प्राकृतिक जीवन-शैली अपनाएं, कैंसर दूर भगाएं

आज बीमारियों की रोकथाम के लिए जितनी तेजी से तरह-तरह की दवाइयों का निर्माण हो रहा है, उतनी ही तेजी से मनुष्य नई-नई बीमारियों के शिकंजे में जकड़ता जा रहा है। इनमें कुछ बीमारियां तो ऐसी भी हैं जिनका अभी तक कोई कारगर इलाज नहीं खोजा जा सका है। कैंसर भी एक ऐसा ही रोग है। रसायनिक दवाइयों से कीमोथैरेपी, विकिरण से रेडियोथैरेपी, हार्मोन थैरेपी तथा इम्यूनोथेरेपी जैसी आधुनिक चिकित्सा प्रणालियों के बाद भी कैंसर से मरने वालों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार पूरे विश्व में प्रतिवर्ष लगभग 80 लाख मौतें सिर्फ विकासशील देशों में होती हैं जहां कैंसर से लड़ने के संसाधन अत्यंत कम हैं। विकसित देशों में व्याप्त जानलेवा रोगों में कैंसर का स्थान चौथा है और 6 प्रतिशत मौतों का कारण है। भारत में मौत के दस प्रमुख कारणों में से कैंसर एक प्रमुख कारण है। यहां एक लाख लोगों में से सत्तर लोगों में कैंसर का प्रकोप देखा गया है और हर आठ में एक को कैंसर होने की संभावना है। हर वर्ष यहां कैंसर के पांच लाख नए मरीज बन जाते हैं। कैंसर एक गैर संक्रामक रोग है। यह कोई वंशानुगत बीमारी भी नहीं है। फिर भी कभी-कभी कुछ परिवारों में यह रोग एक से अधिक सदस्यों को अपनी चपेट में ले लेता है। कैंसर किसी भी आयु में, किसी भी व्यक्ति को हो सकता है। स्त्री-पुरूष, बच्चे, युवा, वृद्ध सभी इसके शिकार हो सकते हैं। कैंसर का सबसे बड़ा कारण है- पर्यावरण प्रदूषण। दो-तिहाई कैंसर गलत खान-पान व रहन सहन की आदतों के कारण होता है जैसे-तंबाकू, बीड़ी, सिगरेट, सुपारी, पान-मसाला, शराब आदि का अत्यधिक सेवन। कुछ दवाइयां, हार्मोंस, एक्स रे एंव अल्ट्रा वायलेट किरणें भी कैंसर का कारण बन सकती हैं। यह मानव शरीर के किसी भी अंग में हो सकता है। वर्तमान में गुटखा या पान मसाला खाने का व्यसन जिस तेजी से बढ़ा है उसी अनुपात में मुंह का कैंसर के रोगियों में भी वृद्धि हुई है। मुंह के कैंसर के इलाज की अब तक कई आधुनिक विधियों का आविष्कार हो चुका है। रेडियोथेरेपी द्वारा मुंह के कैंसर का काफी सीमा तक उपचार संभव है परंतु इन नई विधियों के बाद भी अगर यह बीमारी हो जाए तो आज भी उसका शत-प्रतिशत नहीं है। साधारणतया मुंह का कैंसर उन व्यक्तियों में अधिक होता है जो तंबाकू का प्रयोग चूने के साथ करते हैं एंव बीड़ी, सिगरेट या सिगार पीते हैं। कुछ चिकित्सकीय व्याधियां जैसे टाइलोसिस पामेरिस, पैटर्सनब्राउन, कैलीसिड्रोम, भोजन में आयरन की कमी से होने वाला एनीमिया, ग्रास नली का एक्लेजिया इस कैंसर के अन्य स्वरूप हैं। ग्रास नली के कैंसर का उपचार कीमोथेरेपी, बाह्य विकिरण चिकित्सा और अंत विकिरण चिकित्सा के समन्वित सहयोग से किया जाता है जिसके अच्छे परिणाम सामने आये हैं। फिर भी इसमें 20 से 30 प्रतिशत रोगियों में भी पूर्णरूपेण रोग मुक्त होने की संभावनाएं बन पाती हैं। रक्त कैंसर से हर साल हजारों व्यक्ति मौत के मुंह में जा रहे हैं। रक्त कैंसर के दो वर्ग हैं। एक वर्ग ‘क्रॉनिट रक्त कैंसर’ का तथा दूसरा वर्ग ‘एक्यूट रक्त कैंसर’ का होता है। कुछ कैंसर ऐसे होते हैं जो सिर्फ महिलाओं को होते हैं। इनमें से एक है स्तन कैंसर। पैंतीस से चौवन वर्ष की आयु की महिलाओं को होने वाला सबसे घातक रोग स्तन कैंसर है। वैज्ञानिको के अनुसार स्तन कैंसर हार्मोन में परिवर्तन, बी. आर. ए. सी. जीन, वंशानुगत प्रभावों, अधिक उम्र में गर्भ धारण, मासिक चक्र की अनियमितता, रजोनिवृत्ति एंव पर्यावरण में विद्यमान कैंसरजन्य पदार्थो के कारण हो सकता है। स्तन कैंसर का प्रारंभिक अवस्था में दवाइयों, इंजेक्शनों आदि की मदद से अथवा कैमोथेरेपी चिकित्सा पद्वति द्वारा इलाज किया जा सकता है। सर्जरी, रेडिएशसन एंव हार्मोन थेरेपी स्तन कैंसर के उपचार की अन्य विधियां हैं। कैंसर के अनेक प्रकारों के अनुसार उसके कारण भी बहुआयामी हैं परंतु विभिन्न शोधों से यह तथ्य निर्विवाद रूप से सत्य है कि उसकी रोकथाम में शरीर की आंतरिक क्षमता की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण हो सकती है। कैंसर जैसे रोग के हो जाने के बाद उपचार भले ही कठिन है लेकिन थोड़ी वैज्ञानिक जीवन शैली और थोड़े संतुलित आहार के सहारे काफी सीमा तक अपने आप को कैंसर से सुरक्षित रखा जा सकता है। समुचित खान-पान कैंसर से लड़ने का प्रमुख हथियार बन सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसर कैंसर को नियंत्रित करने में सक्षम विटामिन ‘ए’ और ‘बी’ केरोटीन तत्व प्राकृतिक रूप् से साग-सब्जियों में पाए जाते हैं। ये मेथी, पालक, गोभी, आलूबुखारे एंव गाजर आदि में उपलब्ध होते हैं। जिन देशों-प्रदेशों के लोग भोजन में हरी साग-सब्जी एंव ताजी फलों का सेवन करते हैं, वहां इस के रोगी बहुत कम पाए जाते हैं। विटामिन ‘सी’ से युक्त खाद्य पदार्थो का सेवन करके भी कैंसर से बचा जा सकता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि सीधी-सरल प्राकृतिक जीवनशैली अपनाकर एंव साग-सब्जी तथा ताजे फलों के नियमित सेवन से कैंसर जैसी घातक बीमारी से दूर रहा जा सकता है। इसके लिए लोगों में जागरूकता पैदा करके कैंसर के भयावह शिंकजे से मुक्त रहने का सामूहिक प्रयास किया जाना चाहिए। ‘सादा जीवन, सादा भोजन’ का सूत्र ही मानव जाति को इस भयावह बीमारी से बचा जा सकता है।

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