पत्नी कमाए पति खाएं कहां तक उचित है

हमारे यहां कहा जाता है कि पति पत्नी जीवन की गाड़ी के दो पहिए है और एक दूसरे के समन्वय के बिना जीवन की गाड़ी खींचना मुश्किल है। परंतु कई बार जीवन में ऐसे मोड़ भी आते है जब एक पहिया लड़खड़ाने लगते है और इस लड़खड़ाहट के कई कारण होते है और उनमें एक है जब पत्नी कमाऊ हो जाती है और पति गैर जिम्मेदार। किसी पति से यदि आप पूछे तो क्या वह हामी भरेगा कि वह गैर जिम्मेदार हो गया है? कभी नही, परंतु यदि हम अपने आस पास देखे तो हमें ऐसे कई उदाहरण मिलेंगे जहां पत्नी की कमाई से घर चलने लगता है तो पति को व्यापर करने की सुझती है या फिर आराम करने की। हमारे घरों में काम करने वाली बाईयों का हाल किसी से छुपा नहीं है। उनके पति उनकी कमाई पर ही नशा करते है यह स्थिति हमें निम्न वर्ग में हर जगह नजर आएगी। एक ओर शिक्षा और बदलते वातावरण ने महिलाओं को जागृति दी है वहीं दूसरी ओर इस शिक्षा और कुछ न कुछ काम करने की तमन्ना ने उनको दो पाटों के बीच पीसने पर मजबूर कर दिया है। आज कल बड़े शहरों में ज्यादातर महिलाएं कमाने लगी है। काम कसकर चाहे कोई भी हो, हर महिला चाहती है उसके घर में अतिरिक्त आय हो।
श्रीमति विमला अग्रवाल एक उच्च वर्गीय परिवार की सदस्य है उनके घर में ऐशोआराम की सभी चीजे है। पैसों की बहुलता और नौकरों की बहुत आयत ने विमला को प्रेरणा दी कि वे भी कुछ काम करें। वह बेकार बैठना नहीं चाहती थीं। इसलिए उन्होंने अपने घर के गैरेज में एक दो औरतों को रखकर वंदनवार और शादी विवाह के अवसर पर काम आने वाली ट्रे बनाना शुरू किया। उनका काम चल निकला और अब उसके पति सुनील भी पारिवारिक व्यापार में हाथ बटाने लगे और फिर धीरे धीरे घर पर ही रहने लगे और फिर घर में रोज शाम को ताश की चोकड़ी जमने लगी। उनके दोस्त रोजाना शाम को घर आ जाते और ताश खेली जाती। विमला परेशान रहने लगी। सुनील का कहना था कि जब विमला कमाती है तो उसे कमाने की क्या जरूरत है। कल तक मैं कमाता था आज अगर विमला कमाती है तो इसमें बुराई क्या और पुरूष का गैर जिम्मेदार होने का आरोप क्यों हो मुझ पर। लेकिन विमला को इस बात पर नाराजगी थी कि पत्नियां अगर घर में रहती है तो वो बच्चों को संभालती है और घर की बाकी जिम्मेदारियों को पूरा करती है। वे पति की तरह ताश नहीं खेल सकती। जबकि पति न बच्चों को संभाल सकते है और न ही मेहमानों की आवाभगत कर सकते है तो ये गैर जिम्मेराना ही तो हुआ। कई बार पुरूष के काम बंद करने के कारण कुछ और होते हैं। चूंकि पत्नी काम करते-करते थक जाती है, इसलिए वह पति के काम न करने से परेशान हो जाती है। परंतु कई पुरूष इस पर सवाल उठाते हैं कि यदि पुरूष काम करता है और पत्नी घर में रहती है तो कोई नहीं कहता कि पत्नी गैर जिम्मेदार हो गई है। आजकल सच्चाई है कि ज्यादातर मध्यम और उच्चवर्गीय घरों में घर के काम के लिए अतिरिक्त मदद ली जाती है। परंतु पुरूष को अपना काम स्वतः ही करना पड़ता है। जो बात हमें गैर जिम्मेदार लगती है, वह दूसरे की मजबूरी भी हो सकती है। यह तो परिस्थितियां ही बता सकती हैं कि असलियत क्या है। यह सच है कि पत्नी के काम करने से पति का व्यवहार थोड़ा लापरवाह हो जाता है क्योंकि वह अंदर से आश्वस्त होता है कि पत्नी का घर में सहयोग मिलेगा और उसे अकेले ही सारे खर्च नही चलाने पडेंगे। परंतु इसे गैर जिम्मेदाराना कहना गलत होगा। इस तरह की गैर जिम्मेदारी ज्याददातर निम्न आयवर्गीय लोगों में मिलती है। मध्यम और उच्चआय के दर्जे के लोगों की यह कोशिश रहती है कि यदि पत्नी काम करती है तो घर में कुछ बचत भी हो जाए। पति गैरजिम्मेदार तभी होता है जब उसे महसूस हो कि पत्नी से घर खर्च भली भांति चल रहा है। तब वो भूल जाता है कि उसका भी घर के प्रति कोई कर्तव्य है। पुरानी परिपाटी की पीढ़ी का मानना है कि महिलाओं का बाहर जाकर ही काम करना ही गलत है। क्यूंकि घर में क्या कम काम है जो बाहर जाने की जरूरत पड़े। स्वतंत्रता कि यह पराकाष्ठा है। और इसी का परिणाम है कि पति अपने मार्ग से भटकते है और ये भटकन लापरवाही को जन्म देती है और पति गैर जिम्मेदार होते है। पुरूष जब नारी को अपने से आगे बढ़ता देखता है तो उसके मन में हीन भावना जागृत होती है और यही भावना उसे गैर जिम्मेवार बनाती है।

जब पति हो उम्र में छोटा

ना उम्र की सीमा हो, ना जन्मों का हो बंधन
जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन,
कुछ रिश्तें हमे जन्म के साथ ही प्राप्त होते है जिनमें हम चाहकर भी परिवर्तन नहीं कर सकते। जैसे माता-पिता, भाई बहन इत्यादी। किंतु जो रिश्ते जीवन के दौरान बनते है उनमें हमें चुनाव की स्वतंत्रता होती है जैसे पति पत्नी, बहु, दामाद, मित्र, सखा, संबंधी इसी तरह शादी ब्याह ऐसा ही एक संबंध है जिसमें हम चुनाव कर सकते है। आयु, परिवार, जाति, राज्य सभी मामलों में नियम न होने के बाद भी हम समाज द्वारा बनाये गए नियमों पर ही चलते आ रहे है। जिसमें तय है विवाह अपनी जाति में हो, बराबर के परिवार में हो, पति उम्र में बड़ा हो और दोनों की समाजिक और आर्थिक स्थिति में ज्यादा अंतर न हो। बदलते परिवेश में समय के साथ साथ इन मान्यताओं पर ध्यान तो दिया जाता है परंतु पालन नहीं। अब लड़के लड़कियां अपनी पसंद और इच्छानुसार शादी विवाह करने लगे तो जाति, धर्म, आयु, गोत्र, परिवार के बंधन भी ढीले पड़ने लगे है। दरअसल जब दिल का मामला हो तो फिर अन्य सारी बातें गौण हो जाती है। ऐसे कई मामलों में लड़कियां उम्र में अपने से छोटे लड़के से शादी कर लेती है। कुछ जोड़े तो उम्र भर सफलता पूर्वक साथ निभाते है। परंतु कुछ मामलों में ये सफर दो चार कदम चल कर अलग राह पकड़ लेता है।
हमारे समाज में विवाह मात्र दो प्राणियों का मिलन न होकर दो परिवारों का समन्वय होता है। जहां परिवार की मर्यादा बचाए रखने के लिए कई बार लोग न चाहते हुए भी मजबूरन एक दूसरे से निभा लेते है। ऐसी स्थिति में पति पत्नी के अलावा परिवार के अन्य सदस्यों से भी परिपक्वता की उम्मीद की जाती है। आमतौर पर स्त्री, पुरूष की अपेक्षा अधिक सहनशील और परिपक्व मानी जाती है। इसी कारण आमतौर पर वर वधु से अधिक उम्र का ही ढूंढा जाता है यही परंपरा बन गयी है कि विवाहिक जीवन के सुख पूर्ण होने के लिए पति को पत्नी से उम्र में बड़ा होना चाहिए। एक समय था जब बालविवाह कर दिए जाते थे, कुलीन परिवार में कन्या का विवाह करने की चाह में बेमेल विवाह भी कर दिए जाते थे। कई बार तो मात्र तेरह व चौदह वर्ष की कन्या का विवाह उसके पिता की आयु के बराबर व्यक्ति से कर दिया जाता था। पत्नी जब यौवन की दहलिज पर पहुंचती पति के पैर कब्र में पहुंचने लगते। समय के साथ परिवर्तन आए और स्त्रियों को स्वतंत्रता जागी। वैचारिक स्वतंत्रता प्रमुख थी उसमें। अब वे शादी विवाह के मामले में मुखर हो गई थी। यदि कोई युवती अपने से छोटे उम्र के युवक को पति बनाना चाहे तो कोई समाज का बंधन या कानून का बंधन उसे नहीं रोक सकता। वैवाहिक मतभेद तो समान आयु वाले जोड़ों में या पत्नी के छोटी उम्र के हाने पर भी होते हैं, फिर उम्र का फासला इतना महत्वपूर्ण क्यों हो? समय के साथ-साथ शिक्षा का प्रचार होने से स्त्रियां जागरूक हुई हैं। अधिकांश छोटी उम्र में घर बसा कर पति और बच्चों में व्यस्त होने के बजाय कैरियर बनाने को प्राथमिकता देने लगी हैं। घर परिवार में उनका निर्णय भी महत्व रखने लगा है। जिसके चलते वैवाहिक संबंधो में उम्र की दूरियां भी घटने लगी हैं। कुछ साल का ही अंतर रह गया है पति पत्नी के बीच, कभी कभी एकाध साल या कभी तो लगभग समान आयु वालों में भी संबंध होने लगे हैं। अब विवाह संबंध के लिए पति का उम्र में बड़ा होना अति आवश्यक नहीं माना जाता बल्कि बहुस सी जोड़ियों में पति कम उम्र के भी होते है और पत्नी उम्र में उनसे बड़ी।
समाज शास्त्रियों के अनुसार लड़कियां जल्दी परिपक्व और समझदार हो जाती है। जबकि लड़कों को विकसित होने में कुछ देर लगता है। यह भी एक कारण है कि विवाहित युगल में लडके की उम्र अधिक होना समाज की दृष्टि में ठीक माना जाता है। यही कारण है कि कानूनन भी लडकियों के लिए विवाह की न्यूनतम आयु अठारह वर्ष है और लड़कों के लिए इक्कीस वर्ष। मगर आज की सोच के अनुसार उम्र बड़ी या छोटी होना समझदारी का पैमाना नहीं है। कहा भी गया है कि अक्ल का होता नहीं है वास्ता कुछ उम्र से, अगर नहीं आती तो सौ बरस तक भी नहीं आती। अब तो शादी ब्याह दिल का मामला हो गया है। जिस पर दिल आ जाए उसी से शादी की जाएं।
लड़कियों का अपने से कम उम्र के लड़के से शादी का प्रचलन नया नहीं है, इससे पहले भी यह होता आया है और ऐसी शादियां सफल भी हुई है। कुछ प्रसिद्ध हस्तियां जैसे सुनील दत्त, सचिन तेंदुलकर। व्यवाहिक जीवन के लिए जो बात मायने रखती है वह है अंडरस्टैडिंग जो इन जोड़ों में और इन जैसे और बाकि सफल जाड़ो में रही। विरोधाभास कहां नहीं है? हर सिक्के के दो पहलू होते है। कई बार पति के उम्र में छोटे होने पर समस्याएं खड़ी हो जाती है जैसे – जिम्मेदारियों के बोझ से पत्नी की उम्र कुछ वक्त बाद परिपक्वता के चलते बड़ी दिखने लगती है और दूसरी तरफ पति देव की उम्र बढ़ने के साथ उसमें रंगीन मिजाजी चरम सीमा पे पहुंच जाती है। उसकी दिलचस्पी कम उम्र की लड़कियों की तरफ बढ़ने लगती है। अपनी पत्नी प्रौढ़ा लगने लगती है। ऐसे में प्यार सामिप्य कम होने लगता है और रिश्तों में विरोधाभास बढ़ता चला जाता है।
कोई भी परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी चले तो वह वैचारिक सत्वता बन जाती है। जिसे तोड़ना समाज में उथल पुथल को जन्म देता है। विवाह में भी इसी लिए पुरूष को बड़ा होना माननीय है क्योंकि लीक से हटकर किए गए फैसले दंपति में फासले ही लाएंगे।
हमारे पूर्वजों ने जो नियम बनाएं उन में वैज्ञानिक सोच भी शामिल थी। नियम तो यही है कि लड़के और लड़की की उम्र में दो पांच साल का फासला होना ही आदर्श अंतर है। क्यूंकि लड़कियां अपने अचेतन पति में पिता का सामर्थ्य खोजती है जो उन्हें छोटी उम्र की पति में नहीं मिलता और लड़के पत्नी में मां की छवि अपेक्षा करते है। यानि सहचर्या के साथ ममता भी चाहते है।
आज पति का उम्र में पत्नी से छोटा होना कोई समस्या नहीं लगता कुछ समय से यह चलन बढ़ा है, दोनो तरफ से वफादारी और प्रेम से इस रिश्ते को सिंचा जाएं तो छोटे उम्र का पति भी सफल पति साबित होगा, बड़ी उम्र की पत्नी भी पति की प्रिय बनी रहेगी। उम्र का अंतर पृष्ठभूमि की भिन्नता तथा यहां तक की कुछ मामलों में वैचारिक मतभेद भी उनके सुखद वैवाहिक जीवन में अर्चन नहीं बन पांए।

लड़की को इंप्रेस करने से चूके तो रह जाएंगे खाली हाथ

लड़कियों को खु्श करना बहुत मुश्किल होता है। यदि आप थोड़ी सी भी चूक कर दें तो आपको लेने के देने पड़ सकते हैं। लड़कियों को खुश करने और उनका दिल जीतने के लिए आपको बहुत सावधानी बरतने की जरूरत है। इतना ही नहीं इसके लिए सबसे पहले माहौल को परखना भी बेहद जरूरी है। यदि आप भी लड़कियों को खुश करने के उपाय खोज रहे हैं तो परेशान ना हो। हम आपको बता रहे हैं लड़कियों का दिल जीतने और उन्हें खुश करने के टिप्स के बारे में।

माहौल को परखें – लड़कियों को खुश करने और उनका दिल जीतने के लिए सबसे पहले आपको चाहिए कि आप उनसे जाकर तुरंत अपने प्यार का इजहार ना करें। बल्कि पहले उनके आसपास के माहौल को अच्छी तरह से जाने-समझें। नहीं तो आपको लेने के देने पड़ सकते हैं।

पहले दोस्ती करें – लड़की को प्रपोज करने से पहले आपको चाहिए कि पहले आप उनसे दोस्ती की मांग करें। उनसे दोस्ताना संबंध बनाकर आप उन्हें आराम से अपने दिल की बात बता सकते हैं।

बातचीत करें लड़की को प्रपोज करने से पहले आप उनसे बातचीत करें। उन्हें यह अहसास ना करवाएं कि आप उन्हें प्रपोज करने की योजना बना रहे हैं। आमतौर पर लड़कियां बात करने की शौकीन होती हैं। ऐसे में आपमें बात करने का हुनर होना चाहिए।

बॉडी लैग्वेंज को समझें – किसी भी लड़की से बात करने या उन्हें खुश करने के लिए आपको चाहिए कि आप ये जानें कि लड़कियां आपसे बात करने में रूचि ले भी रही हें या नहीं। क्या उनको आपकी बातों में मजा आ रहा है या नहीं।

इंप्रेस करना है जरूरी – लड़कियों को अपनी ओर आकर्षित करने और उन्हें खुश करने का सबसे बढ़िया फॉर्मूला है कि आप उन्हें इंप्रेस करें। यदि आपको अहसास होता है कि लड़की आपकी इंप्रेस है तो आपको मुस्कुराकर प्यार से बात करनी चाहिए।

पॉजिटिव एटीट्यूट रखें – आपको चाहिए कि लड़कियों से पॉजिटिव बात करें और अपने एटीट्यूट को पॉजिटिव रखें, ताकि लड़कियों आपसे बात करने के लिए प्रेरित हो।

हंसी-मजाक भी करें – आपको चाहिए कि आप सीरियस बातों और हल्की-फुल्की बातों के बीच तालमेल बनाकर रखें। आप सिर्फ गंभीर या फिर सिर्फ हंसी मजाक ही ना करते रहें। इससे आपसे लड़कियां बात करने की इच्छुक होंगी। आपको चाहिए कि आपके आसपास के लोग उदास हें तो आप उनको हंसा सकें।

संकोची ना बनें – आपको चाहिए कि आप लड़कियों के आगे बिल्कुल भी नर्वस ना हो। ना ही आप बात करने से डरे और संकोची स्वभाव तो बिल्कुल नहीं होना चाहिए, वरना लड़कियां आपसे दूर भागने लगेंगी।

क्या मैं आपके लिए हूं??

आजकल प्यार होने में ज्यादा देर नहीं लगती। तो जाहिर है आई लव यू कहने में भी ज्यादा देर नहीं लगाते होंगे। कई बार आप किसी से प्यार तो करते हैं लेकिन इस बात से अनजान होते हैं कि वाकई आप उससे प्यार करते हैं या फिर नहीं। आपको समझ नहीं आता कि आपके साथ जो हो रहा है कि वो क्या है। लेकिन आपको किसी के प्यार में पड़ने से पहले कुछ बातों का खासतौर पर ख्याल रखना चाहिए। किसी के साथ रिलेशनशिप में आने से पहले ये पांच सवाल खुद से पूछें….

क्या वो आपके लायक है? – आपको रिलेशन बनाने से पहले उस व्यक्ति को जानना चाहिए कि आप जिसे प्रपोज करने वाले हैं क्या वाकई वो आपके लायक है। क्या वह आपको वो सम्मान और प्यार दे पाएगा जिसकी उम्मीद आप करते हैं। आपके प्यार में पड़ने से पहले अपने पार्टनर की खूबियों, अपनी और उसकी समानताओं और अंतर का भी ध्यान रखना चाहिए। इससे आपको रिश्ते को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी।

क्या आप वाकई उसे चाहते हैं? – सबसे पहले आपको अपने प्यार को प्रपोज करने से पहले इस बात को अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए कि आप वाकई उसको चाहने लगे हैं। किसी से रिलेशन में बंधने से पहले जाने लें कि वाकई आपको उसकी जरूरत है। आमतौर पर रिश्ते जरूरत पर ही बनते हैं। आपको अपने आपसे पूछना चाहिए कि आप नया रिश्ता क्यों बनाना चाहते हैं।
क्या मैं ये जिम्मेदारियां निभा सकूंगा? – आपके प्यार में पड़ने का कारण कोई भी हो सकता है। लेकिन आपको चाहिए कि आप पहले खुद क्लियर हो। साथ ही आपको यह भी ध्यान रखना चाहिए यदि आप अपने प्यार के रिश्ते को आगे तक ले जाएंगे तो कहां तक। आपको प्यार में पड़ने से पहले अपने बारे में पता होना चाहिए कि क्या आप इस रिश्ते के काबिल हैं। आपको जानना चाहिए कि क्या आप वो जिम्मदारियां निभा पाएंगे जो प्यार में पड़ने के बाद निभाई जाती हैं।

क्या वो भी मुझे इतनी ही अहमियत देता है? – आपको यह भी तय कर लेना चाहिए कि आप अपने साथी के बारे में जैसा महसूस कर रहे हैं क्या वह भी आपको उतनी ही अहमियत देता है। किसी के प्यार में पड़ने से पहले या किसी को प्रपोज करने से पहले आपको अपनी क्षमताओं का भी ध्यान रखना है। ऐसे में नया रिलेशन बनाते हुए आपको पहले भावनात्मक रूप से जुड़ना बहुत जरूरी है। यदि आप अपने प्यार को आगे की ओर ले जाना चाहते हैं तो आपको सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि आपका निर्णय सही है या नहीं। इस तरह से आप आसानी से जान सकते हैं कि क्या आप वाकई नए संबंध बनाने के लिए तैयार हैं। आमतौर पर किसी भी व्यक्ति के बारे में जरूरत से ज्यादा ख्यालात आने या उसकी हर छोटी-बड़ी बात अच्छी लगने का अर्थ है कि आप उसे पसंद करने लगे हैं। ऐसे में आप जल्दबाजी में कोई फैसला ना लें बल्कि अच्छी तरह से सोच-विचार कर लें।

हो चुकी है गर्मियों के मौसम की शुरूआत

गर्मियों के मौसम की शुरूआत हो चुकी है। इस मौसम में हर कोई गर्मी से बचने और रिलैक्स होने के लिए कूल जगहों पर जाना पसंद करते हैं। खासकर जब बात बच्चों की छुट्टियों की आती हैं तो वह भी अपनी इन वेकेशन को एन्जॉय करने के लिए पहाड़ों की सैर, खूबसूरती और कूल जगहों का चुनाव करते हैं। इसलिए आज हम आपको भारत की कुछ ऐसी ही जगहों के बारे में बताएगें जहां पर आप वेकेशन को एंजॉय करने के साथ ठंडक का अहसास भी कर सकते हैं। तो आइए जानते है इन जगहों के बारे में
औली, उत्तराखंडः- औली उत्तराखंड का एक भाग है। यह जगह काफी शांत और सुकून भरी होने के कारण पर्यटक यहां पर अप्रैल से ही घुमने के लिए आने लगते हैं। चारों तरफ बर्फ से ढके रहने के कारण यहां का टेंपरेचर 7-17 डिग्री रहता है। इसलिए यह जगह आपके लिए वेकेशन को एंजॉय करने के लिए बेस्ट हैं।
पंचमढ़ी, मध्य प्रदेशः- मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले में स्थित पंचमढ़ी मध्य भारत के सबसे खूबसूरत पर्यटन स्थलों में एक है। यह चारों ओर से पहाड़ी से घिरा हैं। यहां पर देखने के लिए बहुत सी गुफाएं, जंगल और बैम्बू फॉरेस्ट हैं। गर्मियों के मौसम में यहां आकर आप ठंडक महसूस करेंगे।
मॉन, नागालैंडः- अगर आप गर्मियों की छुट्टियों में घूमने के लिए प्लान कर रहें है तो मॉन, नागालैंड जाएं। यहां पर अप्रैल के पहले वीक में नए साल का स्वागत एलेआन्ग फेस्टिवल कोन्याक नागा को सेलिब्रेट करके किया जाता है। जिसमें डांस, म्यूजिक और कई प्रकार के खेल खेले जाते हैं।
साराहान, हिमांचल प्रदेशः- घूमने के लिए आप अप्रैल माह में साराहान जाएं। चारों ओर पहाड़ियों से घिरी यह जगह हिमांचल प्रदेश में स्थित हैं। यहां पर एक पार्क ऐसा है जो पक्षियों की ब्रीडिंग के लिए मशहूर है। यहां पर सारा साल टूरिस्ट की भीड़ लगी रहती है।
कदमत आइलैंड, लक्षद्वीपः- कदमत आईलैंड की नेचुरल ब्यूटी देखने में बहुत ही खूबसूरत है। लक्षद्वीप का यह 3.12 स्क्वेयर किमी के एरिया में फैला बहुत ही छोटा-सा आइलैंड है। यहां पर आने वाले टूरिस्ट को ड्राइविंग, स्नॉकर्लिंग और स्वीमिंग जैसी कई सुविधाएं दी जाती है।
कन्याकुमारी, तमिलनाडुः- भारत के सबसे दक्षिणी छोर पर बसा कन्याकुमारी वर्षों से कला, संस्कृति, सभ्यता का प्रतीक रहा है। भारत के पर्यटक स्थल के रूप में भी इस स्थान का अपना ही महत्व है। यहां पर स्वामी विवेकानंद ने 3 दिनों तक तपस्या की थी। यहां पर देखने के लिए गांधी मेमोरियल भी है। अप्रैल माह में यहां पर घूमने के लिए दर-दर से टूरिस्ट आते हैं।
दार्जिलिंग, पश्चिम बंगालः- बारिश के मौसम में दार्जिलिंग जाने का अलग ही मजा है। दार्जिलिंग शहर पश्चिम बंगाल में स्थित है। यहां पर होने वाली चाय की खेती पूरी दुनिया में मशहूर है। बारिश के मौसम में यहां काफी संख्या में लोग घूमने आते हैं। यहां पर आप टॉय ट्रेन का भी लुत्फ ले सकती हैं। टॉय ट्रेन दार्जिलिंग के पर्यटकों के आकर्षण का बड़ा केंद्र है।
वायनाड़, केरलः- अगर आप अपने मूड़ को रिफ्रेश करने के लिए घूमने जाना चाहते हैं तो वायनाड जाएं। यहां के हरे-भरे पहाड़, खुशबू बिखेरते इलायची, वनीला, कॉफी और चाय पीने से आपका मूड फ्रेश हो जाएगा और अच्छे से छुट्टियों को इंजॉय कर सकते हैं। इसे पुरानी जनजातियों का गढ़ भी कहा जाता है।
कलीमपोंग, पश्चिम बंगालः- आपके ट्रिप को रोमांचक बनाने के लिए कलीमपोंग जाएं। यह जगह पश्चिम बंगाल में स्थित है। अप्रैल में यहां पर दूर-दूर से पर्यटक आते हैं। यहां पर आप जंगलों में रेड पांडा और ब्लैक बियर भी देख सकते है। यहां की खूबसूरत वादियां देखने लायक हैं।

समय के अभाव के सितम की गाज जब मां और संतान के रिश्तों पर गिरती है तो, सारे समाज का ढांचा चरमरा जाता है। आज के जेट युग में नौकरी पेशा मां के पास बच्चें के लिए वक्त नहीं। “क्वालिटी टाइम” जैसी वाहियात बातों की सफाई देकर सच को नहीं झुठलाया जा सकता। उपभोक्तावादी संस्कृति, उच्च स्तरीय जीवन का क्रेज और अपनी पहचान बनाने की होड़ स ेउपजी स्वार्थ परक्ता माताओं को अपने जायों से ही दूर कर रही है।
क्या कहते हैं मां बापः- वे कहते हैं यह मारा मारी, नाइन टू सेवन की जिंदगी हम बच्चों के लिए ही तो जी रहे हैं। बच्चों को सभी सुख सुविधायें, अच्छी शिक्षा, स्टैंडर्ड लाइफ दे सके। इसीलिए तो हम जी तोड़ मेहनत करते हैं। हमारे त्याग को वे आज समझें, ना समझें कभी तो समझेंगे ही। दीपाली माथुर का कहना है, “हमने अपने बेटे संचित को वैलहम जैसे महंगे और प्रेस्टीजियस स्कूल के बोर्डिंग में इसीलिए तो डाला है ताकि उसका भविष्य बना जाए, इसलिए तो मुझे नौकरी करनी पड़ रही है।”
परिस्थितिवश भी बढ़ती है दूरीः- नीलेश का ट्रांसफर किसी छोटे शहर में हो गया, तो पत्नी और दोनों बच्चें जयपुर ही रहे ताकि बच्चों की पढ़ाई में हर्ज न हो। नीलेश का ट्रांसफर बाद में किसी और जगह हो गया। बच्चों के साथ ही नीलेश और उसकी पत्नी में भी दूरियां आ गई थी। नीलेश ने दूसरी औरत को रख लिया था। मां को घर बिखरने के गम से ज्यादा अपने पर फक्र था कि ये त्याग मैंने अपने बच्चों के लिए किया। निषिता सारा दिन ऑफिस में कम्प्यूटर पर काम करके इतना थक जाती थी कि नन्हीं साक्षा के साथ समय बिताने के लिए उसके पास ऊर्जा ही शेष नहीं बचती थी। उसके सवालों का जवाब देते समय वह खीज जाती थी। मां के बजाय साक्षा पड़ोस वाली आंटी के ज्यादा करीब हो गई थीं।
टी. वी. केबल संस्कृतिः- मां की ममता, दुलार, उसका अभय दान देता संरक्षण, सुखदायी सान्निध्य और एक अवर्णंनीय निरंतर प्रवाहित होती ऊष्मा का अपने आप में संपूर्ण अहसास ना मिलने पर बच्चा एक अव्यक्त गहरी उदासी में डूब जाता है। ऐसे में वह अपना मन कंप्यूटर गेम्स, टी. वी. से बहलाते है। आज जो बच्चे असमय बड़े होते नजर आते है इसके पीछे टी. वी. कल्चर का बड़ा हाथ है। वे धीरे-धीरे इतने टी. वी. एडिक्ट हो जाते है कि, उन्हें बाहर खेलना, मित्र बनाना भी अच्छा नहीं लगता। एकाकी होते बच्चे अपने में ज्यादा गुम रहने लगते हैं। टी.वी. के कारण आपसी संवाद भी नहीं हो पाता है क्योंकि मां भी कम टी.वी. की शौकीन नहीं होती।
एकल परिवार भी कारण हैः- होना तो ये चाहिए था कि, एकल परिवार में बच्चा मां के और करीब आ जाता किंतु हुआ ठीक विपरीत। एकल परिवार में मां की जिम्मेदारियां ज्यादा बढ़ जाती है। काम पर जाना है तो बच्चें को क्रेच में छोड़ना है या फिर आया या नौकर के भरोसे। बच्चे को वे अपने ढंग से देखेंगे। हो सकता है गलत आदतें डाल दें। क्रच्च में वह अपनापन कहां जो बच्चें के स्वस्थ विकास के लिए पहली शर्त है।
सुविधायें देकर कर्तव्य पालनः- माना कि सुविधाओं की जीवन में अहमियत है और सुविधायें है कि जिनका काई छोर ही नहीं। उपभोक्तावादी संस्कृति का कमाल है कि बाजार हर तरफ की नामी “सॉफिस्टिकेटेड“ चीजों से अटा पड़ा है। बच्चों की आदतें भी ऐसी बन गई है कि बोलना शुरू ही हुएं है और सादी लेमनचूस टॉफी गोली की जगह फाइव स्टार केड्बरी और ये पिन और वह पिन जैसे न जाने कैसे-कैसे नामों की महंगी टॉफियों की मांग करने लगते है। आधी से ज्यादा “सोकॉल्ड” सुविधायें असुविधा ज्यादा सिद्ध हो रही है। ये सुविधाओं का ही अंजाम सामने आ रहा है कि बड़े-बड़े अमीर घरों के बिगड़े नवाबजादे अपराधी बन कर बैंक लूटते, लड़कियां छेड़ते और नशे के आदी बनते जा रहे हैं। सब चीज एकदम से मिल जाने से न बच्चों को चीजों की कद्र करनी आती है न मिलने पर उन्हें उसके बिना रहना भी नहीं आता है। आज बच्चों पर पढ़ाई का जबर्दस्त भार है। ऊपरसे अभिभवकों की उनको लेकर महत्वाकांक्षाए बच्चों को तनावग्रस्त कर देती है। हाल ही में बच्चों पर आई. सी. एम. आर. और ‘इंस्टीट्यूट ऑफ होम इकनॉमिक्स’ द्वारा की गई स्ट्डीज से पता चला है कि, आठ सौ बच्चों में से 25 प्रतिशत बच्चों को हाई कोलेस्ट्रोल, 35 प्रतिशत ओवरवेट, 13 प्रतिशत अंडरवेट हैं। क्या कारण है कि 13 साल के किशोर बढ़े हुए रक्तचाप, हार्ट प्रॉब्लम, डायबीटिज और विभिन्न प्रकार की एलर्जी तथा मनाविकारों के शिकार होकर अस्पताल पहुंच जाते है? सिर्फ शिक्षा पद्धति ही बच्चों में तनाव की जिम्मेदार नहीं, माता-पिता की बच्चों से ढेर सारी उम्मीदें भी बच्चों में तनाव का कारण बन जाती है। वे चाहते हैं कि बच्चें शीघ्र ही पढ़ाई में अव्वल आने के साथ हर क्षेत्र में टॉप करें। फिर चाहे वह म्यूजिक, डांस, पेंटिग, क्राफ्ट क्लासेज, स्पोर्टस, स्विमिंग जैसे भिन्न क्षेत्र ही क्यों न हों। बच्चों और अभिभावकों में फिर संवाद के लिए समय ही कहां बचता है। रहा सहा समय टेलीविजन ले लेता है। बच्चों में बढ़ते तनाव के कारण, आत्महत्या के आंकड़े चौकाने वाले हैं। अभिभावकों की जिम्मेदारी है कि वे उनके मन, उनकी परेशानियों को समझें। उनसे निरंतर संवाद बनाए रखें चाहे वे कितने ही थके हों। सोने जाने से पहले वे उनके साथ वार्तालाप करें। कुछ अपनी कहें कुछ उनकी सुनें। परिवार के साथ छुट्टियां बिताना बहुत अहमियत रखता है। जहां पर परिवार के सदस्य बढ़िया वक्त साथ गुजारते हैं, वहीं किशोर होते बच्चों को वैज्ञानिक ढंग से शारीरिक शिक्षा भी थोड़ी बहुत अभिभावक जैसे बाप बेटे को, मां बेटी को दे सकते है। उनमें होने वाले शारीरिक परिवर्तन उन्हें परेशान कर इधर-उधर से अध-कचरा ज्ञान बटोरने पर मजबूर करते हैं। बेहतर है कि अभिभावक स्वंय उन्हें सही तौर पर इस विषय में जानकारी दें ताकि वे इन परिवर्तनों को सहज रूप से ले सके।

किशोरावस्था जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव है। इस उम्र में बच्चों में बहुत बदलाव आते हैं। बच्चों को इस उम्र में समझ पाना जितना जटिल काम है उतना कभी नहीं। बच्चों के विकास में उनके परिवार के साथ-साथ मित्रों का भी सहयोग होता है। किशोरावस्था में तो परिवार से भी ज्यादा उनके दोस्तों और सहेलियों का उन पर प्रभाव पड़ता है। इसी से उनका व्यक्तित्व बनता या बिगड़ता है। उस उम्र में वे सिर्फ दोस्तों के सम्पर्क में ही रहना चाहते हैं। उनसे ही मोहब्बत करना चाहते हैं। उनके साथ ही हर जगह घूमना और जाना पसंद करते हैं। उनके साथ पार्टियों में शराब-सिगरेट पीना पसंद करते हैं। वे उनके साथ सारे अनुभव बटोरने को तैयार रहते हैं। अनुभव लेने के चक्कर में वे खुद पर नियंत्रण नहीं रख पाते। वे चाहें तो इस सबका सेवन करने के लिए अपने दोस्तों को मना कर सकते हैं। उन्हें रोक सकते हैं। जब उनके दोस्त उन्हें गलत चीजें खाने-पीने के लिए उत्सुक कर सकते हैं तो क्या वे अपने दोस्तों को इन गलत चीजों के सेवन से नहीं रोक सकते? उन्हें रोकने की हिम्मत तो उन्हें दिखानी ही होगी। यह उम्र इसलिए कच्ची भी कही जाती है क्योंकि इस उम्र में नादानियों में किशोर-किशारी ऐसे कदम उठा लेते हैं जो उन्हें जीवन भर के लिए अपराधी बना देते हैं। इस उम्र के लड़के लड़कियों का एक दूसरे के प्रति आकर्षित होना स्वाभाविक है। जरूरी नहीं कि आपकी बेटी लड़को से दोस्ती करती है तो उसके प्रति प्रेम व्रेम जैसा भी कुछ मन में रखती है। इस उम्र की दोस्ती में भावनात्मक जुड़ाव पैदा होना लाजिमी है मगर अपने बच्चों को इस हद से आगे न बढ़ने की हिदायत दें। इस उम्र में लड़के-लड़कियों का आपस में दोस्ती रखना कोई गलत बात नहीं किंतु सोचने वाली बात यह है कि उनकी दोस्ती का स्वरूप क्या है? कहीं इस दोस्ती के कारण वे पढ़ाई में तो नहीं पिछड़ रहे हैं। जो आपको पढ़ने के लिए प्रेरित न करें, वे आपके अच्छे दोस्त नहीं हो सकते। अगर वे आपके सच्चे दोस्त होते तो आपको पढ़ने से नहीं रोकते। अपने दोस्तों को पहचानना सीखें। बच्चों को प्यार और सेक्स की जानकारी दें। इस उम्र में सबसे जरूरी है पढ़ाई। बाकी बाद की चीजें है। सबसे पहले अपना कैरियर बनायें। उसके बाद कुछ और हो। हर घर के कुछ कायदे-कानून होते हैं। बच्चों को भी अपने घर के कायदे-कानून मानने चाहिए। उन्हें यह मालूम होना चाहिए कि यदि वे अपने घर के नियमों को नहीं मानेंगे तो उनके माता पिता यह बर्दाश्त नहीं करेंगे। किस समय क्या चीज जरूरी है, उन्हें उसे ध्यान में रखना होगा? पढ़ाई के समय पढ़ाई ही जरूरी है। जरूरी नहीं कि आपके बच्चे सारा दिन पढ़ाई करें किंतु दिन में तीन-चार घंटे तो उन्हें पढ़ाई को देने होंगे। पढ़ाई के समय यदि उनके मित्र उन्हें परेशान करते हैं तो वे उनके अच्छे दोस्त नहीं हैं। आप भी ऐसे दोस्तों को अपने बच्चों के साथ मिलने न दें। अगर आपको अपने बच्चों के किसी दोस्त से परेशानी है या उसे आप पंसद नहीं करते तो अपने बच्चे के साथ बैठकर उससे इस विषय में बात करें। यदि वह आपको उसकी कुछ अच्छाई बताता है तो उसे स्वीकार करें किंतु उसे यह भी बता कि यदि आपने उसके दोस्त में कोई झूठी या गलत बात देखी तो आप उसे बर्दाश्त नहीं करेंगे। आप तुरंत उसे उससे दूर कर देंगे। अपने बच्चें का स्कूल बदलवा देंगे। अगर आपके बच्चों को यह पता है कि आप जो कहते हैं वो करते जरूर हैं तो आपके बच्चें अपनी हद पार नहीं करेंगे।

नारी के जीवन में आने वाली रजोनिवृति की तरह की ही स्थिति पुरूषों के जीवन में भी आती है जिसे ‘एडम’ यानी ‘एंड्रोजन डेफिशिऐंसी इन एजिंग मेल्स’ कहा जाता है। ऐसा उन वैज्ञानिकों का कहना है जो कई दशकों से उम्र बढ़ने के साथ पुरूषों के शरीर पर पड़ते प्रभाव का अध्ययन करते आ रहे थे। उम्र बढ़ने के साथ पुरूषों के स्वभाव में भी परिवर्तन आने लगता है। 40 वर्ष की उम्र के बाद पुरूषों के शरीर में सैक्स हारमोन ‘टेस्टोस्टेरोन’ की उत्पत्ति कम होने लगती है जिसका असर पुरूष के यौन जीवन और स्वभाव पर पड़ता है। टेस्टोस्टेरोन की उत्पत्ति कम होने के कारण प्रायः पुरूषों में कामेच्छा कम हो जाती है और चिड़चिड़े हो जाते हैं। हड्डियों और जोड़ों में दर्द होने लगता है। अंगों पर चर्बी बढ़ने लगती है और वे तनाव तथा डिप्रेशन का शिकार हो जाते है। ये सभी लक्षण ‘एडम’ अर्थात ‘एंड्रोजन डेफिशिऐंसी इन एजिंग मेल्स’ के हैं। कुछ वैज्ञानिक महिलाओं में होने वाली रजोनिवृति की प्रक्रिया तथा एडम की प्रक्रिया, दोनों को एक सा मानते हैं लेकिन कुछ अन्य वैज्ञानिक इस विचार से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि ‘एडम’ की तुलना रजोनिवृति से नहीं की जा सकती क्योंकि रजोनिवृति के बाद एंड कोशिकाओं में एग सेल्स का निर्माण होना बंद हो जाता है और महिलाएं गर्भधारण करने में अक्षम हो जाती है लेकिन एडम के चलते पुरूषों में ऐसी स्थिति नहीं आती है। उनके शरीर में जीवन भर निरंतर शुक्राणु बनने की प्रक्रिया जारी रहती है। पुरूष 60 या 70 साल की उम्र में भी गर्भाधान कराने में सक्षम होते हैं यद्यपि उस समय उनके जननांगों में पर्याप्त उत्तेजना नहीं आती। एडम को तुरंत नहीं पहचाना जा सकता क्योंकि यह स्थिति धीरे-धीरे आती है और अधिकांश पुरूष इसे उम्र का प्रभाव मान लेते हैं कि शरीर अब बुढ़ापे की ओर अग्रसर हो रहा है। डॉक्टरों का कहना है कि यह बुढ़ापे की अवस्था नहीं है बल्कि सैक्स हारमोन टेस्टोस्टेरोन की मात्रा में कमी के कारण यह स्थिति है जिसे इलाज द्वारा दूर किया जा सकता है, इसलिए एडम के लक्षणों के पता चलते ही पुरूषों को सतर्क हो जाना चाहिए। टेस्टोस्टेरोन पुरूषों के शरीर में पैदा होने वाला एक हारमोन है जिसे सैक्स हारमोन या एन्ड्रोजेनिक हारमोन कहा जाता है। इस हारमोन का निर्माण वृषणों मे होता है। एक पुरूष के अंदर प्रतिदिन 4.7 मिलीग्राम होता है। इसी हारमोन की दौलत एक दुबला पतला किशोर पूर्ण पुरूष में बदल जाता है। उसके जननांगों और शरीर का विकास होता है। चेहरे पर दाढ़ी-मूछें व शरीर पर घने बाल निकल आते है। शुक्राणु जनन की प्रक्रिया शुरू होती है। इस हारमोन का निर्माण किशोरावस्था में शुरू हो जाता है। एडम की अवस्था में मधुमेह व दिल की बीमारियों जैसे घातक रोग उभर सकते हैं। रोग पैदा होते ही उपचार कराना चाहिए। टेक्सास विश्वविद्यालय, ह्यूस्टन के एसोसिएट प्रोफेसर राबर्ट टान के अनुसार टेस्टोस्टोरोन हारमोन की कमी के कारण पुरूष में स्मरण शक्ति की कमी, हड्डियों के टूटने का खतरा, नपुंसकता और डिप्रेशन आदि का शिकार हो सकते हैं। हारमोन कमी को पूरा करके रोगी को इन परेशानियों से छुटकारा दिलाया जा सकता है। डॉ. टान के अनुसार टेस्टोस्टेरोन का स्मृति से सीधा संबंध है। जब उन्होंने इस हारमोन की कमी वाले पुरूषों को एंड्रोजन हारमोन दिया तो उनकी स्मरणशक्ति आश्चर्यजनक रूप से बढ़ गई। डॉ. टान द्वारा कराए गए सर्वेक्षण में पाया गया कि प्रति दिन 10 सिगरेट से ज्यादा सिगरेट पीने वाले पुरूषों में सिगरेट पीने वाले पुरूषों की तुलना में एंड्रोपोज की अवस्था जल्दी आती है। यही बात स्त्रियों के साथ भी है। ज्यादा मद्यपान व धूम्रपान करने वाली महिलाओं में रजोनिवृति जल्दी होती है। टेस्टोस्टेरोन हारमोन पुरूषत्व प्रदान करता है। इस हारमोन की कमी के कारण पुरूष, तनाव, चिड़चिड़ापन, डिप्रेशन व तनाव का शिकार हो जाते हैं। उन्हें गुस्सा ज्यादा आता है। एंड्रोपोज की अवस्था को टेस्टोस्टेरोन रिप्लेसमेंट थैरेपी (टी. आर. टी.) द्वारा दूर किया जा सकता है। इस थैरेपी से पहले व्यक्ति के शरीर में सीरम टेस्टोस्टेरोन की मात्रा की जांच करना आवश्यक होता है। यह परीक्षण सुबह किया जाता है। कुल टेस्टोस्टेरोन की मात्रा कम पाए जाने पर सीरम प्रोलेक्टिन जांच की जाती है। सीरम टेस्टोस्टेरोन की मात्रा कम पाए जाने पर ही टी. आर. टी. द्वारा उपचार किया जाता है।

उम्र को लेकर पहले एक वाक्य चलता था, ‘लाइफ बिगिंस एट फॉर्टी’ लेकिन अब जब औसत उम्र में इजाफा हुआ है, फॉर्टी से बढ़कर अब यह सिक्सटी हो गया है, यानी कि अब ‘लाइफ बिगिंग एट सिक्सटी’ वाक्य लोकप्र्रिय हो रहा है। जहां पहले सीनियर सिटीजन अपने बेटे बहू, पोते पोती के साथ रहना चाहते थे, आज जीवन के स्वर्णिम काल में अपना जीवन वे अपने ढंग से गुजारना पसंद करने लगे हैं। अपनी स्वतंत्रता और सम्मान अब उन्हें ज्यादा महत्वपूर्ण लगने लगा है। वे एक्टिव रहते हुए संसार से कूच करना चाहते हैं, निष्क्रिय रहकर एक कोने में पड़े उपेक्षित बूढ़े की तरह नहीं। जनरेशन गेप के कारण बाप बेटों व सास बहू में आए दिन झगड़े होने लगते हैं। झगड़े न भी हों तो उनमें से किसी न किसी को तो दूसरी पोजीशन पर रहना ही पड़ता है। अब वे उसे किस तरह लेते हैं, यह उनकी समझ पर निर्भर करता है। जाहिर है कि मां बाप जब अब तक घर में सर्वेसर्वा थे, सैकंड पोजीशन पर रहकर अपमानित महसूस करते हैं। ऐसी स्थिति आए, इससे पहले ही क्यों न प्रेमपूर्वक अलग रहा जाए, यही सोचकर आज कई उम्रदराज लोग बच्चों की शादी के बाद अलग रहना पसंद करते हैं। वे बराबर बच्चों से संपर्क और सुरक्षा की दृष्टि से सपोर्ट नेटवर्क भी बना कर रखते हैं। डिगनिटी फाउंडेशन के अध्यक्ष शीलू श्रीनिवासन के अनुसार एक परिवार की चाह और खर्च ने की पावर बढ़ने के कारण बहुत से सीनियर सिटीजन स्वतंत्र जीवन ही पसंद करते हुए अपनी पहचान बनाने में जुटे रहते हैं। बहुत से रिटायर्ड लोग कुछ न कुछ काम करते मिल जाएंगे। उनके पास अनुभव का खजाना होता है। कन्सलटेंसी का काम या कोई दुकान चलाना, कही पर पैंसठ वर्ष की मीरा यादव कहती हैं, ‘कुछ दिन साथ भी रहे हैं हम और रोज-रोज का नर्क भी भुगत कर देख लिया। बहू इतनी ज्यादा एंटी थी कि पूरे समय मुझे नोचने को तैयार रहती थी। मेरा हसना, बोलना कोई काम उसे पसंद नही था, सिवाय उन कार्यो के जो नौकरानी करती हैं। मेड बहुत छुट्टी करती रहती थी, तब बर्तन झाडु मुझसे करवाते उसे जरा भी लाज शरम नहीं आती। हर हिसाब किताब का काम देखना, ट्यूशन, कोचिंग देना उनमें से कुछ हैं। सीनियर सिटीजन श्री गणपत वाडेकर कहते हैं, ‘भई हम तो जियो और जीने दो के दर्शन में विश्वास करते हैं। यंग लोगों की अपनी जीवनशैली है। उनकी भागदौड़ में हम कहां फिट बैठते हैं। जब हम भी लाइफ एंजॉय कर सकते हैं तो हम उन पर बोझ बन कर क्यों रहें। हमने अपना धन इस तरह से इनवेस्ट किया है कि उससे अच्छी खासी रकम मिल जाती है। थोड़ा बहुत शेयर का काम कर लेता हूं। अक्सर हम पति पत्नी कभी सिनेमा, कभी मॉल चले जाते हैं। फ्रैंड सर्कल है। उनसे मेल मुलाकात हो जाती है। कभी उनके साथ आउटिंग पर चले जाते हैं। साल दो साल में फॉरेन टूर भी लगा लेते है। हम तो अपने जीवन का स्वर्णिम काल लगता है। कोई जिम्मेदारी बाकी नहीं। अपने कर्तव्य पूरी निष्ठा से निभाये हैं। दोनों बेटों को लायक बना दिया। खूब कमा रहे हैं, संस्कारवान हैं। एक फोन पर दौड चले आएंगे। हमें और क्या चाहिए?’ मिस्टर एंड मिसेज कपूर सोशल वर्क करके सुकून पाते हैं। मिस्टर एंड मिसेज जैन ने अपना एक म्यूजिकल ग्रुप बना रखा है जहां दस बारह संगीत प्रेमी म्यूजिकल इंसर्टूमेंट लेकर गाते बजाते खुश रहते हैं। नेहा जी नृत्यांगना हैं। साठ की हो जाने के बाद भी वे बखूबी डांस क्लास चला रही हैं। इसी का नाम है जीना कि आखिरी सांस तक शिद्दत से जिएं।

सबसे खतरनाक है मोबाइल एडिक्शन

युद्ध और मोहब्बत के दौरान सनक ही सब कुछ कराती है। प्रेम करना गुनाह नहीं। गुनाह है प्यार में अंधा हो कर सब कुछ भूल जाना। भक्ति में शक्ति होती है। प्रेम करना ही है तो वतन से करो, प्रकृति से करो, ईश्वर से करो। प्रेम रोगी बन कर हिंसक बन जाना प्रेम का अपमान करना ही है। एडिक्ट होना घातक हो जाता है फिर चाहे आप किसी भी चीज के एडिक्ट क्यों न बनें। चर्चा में ड्रग एडिक्ट ही आते हैं। लव एडिक्शन के कारनामे भी रोंगटे खड़े कर देते हैं। प्रेम रोगियों की केमिस्ट्री कम खतरनाक नहीं होती। आधुनिक युग में टीवी एडिक्शन के शिकार हैं तो कुछ मोबाइल एडिक्शन के। दुष्परिणाम पड़ रहा है घरेलू औरतों और विद्यार्थियों पर। औरतें आक्रामक हो रही हैं तो विद्यार्थियों का रूझान पढ़ाई से हटता जा रहा है। किताबों के पन्नों में प्रेमी प्रेमिका की तस्वीरें और खत रहेंगे तो कहां से पढाई में मन लगेगा। करोड़ों हाथों में मोबाइल पकड़ा कर कई कंपनियों ने अरबों का कारोबार कर लिया किंतु उपयोगिता के दृष्टिकोण से यदि हम मोबाइल फोन की समीक्षा करें तो लाभ कम, हानि ज्यादा नजर आयेगी। मोबाइल फोन ब्लैकमेलिंग का सुलभ साधन जो बन गया है। घंटों मोबाइल फोन पर अपनी उंगलियां चलाने वालों की निराली दुनिया यही बता रही है कि मोबाइल स्टेटस सिममबल बन गया है। लोग इसका सदुपयोग कम और दुरूपयोग ज्यादा कर रहे हैं। अश्लील तस्वीरें और संदेश के प्रसारण में मोबाइल महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। गप्प मारने में महारथियों के लिए तो मोबाइल फोन वरदान साबित हो रहा है। स्कूली विद्यार्थियों को भी मोबाइल लत लग रही है। कंप्यूटर के गेम्स बच्चे मोबाइल में खेल रहे हैं। गाने सुन रहें है, फिल्में देख रहे हैं। ब्लू फिल्में तक बड़ी आसानी से बन रही हैं। मोबाइल एडिक्ट पतन के मार्ग पर बढ़ चुके हैं। अपनी जिंदगी हैण्डसेट तक सीमित कर युवा वर्ग ने मोबाइल रोग पाल कर स्वयं को बर्बादी का मार्ग प्रशस्त किया है। मोबाइल एडिक्ट न दिन में अपना ध्यान अपने कार्यक्षेत्र में केंद्रित कर पा रहे हैं और न ही रात में चैन की नींद सो पा रहे हैं। एसएमएस से पीड़ितों का इलाज संभव नहीं। इसी तरह मोबाइल टू मोबाइल घंटों बातें करने वालों का भी इलाज मुश्किल है। मोबाइल फोन का उपयोग जानना जरूरी है। दुर्भाग्य यह है कि लोग दुरूपयोग का आनंद लूट रहे हैं। मोबाइल झूठ बोलने वालों के लिए तो मानो वरदान साबित हो रहा है लेकिन चिंता किसे है? सभी मस्त हैं मोबाइल-मोबाइल खेलने और बेचने में। मध्यम वर्ग पर मोबाइल का बड़ा गहरा प्रभाव पड़ रहा है। पेट में रोटी न रहे चलेगा, जेब में मोबाइल जरूरी है। टॉपअप जरूरी है। रिचार्ज कूपन जरूरी है। स्कूल-कॉलेज पढ़ने वालों के पास लंच बॉक्स न रहे चलेगा, मोबाइल जरूरी है। पालकों ने प्रतिस्पर्धा को गलत अर्थ में लिया और खरीद दिया बच्चों का कलर मोबाइल हैन्डसेट्स। होस्टल में रह कर पढ़ने वाले विद्यार्थियों के लिए तो एक बार मोबाइल की उपयोगिता मायने रखती है किंतु घर में रह कर गांव अथवा शहर के शैक्षणिक संस्थानों में शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों और शिक्षकों दोनों के लिए मोबाइल की अनिवार्यता समझ के बाहर की बात है। क्लासरूम में ही रिंग टोन बनजे लगती है। बच्चे म्यूजिक सुनने में मस्त है। पढ़ाई की किसी को काई फिक्र नहीं है। घर पर भी पढ़ाई के समय मोबाइल हाथ में नजर आए तो इसे दुर्भाग्य ही कहना पडेगा। मोबाइल के द्वारा टीनएजर्स अपराध के नये-नये गुर सीख रहे हैं। मोबाइल एडिक्शन एक खतरनाक रोग बनता जा रहा है।