हो चुकी है गर्मियों के मौसम की शुरूआत

गर्मियों के मौसम की शुरूआत हो चुकी है। इस मौसम में हर कोई गर्मी से बचने और रिलैक्स होने के लिए कूल जगहों पर जाना पसंद करते हैं। खासकर जब बात बच्चों की छुट्टियों की आती हैं तो वह भी अपनी इन वेकेशन को एन्जॉय करने के लिए पहाड़ों की सैर, खूबसूरती और कूल जगहों का चुनाव करते हैं। इसलिए आज हम आपको भारत की कुछ ऐसी ही जगहों के बारे में बताएगें जहां पर आप वेकेशन को एंजॉय करने के साथ ठंडक का अहसास भी कर सकते हैं। तो आइए जानते है इन जगहों के बारे में
औली, उत्तराखंडः- औली उत्तराखंड का एक भाग है। यह जगह काफी शांत और सुकून भरी होने के कारण पर्यटक यहां पर अप्रैल से ही घुमने के लिए आने लगते हैं। चारों तरफ बर्फ से ढके रहने के कारण यहां का टेंपरेचर 7-17 डिग्री रहता है। इसलिए यह जगह आपके लिए वेकेशन को एंजॉय करने के लिए बेस्ट हैं।
पंचमढ़ी, मध्य प्रदेशः- मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले में स्थित पंचमढ़ी मध्य भारत के सबसे खूबसूरत पर्यटन स्थलों में एक है। यह चारों ओर से पहाड़ी से घिरा हैं। यहां पर देखने के लिए बहुत सी गुफाएं, जंगल और बैम्बू फॉरेस्ट हैं। गर्मियों के मौसम में यहां आकर आप ठंडक महसूस करेंगे।
मॉन, नागालैंडः- अगर आप गर्मियों की छुट्टियों में घूमने के लिए प्लान कर रहें है तो मॉन, नागालैंड जाएं। यहां पर अप्रैल के पहले वीक में नए साल का स्वागत एलेआन्ग फेस्टिवल कोन्याक नागा को सेलिब्रेट करके किया जाता है। जिसमें डांस, म्यूजिक और कई प्रकार के खेल खेले जाते हैं।
साराहान, हिमांचल प्रदेशः- घूमने के लिए आप अप्रैल माह में साराहान जाएं। चारों ओर पहाड़ियों से घिरी यह जगह हिमांचल प्रदेश में स्थित हैं। यहां पर एक पार्क ऐसा है जो पक्षियों की ब्रीडिंग के लिए मशहूर है। यहां पर सारा साल टूरिस्ट की भीड़ लगी रहती है।
कदमत आइलैंड, लक्षद्वीपः- कदमत आईलैंड की नेचुरल ब्यूटी देखने में बहुत ही खूबसूरत है। लक्षद्वीप का यह 3.12 स्क्वेयर किमी के एरिया में फैला बहुत ही छोटा-सा आइलैंड है। यहां पर आने वाले टूरिस्ट को ड्राइविंग, स्नॉकर्लिंग और स्वीमिंग जैसी कई सुविधाएं दी जाती है।
कन्याकुमारी, तमिलनाडुः- भारत के सबसे दक्षिणी छोर पर बसा कन्याकुमारी वर्षों से कला, संस्कृति, सभ्यता का प्रतीक रहा है। भारत के पर्यटक स्थल के रूप में भी इस स्थान का अपना ही महत्व है। यहां पर स्वामी विवेकानंद ने 3 दिनों तक तपस्या की थी। यहां पर देखने के लिए गांधी मेमोरियल भी है। अप्रैल माह में यहां पर घूमने के लिए दर-दर से टूरिस्ट आते हैं।
दार्जिलिंग, पश्चिम बंगालः- बारिश के मौसम में दार्जिलिंग जाने का अलग ही मजा है। दार्जिलिंग शहर पश्चिम बंगाल में स्थित है। यहां पर होने वाली चाय की खेती पूरी दुनिया में मशहूर है। बारिश के मौसम में यहां काफी संख्या में लोग घूमने आते हैं। यहां पर आप टॉय ट्रेन का भी लुत्फ ले सकती हैं। टॉय ट्रेन दार्जिलिंग के पर्यटकों के आकर्षण का बड़ा केंद्र है।
वायनाड़, केरलः- अगर आप अपने मूड़ को रिफ्रेश करने के लिए घूमने जाना चाहते हैं तो वायनाड जाएं। यहां के हरे-भरे पहाड़, खुशबू बिखेरते इलायची, वनीला, कॉफी और चाय पीने से आपका मूड फ्रेश हो जाएगा और अच्छे से छुट्टियों को इंजॉय कर सकते हैं। इसे पुरानी जनजातियों का गढ़ भी कहा जाता है।
कलीमपोंग, पश्चिम बंगालः- आपके ट्रिप को रोमांचक बनाने के लिए कलीमपोंग जाएं। यह जगह पश्चिम बंगाल में स्थित है। अप्रैल में यहां पर दूर-दूर से पर्यटक आते हैं। यहां पर आप जंगलों में रेड पांडा और ब्लैक बियर भी देख सकते है। यहां की खूबसूरत वादियां देखने लायक हैं।

समय के अभाव के सितम की गाज जब मां और संतान के रिश्तों पर गिरती है तो, सारे समाज का ढांचा चरमरा जाता है। आज के जेट युग में नौकरी पेशा मां के पास बच्चें के लिए वक्त नहीं। “क्वालिटी टाइम” जैसी वाहियात बातों की सफाई देकर सच को नहीं झुठलाया जा सकता। उपभोक्तावादी संस्कृति, उच्च स्तरीय जीवन का क्रेज और अपनी पहचान बनाने की होड़ स ेउपजी स्वार्थ परक्ता माताओं को अपने जायों से ही दूर कर रही है।
क्या कहते हैं मां बापः- वे कहते हैं यह मारा मारी, नाइन टू सेवन की जिंदगी हम बच्चों के लिए ही तो जी रहे हैं। बच्चों को सभी सुख सुविधायें, अच्छी शिक्षा, स्टैंडर्ड लाइफ दे सके। इसीलिए तो हम जी तोड़ मेहनत करते हैं। हमारे त्याग को वे आज समझें, ना समझें कभी तो समझेंगे ही। दीपाली माथुर का कहना है, “हमने अपने बेटे संचित को वैलहम जैसे महंगे और प्रेस्टीजियस स्कूल के बोर्डिंग में इसीलिए तो डाला है ताकि उसका भविष्य बना जाए, इसलिए तो मुझे नौकरी करनी पड़ रही है।”
परिस्थितिवश भी बढ़ती है दूरीः- नीलेश का ट्रांसफर किसी छोटे शहर में हो गया, तो पत्नी और दोनों बच्चें जयपुर ही रहे ताकि बच्चों की पढ़ाई में हर्ज न हो। नीलेश का ट्रांसफर बाद में किसी और जगह हो गया। बच्चों के साथ ही नीलेश और उसकी पत्नी में भी दूरियां आ गई थी। नीलेश ने दूसरी औरत को रख लिया था। मां को घर बिखरने के गम से ज्यादा अपने पर फक्र था कि ये त्याग मैंने अपने बच्चों के लिए किया। निषिता सारा दिन ऑफिस में कम्प्यूटर पर काम करके इतना थक जाती थी कि नन्हीं साक्षा के साथ समय बिताने के लिए उसके पास ऊर्जा ही शेष नहीं बचती थी। उसके सवालों का जवाब देते समय वह खीज जाती थी। मां के बजाय साक्षा पड़ोस वाली आंटी के ज्यादा करीब हो गई थीं।
टी. वी. केबल संस्कृतिः- मां की ममता, दुलार, उसका अभय दान देता संरक्षण, सुखदायी सान्निध्य और एक अवर्णंनीय निरंतर प्रवाहित होती ऊष्मा का अपने आप में संपूर्ण अहसास ना मिलने पर बच्चा एक अव्यक्त गहरी उदासी में डूब जाता है। ऐसे में वह अपना मन कंप्यूटर गेम्स, टी. वी. से बहलाते है। आज जो बच्चे असमय बड़े होते नजर आते है इसके पीछे टी. वी. कल्चर का बड़ा हाथ है। वे धीरे-धीरे इतने टी. वी. एडिक्ट हो जाते है कि, उन्हें बाहर खेलना, मित्र बनाना भी अच्छा नहीं लगता। एकाकी होते बच्चे अपने में ज्यादा गुम रहने लगते हैं। टी.वी. के कारण आपसी संवाद भी नहीं हो पाता है क्योंकि मां भी कम टी.वी. की शौकीन नहीं होती।
एकल परिवार भी कारण हैः- होना तो ये चाहिए था कि, एकल परिवार में बच्चा मां के और करीब आ जाता किंतु हुआ ठीक विपरीत। एकल परिवार में मां की जिम्मेदारियां ज्यादा बढ़ जाती है। काम पर जाना है तो बच्चें को क्रेच में छोड़ना है या फिर आया या नौकर के भरोसे। बच्चे को वे अपने ढंग से देखेंगे। हो सकता है गलत आदतें डाल दें। क्रच्च में वह अपनापन कहां जो बच्चें के स्वस्थ विकास के लिए पहली शर्त है।
सुविधायें देकर कर्तव्य पालनः- माना कि सुविधाओं की जीवन में अहमियत है और सुविधायें है कि जिनका काई छोर ही नहीं। उपभोक्तावादी संस्कृति का कमाल है कि बाजार हर तरफ की नामी “सॉफिस्टिकेटेड“ चीजों से अटा पड़ा है। बच्चों की आदतें भी ऐसी बन गई है कि बोलना शुरू ही हुएं है और सादी लेमनचूस टॉफी गोली की जगह फाइव स्टार केड्बरी और ये पिन और वह पिन जैसे न जाने कैसे-कैसे नामों की महंगी टॉफियों की मांग करने लगते है। आधी से ज्यादा “सोकॉल्ड” सुविधायें असुविधा ज्यादा सिद्ध हो रही है। ये सुविधाओं का ही अंजाम सामने आ रहा है कि बड़े-बड़े अमीर घरों के बिगड़े नवाबजादे अपराधी बन कर बैंक लूटते, लड़कियां छेड़ते और नशे के आदी बनते जा रहे हैं। सब चीज एकदम से मिल जाने से न बच्चों को चीजों की कद्र करनी आती है न मिलने पर उन्हें उसके बिना रहना भी नहीं आता है। आज बच्चों पर पढ़ाई का जबर्दस्त भार है। ऊपरसे अभिभवकों की उनको लेकर महत्वाकांक्षाए बच्चों को तनावग्रस्त कर देती है। हाल ही में बच्चों पर आई. सी. एम. आर. और ‘इंस्टीट्यूट ऑफ होम इकनॉमिक्स’ द्वारा की गई स्ट्डीज से पता चला है कि, आठ सौ बच्चों में से 25 प्रतिशत बच्चों को हाई कोलेस्ट्रोल, 35 प्रतिशत ओवरवेट, 13 प्रतिशत अंडरवेट हैं। क्या कारण है कि 13 साल के किशोर बढ़े हुए रक्तचाप, हार्ट प्रॉब्लम, डायबीटिज और विभिन्न प्रकार की एलर्जी तथा मनाविकारों के शिकार होकर अस्पताल पहुंच जाते है? सिर्फ शिक्षा पद्धति ही बच्चों में तनाव की जिम्मेदार नहीं, माता-पिता की बच्चों से ढेर सारी उम्मीदें भी बच्चों में तनाव का कारण बन जाती है। वे चाहते हैं कि बच्चें शीघ्र ही पढ़ाई में अव्वल आने के साथ हर क्षेत्र में टॉप करें। फिर चाहे वह म्यूजिक, डांस, पेंटिग, क्राफ्ट क्लासेज, स्पोर्टस, स्विमिंग जैसे भिन्न क्षेत्र ही क्यों न हों। बच्चों और अभिभावकों में फिर संवाद के लिए समय ही कहां बचता है। रहा सहा समय टेलीविजन ले लेता है। बच्चों में बढ़ते तनाव के कारण, आत्महत्या के आंकड़े चौकाने वाले हैं। अभिभावकों की जिम्मेदारी है कि वे उनके मन, उनकी परेशानियों को समझें। उनसे निरंतर संवाद बनाए रखें चाहे वे कितने ही थके हों। सोने जाने से पहले वे उनके साथ वार्तालाप करें। कुछ अपनी कहें कुछ उनकी सुनें। परिवार के साथ छुट्टियां बिताना बहुत अहमियत रखता है। जहां पर परिवार के सदस्य बढ़िया वक्त साथ गुजारते हैं, वहीं किशोर होते बच्चों को वैज्ञानिक ढंग से शारीरिक शिक्षा भी थोड़ी बहुत अभिभावक जैसे बाप बेटे को, मां बेटी को दे सकते है। उनमें होने वाले शारीरिक परिवर्तन उन्हें परेशान कर इधर-उधर से अध-कचरा ज्ञान बटोरने पर मजबूर करते हैं। बेहतर है कि अभिभावक स्वंय उन्हें सही तौर पर इस विषय में जानकारी दें ताकि वे इन परिवर्तनों को सहज रूप से ले सके।

किशोरावस्था जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव है। इस उम्र में बच्चों में बहुत बदलाव आते हैं। बच्चों को इस उम्र में समझ पाना जितना जटिल काम है उतना कभी नहीं। बच्चों के विकास में उनके परिवार के साथ-साथ मित्रों का भी सहयोग होता है। किशोरावस्था में तो परिवार से भी ज्यादा उनके दोस्तों और सहेलियों का उन पर प्रभाव पड़ता है। इसी से उनका व्यक्तित्व बनता या बिगड़ता है। उस उम्र में वे सिर्फ दोस्तों के सम्पर्क में ही रहना चाहते हैं। उनसे ही मोहब्बत करना चाहते हैं। उनके साथ ही हर जगह घूमना और जाना पसंद करते हैं। उनके साथ पार्टियों में शराब-सिगरेट पीना पसंद करते हैं। वे उनके साथ सारे अनुभव बटोरने को तैयार रहते हैं। अनुभव लेने के चक्कर में वे खुद पर नियंत्रण नहीं रख पाते। वे चाहें तो इस सबका सेवन करने के लिए अपने दोस्तों को मना कर सकते हैं। उन्हें रोक सकते हैं। जब उनके दोस्त उन्हें गलत चीजें खाने-पीने के लिए उत्सुक कर सकते हैं तो क्या वे अपने दोस्तों को इन गलत चीजों के सेवन से नहीं रोक सकते? उन्हें रोकने की हिम्मत तो उन्हें दिखानी ही होगी। यह उम्र इसलिए कच्ची भी कही जाती है क्योंकि इस उम्र में नादानियों में किशोर-किशारी ऐसे कदम उठा लेते हैं जो उन्हें जीवन भर के लिए अपराधी बना देते हैं। इस उम्र के लड़के लड़कियों का एक दूसरे के प्रति आकर्षित होना स्वाभाविक है। जरूरी नहीं कि आपकी बेटी लड़को से दोस्ती करती है तो उसके प्रति प्रेम व्रेम जैसा भी कुछ मन में रखती है। इस उम्र की दोस्ती में भावनात्मक जुड़ाव पैदा होना लाजिमी है मगर अपने बच्चों को इस हद से आगे न बढ़ने की हिदायत दें। इस उम्र में लड़के-लड़कियों का आपस में दोस्ती रखना कोई गलत बात नहीं किंतु सोचने वाली बात यह है कि उनकी दोस्ती का स्वरूप क्या है? कहीं इस दोस्ती के कारण वे पढ़ाई में तो नहीं पिछड़ रहे हैं। जो आपको पढ़ने के लिए प्रेरित न करें, वे आपके अच्छे दोस्त नहीं हो सकते। अगर वे आपके सच्चे दोस्त होते तो आपको पढ़ने से नहीं रोकते। अपने दोस्तों को पहचानना सीखें। बच्चों को प्यार और सेक्स की जानकारी दें। इस उम्र में सबसे जरूरी है पढ़ाई। बाकी बाद की चीजें है। सबसे पहले अपना कैरियर बनायें। उसके बाद कुछ और हो। हर घर के कुछ कायदे-कानून होते हैं। बच्चों को भी अपने घर के कायदे-कानून मानने चाहिए। उन्हें यह मालूम होना चाहिए कि यदि वे अपने घर के नियमों को नहीं मानेंगे तो उनके माता पिता यह बर्दाश्त नहीं करेंगे। किस समय क्या चीज जरूरी है, उन्हें उसे ध्यान में रखना होगा? पढ़ाई के समय पढ़ाई ही जरूरी है। जरूरी नहीं कि आपके बच्चे सारा दिन पढ़ाई करें किंतु दिन में तीन-चार घंटे तो उन्हें पढ़ाई को देने होंगे। पढ़ाई के समय यदि उनके मित्र उन्हें परेशान करते हैं तो वे उनके अच्छे दोस्त नहीं हैं। आप भी ऐसे दोस्तों को अपने बच्चों के साथ मिलने न दें। अगर आपको अपने बच्चों के किसी दोस्त से परेशानी है या उसे आप पंसद नहीं करते तो अपने बच्चे के साथ बैठकर उससे इस विषय में बात करें। यदि वह आपको उसकी कुछ अच्छाई बताता है तो उसे स्वीकार करें किंतु उसे यह भी बता कि यदि आपने उसके दोस्त में कोई झूठी या गलत बात देखी तो आप उसे बर्दाश्त नहीं करेंगे। आप तुरंत उसे उससे दूर कर देंगे। अपने बच्चें का स्कूल बदलवा देंगे। अगर आपके बच्चों को यह पता है कि आप जो कहते हैं वो करते जरूर हैं तो आपके बच्चें अपनी हद पार नहीं करेंगे।

नारी के जीवन में आने वाली रजोनिवृति की तरह की ही स्थिति पुरूषों के जीवन में भी आती है जिसे ‘एडम’ यानी ‘एंड्रोजन डेफिशिऐंसी इन एजिंग मेल्स’ कहा जाता है। ऐसा उन वैज्ञानिकों का कहना है जो कई दशकों से उम्र बढ़ने के साथ पुरूषों के शरीर पर पड़ते प्रभाव का अध्ययन करते आ रहे थे। उम्र बढ़ने के साथ पुरूषों के स्वभाव में भी परिवर्तन आने लगता है। 40 वर्ष की उम्र के बाद पुरूषों के शरीर में सैक्स हारमोन ‘टेस्टोस्टेरोन’ की उत्पत्ति कम होने लगती है जिसका असर पुरूष के यौन जीवन और स्वभाव पर पड़ता है। टेस्टोस्टेरोन की उत्पत्ति कम होने के कारण प्रायः पुरूषों में कामेच्छा कम हो जाती है और चिड़चिड़े हो जाते हैं। हड्डियों और जोड़ों में दर्द होने लगता है। अंगों पर चर्बी बढ़ने लगती है और वे तनाव तथा डिप्रेशन का शिकार हो जाते है। ये सभी लक्षण ‘एडम’ अर्थात ‘एंड्रोजन डेफिशिऐंसी इन एजिंग मेल्स’ के हैं। कुछ वैज्ञानिक महिलाओं में होने वाली रजोनिवृति की प्रक्रिया तथा एडम की प्रक्रिया, दोनों को एक सा मानते हैं लेकिन कुछ अन्य वैज्ञानिक इस विचार से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि ‘एडम’ की तुलना रजोनिवृति से नहीं की जा सकती क्योंकि रजोनिवृति के बाद एंड कोशिकाओं में एग सेल्स का निर्माण होना बंद हो जाता है और महिलाएं गर्भधारण करने में अक्षम हो जाती है लेकिन एडम के चलते पुरूषों में ऐसी स्थिति नहीं आती है। उनके शरीर में जीवन भर निरंतर शुक्राणु बनने की प्रक्रिया जारी रहती है। पुरूष 60 या 70 साल की उम्र में भी गर्भाधान कराने में सक्षम होते हैं यद्यपि उस समय उनके जननांगों में पर्याप्त उत्तेजना नहीं आती। एडम को तुरंत नहीं पहचाना जा सकता क्योंकि यह स्थिति धीरे-धीरे आती है और अधिकांश पुरूष इसे उम्र का प्रभाव मान लेते हैं कि शरीर अब बुढ़ापे की ओर अग्रसर हो रहा है। डॉक्टरों का कहना है कि यह बुढ़ापे की अवस्था नहीं है बल्कि सैक्स हारमोन टेस्टोस्टेरोन की मात्रा में कमी के कारण यह स्थिति है जिसे इलाज द्वारा दूर किया जा सकता है, इसलिए एडम के लक्षणों के पता चलते ही पुरूषों को सतर्क हो जाना चाहिए। टेस्टोस्टेरोन पुरूषों के शरीर में पैदा होने वाला एक हारमोन है जिसे सैक्स हारमोन या एन्ड्रोजेनिक हारमोन कहा जाता है। इस हारमोन का निर्माण वृषणों मे होता है। एक पुरूष के अंदर प्रतिदिन 4.7 मिलीग्राम होता है। इसी हारमोन की दौलत एक दुबला पतला किशोर पूर्ण पुरूष में बदल जाता है। उसके जननांगों और शरीर का विकास होता है। चेहरे पर दाढ़ी-मूछें व शरीर पर घने बाल निकल आते है। शुक्राणु जनन की प्रक्रिया शुरू होती है। इस हारमोन का निर्माण किशोरावस्था में शुरू हो जाता है। एडम की अवस्था में मधुमेह व दिल की बीमारियों जैसे घातक रोग उभर सकते हैं। रोग पैदा होते ही उपचार कराना चाहिए। टेक्सास विश्वविद्यालय, ह्यूस्टन के एसोसिएट प्रोफेसर राबर्ट टान के अनुसार टेस्टोस्टोरोन हारमोन की कमी के कारण पुरूष में स्मरण शक्ति की कमी, हड्डियों के टूटने का खतरा, नपुंसकता और डिप्रेशन आदि का शिकार हो सकते हैं। हारमोन कमी को पूरा करके रोगी को इन परेशानियों से छुटकारा दिलाया जा सकता है। डॉ. टान के अनुसार टेस्टोस्टेरोन का स्मृति से सीधा संबंध है। जब उन्होंने इस हारमोन की कमी वाले पुरूषों को एंड्रोजन हारमोन दिया तो उनकी स्मरणशक्ति आश्चर्यजनक रूप से बढ़ गई। डॉ. टान द्वारा कराए गए सर्वेक्षण में पाया गया कि प्रति दिन 10 सिगरेट से ज्यादा सिगरेट पीने वाले पुरूषों में सिगरेट पीने वाले पुरूषों की तुलना में एंड्रोपोज की अवस्था जल्दी आती है। यही बात स्त्रियों के साथ भी है। ज्यादा मद्यपान व धूम्रपान करने वाली महिलाओं में रजोनिवृति जल्दी होती है। टेस्टोस्टेरोन हारमोन पुरूषत्व प्रदान करता है। इस हारमोन की कमी के कारण पुरूष, तनाव, चिड़चिड़ापन, डिप्रेशन व तनाव का शिकार हो जाते हैं। उन्हें गुस्सा ज्यादा आता है। एंड्रोपोज की अवस्था को टेस्टोस्टेरोन रिप्लेसमेंट थैरेपी (टी. आर. टी.) द्वारा दूर किया जा सकता है। इस थैरेपी से पहले व्यक्ति के शरीर में सीरम टेस्टोस्टेरोन की मात्रा की जांच करना आवश्यक होता है। यह परीक्षण सुबह किया जाता है। कुल टेस्टोस्टेरोन की मात्रा कम पाए जाने पर सीरम प्रोलेक्टिन जांच की जाती है। सीरम टेस्टोस्टेरोन की मात्रा कम पाए जाने पर ही टी. आर. टी. द्वारा उपचार किया जाता है।

उम्र को लेकर पहले एक वाक्य चलता था, ‘लाइफ बिगिंस एट फॉर्टी’ लेकिन अब जब औसत उम्र में इजाफा हुआ है, फॉर्टी से बढ़कर अब यह सिक्सटी हो गया है, यानी कि अब ‘लाइफ बिगिंग एट सिक्सटी’ वाक्य लोकप्र्रिय हो रहा है। जहां पहले सीनियर सिटीजन अपने बेटे बहू, पोते पोती के साथ रहना चाहते थे, आज जीवन के स्वर्णिम काल में अपना जीवन वे अपने ढंग से गुजारना पसंद करने लगे हैं। अपनी स्वतंत्रता और सम्मान अब उन्हें ज्यादा महत्वपूर्ण लगने लगा है। वे एक्टिव रहते हुए संसार से कूच करना चाहते हैं, निष्क्रिय रहकर एक कोने में पड़े उपेक्षित बूढ़े की तरह नहीं। जनरेशन गेप के कारण बाप बेटों व सास बहू में आए दिन झगड़े होने लगते हैं। झगड़े न भी हों तो उनमें से किसी न किसी को तो दूसरी पोजीशन पर रहना ही पड़ता है। अब वे उसे किस तरह लेते हैं, यह उनकी समझ पर निर्भर करता है। जाहिर है कि मां बाप जब अब तक घर में सर्वेसर्वा थे, सैकंड पोजीशन पर रहकर अपमानित महसूस करते हैं। ऐसी स्थिति आए, इससे पहले ही क्यों न प्रेमपूर्वक अलग रहा जाए, यही सोचकर आज कई उम्रदराज लोग बच्चों की शादी के बाद अलग रहना पसंद करते हैं। वे बराबर बच्चों से संपर्क और सुरक्षा की दृष्टि से सपोर्ट नेटवर्क भी बना कर रखते हैं। डिगनिटी फाउंडेशन के अध्यक्ष शीलू श्रीनिवासन के अनुसार एक परिवार की चाह और खर्च ने की पावर बढ़ने के कारण बहुत से सीनियर सिटीजन स्वतंत्र जीवन ही पसंद करते हुए अपनी पहचान बनाने में जुटे रहते हैं। बहुत से रिटायर्ड लोग कुछ न कुछ काम करते मिल जाएंगे। उनके पास अनुभव का खजाना होता है। कन्सलटेंसी का काम या कोई दुकान चलाना, कही पर पैंसठ वर्ष की मीरा यादव कहती हैं, ‘कुछ दिन साथ भी रहे हैं हम और रोज-रोज का नर्क भी भुगत कर देख लिया। बहू इतनी ज्यादा एंटी थी कि पूरे समय मुझे नोचने को तैयार रहती थी। मेरा हसना, बोलना कोई काम उसे पसंद नही था, सिवाय उन कार्यो के जो नौकरानी करती हैं। मेड बहुत छुट्टी करती रहती थी, तब बर्तन झाडु मुझसे करवाते उसे जरा भी लाज शरम नहीं आती। हर हिसाब किताब का काम देखना, ट्यूशन, कोचिंग देना उनमें से कुछ हैं। सीनियर सिटीजन श्री गणपत वाडेकर कहते हैं, ‘भई हम तो जियो और जीने दो के दर्शन में विश्वास करते हैं। यंग लोगों की अपनी जीवनशैली है। उनकी भागदौड़ में हम कहां फिट बैठते हैं। जब हम भी लाइफ एंजॉय कर सकते हैं तो हम उन पर बोझ बन कर क्यों रहें। हमने अपना धन इस तरह से इनवेस्ट किया है कि उससे अच्छी खासी रकम मिल जाती है। थोड़ा बहुत शेयर का काम कर लेता हूं। अक्सर हम पति पत्नी कभी सिनेमा, कभी मॉल चले जाते हैं। फ्रैंड सर्कल है। उनसे मेल मुलाकात हो जाती है। कभी उनके साथ आउटिंग पर चले जाते हैं। साल दो साल में फॉरेन टूर भी लगा लेते है। हम तो अपने जीवन का स्वर्णिम काल लगता है। कोई जिम्मेदारी बाकी नहीं। अपने कर्तव्य पूरी निष्ठा से निभाये हैं। दोनों बेटों को लायक बना दिया। खूब कमा रहे हैं, संस्कारवान हैं। एक फोन पर दौड चले आएंगे। हमें और क्या चाहिए?’ मिस्टर एंड मिसेज कपूर सोशल वर्क करके सुकून पाते हैं। मिस्टर एंड मिसेज जैन ने अपना एक म्यूजिकल ग्रुप बना रखा है जहां दस बारह संगीत प्रेमी म्यूजिकल इंसर्टूमेंट लेकर गाते बजाते खुश रहते हैं। नेहा जी नृत्यांगना हैं। साठ की हो जाने के बाद भी वे बखूबी डांस क्लास चला रही हैं। इसी का नाम है जीना कि आखिरी सांस तक शिद्दत से जिएं।

सबसे खतरनाक है मोबाइल एडिक्शन

युद्ध और मोहब्बत के दौरान सनक ही सब कुछ कराती है। प्रेम करना गुनाह नहीं। गुनाह है प्यार में अंधा हो कर सब कुछ भूल जाना। भक्ति में शक्ति होती है। प्रेम करना ही है तो वतन से करो, प्रकृति से करो, ईश्वर से करो। प्रेम रोगी बन कर हिंसक बन जाना प्रेम का अपमान करना ही है। एडिक्ट होना घातक हो जाता है फिर चाहे आप किसी भी चीज के एडिक्ट क्यों न बनें। चर्चा में ड्रग एडिक्ट ही आते हैं। लव एडिक्शन के कारनामे भी रोंगटे खड़े कर देते हैं। प्रेम रोगियों की केमिस्ट्री कम खतरनाक नहीं होती। आधुनिक युग में टीवी एडिक्शन के शिकार हैं तो कुछ मोबाइल एडिक्शन के। दुष्परिणाम पड़ रहा है घरेलू औरतों और विद्यार्थियों पर। औरतें आक्रामक हो रही हैं तो विद्यार्थियों का रूझान पढ़ाई से हटता जा रहा है। किताबों के पन्नों में प्रेमी प्रेमिका की तस्वीरें और खत रहेंगे तो कहां से पढाई में मन लगेगा। करोड़ों हाथों में मोबाइल पकड़ा कर कई कंपनियों ने अरबों का कारोबार कर लिया किंतु उपयोगिता के दृष्टिकोण से यदि हम मोबाइल फोन की समीक्षा करें तो लाभ कम, हानि ज्यादा नजर आयेगी। मोबाइल फोन ब्लैकमेलिंग का सुलभ साधन जो बन गया है। घंटों मोबाइल फोन पर अपनी उंगलियां चलाने वालों की निराली दुनिया यही बता रही है कि मोबाइल स्टेटस सिममबल बन गया है। लोग इसका सदुपयोग कम और दुरूपयोग ज्यादा कर रहे हैं। अश्लील तस्वीरें और संदेश के प्रसारण में मोबाइल महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। गप्प मारने में महारथियों के लिए तो मोबाइल फोन वरदान साबित हो रहा है। स्कूली विद्यार्थियों को भी मोबाइल लत लग रही है। कंप्यूटर के गेम्स बच्चे मोबाइल में खेल रहे हैं। गाने सुन रहें है, फिल्में देख रहे हैं। ब्लू फिल्में तक बड़ी आसानी से बन रही हैं। मोबाइल एडिक्ट पतन के मार्ग पर बढ़ चुके हैं। अपनी जिंदगी हैण्डसेट तक सीमित कर युवा वर्ग ने मोबाइल रोग पाल कर स्वयं को बर्बादी का मार्ग प्रशस्त किया है। मोबाइल एडिक्ट न दिन में अपना ध्यान अपने कार्यक्षेत्र में केंद्रित कर पा रहे हैं और न ही रात में चैन की नींद सो पा रहे हैं। एसएमएस से पीड़ितों का इलाज संभव नहीं। इसी तरह मोबाइल टू मोबाइल घंटों बातें करने वालों का भी इलाज मुश्किल है। मोबाइल फोन का उपयोग जानना जरूरी है। दुर्भाग्य यह है कि लोग दुरूपयोग का आनंद लूट रहे हैं। मोबाइल झूठ बोलने वालों के लिए तो मानो वरदान साबित हो रहा है लेकिन चिंता किसे है? सभी मस्त हैं मोबाइल-मोबाइल खेलने और बेचने में। मध्यम वर्ग पर मोबाइल का बड़ा गहरा प्रभाव पड़ रहा है। पेट में रोटी न रहे चलेगा, जेब में मोबाइल जरूरी है। टॉपअप जरूरी है। रिचार्ज कूपन जरूरी है। स्कूल-कॉलेज पढ़ने वालों के पास लंच बॉक्स न रहे चलेगा, मोबाइल जरूरी है। पालकों ने प्रतिस्पर्धा को गलत अर्थ में लिया और खरीद दिया बच्चों का कलर मोबाइल हैन्डसेट्स। होस्टल में रह कर पढ़ने वाले विद्यार्थियों के लिए तो एक बार मोबाइल की उपयोगिता मायने रखती है किंतु घर में रह कर गांव अथवा शहर के शैक्षणिक संस्थानों में शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों और शिक्षकों दोनों के लिए मोबाइल की अनिवार्यता समझ के बाहर की बात है। क्लासरूम में ही रिंग टोन बनजे लगती है। बच्चे म्यूजिक सुनने में मस्त है। पढ़ाई की किसी को काई फिक्र नहीं है। घर पर भी पढ़ाई के समय मोबाइल हाथ में नजर आए तो इसे दुर्भाग्य ही कहना पडेगा। मोबाइल के द्वारा टीनएजर्स अपराध के नये-नये गुर सीख रहे हैं। मोबाइल एडिक्शन एक खतरनाक रोग बनता जा रहा है।

बड़े शहरों में काठियां या बंगले तो एक सपना सा लगता है। अधिकतर घर अपार्टमेंटस में होते है जहां न तो जमीन अपनी होती है न छत। यदि आप हरियाली के शौकीन हैं तो अपने शौक को पूरा करने के लिए कुछ न कुछ हल तो ढूंढेगें ही न कि निराश होकर अपना मन मार लेंगे। बड़े घर तो बहुत कम लोगों के पास होते हैं जहां पर आप लॉन का आनंद उठा सकते हैं पर निराश न हों। आप अपने फ्लैट में भी छोटा सा गार्डन तैयार कर अपने शौक को जिंदा रख सकते हैं, साथ ही साथ घर को आकर्षक लुक भी दे सकते हैं। आइए जानिए घर पर छोटी सी बगिया को कैसे तैयार किया जाए।

  •  घर की बालकनी में गमलों में सीजनल पौधे लगवाएं ताकि घर के बाहर हरियाली भी रहे और घर आकर्षक भी लगे। गमलों को ऐसे स्थान पर रखें जहां बालकनी में पौधों पर धूप आ सके। पौधे खरीदने से पहले उनकी प्रकृति के बारे में जानकारी जरूर लें ताकि पौधे खिले रह सकें।
  •  यदि बालकनी बड़ी हो तो उसके एक ओर गमले रखें ताकि बाकी बालकनी का प्रयोग आप कर सकें। ऐसे में ऊंचे गमले पीछे रखें और छोटे आगे रखें। सबसे आगे बिल्कुल छोटे चिलमचीनुमा गमले भी रख सकते है।
  •  कुछ पौधे ऐसे हैं जो सारा साल हरे रहते हैं। उन्हें अपने गार्डन में जरूर स्थान दें जैसे मनीप्लांटस, एलोवेरा फर्न, करी पत्ता, तुलसी, पुदीना, एस्पेरेगस, मोन्सटेरा आदि। इन्हें आप अलग आकार के गमलों में भी लगा सकते हैं। आजकल विभिन्न आकार के गमले बाजार में उपलब्ध है।
  •  यदि आप ग्राउंडफ्लोर पर हैं और घर के बाहर जो कच्ची जमीन हो कुछ पौधे उस जमीन पर लगा दें, कुछ गमलों में, और कुछ स्थान खाली छोड़कर उसमें घास लगा दें ताकि छोटा सा गार्डन या लॉन आपके घर के बाहर बन जाए। यह ध्यान रखें कि पौधे खिड़की के एकदम पास न रखें। थोड़ी सी दूरी बना कर रखें।
  •  बालकनी भी छोटी हो और घर भी ग्राउंड लेवर पर न हो, ऐसे में यदि छत आपके पास हो तो आप टैरेस गार्डन बना सकती हैं। टैरेस गार्डन इस तरह से प्लान करें कि छत का सुख भी आप उठा सकें, बिशेषकर सर्दियों में धूप लेने के लिए।
  •  घर के बाहर बालकनी और छत के अतिरिक्त आप घर के अंदर भी कुछ इनडोर प्लांट रख कर घर में हरे पौधों का आनंद भी उठा सकती हैं। बस इन्हें आवश्यकता होती है थोडी सी अधिक देखभाल की।
  •  ऐसे पौधों को सप्ताह में एक बार खुली हवा में रखना होता है और देखना होता है कि उस स्थान पर सूरज की सीधी रोशनी न पड़े।
  •  इन्डोर प्लॉटस में आप मनीप्लांट, फर्न, एरिका पाम आदि लगा सकते हैं। इन्हें सप्ताह में दो बार पानी दें।
  •  पौधों पर पानी फव्वारें से दें। इससे पौधों पर पड़ी मिट्टी भी घुल जाती है और पौधों की जड़ें भी मिट्टी नहीं छोड़ती। डिब्बे या पाइप से पानी डालने पर पौधों की जड़े उखड़नें का ड़र रहता है और मिट्टी के गमलों से बाहर आने से बालकनी भी खराब होगी।
  •  हर सप्ताह या दस दिन में एक बार खुर्पी से हल्की हल्की गुड़ाई करनी चाहिए जिससे नमी वाली मिट्टी को ताजी हवा लग जाती है और नमी में पैदा होने वाले कीड़े भी नहीं पनपते। सूखे पत्तों को साथ-साथ अलग करते रहना चाहिए।
  •  गर्मी में प्रतिदिन पौधों को पानी देना चाहिए और सर्दी में एक दिन छोड़कर। तीन से चार माह के बाद सभी गमलों से मिट्टी निकालकर उसमें खाद मिलाकर पुनः गमलों में भर देनी चाहिए ताकि उन्हें उचित खुराक मिलती रह सके। थोड़ी सी मेहनत और देखभाल से आप गाडर्निंग के शौक को पूरा सकते हैं और अपनी प्यारी सी बगिया को हरा भरा रख सकते हैं।

शिक्षा के विकास ने स्त्रियों को आत्मनिर्भर बनाया। वे बाहर नौकरी करने लगी। उनसे व्यक्त्वि का विकास हुआ। अब वे घर की चारदीवारी से बाहर सार्वजनिक क्षेत्रों में पुरूष के बराबर भागीदार बन के कार्य करने लगी लेकिन समाज आज भी पुरूषों का ही है। अपनी अस्मिता की चाह लिये जब स्त्री उसमें अपनी जगह ढूंढने चली तो उसे कई एक कठिनाइयों का सामना कई मुकामों पर एक साथ करना पड़ा। सहयोग की अपेक्षा उसके लिए मृगमरीचिका ही बनी रही। वह चाहे नौकरीपेशा हो या गृहिणी, गृहकार्य उसी की जिम्मेदारी है। अगर बच्चें है तो उनकी देखरेख भी उसे ही करनी है। घर बाहर के बोझ तले दबी नारी जब कुंठाग्रस्त होकर खीझ से भर उठती है तो उसकी भावनाओं को पति या घर के दूसरें सदस्य समझ नहीं पाते। उल्टा उसे बदमिजाज होने पर प्रताडित करते है। इसका सीधा असर उसके दांपत्य जीवन पर पड़ता है। पति के साथ उसके रिश्तों में ठंडापन, विसंगति और दरार आने लगती है। दोनों ही जब घर में सुकून नहीं पाते तो सुकून की तलाश में अन्यत्र भटकने लगते हैं। वैवाहिक जीवन की ऊब भरी असफलता व नीरस यौन जीवन न केवल पुरूषों को बल्कि स्त्रियों को भी विवाहेत्तर संबंध बनाने की ओर प्रेरित करते है। विवाहेत्तर संबंधों में फंसी सुनीता दत्ता एक शिक्षित नारी इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए कहती हैं, ‘मेरी शादी को नौ वर्ष हो गए हैं। मेरे दो बच्चें भी हैं। शादी के कुछ वर्ष बाद सब कुछ बासी लगने लगा। रोज-रोज वही रूटीन एक रस ऊबाऊ जिंदगी से मै बोर होने लगी थी। शिवम और मेरे बीच जैसे कुछ भी नया नहीं रहा। वह ऑफिस से ही क्लब चला जाता। घर में रहते हुए भी बस औपचारिकता ही बरतता। अनायास ही मेरे जीवन में मेरा सहकर्मी जावेद आ गया। सब कुछ अचानक ही हो गया था। जिंदगी मुझे फिर से जीने लायक लगने लगी। उसने मुझे औरत होने का अहसास दिलाया वर्ना मैं तो भूल ही गई थी कि मैं मिसेज दत्ता और बच्चों की मां के अलावा भी कुछ हूं।’ राहुल जिसे पहले अपनी निहायत सीधी सादी घरेलू किस्म की बीवी दुनिया की सबसे सुंदर और अच्छी स्त्री लगती थी, अब उसके लिजलिजे, यस वुमन वाले व्यक्तित्व से ऊबने लगा था। उसे अपने दोस्त की नई नवेली पत्नी जो साधारण रूप रंग होने बावजूद बहुत बोल्ड और फैशनेबल, साथ ही नंबर बन फ्लर्ट थी, आकर्षित करने लगी। दोस्त अक्सर ऑफिस के काम से टूर पर जाता रहता था। ऐसे मे उसकी फ्लर्ट पत्नी जो कॉलेज के जमाने से ही अनेक पुरूषों के साथ दैहिक संबंध बनाने की आदी थी, राहुल की कमजारी जानने के बाद फंसाने में उसे वक्त न लगा। आज नैतिकता के मापदंड बदल गए हैं। ज्यादा से ज्यादा आधुनिक विचारों वाले विवाहेत्तर संबंधों के पक्ष में मिलेंगे। अगर इससे जीवन की एकरसता टूटती है, ऊब मिटती है तो इसमें बुरा क्या है बशर्ते आप परिवार के प्रति जिम्मेदारी निभाते रहें, उसे टूटने न दें। ये संबंध अगर आप में नई स्फूर्ति भरते हैं, आपमें अपनापन लौटाते है, नये संदर्भो में पुराने को तोलने का मौका देते हैं और दांपत्य को स्थायित्व दिलाते हैं तो इन पर किसी को आपत्ति क्यों होनी चाहिए। सच्चाई यह भी है कि ऊब को मात्र बहाना मान कई व्यक्ति स्त्री हो या पुरूष, अपनी मूल प्रवृति को ऐसे संबंध बना कर संतुष्ट करते हैं।

आज के भौतिकवादी युग में तेज गति से दौड़ती इंसानी जिंदगी में परेशानियां दिनों दिन बढ़ती जा रही हैं। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में इंसान को हंसी मजाक के बहुत कम अवसर नसीब होते है और शायद अधिकतर लोग दिल से हंसना भी भूलते जा रहे हैं, जिस से कुण्ठित समाज का निर्माण शुरू हो गया है। दिल खोल कर हंसना सेहत व दिमाग के लिए किसी टॉनिक से कम नहीं मगर इस टॉनिक के निर्माण के लिए परम आवश्यक है मजाक। इंसान के मन में मजाक हंसी व खुशी के अंकुर प्रस्फुटित करता है। निस्संदेह आज मजाक करने वाले लोगों की कमी लगातार खलती जा रही है। कारण, लोगों की मानसिकताओं में तीव्र परिवर्तन, अपना अहम और खोखले भौतिकवादी आदर्श। एक स्वस्थ मजाक से मिली हंसी-खुशी तन और मन दोनों को स्वस्थ बनाती है लेकिन भद्दा या फूहड़ किस्म का किया मजाक किसी को दुखी व अशांत कर सकता है, जो कभी-कभी आपसी मनमुटाव व झगड़े का रूप भी धारण कर लेता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए, आइये इस विषय पर कुछ और आगे बढ़ते है। मजाक क्यों किया जाता है, यह सर्वविदित है। ऊपर भी लिखा जा चुका है मगर किससे कब और कैसे किया जाना चाहिए, यह जानना बेहद जरूरी है। किसी से भी मजाक करने से पहले यह ध्यान रखना जरूरी है कि सामने वाला आप से परिचित है या नहीं। अपरिचित व्यक्ति से सीधे कभी मजाक न करें। हो सकता है वह मजाक पसंद न करता हो। ऐसे आदमी से भी मजाक न करें जो दूसरों के साथ मजाक न करता हों अथवा सहन न कर सकता हो। अगर आप किसी से मजाक कर रहे हैं तो सामने वाला भी मजाक कर सकता है। अतः आप में मजाक सहने की भी सहनशीलता अवश्य होनी चाहिए। मजाक कब किया जाये, यह एक विचारणीय विषय है। वैसे तो इंसान को ज्यादा से ज्यादा हंसी मजाक के पल बटोरकर निकालने चाहिए मगर गंभीर, दुखी, अत्यधिक व्यस्त व नशेडी महफिल जैसे वातावरण में किसी से मजाक न करें। मजाकिया होना अच्छी बात है मगर अर्थहीन मजाक किसी के भी व्यक्तित्व को बिगाड़ सकता है। ऐसा व्यक्ति खुद दूसरों की हंसी का पात्र बन जाता है। स्वस्थ मजाक में अर्थयुक्त वाकपटुता, सहनशीलता, सामयिक विषय में चार चांद लगा देती है। ब्याह शादियों आदि मौकों पर मजाक का माहौल हाता है। युवक युवतियों में आकर्षण स्वाभाविक है अतः ऐसे मौकों पर समझदारी से काम लेना चाहिए। मजाक ऐसे करें कि कोई गलत अर्थ न लगाये। फूहड़, भद्दा या किसी को मानसिक कष्ट पहुंचाने वाला मजाक कदापि न करें। मजाक यथासंभव हम उम्र के व्यक्तियों से ही किया जाना चाहिए। मजाक में अबोध बच्चें या अज्ञानी व्यक्ति को किसी गलत कार्य करने के लिए प्रेरित न करें।

कामकाजी महिलाओं का तनाव से गहरा रिश्ता है। जब यह तनाव उन पर हावी होने लगता है। तो अक्सर वे अवसादग्रस्त हो जाती हैं जिससे उनका काम तो प्रभावित होता ही है, साथ ही पर्सनल लाइफ भी डिस्टर्ब होती है।
कारण-

  •  काम का अत्यधिक बोझ होना
  •  कम्युनिकेशन गैप-अक्सर वे कोई समस्या होने पर बॉस से डिस्कस नहीं करती, उस समस्या से अकेली जूझती हैं तो मन व दिमाग दोनों ही कभी फ्रैश नहीं हो पाते।
  •  कई बार इसके विपरीत वे ‘ओवररिएक्ट’ करती हैं। बॉस उनकी प्रतिक्रिया पर नाराज होते हैं तो वे तनावग्रस्त हो जाती हैं।
    अस्पताल के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डा. संदीप वोहरा के अनुसार चूंकि कामकाजी महिलाओं पर काम का दोहरा बोझ होता है, ऐसे में परिवारजनों का सहयोग न मिलने से वे तनावग्रस्त हो जाती हैं साथ ही घर का वातावरण, परिवार की उनसे बढ़ती उम्मीदें इत्यादि कारण भी उनके तनाव को बढ़ाते हैं।
  •  कुलीग्स के साथ वे अच्छे संबंध मैंटेन नहीं कर पाती हैं तो भी ऑफिस का माहौल बोझिल हो जाता है, जिससे तनाव उत्पन्न होता है।
  •  स्वंय पर जरूरत से ज्यादा भरोसा होना या काम के प्रति लापरवाही, गलतियों का मुख्य कारण है। जब गलती सीनियरस के सामने आती है तो वे परेशान हो उठती हैं।
  •  कुछ महिलाओं में कांफिडेंस की कमी होती है जो उन्हें तनाव देता है।
  •  टाइम मैनेजमेंट की कमी, जिससे उन पर सदैव काम का प्रेशर रहता है।
  •  अपनी इच्छा व टेलेंट से हटकर जॉब करना भी उसके तनाव का कारण रहता है।
  •  काम को पूरी वफादारी से करने पर भी बॉस द्वारा कोई क्रेडिट न दिए जाने पर भी अक्सर वे तनाव की शिकार हो जाती हैं।
  •  पर्सनल व प्रोफेशनल लाइफ के बीच सही संतुलन न होने से भी वे इस समस्या से ग्रस्त रहती हैं।
  •  मीटिंग, प्रेजेंटेशन इत्यादी की सही प्रकार से तैयारी न कर पाने से जब वे अच्छी परफॉरमेंस नहीं दे पाती तो उन्हें स्वयं पर क्रोध आता है जिससे तनाव पनपता है।
  •  जब वे व्यस्तता के कारण पति या बच्चों के लिए कुछ कर नहीं पाती तो स्वयं को कोसती रहती हैं व अपराध भावना का शिकार हो कर तनावग्रस्त हो जाती हैं।
    परिणाम – डा. वोहरा के मुताबिक ऐसे में महिलाओं को कई मानसिक व शारीरिक समस्याएं हो सकती हैं जैसे- सिरदर्द, बॉडी में दर्द
  •  सदैव थकान महसूस करना।
  •  भूख ज्यादा या कम लगना।
  •  चीजें रखकर भूल जाना।
  •  छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आना या रोने का मन करना
  •  एकाग्रचितता में कमी।
  •  स्वभाव में चिड़चिड़ापन पैदा होना।
  •  कभी-कभी जीवन में उत्साह की कमी के कारण उनकी जीने की चाह खत्म होने लगती है।
    कैसे पाएं छुटकारा-
  •  घर व काम के बीच संतुलन बिठाने हेतु जरूरी है कि अपने दिमाग में दो फाइल केबिनेट बनाएं, एक में ऑफिस की पूरी जिम्मेदारियां व समस्याएं रखें, दूसरे में घरेलू। इन दोनों को कभी मिक्स नहीं होने देंगी तो तनाव सदैव आपसे दूर रहेगा।
  •  आत्मविश्वासी बनें। अपनी फिटनेस, ड्रेय सेंस व खानपान पर ध्यान दें। सब तरह से फिट रहेंगी तो पूरे आत्मविश्वास के साथ लोगों का सामना कर पाएंगी जिससे अंदरूनी उत्साह में वृद्धि होगी। टेलेंट को सही शैप देने हेतु परिणाम जरूरी है। इससे आपकी परफॉरमेंस बेहतर होगी जो आपके आत्मविश्वास में वृद्धि करेगी व तनाव को दूर भगाएगी।
  •  पॉजिटिव बनें। नकारात्मक विचार अक्सर तनाव उत्पन्न करने में सहायक होते हैं।
  •  अच्छी प्लानर बनें। इससे आपका काम सही तरीके से व सही समय पर होगा तो आप तनाव से बची रहेंगी।
  •  जो बातें आपके लिए तनाव को कारण बनती है, उनसे दूर ही रहें। ऐसा संभव न हो तो उनके साथ किस तरह डील करना है, सीखें। किसी एक्सपर्ट की सलाह भी ले सकती हैं।
  •  फोन पर दोस्तों या क्लाइंट्स से लंबी बातचीत करने से बचें। इससे आपका काम प्रभावित होगा जो आपको तनाव देगा। बेहतर है दोस्तों से बात करने हेतु टाइम फिक्स कर लें।
  •  स्वयं को मशीन न बनांए। अपने सामर्थ्य के अनुसार ही कार्य करें।
  •  ऐसे लोग जो आपको इरीटेट करते हों भले ही वे आपके कुलीग हों या क्लाइंट्स, उनसे सिर्फ काम के विषय में ही बात करें।
  •  नेटवर्किंग से जुड़े रहे। इससे आपमें स्मार्टनेस आएगी व ज्ञान बढ़ेगा पर ऑफिस टाइम में व्यर्थ की नेटसर्फिंग करने से बचें।
  •  सोशल बनें। लोगों से मिलना जुलना तनाव को कम करेगा।
  •  पति या बच्चों के समक्ष अपनी व्यस्तता का रोना न रोएं। उनसे मदद लेने हेतु उन्हें प्यार से डील करें वरना वे आपसे कतराने लगेंगे जिससे तनाव आना स्वाभाविक है।
  •  स्वयं को ‘टेकन फॉर ग्रांटेड’ न लें। अपनी इम्पॉर्टेंस समझें। तभी परिवारजन आपको महत्ता देंगे।
  •  घर के लिए कभी कुछ न कर पाएं तो स्वयं को कोसने की बजाय प्रयास करना बेहतर है।