हो चुकी है गर्मियों के मौसम की शुरूआत

गर्मियों के मौसम की शुरूआत हो चुकी है। इस मौसम में हर कोई गर्मी से बचने और रिलैक्स होने के लिए कूल जगहों पर जाना पसंद करते हैं। खासकर जब बात बच्चों की छुट्टियों की आती हैं तो वह भी अपनी इन वेकेशन को एन्जॉय करने के लिए पहाड़ों की सैर, खूबसूरती और कूल जगहों का चुनाव करते हैं। इसलिए आज हम आपको भारत की कुछ ऐसी ही जगहों के बारे में बताएगें जहां पर आप वेकेशन को एंजॉय करने के साथ ठंडक का अहसास भी कर सकते हैं। तो आइए जानते है इन जगहों के बारे में
औली, उत्तराखंडः- औली उत्तराखंड का एक भाग है। यह जगह काफी शांत और सुकून भरी होने के कारण पर्यटक यहां पर अप्रैल से ही घुमने के लिए आने लगते हैं। चारों तरफ बर्फ से ढके रहने के कारण यहां का टेंपरेचर 7-17 डिग्री रहता है। इसलिए यह जगह आपके लिए वेकेशन को एंजॉय करने के लिए बेस्ट हैं।
पंचमढ़ी, मध्य प्रदेशः- मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले में स्थित पंचमढ़ी मध्य भारत के सबसे खूबसूरत पर्यटन स्थलों में एक है। यह चारों ओर से पहाड़ी से घिरा हैं। यहां पर देखने के लिए बहुत सी गुफाएं, जंगल और बैम्बू फॉरेस्ट हैं। गर्मियों के मौसम में यहां आकर आप ठंडक महसूस करेंगे।
मॉन, नागालैंडः- अगर आप गर्मियों की छुट्टियों में घूमने के लिए प्लान कर रहें है तो मॉन, नागालैंड जाएं। यहां पर अप्रैल के पहले वीक में नए साल का स्वागत एलेआन्ग फेस्टिवल कोन्याक नागा को सेलिब्रेट करके किया जाता है। जिसमें डांस, म्यूजिक और कई प्रकार के खेल खेले जाते हैं।
साराहान, हिमांचल प्रदेशः- घूमने के लिए आप अप्रैल माह में साराहान जाएं। चारों ओर पहाड़ियों से घिरी यह जगह हिमांचल प्रदेश में स्थित हैं। यहां पर एक पार्क ऐसा है जो पक्षियों की ब्रीडिंग के लिए मशहूर है। यहां पर सारा साल टूरिस्ट की भीड़ लगी रहती है।
कदमत आइलैंड, लक्षद्वीपः- कदमत आईलैंड की नेचुरल ब्यूटी देखने में बहुत ही खूबसूरत है। लक्षद्वीप का यह 3.12 स्क्वेयर किमी के एरिया में फैला बहुत ही छोटा-सा आइलैंड है। यहां पर आने वाले टूरिस्ट को ड्राइविंग, स्नॉकर्लिंग और स्वीमिंग जैसी कई सुविधाएं दी जाती है।
कन्याकुमारी, तमिलनाडुः- भारत के सबसे दक्षिणी छोर पर बसा कन्याकुमारी वर्षों से कला, संस्कृति, सभ्यता का प्रतीक रहा है। भारत के पर्यटक स्थल के रूप में भी इस स्थान का अपना ही महत्व है। यहां पर स्वामी विवेकानंद ने 3 दिनों तक तपस्या की थी। यहां पर देखने के लिए गांधी मेमोरियल भी है। अप्रैल माह में यहां पर घूमने के लिए दर-दर से टूरिस्ट आते हैं।
दार्जिलिंग, पश्चिम बंगालः- बारिश के मौसम में दार्जिलिंग जाने का अलग ही मजा है। दार्जिलिंग शहर पश्चिम बंगाल में स्थित है। यहां पर होने वाली चाय की खेती पूरी दुनिया में मशहूर है। बारिश के मौसम में यहां काफी संख्या में लोग घूमने आते हैं। यहां पर आप टॉय ट्रेन का भी लुत्फ ले सकती हैं। टॉय ट्रेन दार्जिलिंग के पर्यटकों के आकर्षण का बड़ा केंद्र है।
वायनाड़, केरलः- अगर आप अपने मूड़ को रिफ्रेश करने के लिए घूमने जाना चाहते हैं तो वायनाड जाएं। यहां के हरे-भरे पहाड़, खुशबू बिखेरते इलायची, वनीला, कॉफी और चाय पीने से आपका मूड फ्रेश हो जाएगा और अच्छे से छुट्टियों को इंजॉय कर सकते हैं। इसे पुरानी जनजातियों का गढ़ भी कहा जाता है।
कलीमपोंग, पश्चिम बंगालः- आपके ट्रिप को रोमांचक बनाने के लिए कलीमपोंग जाएं। यह जगह पश्चिम बंगाल में स्थित है। अप्रैल में यहां पर दूर-दूर से पर्यटक आते हैं। यहां पर आप जंगलों में रेड पांडा और ब्लैक बियर भी देख सकते है। यहां की खूबसूरत वादियां देखने लायक हैं।

वरूण धवन का जीवन परिचय

वरूण धवन एक भारतीय फिल्म अभिनेता होने के साथ-साथ फिल्म निर्माता, निर्देशक और मॉडल भी है। वरूण धवन बहुत कम समय में बॉलीवुड के फेमस अभिनेता बन गये, वे यूथ के बीच बहुत ज्यादा पॉपुलर है। वरूण धवन अपनी चार्मिंग पर्सनेलिटी और गुड लुकिंग के लिए भी जाने जाते है। वे फिल्मों में काम करने के साथ-साथ स्टेज पर परफॉर्म भी करते हैं।
प्रारंभिक जीवनः- वरूण धवन का जन्म 24 अप्रैल 1987 को एक पंजाबी परिवार में मुंबई में हुआ। उनके पिता फिल्म निर्देशक डेविड धवन है, उनकी मां का नाम करूणा धवन है। वरूण धवन का होम टाउन दिल्ली है पर फैमिली मुंबई में ही शिफ्ट कर गये, 2011 फिल्म, देसी बॉयज के साथ अपने निर्देशन करियर की शुरूआत करनेवाले निर्देशक रोहित धवन, वरूण के बड़े भाई है। वे अभिनेता अनिल धवन के भतीजे है और अभिनेता सिद्धार्थ धवन के चचेरा भाई है। वैसे तो वरूण धवन की पूरी फैमिली फिल्मों में कही न कहीं जुडी हुई है। वरूण धवन को घर में पप्पू नाम से भी पुकारा जाता हैं। वरूण धवन ने अपनी पढ़ाई बाम्बे स्कॉटिश स्कूल से की। इसके बाद उन्होंने नॉटिंघम ट्रेंट विश्वविद्यालय, ब्रिटेन से बिजनेस प्र्रबंधन में डिग्री की है। उनके पिता डेविड धवन की चाहत थी कि वरूण इंजिनियर या डॉक्टर बने लेकिन उसकी मां के कारण वह बॉलीवुड में आए। फिर बाद में वे अर्जुन कपूर के साथ एक्टिंग सीखने लगे।
अभिनय की शुरूआतः- वरूण ने अपने अभिनय सफर की शुरूआत सिद्धार्थ मल्होत्रा और आलिया भट्ट के साथ करन जौहर की फिल्म ‘स्टूडेंट ऑफ द इयर (2012)’ से शुरू की। जो की सूपर हिट फिल्म साबित हुई। इसमें उनके शानदार अभिनय के लिए उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला, और प्रदर्शन को सराहा गया। खासकर उनके डांस को भी काफी पसंद किया गया। इस फिल्म में वरूण ने एक कॉलेज स्टूडेंट का रोल किया था। लेकिन यह इससे पहले करन जौहर के साथ ‘माइ नेम इज खान’ (2010) फिल्म में सहायक निर्देशक के रूप में साथ काम कर चुके थे। इसके बाद वरूण 2014 में करण जौहर निर्मित फिल्म ‘हम्प्टी शर्मा की दुल्हनियाँ’ में आलिया भट्ट के साथ एक बार फिर नजर आये। फिल्म ने अच्छा करोबार किया साथ ही दर्शको ने आलिया भट्ट और वरूण धवन की जोड़ी पसंद की और फिल्म सफल रही। 2014 में वरूण धवन ने फिल्म ‘मैं तेरा हीरो’ में अभिनय किया। जिसके डाइरेक्टर उनके पिता डेविड धवन थे। यह फिल्म भी हिट रही। इसके बाद उन्होने 2015 में श्रद्धा कपूर के साथ ‘एबीसीडी2’ की जिसमें उनके डांस की काफी प्रशंसा की गयी और वरूण धवन की पॉपुलीरिटी भी बड़ी। फिर 2015 में वरूण धवन सूपर स्टार शाहरूख खान और काजल के साथ ‘दिलवाले’ में नजर आए। जिसमें वे शाहरूख खान के छोटे भाई के रोल में थे। वरूण धवन की रियल लाइफ की कुछ दिलचस्प बातेंः- वरूण धवन रियल लाईफ में बहुत शांत स्वभाव के हैं, और गरीबों की हेल्प करने में बहुत आगे रहते है, उन्होंने कई चैरेटी में गरीबों की मदद करने के लिए पैसे दान किए है।

  •  लव अफेर- वरूण धवन की लव लाइफ लगभग हर कोई जानता है। पहले धवन आलिया भट्ट के साथ डेट कर रहे थे, पर इन्होने इसे खारीज किया था। वरूण के अनुसार आलिया और वो सिर्फ अच्छें फ्रेंड है। वरूण धवन के साथ, तापसी पन्नू, श्रद्धा कपूर के साथ नाम जुड़ चुका है।
काश, मैं बॉलीवुड़ की एक्शन आइकन बन सकूं : जैकलिन

 

बॉलिवुड़ अभिनेत्री जैकलिन फर्नाडीज को ऑन स्क्रीन एक्शन दृश्य करना बेहद पसंद है तथा वह आगे और भी ज्यादा एक्शन फिल्में करना चाहती है। जैकलिन ने ए फ्लाइंग जट के दौरान पहली बार एक्शन में हाथ आजमाया और अब अपनी आगामी दो फिल्मों रिलोड और ड्राईव में वह और अधिक एक्शन दृश्य करती दिखायी देंगी। जैकलिन ने कहा, यह एक शानदार शैली है और मैं इसे लेकर काफी सहज हूं। अगर मैं बॉलीवुड में एक्शन आइकन बन सकी तो यह बहुत अच्छा होगा। एक्शन फिल्मों में महिलाओं की भूमिका अभिनेताओं के मुकाबले कम होती है। उन्होंने कहा, अगर एक्शन में कुछ आया तो मैं करूंगी। मैं ऐसी भूमिकांए निभाने के लिए काफी उत्साहित हूं जिसमें एक्शन करने का मौका मिले। किक की अभिनेत्री ने कहा कि जब हीरोइनों के एक्शन आधारित फिल्में करने की बात आती है तो बॉलीवुड फिल्म निर्माताओं को हॉलीवुड़ से प्रेरणा लेनी चाहिये। उन्होंने कहा, जब महिलाओं के एक्शन करने की बात आती है तो हम हॉलीवुड़ से से सीख सकते हैं कि वे क्या कर रहे हैं। लेकिन अगर आप टाइगर श्राफ जैसे अभिनेताओं की ओर देखें तो पश्चिम हमसे काफी कुछ सीख सकता है। बतौर एक्शन हीरो वह असाधारण है और वह अपने खुद के स्टंट करते है और उसे बहुत अच्छी तरह निभाते हैं।

त्वचा पर मौसम का प्रभाव

 

प्रत्येक मौसम में त्वचा की अलग-अलग तरह से देखभाल करनी पड़ती है। त्वचा पर ऋतु का बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। सर्दियों में यह खुश्क हो सकती है तो गर्मियों में इसका तेल बह सकता है। इसलिए आप अपनी त्वचा की प्रकृति को जानकर नीचे दिए गए टिप्स के अनुसार उसकी उचित देख-रेख करेंगी तो आप हर मौसम में चमकती और दमकती त्वचा पा सकती है।

  •  सामान्य त्वचा वाली स्त्री या पुरूष को गर्मियों में हमेशा अपना चेहरा बेबी सोप और ठंडे पानी से धोना चाहिए।
  •  गर्मी के मौसम में तेलीय त्वचा और भी चिपचिपी हो जाती है अतः इन दिनों, अर्थात गर्मी के मौसम में किसी औषधियुक्त साबुन का प्रयोग करना चाहिए और मेकअप करने से पहले आइस पैक लगाना चाहिए।
  •  रूखी त्वचा गर्मी के दिनों में खिंची-खिंची सी लगती है, अतः इन दिनों त्वचा पर कोई भी हल्का सा माइस्चराइजर लगाएं।
  •  सर्दियों में रूखी त्वचा पर लकीरें सी पड़ जाती हैं, अतः इन दिनों नींबू का रस, ग्लिसरीन और गुलाब जल को बराबर मात्रा में लेकर शरीर के खुले भाग पर सुबह-शाम लगाएं। इससे त्वचा बेदाग भी रहेगी और कांतिमय होकर त्वचा का फटना भी रूक जाएगा।
  •  चंदन के तेल में नारियल का तेल बराबर मात्रा में मिलाकर त्वचा पर लगाएं, दस मिनट बाद कुनकुने पानी से धो लें। खुश्क त्वचा में होने वाली खुश्की से राहत मिलेगी।
  •  गुलाबी ठंडक में शरीर पर, खास-तौर से रूखी त्वचा पर नींबू, हल्दी व मलाई को रगड़ने से जहां एक ओर त्वचा में नमी आती हैं, वहीं त्वचा स्निगध भी हो जाती है।
  •  त्वचा की खुश्की दूर करने के लिए गुलाब जल और जैतून का तेल बराबर मात्रा में लेकर उसमें थोड़ा सा कच्चा दूध मिला लें। इसे त्वचा पर हल्के हाथों से मलें। दस मिनट बाद कुनकुने पानी से स्नान कर लें।
  •  रूखी त्वचा होने पर सर्दियों में प्रतिदिन प्रातः स्नान के पश्चात बेबी ऑयल प्रयोग में लाएं।
  •  सर्दियों में रूखी त्वचा पर संतरे के छिलके रगड़ने से न केवल शरीर में एक नई आभा आती हैं, अपितु शरीर में कसावट भी आती है।
  •  रूखी त्वचा के लिए सर्दियों में सबसे कारगर उपाय है, धूप में प्रतिदिन जैतून के तेल या बादाम रोगन से मालिश करें एवं गुनगुने पानी से स्नान करें।
  •  सर्दियों में तैलीय त्वचा के लिए विशेष प्रकार की देखभाल की आवश्यकता नहीं होती, फिर भी इन दिनों यदि चेहरे पर रात को गाजर व टमाटर का रस निकालकर चेहरे पर लगाया जाए तो चेहरे की अतिरिक्त चिकनाई खत्म होगी।
  •  सर्दियों में तैलीय त्वचा पर ऑयल-फ्री मॉइस्चराइजर लगाएं।
  •  प्रातः काल उठकर नहाने से आधा घंटा पूर्व धूप में बैठकर खाली हाथों से पूरे शरीर की मालिश करें। इससे शरीर का अतिरिक्त तेल निकल जाएगा और धीरे-धीरे प्राकृतिक रूप से चिकनाहट बनी रह जाएगी।
  •  सर्दियों में सामान्य त्वचा की विशेष देखभाल की आवश्यकता होती है। इसके लिए बादामयुक्त मॉइस्चराइजर का प्रयोग करें।
कैसे बनाएं रखे आंखों की खूबसूरती

सुंदर और स्वस्थ आंखे चेहरे का आकर्षण बढ़ा देती है। अगर आपकी आंखों की बनावट सुंदर और आकर्षण है तो आप बहुत भाग्यशाली हैं। लेकिन अगर किसी की आंखे प्राकृतिक रूप से सुंदर नहीं हैं तो भी परेशान होने की जरूरत नहीं है। उचित देखभाल और सही मेकअप के जरिये उन्हें भी आकर्षण बनाया जा सकता है।
आइए हम आपको बताते है कि आज की जीवनशैली में आखों की देखभाल कैसे करेंः-

  •  पेट की बीमारी से भी आंखों की समस्या पैदा हो सकती है। इसके लिए सुबह-सुबह एक ग्लास गर्म पानी में एक नींबू का रस निचोड़कर पीने से पेट साफ रहता है।
  •  हफ्ते में एक दिन आंखों पर ठंडे पानी में टी बैग को डुबोकर आंखो पर 10-15 मिनट तक रखें। इसके अलावा खीरे के पतले गोल टुकड़े करके फ्रिज में आधे घंटे के लिए रख दें, फिर लेट कर आंखो पर एक टुकड़ा रखकर बीस मिनट तक आंखे बंद करके आराम करें। ऐसा करने से आंखों का बहुत आराम मिलेगा और आप तरोताजा महसूस करेंगी। इससे आंखों में चमक भी आने लगेगी।
  • आंखो को स्वस्थ और सुंदर बनाने के लिए पर्याप्त नींद लेना बहुत जरूरी है।
  •  थकी हुई और लाल आंखो को ताजगी प्रदान करने के लिए खीरे के गोल टुकड़े काटकर आंखों पर दस मिनट तक रखें, फिर गुलाबजल में रूई भिगोकर आंखो पर लगाएं। एक मिनट बाद ठंडे पानी से छीटें मारकर साफ करें।
  •  आंखो के नीचे काले घेरे हों तो एक कच्चे आलू को कसकट काले घरों पर लगाएं। आधे घंटे के बाद ठंडे पानी से आंखे धो ले और मायस्चराइजर लगा लें।
  •  रात में सोने से पहले आंखों के नीचे अंडर आई क्रीम या जेल लगाकर सोएं।
  •  धूप में बाहर जाना हो तो सनग्लासेज लगाएं और सनब्लाक लगाना न भूलें।
  •  डाइटीशियन कहते हैं कि आंखो की सेहत के लिए आपका आहार भी बहुत महत्वपूर्ण है। अपने आहार में विटमिन ‘ए’ प्रचुर मात्रा में ले। यह दूध और दूध से बने पदार्थो, मछली, अंडे, पीले फलों और सब्जियों, गाजर, पालक, आडू और पपीते आदि में पाया जाता है।
  •  अगर आंखो के आसपास झुर्रियां नजर आने लगी है तो प्रतिदिन सैलेड और हरी सब्जियों में एक टी स्पून वेजटेबल ऑयल डालकर खाएं।
  •  आंखों पर एंटी रिंकल क्रीम लगाएं। इसके लिए कैस्टर ऑयल, ऑलिव ऑयल और पेट्रोलियम जेली को बराबर मात्रा में अच्छी तरह मिलाकर एक जार में अच्छी तरह मिलाकर एक जार में रख लें। इसे रोजाना आंखों पर और उसके आसपास लगाकर हल्की मालिश करें।
  •  पानी में एक चुटकी बोरिक एसिड़ मिलाकर उबालें। ठंडा करके इस पानी से आंखों को धोएं, ऐसा करने से आंखों को आराम व ठंडक मिलेगी।
  •  अगर आपकी आंखों में जलन होती हो तो एक टी स्पून उबले पानी में दो टेबल स्पून गुलाबजल मिलाएं। इससे आंखे साफ करें।
    आंखों के लिए एक्सरसाइज भी है बेहद जरूरी
  •  फिटनेस एक्सपर्ट के मुताबिक आंखों को आराम देने और सुंदर बनाने के लिए नियमित एक्सरसाइज भी जरूरी है। इसके लिए एक शांत कमरे में लाइट बंद करके दोनों हाथों को आंखों पर रखें, पांच मिनट तक आंखें बंद करें, फिर आंखें खोलकर फैलाएं और अंधेरे में देखने की कोशिश करें। आंखों को आराम मिलेगा।
  •  अगर आपकी आंखे कमजोर हैं और आप चश्मा लगाती हैं तो काम के हर एक घंटे बाद चश्मा उतार कर आंखे कर आंखे बंद करके पांच मिनट के लिए उन्हें आराम दें।
  •  आराम की मुद्रा में बैठ जाएं। अपनी आंखों को गोलाइ्र में घुमाएं। पहले एक दिशा में फिर दूसरी दिशा में घुमाएं।
  •  अपनी चार उंगलियों को आंखों के सामने लांए फिर धीरे-धीरे दूर ले जाएं। यह प्रक्रिया कम से कम पांच बार दोहराएं।
  •  आप जब भी बाहर जाएं तो पेड़-पौधों को ध्यान से देखते रहें। हरियाली या हरा रंग आंखों को बहुत सुकून देता हैं।
    कैसा करें आंखों का मेकअपः- सौंदर्य विशेषज्ञ कहते हैं कि आंखों के मेकअप के लिए एक महत्वपूर्ण बात यह है कि भौहें सही आकार में बनी होनी चाहिए। भौहें बनाने का सबसे सही समय नहाने के बाद होता है। भौहें सही आकार में और साफ-सुथरी न हों तो आई मेकअप बहुत खराब लगता है। भौहें नेचुरल रखें। ‘सी’ आकार वाली बौर बेहद पतली भौहें चलन से बाहर हैं। जो बाल आकार से बाहर हों, बस उन्हीं फालतू बालों को हटवाएं। चेहरे पर बेस लगाने के बाद सबसे पहले आंखों का मेकअप किया जाना चाहिए।
  •  आईशैड़ो से शुरूआत करें- आजकल लाइट शिमरी कलर्स चलन में हैं। पलकों पर पहले अपने कपड़े और त्वचा के रंग से मेल खाता हुआ आईशैड़ो ब्रश की सहायता से लगाएं। फिर थोड़ा हाइलाइटर आइशैडो में मिलाएं। इसके बाद आइलैशेज को कर्ल करें। वाल्यूमाइजिंग या ट्रांस्पेरेंट मस्कारा के दो कोट लगाएं।
  •  सबसे अंत में आइलाइनर से आंखों को खूबसूरत आकार दें। आंखों का मेकअप करने के बाद अपनी आइब्रोज को कोंब करें। अंत में आईब्रो पेंसिल से उन्हें हल्का गहरा करें।
  •  रात में आंखों का मेकअप उतारना न भूलें। अगर आप कृतिम बरौनियां लगाती हों तो सबसे पहले उन्हें हटाएं। फिर क्लींजिंग जेल और गीली रूई की सहायता से आईलाइनर और आइशैड़ो हटाएं।
  •  आंखे बंद करके गीली रूई से भीतरी कोने से बाहरी कोने तक हल्के से पोंछे। ध्यान रखें त्वचा पर खरोंच न आए।

समय के अभाव के सितम की गाज जब मां और संतान के रिश्तों पर गिरती है तो, सारे समाज का ढांचा चरमरा जाता है। आज के जेट युग में नौकरी पेशा मां के पास बच्चें के लिए वक्त नहीं। “क्वालिटी टाइम” जैसी वाहियात बातों की सफाई देकर सच को नहीं झुठलाया जा सकता। उपभोक्तावादी संस्कृति, उच्च स्तरीय जीवन का क्रेज और अपनी पहचान बनाने की होड़ स ेउपजी स्वार्थ परक्ता माताओं को अपने जायों से ही दूर कर रही है।
क्या कहते हैं मां बापः- वे कहते हैं यह मारा मारी, नाइन टू सेवन की जिंदगी हम बच्चों के लिए ही तो जी रहे हैं। बच्चों को सभी सुख सुविधायें, अच्छी शिक्षा, स्टैंडर्ड लाइफ दे सके। इसीलिए तो हम जी तोड़ मेहनत करते हैं। हमारे त्याग को वे आज समझें, ना समझें कभी तो समझेंगे ही। दीपाली माथुर का कहना है, “हमने अपने बेटे संचित को वैलहम जैसे महंगे और प्रेस्टीजियस स्कूल के बोर्डिंग में इसीलिए तो डाला है ताकि उसका भविष्य बना जाए, इसलिए तो मुझे नौकरी करनी पड़ रही है।”
परिस्थितिवश भी बढ़ती है दूरीः- नीलेश का ट्रांसफर किसी छोटे शहर में हो गया, तो पत्नी और दोनों बच्चें जयपुर ही रहे ताकि बच्चों की पढ़ाई में हर्ज न हो। नीलेश का ट्रांसफर बाद में किसी और जगह हो गया। बच्चों के साथ ही नीलेश और उसकी पत्नी में भी दूरियां आ गई थी। नीलेश ने दूसरी औरत को रख लिया था। मां को घर बिखरने के गम से ज्यादा अपने पर फक्र था कि ये त्याग मैंने अपने बच्चों के लिए किया। निषिता सारा दिन ऑफिस में कम्प्यूटर पर काम करके इतना थक जाती थी कि नन्हीं साक्षा के साथ समय बिताने के लिए उसके पास ऊर्जा ही शेष नहीं बचती थी। उसके सवालों का जवाब देते समय वह खीज जाती थी। मां के बजाय साक्षा पड़ोस वाली आंटी के ज्यादा करीब हो गई थीं।
टी. वी. केबल संस्कृतिः- मां की ममता, दुलार, उसका अभय दान देता संरक्षण, सुखदायी सान्निध्य और एक अवर्णंनीय निरंतर प्रवाहित होती ऊष्मा का अपने आप में संपूर्ण अहसास ना मिलने पर बच्चा एक अव्यक्त गहरी उदासी में डूब जाता है। ऐसे में वह अपना मन कंप्यूटर गेम्स, टी. वी. से बहलाते है। आज जो बच्चे असमय बड़े होते नजर आते है इसके पीछे टी. वी. कल्चर का बड़ा हाथ है। वे धीरे-धीरे इतने टी. वी. एडिक्ट हो जाते है कि, उन्हें बाहर खेलना, मित्र बनाना भी अच्छा नहीं लगता। एकाकी होते बच्चे अपने में ज्यादा गुम रहने लगते हैं। टी.वी. के कारण आपसी संवाद भी नहीं हो पाता है क्योंकि मां भी कम टी.वी. की शौकीन नहीं होती।
एकल परिवार भी कारण हैः- होना तो ये चाहिए था कि, एकल परिवार में बच्चा मां के और करीब आ जाता किंतु हुआ ठीक विपरीत। एकल परिवार में मां की जिम्मेदारियां ज्यादा बढ़ जाती है। काम पर जाना है तो बच्चें को क्रेच में छोड़ना है या फिर आया या नौकर के भरोसे। बच्चे को वे अपने ढंग से देखेंगे। हो सकता है गलत आदतें डाल दें। क्रच्च में वह अपनापन कहां जो बच्चें के स्वस्थ विकास के लिए पहली शर्त है।
सुविधायें देकर कर्तव्य पालनः- माना कि सुविधाओं की जीवन में अहमियत है और सुविधायें है कि जिनका काई छोर ही नहीं। उपभोक्तावादी संस्कृति का कमाल है कि बाजार हर तरफ की नामी “सॉफिस्टिकेटेड“ चीजों से अटा पड़ा है। बच्चों की आदतें भी ऐसी बन गई है कि बोलना शुरू ही हुएं है और सादी लेमनचूस टॉफी गोली की जगह फाइव स्टार केड्बरी और ये पिन और वह पिन जैसे न जाने कैसे-कैसे नामों की महंगी टॉफियों की मांग करने लगते है। आधी से ज्यादा “सोकॉल्ड” सुविधायें असुविधा ज्यादा सिद्ध हो रही है। ये सुविधाओं का ही अंजाम सामने आ रहा है कि बड़े-बड़े अमीर घरों के बिगड़े नवाबजादे अपराधी बन कर बैंक लूटते, लड़कियां छेड़ते और नशे के आदी बनते जा रहे हैं। सब चीज एकदम से मिल जाने से न बच्चों को चीजों की कद्र करनी आती है न मिलने पर उन्हें उसके बिना रहना भी नहीं आता है। आज बच्चों पर पढ़ाई का जबर्दस्त भार है। ऊपरसे अभिभवकों की उनको लेकर महत्वाकांक्षाए बच्चों को तनावग्रस्त कर देती है। हाल ही में बच्चों पर आई. सी. एम. आर. और ‘इंस्टीट्यूट ऑफ होम इकनॉमिक्स’ द्वारा की गई स्ट्डीज से पता चला है कि, आठ सौ बच्चों में से 25 प्रतिशत बच्चों को हाई कोलेस्ट्रोल, 35 प्रतिशत ओवरवेट, 13 प्रतिशत अंडरवेट हैं। क्या कारण है कि 13 साल के किशोर बढ़े हुए रक्तचाप, हार्ट प्रॉब्लम, डायबीटिज और विभिन्न प्रकार की एलर्जी तथा मनाविकारों के शिकार होकर अस्पताल पहुंच जाते है? सिर्फ शिक्षा पद्धति ही बच्चों में तनाव की जिम्मेदार नहीं, माता-पिता की बच्चों से ढेर सारी उम्मीदें भी बच्चों में तनाव का कारण बन जाती है। वे चाहते हैं कि बच्चें शीघ्र ही पढ़ाई में अव्वल आने के साथ हर क्षेत्र में टॉप करें। फिर चाहे वह म्यूजिक, डांस, पेंटिग, क्राफ्ट क्लासेज, स्पोर्टस, स्विमिंग जैसे भिन्न क्षेत्र ही क्यों न हों। बच्चों और अभिभावकों में फिर संवाद के लिए समय ही कहां बचता है। रहा सहा समय टेलीविजन ले लेता है। बच्चों में बढ़ते तनाव के कारण, आत्महत्या के आंकड़े चौकाने वाले हैं। अभिभावकों की जिम्मेदारी है कि वे उनके मन, उनकी परेशानियों को समझें। उनसे निरंतर संवाद बनाए रखें चाहे वे कितने ही थके हों। सोने जाने से पहले वे उनके साथ वार्तालाप करें। कुछ अपनी कहें कुछ उनकी सुनें। परिवार के साथ छुट्टियां बिताना बहुत अहमियत रखता है। जहां पर परिवार के सदस्य बढ़िया वक्त साथ गुजारते हैं, वहीं किशोर होते बच्चों को वैज्ञानिक ढंग से शारीरिक शिक्षा भी थोड़ी बहुत अभिभावक जैसे बाप बेटे को, मां बेटी को दे सकते है। उनमें होने वाले शारीरिक परिवर्तन उन्हें परेशान कर इधर-उधर से अध-कचरा ज्ञान बटोरने पर मजबूर करते हैं। बेहतर है कि अभिभावक स्वंय उन्हें सही तौर पर इस विषय में जानकारी दें ताकि वे इन परिवर्तनों को सहज रूप से ले सके।

डैंड्रफ जब समस्या बनने लगे

डैंड्रफ यानी रूसी की एक सामान्य मात्रा हर एक के बालों में होती है। लेकिन अगर डैंड्रफ इतना बढ़ जाए कि कंघी और कपड़ों पर गिरने लगे तो समस्या विकट हो जाती है। डैंड्रफ सिर की त्वचा की मृत कोशिकाएं होती हैं, जो लगातार बनती रहती है। अगर बालों की देखभाल तरीके से न की जाए तो डैंड्रफ की समस्या बढ़ने लगती है। नेचर्स एसेंस् की सुप्रसिद्ध सौंदर्य विशेषज्ञ सुनीता अरोड़ा, डैंड्रफ की समस्याओं पर कुछ उपयोगी सुझाव दे रही हैं।
ऽ डैंड्रफ का असर :- डैंड्रफ बालों की जड़ों को कमजोर करता है, फलतः बाल तेजी से झड़ने लगते हैं। डैंड्रफ सिर की त्वचा की सतह पर चिपक जाता हैं, जिससे जड़ों की ओर हवा का प्रवाह बाधित होता है। परिणामस्वरूप, बालों की जड़े कमजोर और बालों पर इनकी पकड़ ढीली पडती है।

  •  डैंड्रफ का कारण :- इस क्षेत्र में अध्ययनों से कुछ बात सामने आई है जैसे कि पचास फीसदी से अधिक युवा इस समस्या से कभी ना कभी पीड़ित रहते हैं। यह माना जाता है कि सिर की त्वचा पर हुआ फंगल इनफेक्शन भी डैंड्रफ का कारण हो सकता है। इस समस्या के उपजने का एक बहुत बड़ा कारण उपापचय प्रक्रिया में गड़बड़ी होना भी है। सिर की त्वचा में नई कोशिकाएं लगातार बनती रहती है और उसी अनुपात में मृत कोशिकाएं भी तैयार होती रहती है। उपापचय प्रक्रिया में असंतुलन पैदा होने पर नई कोशिकाएं तेजी से बनने लगती हैं, जिसके कारण मृत कोशिकाएं यानी डैंड्रफ तेजी से बनने लगते हैं। उपापचय प्रक्रिया में असंतुलन के निम्न कारण हो सकते है-
  •  ड्रग्स
  •  भवानात्मक तनाव
  •  युवावस्था के शारीरिक बदलाव
  •  मौसम या खानपान में अचानक आया परिवर्तन
    क्या आपको वास्तव में डैंड्रफ की समस्या है?
    डैंड्रफ का उपचार करने से पहले ये सुनिश्चित कर लें कि आपके बालों से वाकई डैंड्रफ है भी या नहीं। क्योंकि कभी-कभी सिर की त्वचा पर डैंड्रफ नुमा छोटे-छोटे कण तेज धूप या हेयर ड्रायर के अत्यधिक इस्तेमाल से भी हो जाते है। बालों में साबुन या आसानी से न साफ होने वाले शैंपू के इस्तेमाल से भी ऐसा हो जाता है।
     आपका कंघा ब्रश और डैंड्रफ
    कभी भी डैंड्रफ से पीड़ित व्यक्ति का इस्तेमाल किया हुआ कंघा या ब्रश इस्तेमाल न करें। इससे आप भी डैंड्रफ की चपेट में आ सकते है। हर बार शैंपू करने के बाद अपने कंघे और ब्रश को अच्छी तरह साफ करना न भूलें। डैंड्रफ से बचाव के लिए बालों पर ब्रश का इस्तेमाल करें और सप्ताह में कम से कम एक बार शैंपू का प्रयोग करें। बालों का धोते समय ध्यान रखें कि सिर से पानी चेहरे पर न गिरे क्योंकि यह मुहासों का कारण बन सकता है।
    डैंड्रफ के कुछ घरेलू उपचारः- छह चम्मच पानी में दो चम्मच शुद्ध सिरका मिला लें और सोने से पहले रूई से सिर की त्वचा में लगा लें। तकिये को गंदा होने से बचाने के लिए सिर पर तौलिया बांध कर लेटें। दूसरी सुबह शैंपू करने के बाद एक बार फिर सिरके से बाल धोएं। यह प्रक्रिया सप्ताह में एक बार तीन महीने तक लगातार करें।
  •  मेथी के बीज डैंड्रफ, बालों को गिरने गंजेपन और बालों को लंबे, काले और घने बनाने में बहुत लाभदायक होते हैं। मेथी के बीज को पानी में भिगो कर रात भर रखें। सुबह इसे पीस कर पेस्ट बना लें। बाल धाने के पहले आधे घंटे तक इस पेस्ट को सिर की त्वचा पर लगाएं। आधे घंटे बाद बालों में शैंपू कर लें।
    डैंड्रफ में उपयोगी मसाज :- गर्म नारियल या कैस्टर के तेल से सप्ताह में दो बार सिर की त्वचा पर अच्छी तरह मसाज करें।
  •  अपनी उंगलियों से पोरों से कम से कम आधे घंटे तक गोलाकार गति से मसाज करें।
  •  अगली सुबह शैंपू कर लें।
  •  इस तरह की मसाज से सिर में रक्त प्रवाह तेज होता है। फलस्वरूप बाल रूखे नहीं होते और इनकी जड़े मजबूत होती है। डैंड्रफ के नियंत्रण के लिए यह काफी लाभप्रद होता है।
    डैंड्रफ में उपयोगी, अंडे का पैकः- दो कच्चे अंडे में दो छोटे चम्मच पानी मिला लें। बालों को गीला करके इस मिश्रण को बालों पर लगाएं। अब सिर पर मसाज करते हुए दस से पंद्रह मिनट तक छोंड़ दें। इसके बाद हल्के गुनगुने पानी से बालों को धो लें। यह आपको डैंड्रफ और बाल झड़ने, दोनों समस्याओं से दूर रखेगा।

आज बीमारियों की रोकथाम के लिए जितनी तेजी से तरह-तरह की दवाइयों का निर्माण हो रहा है, उतनी ही तेजी से मनुष्य नई-नई बीमारियों के शिकंजे में जकड़ता जा रहा है। इनमें कुछ बीमारियां तो ऐसी भी हैं जिनका अभी तक कोई कारगर इलाज नहीं खोजा जा सका है। कैंसर भी एक ऐसा ही रोग है। रसायनिक दवाइयों से कीमोथैरेपी, विकिरण से रेडियोथैरेपी, हार्मोन थैरेपी तथा इम्यूनोथेरेपी जैसी आधुनिक चिकित्सा प्रणालियों के बाद भी कैंसर से मरने वालों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार पूरे विश्व में प्रतिवर्ष लगभग 80 लाख मौतें सिर्फ विकासशील देशों में होती हैं जहां कैंसर से लड़ने के संसाधन अत्यंत कम हैं। विकसित देशों में व्याप्त जानलेवा रोगों में कैंसर का स्थान चौथा है और 6 प्रतिशत मौतों का कारण है। भारत में मौत के दस प्रमुख कारणों में से कैंसर एक प्रमुख कारण है। यहां एक लाख लोगों में से सत्तर लोगों में कैंसर का प्रकोप देखा गया है और हर आठ में एक को कैंसर होने की संभावना है। हर वर्ष यहां कैंसर के पांच लाख नए मरीज बन जाते हैं। कैंसर एक गैर संक्रामक रोग है। यह कोई वंशानुगत बीमारी भी नहीं है। फिर भी कभी-कभी कुछ परिवारों में यह रोग एक से अधिक सदस्यों को अपनी चपेट में ले लेता है। कैंसर किसी भी आयु में, किसी भी व्यक्ति को हो सकता है। स्त्री-पुरूष, बच्चे, युवा, वृद्ध सभी इसके शिकार हो सकते हैं। कैंसर का सबसे बड़ा कारण है- पर्यावरण प्रदूषण। दो-तिहाई कैंसर गलत खान-पान व रहन सहन की आदतों के कारण होता है जैसे-तंबाकू, बीड़ी, सिगरेट, सुपारी, पान-मसाला, शराब आदि का अत्यधिक सेवन। कुछ दवाइयां, हार्मोंस, एक्स रे एंव अल्ट्रा वायलेट किरणें भी कैंसर का कारण बन सकती हैं। यह मानव शरीर के किसी भी अंग में हो सकता है। वर्तमान में गुटखा या पान मसाला खाने का व्यसन जिस तेजी से बढ़ा है उसी अनुपात में मुंह का कैंसर के रोगियों में भी वृद्धि हुई है। मुंह के कैंसर के इलाज की अब तक कई आधुनिक विधियों का आविष्कार हो चुका है। रेडियोथेरेपी द्वारा मुंह के कैंसर का काफी सीमा तक उपचार संभव है परंतु इन नई विधियों के बाद भी अगर यह बीमारी हो जाए तो आज भी उसका शत-प्रतिशत नहीं है। साधारणतया मुंह का कैंसर उन व्यक्तियों में अधिक होता है जो तंबाकू का प्रयोग चूने के साथ करते हैं एंव बीड़ी, सिगरेट या सिगार पीते हैं। कुछ चिकित्सकीय व्याधियां जैसे टाइलोसिस पामेरिस, पैटर्सनब्राउन, कैलीसिड्रोम, भोजन में आयरन की कमी से होने वाला एनीमिया, ग्रास नली का एक्लेजिया इस कैंसर के अन्य स्वरूप हैं। ग्रास नली के कैंसर का उपचार कीमोथेरेपी, बाह्य विकिरण चिकित्सा और अंत विकिरण चिकित्सा के समन्वित सहयोग से किया जाता है जिसके अच्छे परिणाम सामने आये हैं। फिर भी इसमें 20 से 30 प्रतिशत रोगियों में भी पूर्णरूपेण रोग मुक्त होने की संभावनाएं बन पाती हैं। रक्त कैंसर से हर साल हजारों व्यक्ति मौत के मुंह में जा रहे हैं। रक्त कैंसर के दो वर्ग हैं। एक वर्ग ‘क्रॉनिट रक्त कैंसर’ का तथा दूसरा वर्ग ‘एक्यूट रक्त कैंसर’ का होता है। कुछ कैंसर ऐसे होते हैं जो सिर्फ महिलाओं को होते हैं। इनमें से एक है स्तन कैंसर। पैंतीस से चौवन वर्ष की आयु की महिलाओं को होने वाला सबसे घातक रोग स्तन कैंसर है। वैज्ञानिको के अनुसार स्तन कैंसर हार्मोन में परिवर्तन, बी. आर. ए. सी. जीन, वंशानुगत प्रभावों, अधिक उम्र में गर्भ धारण, मासिक चक्र की अनियमितता, रजोनिवृत्ति एंव पर्यावरण में विद्यमान कैंसरजन्य पदार्थो के कारण हो सकता है। स्तन कैंसर का प्रारंभिक अवस्था में दवाइयों, इंजेक्शनों आदि की मदद से अथवा कैमोथेरेपी चिकित्सा पद्वति द्वारा इलाज किया जा सकता है। सर्जरी, रेडिएशसन एंव हार्मोन थेरेपी स्तन कैंसर के उपचार की अन्य विधियां हैं। कैंसर के अनेक प्रकारों के अनुसार उसके कारण भी बहुआयामी हैं परंतु विभिन्न शोधों से यह तथ्य निर्विवाद रूप से सत्य है कि उसकी रोकथाम में शरीर की आंतरिक क्षमता की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण हो सकती है। कैंसर जैसे रोग के हो जाने के बाद उपचार भले ही कठिन है लेकिन थोड़ी वैज्ञानिक जीवन शैली और थोड़े संतुलित आहार के सहारे काफी सीमा तक अपने आप को कैंसर से सुरक्षित रखा जा सकता है। समुचित खान-पान कैंसर से लड़ने का प्रमुख हथियार बन सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसर कैंसर को नियंत्रित करने में सक्षम विटामिन ‘ए’ और ‘बी’ केरोटीन तत्व प्राकृतिक रूप् से साग-सब्जियों में पाए जाते हैं। ये मेथी, पालक, गोभी, आलूबुखारे एंव गाजर आदि में उपलब्ध होते हैं। जिन देशों-प्रदेशों के लोग भोजन में हरी साग-सब्जी एंव ताजी फलों का सेवन करते हैं, वहां इस के रोगी बहुत कम पाए जाते हैं। विटामिन ‘सी’ से युक्त खाद्य पदार्थो का सेवन करके भी कैंसर से बचा जा सकता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि सीधी-सरल प्राकृतिक जीवनशैली अपनाकर एंव साग-सब्जी तथा ताजे फलों के नियमित सेवन से कैंसर जैसी घातक बीमारी से दूर रहा जा सकता है। इसके लिए लोगों में जागरूकता पैदा करके कैंसर के भयावह शिंकजे से मुक्त रहने का सामूहिक प्रयास किया जाना चाहिए। ‘सादा जीवन, सादा भोजन’ का सूत्र ही मानव जाति को इस भयावह बीमारी से बचा जा सकता है।

किशोरावस्था जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव है। इस उम्र में बच्चों में बहुत बदलाव आते हैं। बच्चों को इस उम्र में समझ पाना जितना जटिल काम है उतना कभी नहीं। बच्चों के विकास में उनके परिवार के साथ-साथ मित्रों का भी सहयोग होता है। किशोरावस्था में तो परिवार से भी ज्यादा उनके दोस्तों और सहेलियों का उन पर प्रभाव पड़ता है। इसी से उनका व्यक्तित्व बनता या बिगड़ता है। उस उम्र में वे सिर्फ दोस्तों के सम्पर्क में ही रहना चाहते हैं। उनसे ही मोहब्बत करना चाहते हैं। उनके साथ ही हर जगह घूमना और जाना पसंद करते हैं। उनके साथ पार्टियों में शराब-सिगरेट पीना पसंद करते हैं। वे उनके साथ सारे अनुभव बटोरने को तैयार रहते हैं। अनुभव लेने के चक्कर में वे खुद पर नियंत्रण नहीं रख पाते। वे चाहें तो इस सबका सेवन करने के लिए अपने दोस्तों को मना कर सकते हैं। उन्हें रोक सकते हैं। जब उनके दोस्त उन्हें गलत चीजें खाने-पीने के लिए उत्सुक कर सकते हैं तो क्या वे अपने दोस्तों को इन गलत चीजों के सेवन से नहीं रोक सकते? उन्हें रोकने की हिम्मत तो उन्हें दिखानी ही होगी। यह उम्र इसलिए कच्ची भी कही जाती है क्योंकि इस उम्र में नादानियों में किशोर-किशारी ऐसे कदम उठा लेते हैं जो उन्हें जीवन भर के लिए अपराधी बना देते हैं। इस उम्र के लड़के लड़कियों का एक दूसरे के प्रति आकर्षित होना स्वाभाविक है। जरूरी नहीं कि आपकी बेटी लड़को से दोस्ती करती है तो उसके प्रति प्रेम व्रेम जैसा भी कुछ मन में रखती है। इस उम्र की दोस्ती में भावनात्मक जुड़ाव पैदा होना लाजिमी है मगर अपने बच्चों को इस हद से आगे न बढ़ने की हिदायत दें। इस उम्र में लड़के-लड़कियों का आपस में दोस्ती रखना कोई गलत बात नहीं किंतु सोचने वाली बात यह है कि उनकी दोस्ती का स्वरूप क्या है? कहीं इस दोस्ती के कारण वे पढ़ाई में तो नहीं पिछड़ रहे हैं। जो आपको पढ़ने के लिए प्रेरित न करें, वे आपके अच्छे दोस्त नहीं हो सकते। अगर वे आपके सच्चे दोस्त होते तो आपको पढ़ने से नहीं रोकते। अपने दोस्तों को पहचानना सीखें। बच्चों को प्यार और सेक्स की जानकारी दें। इस उम्र में सबसे जरूरी है पढ़ाई। बाकी बाद की चीजें है। सबसे पहले अपना कैरियर बनायें। उसके बाद कुछ और हो। हर घर के कुछ कायदे-कानून होते हैं। बच्चों को भी अपने घर के कायदे-कानून मानने चाहिए। उन्हें यह मालूम होना चाहिए कि यदि वे अपने घर के नियमों को नहीं मानेंगे तो उनके माता पिता यह बर्दाश्त नहीं करेंगे। किस समय क्या चीज जरूरी है, उन्हें उसे ध्यान में रखना होगा? पढ़ाई के समय पढ़ाई ही जरूरी है। जरूरी नहीं कि आपके बच्चे सारा दिन पढ़ाई करें किंतु दिन में तीन-चार घंटे तो उन्हें पढ़ाई को देने होंगे। पढ़ाई के समय यदि उनके मित्र उन्हें परेशान करते हैं तो वे उनके अच्छे दोस्त नहीं हैं। आप भी ऐसे दोस्तों को अपने बच्चों के साथ मिलने न दें। अगर आपको अपने बच्चों के किसी दोस्त से परेशानी है या उसे आप पंसद नहीं करते तो अपने बच्चे के साथ बैठकर उससे इस विषय में बात करें। यदि वह आपको उसकी कुछ अच्छाई बताता है तो उसे स्वीकार करें किंतु उसे यह भी बता कि यदि आपने उसके दोस्त में कोई झूठी या गलत बात देखी तो आप उसे बर्दाश्त नहीं करेंगे। आप तुरंत उसे उससे दूर कर देंगे। अपने बच्चें का स्कूल बदलवा देंगे। अगर आपके बच्चों को यह पता है कि आप जो कहते हैं वो करते जरूर हैं तो आपके बच्चें अपनी हद पार नहीं करेंगे।

एड्स एक जानलेवा रोग न होकर खतरनाक रोग है। आम धारणा भले ही यह हो कि असुरक्षित सेक्स से एड्स होता है किंतु यही सच नहीं। सच तो यह भी है कि ब्यूटी पार्लर से भी आप एड्स का शिकार हो सकते हैं। दवाखानों से तो एड्स का खतरा रहता ही है। जेन्ट्स पार्लर सबसे ज्यादा असुरक्षित क्षेत्र हैं। सस्ते पार्लर क्या और महंगे पार्लर क्या, दोनों ही पार्लर सुरक्षित नहीं है। क्या आपको याद है कि पार्लर से सेवारत लोग कपड़े झटक कर ग्राहक के ऊपर डाल देते हैं। प्रतिदिन कपड़े ठीक ढंग से धुलने चाहिए। रेजन, ब्रुश, कंघी प्रतिदिन सैकड़ों लोग इस्तेमाल करते हैं। अन्य सामग्री के दौरान भी सावधानी नहीं बरती जाती है। ग्राहकों को कहां खबर है कि पार्लर में उपयोग की जाने वाली अधिकांश कॉस्मेटिक सामग्री घटिया क्वालिटी की होती है। नकली क्रीम चर्म रोग को आमंत्रित करती है। जरूरी नहीं कि ब्यूटीशियन प्रशिक्षित हों। अप्रशिक्षित ब्यूटीशियन नुकसान पहुंचा सकते हैं। गली मोहल्लों में पार्लर खुल चुके है। गांव और कस्बों में सैलून तो ढेरों होते है किंतु कहीं भी स्वास्थ्य की दृष्टि से कोई ठोस कदम नहीं उठाए जाते। इसी कारण संक्रमण फैलता जाता है। एड्स का प्रचार गलत ढंग से हुआ और इलाज भी गलत ढंग से किया जाता है। समाज एड्स पीडित को इस बुरी नजर से देखता है मानो उसने जघन्य अपराध किया हो। असुरक्षित सेक्स से यदि बचने का प्रयास किया जाए तो एड्स से घबराने की जरूरत नहीं। जरूरी नहीं कि आप बाहर से गुप्त रोग लायेंगे। घर बैठे भी आप गुप्त रोगों के शिकार हो सकते हैं। रक्त चढ़ाने के दौरान भी लापरवाही से एड्स फैल सकता है। ब्लड़ डोनेशन के दौरान भी सावधानियां बरतनी चाहिए। पार्लर जाते समय आप साथ में ऐप्रन तो ले जायेंगे नहीं। न ही अपना नैपकी, क्रीम यूज करेंगे। सावधानी कैसे बरतेंगे? सावधानी का सबसे आसान तरीका यह है कि बेवजह सैलून में जा कर दाढ़ी न बनवाएं। कटिंग करवाते समय भी सावधान रहें। रेजर नया यूज करने को कहिए। बालों को डाय कराना चाहते हैं तो घर पर करें। पार्लर में ब्रश एक ही रहता है और उसी ब्रश से वह सभी के बालों का काला करता हैं। मेहंदी लगाता है। समझ गए न सावधानी।