भारतीय परम्परा में यज्ञ का महत्त्व

यज्ञों के आयोजन से वातावरण शुद्ध होता है। बड़े-बड़े यज्ञों के आयोजन से बारिश भी होती है। आधुनिक परिवेश में बारिश के लिए बड़े-बड़े यज्ञों का आयोजन किया जाता है। यज्ञों की परम्परा अति प्राचीन है। श्रीमद् भगवद् गीता के अनुसार प्रजापति ब्रह्मा ने मनुष्य की उत्पत्ति के साथ यज्ञ का प्रचलन भी प्रारंभ किया था। यज्ञ का प्रारंभ करते हुए ब्रह्मा ने कहा था, यज्ञों द्वारा मनुष्य की सभी मनोकामनाएं पूरी होंगी।
गीता के अनुसार सृष्टि में सभी प्राणियों की उत्पत्ति होती है। अन्न की उत्पत्ति वर्षा से होती है और वर्षा की उत्पत्ति यज्ञों से होती है। वर्षा और शुभ कार्यों के लिए यज्ञ करना आवश्यक होता है।
प्राचीन ग्रंथों के अध्ययन से पता चलता है कि प्राचीन समय में सभी राजा-महाराजाओं द्वारा यज्ञ किया जाता है। यज्ञों का धार्मिक महत्व भी कम नहीं। सूर्य व अन्य ग्रहों से आने वाली अनिष्टकारी किरणों को यज्ञों के आयोजनों से रोके जा सकता है। यज्ञों के पुण्य कर्मों से ग्रहों की अनिष्टकारी किरणों का प्रभाव नष्ट हो जाता है। शुभ कार्यों की सम्पन्नता के लिए यज्ञ किए जाते हैं।
यज्ञों द्वारा अशुभ ग्रहों का अनिष्टकारी प्रभाव नष्ट करने के साथ देवी-देवताओं को प्रसन्न किया जाता है। यज्ञ करते समय विधिवत सभी नियमों का पालन करना चाहिए। स्नान करके, स्वच्छ वस्त्र पहनकर, शारीरिक और मानसिक रूप से शुद्ध होकर यज्ञ करना चाहिए। कुलषित मन से किए गए यज्ञ का पुण्य फल नहीं मिलता है। यज्ञ में प्रयुक्त सामग्री भी पवित्र व शुद्ध होने चाहिए।
किसी भी यज्ञ के प्रारंभ में देवताओं के पूजन की परम्परा है। पूजन के लिए धूप, दीप से वातावरण सुगंधित किया जाता है। शुद्ध घी या तेल का दीपक जलाया जाता है। प्राचीन ग्रंथों के अनुसार दीपक के नीचे गेहूँ या फूल आवश्य बिछाने चाहिए। ग्रंथो में वर्णन किया गया है कि दीपक जलाने से पुण्य मिलता है। दीपक को बुझाने से पुण्य नष्ट होता है। यज्ञों के समय देवताओं की पूजा के लिए दीपक जलाने से स्वर्ग का सुख मिलता है। अगर, तगर, कूठ, मिश्री, कपूर, चंदन, खस, जायफल, सावित्री, जटामासी, देवदार, तज, शीलाजीत आदि से निर्मित धूप जलाने से वातावरण शुद्ध होता है और पुण्य की प्राप्ति होती है।
प्रत्येक मनुष्य की राशि के अनुसार यज्ञ करते समय उनके लिए विशेष मंत्र निदिष्ट होते हैं। मेष राशि के लिए श्री लक्ष्मी नारायणाय नमः मिथुन राशि के जाति के लिए  हीं विश्वरूपाय नमः, मिथुन राशि के लिए क्री केशवाय नमः, कर्क राशि के लिए हीं हरिहराय नमः, सिंह राशि के लिए हीं बाल मुकुंदाय नमः, कन्या राशि के लिए हीं परमात्मने नमः, तुला राशि के लिए श्रीं रामाय नमः, वृश्चिक श्री क्लीं जानकी रामाय नमः, मकर राशि के लिए  श्रीं वत्साय उपेंद्राय नमः, कुुंभ राशि के लिए श्री गोपाल गोविंद्राय नमः, मीन राशि के लिए हीं क्री खड़ग चक्राय नमः से मंत्र बोलकर यज्ञ किया जाता है।
यज्ञ व हवन कुंड में सामग्री डालते समय की विधि को हवन की छवि कहा जाता है। यज्ञ व हवन के उद्येश्य के अनुसार सामग्री में परिवर्तन किया जाता है। सामग्री 8 तरह की जड़ी-बूटियों व वनोमधियों से बनी होती है। यज्ञ के समय में कुंड में आहुति देते समय उस देवी-देवता का स्मरण किया जाता है। स्मरण नहीं करने से यज्ञ का पुंय नहीं मिलता है।
यज्ञ की सामग्री जौ, तिल, चिरौंजी, बादाम, नागकेशर, किशमिश, आँवला, छुआरा, लौंग, सुपारी, चंदन, आगर, गुग्गल, जायफल, नावित्री, इलायची, तामलपत्र, तागर, दालचीनी, खांड, रोली नागरमोया से बनाई जाती है। इस सामग्री से यज्ञ करने से पुण्यफल की प्राप्ति होती है। मनोकामनाएँ पूरी होती है और वातावरण स्वच्छ होता है।
सभी यज्ञ में नवग्रह की पूजा अवश्य की जाती है। नवग्रह की पूजा के लिए अलग से एक कुंड बनाया जाता है। नवग्रह यज्ञ कुंड में मध्य में सूर्य नारायण, दक्षिण पूर्व कोण में चंद्रमा, दक्षिण में मंगल, उत्तर पूर्व में बुध, उत्तर में गृहस्थिति, पूर्व में शुक्र, पश्चिम में शनि, दक्षिण-पश्चिम में राहु और पश्चिम-उत्तर दिशा में केतु की स्थापना की जाती है।
नवग्रह पूजा में देवताओं की स्थापना भी विशेष दिशाओं में करने का महत्त्व होता है। पूजा के समय पंडित ओर यजमान के बैठने की दिशा भी निर्धारित की जाती है। पंडित उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठते हैं और यजमान को पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठना होता है। पूजा प्रारंभ करने से पहले पंडित के निर्देश पर यजमान सभी पूजन सामग्री और देवताओं पर गंगाजल के छींटे मारकर पवित्र करता है।
पंडित वहाँ उपस्थित सभी व्यक्तियों को चावल देकर स्वास्ति वाचन का मंत्र उच्चारण करता है। सकंल्प, रक्षाबंधन, रक्षाविधान के बाद देव पूजन किया जाता है। देव पूजन में सभी देवताओं का आवाह्न करके गणेश की पूजा की जाती है। गणेश के बाद ब्रह्मा, फिर विष्णु, शिव, लक्ष्मी और सरस्वती की पूजा की जाती है। सभी देवताओं की पूजा करते समय विशेष मंत्र बोले जाते है।
नवग्रह पूजन में सर्वप्रथम सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि का आवाह्न किया जाता है। नवग्रह पूजन में राहु और केतु की पूजा भी की जाती है। इसके साथ ही हाथ में पुष्प और चावल लेकर अधिदेवता की पूजा की जाती है। अधिदेवता में भैरव का आवाह्न किया जाता है। उमा, स्कंद, विष्णु, ब्रह्मा, इंद्र, यम, काल, चित्रगुप्त का विधान है।

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