चंद्रमा के अधीन है हमारे स्वप्नों का संसार

वैदिक ज्योतिष की बात की जाए तो, चंद्रमा को मन का कारक तत्त्व माना जाता है, जो कि हमारे मन की समस्त क्रियाओं का संचालन करता है। अब जिस व्यक्ति की जन्मकुंडली में चंद्रमा जिस भाव में होता है, उस व्यक्ति को अधिकांशतः उसी भाव से संबंधित पारिवारिक सदस्यों, सगे-संबंधियों वस्तुओं या पदार्थों के ही स्वप्न दिखलाई पड़ते है।
सपनों की दुनिया भी बड़ी अजीब होती है। हर इन्सान अपनी जिंदगी में अच्छे बुरे सपनों के अनुभव से गुजरता है। ये जरूरी नही कि सपने हमेशा सुंदर ही हों वे अच्छे-बुरे, सुहावने या डरावने कैसे भी हो सकते है। इनका संसार अत्यंत असिमित है और इतिहास भी शायद उतना ही पुराना है, जितना कि मानव जाति का इतिहास। सपनों का संबंध हमारे मन से है और यही मन बाह्य एवं आंतरिक रूप से हमारे समस्त जीवन को क्रियान्वित करता है।
स्वप्नों की विभिन्न परिभाषाएँः-
शरीर शास्त्र अनुसारः
नींद आने के बाद यदि मस्तिष्क में रक्त की कमी अनुभव होने लगे अथवा रक्त संचार सुचारू रूप से न हो पाए तो स्वप्न दिखाई देने लगते है।
इन्द्रिय शस्त्रानुसारः
हमारी पाचन शक्ति के कमजोर होने पर निंद्रावस्था में सपने आने लगते है।
मानव शस्त्रानुसारः
स्वप्न इंसान की पहुँच से बाहर की स्मृतियों का आभास है।
आध्यात्म शास्त्रानुसारः
हमारा सूक्ष्म शरीर नींद की अवस्था में हमारे दिन भर के क्रियाकलापों को चित्रित कर प्रस्तुत करता है, उसे ही स्वप्न कहते है।
जीवन विज्ञान अनुसारः
स्वप्न इंसान की एक चमत्कारिक समझ है। तात्पर्य है कि निद्रावस्था में मन द्वारा होने वाली क्रियाशीलता के निर्माण को ही स्वप्न कहा जाता है।
मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि स्वप्नावस्था मनुष्य के अवचेतन मस्तिष्क की उपज है, भारतीय ज्योतिष भी स्वप्न को अवचेतनावस्था का ही परिणाम मानता है किंतु मस्तिष्क नहीं अपितु मन की अवेचन अवस्था। विज्ञान जहाँ मन और मस्तिष्क को एक ही मानता है, वही हमारे यहाँ मन और मस्तिष्क दोनों की भिन्नता स्वीकार की गई है। मन एक अलग तत्त्व है और मस्तिष्क अलग। मन के दो भाग है….. चेतन मन और अवचेतन मन। भौतिक जगत के समस्त क्रियाकलाप चेतन मन की क्रियाओं द्वारा ही संपादित होते है जब कि अवचेतन मन का 95 प्रतिशत भाग सदैव सुप्तावस्था में ही रहता है। हमारे शरीर में विद्यमान सभी इन्द्रियाँ स्वतंत्र है, सबका अपना-अपना दायित्व होता है किंतु सोते समय इंद्रियां मन में ही एकत्रित होकर सिमट जाती हैं। उस स्थिति में देखना, खाना, सुनना, सूँघना, स्पर्श करना आदि क्रियाएँ विलीन हो जाती है और तब कर्मेंद्रियां कोई कर्म नहीं कर पाती तथा न ही वे कर्म करने के योग्य रहती है। यानि की सोते हुए हमारे शरीर का समस्त कार्यभार इसी अवचेतन मन के अधीन होता है जब कि जागृन अथवा में चेतन मन के अधीन।
स्वप्न में कई बार भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं को हम साफ-साफ या फिर साँकेतिक रूप में देखते है। ऐसा क्यों और कैसें? विज्ञान अभी इसकी खोज में है। लेकिन वैज्ञानिकों के अलावा इस तथ्य को कोई भी साधारण व्यक्ति नहीं नाकारेगा कि उसकी जिंदगी का कोई न कोई स्वप्न अवश्य ही भविष्य में सच हुआ।
वैदिक ज्योतिष की बात की जाए, तो चंद्रमा को मन का कारक तत्त्व माना जाता है, जो कि हमारे मन की समस्त क्रियाओं का संचालन करता है। अब जिस व्यक्ति की जन्मकुंडली में चंद्रमा जिस भाव में होता है, उस व्यक्ति को अधिकांशतः उसी भाव से संबंधित पारीवारिक सदस्यों, सगे-संबंधियों वस्तुओं या पदार्थों के ही स्वप्न दिखलाई पड़ते है। मान लिजिए किसी की जन्मकुंडली में चंद्रमा चतुर्थ भाव में स्थित है तो उस व्यक्ति को अधिकांशतः चतुर्थ भाव में संबंधित माता, भूमि, मकान, सुख के साधन, वाहन, जल, नदी इत्यादि से संबंधित स्वप्न ही दिखलाई देंगे। क्योंकि उस व्यक्ति का मन उन सब चीजों में स्थित है, इनमें रमा हुआ है। अगर उस व्यक्ति का चेतन मन उन सब वस्तुओं, पदार्थों की प्राप्ति में सहायक नहीं हो पा रहा है या कहें कि उस व्यक्ति के जीवन की परिस्थितियाँ उन पदार्थों की प्राप्ति के अनुकूल नहीं है तो फिर मन अपनी अवचेतना व स्थान में उसके लिए स्वप्न के माध्यम से मार्गदर्शक का कार्य करता है।
ऐसा भी नहीं है कि हमें दिखलाई देने वाले सभी स्वप्न सिर्फ उन्हीं वस्तुओं से संबंधित ही हो जहां कि जन्मकुंडली में चंद्रमा स्थित है। इसके अतिरिक्त गोचर में चंद्रमा जन्मकुंडली के जिस-जिस भाव में संचरण करता है, उस उस भाव से संबंधित कारक तत्त्वों के बारे में हमें नित्यप्रति सपने देखने को मिलते हैं। लेकिन ये कोई जरूरी नहीं कि वो सपने सुबह जागन पर हमें याद रह ही जाएँ। इनमें से कभी-कभार कोई सपनें हमें याद रह जाता है अन्यथा शेष स्मृति पटल से विलुप्त हो जाते है।

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