अकेलापन बढ़ता जा रहा है

आज का ज्वलंत समस्या है व्यक्ति का बढ़ता अकेलापन। आज भीड़ भरी सड़को पर भी हर शख्स अपने को नितांत अकेला पाता है। किसी को आज किसी के सुख-दुख से कोई सरोकार ही नहीं। पैसा कमाने व सुख सुविधा के साधन जुटाने में हर व्यक्ति तल्लीन हो गया है कि उसका मर्म, उसका उद्येश्य तथा उसक अस्तित्व के बारे में उसे सोचने की उसे फुरसत ही नहीं।
पारिवारिक संदर्भ में देखें तो आज संयुक्त परिवार का विचार ही समाप्त हो चुका है। संयुक्त परिवार के विघटन का मुख्य कारण है पारिवारिक कलह। आधुनिक स्थितियां इस तरह से बन रही हैं, जिसमें एक साथ, एक ही जैसी बनकर संभव नहीं रहा। अपने उम्दा, मुकम्मल व्यक्तित्व की ओर राजग स्त्री पुरूष पूर्णत्व की चाह में ज्यादा से ज्यादा खुदगर्ज और आत्मकेंद्रित हो चले हैं। संवाद की कमी वे टी.वी. सिनेमा जैसी बेजान वस्तु से पूरी कर लेते हैं। टी.वी. सिनेमा आज क्या परोस रहे हैं, इससे कोई भी समझदार व्यक्ति नावाकिफ नहीं। यह एक ऐसा दुष्चक्र है जिसमें आज का व्यक्ति बुरी तरह फंस चुका है।
यह सब पुरानों उसूलों को पूरी तरह नकार देने का परिणाम है। आज हर क्षेत्र में मूल्यों का पतन जिस तरह से मुखर हो रहा है इसके मूल्य में पारिवारिक संस्थाओं का निरंतर टूटना है क्योंकि संयुक्त परिवार के कारण ही व्यक्ति में त्याग, बलिदान, आज्ञापालन के गुणों का विकास होता है।
सुरक्षा की दृष्टि से देखा जाए तो संयुक्त परिवार में बच्चे और स्त्रियां अपने को काफी सुरक्षित पाते हैं। पैसे से शारीरिक आराम प्राप्त किया जा सकता है लेकिन मन की संतुष्टि व अपनेपन का सुख नहीं। आज व्यक्ति इसी के लिए तरस कर रह गया है। आज की पीढ़ी जिस तरह अटेंशन और डिप्रेशन लफ्जों का इस्तेमाल करती है पहले संयुक्त परिवार के सदस्यों की जुबान पर ये लब्ज कभी आते ही नहीं थे क्योंकि वे जानते ही न थे कि ये कैसी मानसिक स्थितियां होती है।
यह सब कुछ इतना आसान तो नहीं लेकिन प्रगति और आधुनिकता के बहाव में बहते हुए हम आज जिस मुकाम पर पहुचे हैं वहां मानव की सबसे अमूल्य चीज मन का चैन, सूकून और प्रसन्नता कहीं दूर तक नजर नहीं आती।

Related Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *