आमिर खान की फैन रहूंगीः सनी लियोनी

अभिनेता आमिर खान का कहना है कि उन्हें ‘दबंग’ सलमान खान की आगामी फिल्म ‘सुलतान’ से बहुत उम्मीदें हैं और वह इसकी रिलीज का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। आमिर ने सोनम कपूर की फिल्म ‘नीरजा’ की स्क्रीनिंग के मौके पर कहा, सलमान की फिल्में हमेशा ही अच्छी होती हैं, इसलिए मुझे उनकी ‘सुलतान’ से बहुत उम्मीदें हैं। बाकी लोगों की तरह ही में भी दिल थामकर इसका इंतजार कर रहा हूं। यकीनन यह एक बहुत अच्छी फिल्म होगी। ‘सुलतान’ में सलमान हरियाणा के कुश्तीबाज की भूमिका में हैं। फिल्म में अनुष्का शर्मा भी हैं। इधर बाॅलीवुड अभिनेत्री सनी लियोनी का कहना है कि उन्हें आमिर खान के साथ किसी फिल्म में काम करने का मौका मिले या नहीं, वह हमेशा उनकी प्रशंसक रहेगी। आमिर ने भारतीय मूल की सनी लियोनी की बेहद गरिमामय तरीके से सहजता से प्रश्नों के जवाब देने के लिए प्रशंसा की थी। उन्होंने कहा था कि उन्हें सनी के साथ काम करने में कोई परेशानी नहीं है और उनके साथ काम कर उन्हें खुशी होगी। इधर विवादों में रहने वाले बाॅलीवुड डायरेक्टर राम गोपाल वर्मा भी सुर्खियों में रहना पसंद करते हैं। रामू ने देश के पीएम नरेंद्र मोदी और पोर्न स्टार से बाॅलीवुड एक्ट्रेस बनी सनी लियोन की तुलना कर डाली है। उनका कहना है कि भारत को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ज्यादा एडवांस सनी लियोन बनाएंगी। उन्होंने कहा कि मैं सनी लियोन की डिग्निटी देख रहा हूं। अब तो आमिर खान भी उन्हें एंडोर्स कर रहे हैं। मुझे लगता है कि वे नरेंद्र मोदी से ज्यादा एडवांस इंडिया बनाएंगी।

आस्थाओं से गंगा का सफर

पटना में गंगा पर बना महात्मा गाधी सेतु दुनिया के सबसे लंबे पुलों में से एक गिना जाता है। यहाँ गंगा मे घाघरा, गडक, पुनपुन और सोन नाम की चार नदियाँ मिलती है। यहाँ आने पर वैशाली, राजगीर, बौद्ध गया और नालंदा भी घूमने जा सकते है, जो जैन व बौद्ध धर्मों के प्रमुख केंद्र हैं।
गंगा बिहार की पवित्र भूमि की ओर बढ़ती है। हालांकि इससे पहले उत्तर प्रदेश का उसका आखिरी पड़ाव गाजीपुर आता है।
गाजीपुरः
गंगा किनारे बसा गाजीपुर काफी प्राचीन शहर माना जाता है। इलाहाबाद-कोलकाता जल मार्ग पर गाजीपुर एक महत्त्वपूर्ण शहर है। कहा जाता है कि रामायण काल के दौरान इसके जंगलों में ऋषि परशुराम के पिता ऋषि जमदग्नि रहा करते थे। गाजीपुर के निकट ही स्थित ओरिहर इलाका बौद्ध धर्म का प्रमुख स्थान है। यहाँ कई बौद्ध स्तूप और स्तंभ मौजूद है। चीनी यात्री ह्वेन साॅन्ग ने भी यहां की यात्रा की थी। गाजीपुर के लोगों ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भी प्रमुख भुमिका निभाई थी। माना जाता है कि 1857 के गदर की शुरूआत करने वाले अमर शहीद मंगल पाँडे गाजीपुर में ही जन्में थे। परम वीर चक्र विजेता अब्दुल हमीद भी इसी मिट्टि के पैदाइश थे। शहर के दक्षिणी इलाके में एक पुराने किले जैसे खंडहर है, जिसे राजा गांधी का किला कहा जाता है। इसके अलावा यहां गंगा किनारे स्थित महादेव घाट और कलेक्टर घाट देखे जा सकते है।
कैसे जाएं, कहाँ ठहरेः
गाजीपुर की गिनती पूर्वी उत्तर प्रदेश के प्रमुख शहरों में होती है नैशनल हाइवे पर स्थित होने की वजह से यह सड़क मार्ग से भी आया जा सकता है। यहाँ का नजदीक एयरर्पोट वाराणसी है यहां ठहरने के लिए आपको धर्मशाला के अलावा तमाम होटल भी मिल जाएंगे।
बक्सरः
गाजीपुर से आगे गंगा बौद्ध धर्म के पवित्र स्थान बिहार में प्रवेश करती है और यहां इसका पहला पड़ाव है बक्सर, जो भारतीय रेलवे का एक प्रमुख रेलवे स्टेशन भी है। वैसे यह जगह 1764 में हुई एक बड़ी लड़ाई के लिए भी जानी जाती है। गौरतलब है कि मीर कासिम ने अवध के नवाब शुजाउद्यौला और मुगल बादशाह शाह आलम द्वितिय के साथ मिलकर गंगा किनारे अंग्रेजो से बंगाल लेने की लड़ाई लड़ी थी। लेकिन 23 अक्टूबर 1764 को अंगे्रज मेजर हैक्टर मोनरो ने मीर कासिम की सेनाओं को हरा दिया। यह ऐतिहासिक शहर काफी हद तक खेती पर निर्भर है।
कैसे जाएँ, कहां ठहरेः
बक्सर सड़क और रेल मार्ग से देश के प्रमुख नगरों से जुड़ा हुआ है। बिहार की राजधानी पटना इसके नजदीक ही है, इसलिए सड़क या रेल या हवाई मार्ग से पहले पटना जाकर फिर बक्सर जाया जा सकता है। यहाँ ठहरने के लिए होटल और गैस्ट हाउस भी उपलब्ध है।
पटलाः
बक्सर के बाद गंगा बिहार की राजधानी और प्रसिद्ध शहर पटना पहुंचती है। पटना को भारत का तेजी से तरक्की करता शहर माना जाता है। वल्र्ड बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक, बिजनेस शुरू करने के लिए पटना दिल्ली के बाद सबसे अच्छा शहर है। वैसे इस शहर का ऐतिहासिक शहर भी बहुत है। माना जाता है कि मगध के राजा अजातशत्रु अपनी राजधानी राजगृह को किसी ऐसी जगह ले जाना चाहते थे, जहां से वह वैशाली के लिच्छवियों का आसानी से मुकाबला कर सकें। इसी वजह से उन्होनें गंगा किनारे पाटलिपुत्र नगर बसाया, जिसे आज हम पटना नाम से जानते है। वैसे भगवान गौतम बुद्ध ने भी अपने जीवन का अंतिम वक्त यहां बिताया। उसके बाद पाटलिपुत्र सिकंदर को हराने वाले महान राजा चंद्रगुप्त मौर्य की राजधानी बनी। वैसे पटना सिखों के दसवें गुरू गोविंद सिंह जी का जन्म स्थान भी है। पटना में गंगा में बना महात्मा गांधी सेतु दुनिया के सबसे लंबे पुलों में से एक गिना जाता है। यहाँ गंगा मे घाघरा, गडक, पुनपुन और सोन नाम की चार नदियाँ मिलती है। यहाँ आने पर वैशाली, राजगीर, बौद्ध गया और नालंदा भी घूमने जा सकते है, जो जैन व बौद्ध धर्मों के प्रमुख केंद्र हैं।
कैसे जाएं, कहां ठहरेंः
पटना सड़क, रेल और वायु मार्ग से देश भर के प्रमुख नगरों से जुड़ा हुआ है। यहां ठहरने के लिए लग्जरी और बजट तमाम तरह के होटल, गैस्ट हाउस और धर्मशालाएँ उपलब्ध है।
भागलपुरः
भागलपुर का जिक्र रामायण, महाभारत और पंचतंत्र में भी किया गया है। माना जाता है कि यह जगह पांडवों के बड़े भाई कर्ण की राजधानी थी। यह शहर रेशम और आमों के लिए मशहूर है। पटना और कोलकाता की बीच होने की वजह से यह शहर पुराने समय से ही व्यापार का प्रमुख केंद्र रहा है। यहाँ हर साल विष हरि पूजा नाम का त्यौहार भी मनाया जाता है। जिससे लाखों लोग सांपो के जोड़ों को दूध पिलाने के लिए उमड़ते है। भागलपुर के पास ही सम्राट अशोक के शासनकाल के कुछ अवशेष मिलें है, वहीं शहर से 20 किलोमीटर दूर एक पुराना मंदिर गुप्त काल का बताया जाता है। भागलपुर में मुगल सम्राट औरंगजेब के भाई शुजा का मकबरा भी मौजूद है। माना जाता है कि शहर से थोड़ी दूर स्थित मंदर पर्वत को देवताओं और दानवों ने समुद्र मंथन के लिए इस्तेमाल किया था। इस पहाड़ पर कई हिन्दू देवताओं के जैसी आकृतियां बनी हुई हैं।
कैेसे जाएँ, कहाँ ठहरेः
भागलपुर एक बड़ा रेलवे स्टेशन है। इसके अलावा यह शहर सड़क मार्ग से भी देश भर के प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है। यहाँ ठहरने के लिए होटल और धर्मशालाएँ उपलब्ध है।
कोलकाताः
भागलपुर के बाद गंगा दो भागों में बंट जाती है, जिनमें से एक धारा हुगली नाम से पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के किनारे से गुजरती है। यह शहर ब्रिटिश राज के दौरान भारत की राजधानी रह चुका है। यहाँ का फोर्ट विलयम किसी जमाने में अंगे्रजी फोजों को बेस हुआ करता था, जो अब इंडियन आर्मी का सेंटर है। कोलकाता भारतीय का स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा एक महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है। ब्रिटिश गवर्नर जनरल लार्ड वेलेजली ने इस शहर में काफी निर्णय कार्य कराया, जिस वजह से यह ”सिटी आफ पैलेस“ कहलाता है। यह शहर व्यापार का भी बड़ा केंद्र है। कोलकाता में विक्टोरिया मेमोरियल, टीपू सुल्तान की मस्जिद, दक्षिणेश्वर काली मंदर, ईडन गार्डन और चिडि़याघर दर्शनीय जगहे हैं। कोलकाता भारत का अकेला शहर है, जहाँ ट्राॅम चलती है। इसके अलावा कोलकाता और हावड़ा ब्रिज भी दर्शनीय है।
कैसे जाएँ, कहां ठहरेः
यहां हवाई, रेल और सड़क मार्ग से पहुंचा जा सकता है। ठहरने के लिए आपको फाइव स्टार से लेकर गेस्ट हाउस तक की आप्शन मिल जाएगी।
गंगा सागरः
कोलकाता के बाद हुगली बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। हुगली और समुद्र के संगम को गंगा सागर कहा जाता है, लो हिंदुओं का एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है। कहा भी जाता है कि ”सारे तीर्थ बार-बार, गंगा सागर एक बार“। हर साल मकर संक्रांति के दौरान यहां लगने वाले मेले के दौरान दूर-दूर से लोग यहां स्नान करने के लिए आते है।
पद्माः
गंगा की ट्रिब्यूटरी हुगली तो कोलकाता होते हुए गंगा सागर चली जाती है, लेकिन गंगा बांगला देश पहुंच जाती है, यहां ये पद्मा कहलाती है। बांग्लादेश में गंगा ब्रह्मपुत्र की सबसे बड़ी डिस्ट्रीब्यूटरी मेघना से मिलती है। इसके बाद पद्मा का नाम मेघना हो जाता है और ये अपना डेल्टा बनाती हुई बंगाल की खाड़ी में गिर जाती है। इस गंगा डेल्टा को ही सुंदर डेल्टा कहा जाता है, जो यूनेस्को द्वारा घोषित एक वल्र्ड हैरिटेज साइट है।
गंगोत्रीः
उत्तराखंड के उत्तराकाशी जिले में स्थित गंगोत्री ग्लेशियर गंगा की प्रमुख उपनदी भगीरथी का उद्गम स्थल है। यह आगे देव प्रयाग में अलकनंदा समेत दूसरी नदियों के साथ गंगा का निर्माण करती है। यह जगह चीन के बाॅर्डर के नजदीक पड़ती है। गंगा के उद्गम स्थल के गाय के मुख की तरह दिखने की वजह से इसे गोमुख भी कहा जाता है। गंगोत्री हिंदुओं का एक प्रमुख धार्मिक स्थल और चार धामों में से एक है। धार्मिक स्थल होने के साथ गंगोत्री ट्रैकिंग के शौकीनों के लिए भी बड़ी अच्छी जगह है यहाँ ट्रैकिंग के बेहतरीन रूट मौजूद है।
सतोपंथः
गंगा की दूसरी प्रमुख सहायक नदी अलकनंदा का जन्म उत्तराखंड स्थित सतोपंथ और भागीरथ खड़क ग्लेशियर पर होता है। उसके बाद यह नदी अपने साथ धौलीगंगा, मंदाकनी, पिंडर व नंदाकिनी नदियों को मिलाकर भागीरथी से मिलती है और गंगा का निर्माण करती है। हिंदुओं का पुसिद्ध तीर्थ और चार धामों में से एक बद्रीनाथ भी अलकनंदा के किनारे पर ही स्थित है। अलकनंदा नदी का उद्गम स्थल सतोपंथ ग्लैशियर सैलानियों के बीच खासतौर मर फेमस है। यह जगह भारत तिब्बत बाॅर्डर पर स्थित है।
विष्णु प्रयागः
नैश्नल हाइवे संख्या 58 पर स्थित विष्णु प्रयाग में धौलीगंगा नदी अलकनंदा में मिलती है। इसे गंगा का पहला प्रयाग माना जाता है, क्योंकि यहां पहली बार कोई नदी अलकनंदा से मिलती है। माना जाता है कि यहां देवर्षि नारद ने भगवान विष्णु की आराधना करके अपने लिए वरदान प्राप्त किया था। तब से इस जगह को विष्णु प्रयाग कहा जाने लगा। यहा हिमालय की हरियाली, सुंदर पहाडि़यों और नदी के सुरम्य किनारे का लुप्फ एक साथ उठाया जा सकता है।
बद्रीनाथ के काफी पास स्थित विष्णु प्रयाग में बहुत बड़ा हाइड्रो इलैक्ट्रोनिक प्रोजेक्ट भी लगाया गया है।
नंद प्रयागः
उत्तराखंड के चमोली जिले मे स्थित नंद प्रयाग एक नगर पंचायत है, अलकनंदा नदी और नंदाकिनी का संगम होता है। माना जाता है कि यहा के राजा नंद को भगवान विष्णु को बेटे के रूप में पाने का वरदान प्राप्त था। इसी तरह का वरदान कंस की बहन देवकी को भी प्राप्त था। इसलिए भगवान ने देवकी की कोख से जनम लिया, लेकिन उसका पालन पोषण राजा नंद की पत्नी यशोदा ने किया। यह जगह ट्रैकिंग करने वालों के बीच काफी पाॅपुलर है।
कर्णप्रयागः
चमोली जिले के कर्ण प्रयाग म्यूनिसिपल बोर्ड में अलकनंदा नदी पिंडारी ग्लेशियर से निकली पिंडर नदी से मिलती है। यह पंच प्रयागों में से एक है, जहां गंगा की पांचो सहायक नदियां उससे मिलती है। माना जाता है कि पांडवों के बड़े भाई कर्ण ने यहां भगवान सूर्य की अराधना की थी, जिससे इस जगह को कर्ण प्रयाग कहा जाता है। यहा एक प्राचीन मंदिर भी है। स्वामी विवेकानंद ने भी यहा करीब 18 दिनों तक मेडिटेशन किया था।
रूद्र प्रयागः
उत्तराखंड के रूद्रप्रयाग जिले मे चार धामों में से एक केदारनाथ के निकट चारबारी ग्लेशियर से निकली मंदाकिनी नदी अलकनंदा नदी से मिलती है। इससे पहले सोन प्रयाग में मंदाकिनी में वासुकिगंगा नदी भी मिलती है। रूद्रप्रयाग को रूद्र यानि भगवान शिव का स्थान माना जाता है। कहा जाता है कि यहां भगवान शिव ने नारद मुनि को दर्शन दिए थे।
देव प्रयागः
उत्तराखंड पौड़ी गढ़वाल जिले की नगर पंचायत देव प्रयाग में गंगा की दोनों प्रमुख सहायक नदियों, भागीरथी और अलकनंदा का मिलन होता है। इसी जगह दोनों नदियां अपने विशाल रूप में आती है और उसे गंगा कहा जाने लगता है। पंच प्रयागों में से एक देव प्रयाग हिंदुओं का प्रमुख धार्मिक स्थल है। मान जाता है कि यहां देव शर्मा ने भगवान के दर्शन किए थे। इसी वजह से इसी जगह को देव प्रयाग कहा जाता है।
ऋषिकेशः
देव प्रयाग के बाद हिमालय की घाटियों का लंबा सफर तय करके गंगा देहरादून जिले में स्थित ऋषिकेश पहुंचती है। यहां हिमालय की पहाडि़यां खत्म हो जाती है और मैदानी इलाकी की शुरूआत होती है। माना जाता है कि यहां भगवान विष्णु ने एक ऋषि को दर्शन दिए थे। यहां गंगा नदी पर बना लक्ष्मण झूला पुल प्रसिद्ध है। मंदिरों के शहर ऋषिकेश को ”वल्र्ड कैपिटल आॅफ योगा“ भी कहा जाता है।
हरिद्वारः
माना जाता है कि गंगोत्री से 253 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद हरिद्वार आकर गंगा पूरी तरह मैदानी इलाके में पहुच जाती है। इस जगह को हरि का द्वार यानि हरिद्वार कहा जाता है। माना जाता है कि समुद्र मंथन में अमृत की बूंदे जिन चार जगहो पर छलकी थी, हरिद्वार उनमें से एक है। यही वजह है कि यहां कुंभ के मेेले का आयोजन होता है। हर की पौड़ी यहां का सबसे प्रसिद्ध घाट है, जिसके बारे में माना जाता है कि अमृत इसी जगह छलका था। शाम के समय होने वाली आरती काफी प्रसिद्ध है।

स्लीवलैस ड्रैस पहनने से पहले

आधुनिक युग की महिलाओं में स्लीवलैस परिधानों का आकर्षण बढ़ गया है मगर कई बार देखा जाता है कि महिलाएं स्लीवलैस परिधान पहन तो लेती हैं मगर पूर्ण समझ न होने के कारण स्वयं को हंसी का पात्र बना लेती है। अतः स्लीवलैस परिधान पहनने से पूर्व कुछ बातों की जानकारी का होना अति आवश्यक हैः

  • सर्वप्रथम अपनी देहयष्टि का आंकलन कर लेना बेहतर है। यदि आप बहुत पतली व बहुत अधिक लंबी है तो स्लावलैस परिधान आप पर नहीं जंचेगा, क्योंकि इससे आपकी बाजुओं का पतलापन व अविकसित वक्ष साफ नजर आएंगे व आप पहले से भी अधिक दुबली दिखाई देंगी।
  • इसके पश्चात अपने पीठ वाले भाग गर्दन और कुहनियों पर ध्यान दें। यदि आपकी गर्दन पीठ का रंग अन्य भागों से गहरा है तो स्लीवलैस परिधान आपके तन के अन भागों के रंग की गहराई को उभारने में सहायक होगा, अतः ऐसा होने पर स्लीवलैस परिधान पहनने का ख्याल बिल्कुल छोड़ दें।
  • स्लीवलैस परिधान पहनने से पूर्व शरीर के इन भागों की सफाई की तरफ पूरा ध्यान दे। बांहों की सफाई के साथ साथ कुहनियों की सफाई भी करें। कामकाजी महिलाओं के लिए तो यह और भी आवश्यक है क्योंकि अक्सर ये काम करते समय अपनी कुहनी को कुर्सी के बाजू या मेज पर टिका लेती है। जिससे कुहनी की त्वचा काली मोटी व खुरदरी हो जाती है। यदि आप स्लीवलैस परिधान पहनेंगी तो आपकी कुहनियां दूर से ही बाजू में काला पैबंद नजर आएंगी।
  • काली मोटी व खुरदरी त्वचा की सफाई के लिए सर्वप्रथम वहां गुनगुने पानी से साबुन लगाएं और लगभग पांच मिनट तक धोएं नहीं। इसके पश्चात् वहां की त्वचा को नहाने वाले किसी 10 बादाम गिरी को पीस लें व एक अंडा फेंटे लें। इसमें एक नींबू का रस मिलाकर लेप बनाकर त्वचा पर लगाएं। 15-20 मिनट के बाद गुनगुने पानी की बूंदें डालें व रगड़ कर साफ करें। सप्ताह में 3 बार ऐसा करें बाहों की त्वचा खिल उठेगी।
  • बाहों को दाग धब्बों से मुक्त करने व कोमलता प्रदान करने हेतु एक छोटा चम्मच चीनी ताजा मलाई और नींबू का आधा हिस्सा लेकर बांह पर चीनी के दाने पिघलाने तक मलें, फिर 5-7 मिनट बाद गुनगुने पानी से धोएं। इस उपाय से आपकी बांहों की त्वचा को जीवंतता प्रदान होगी।
    जैतून के तेल की कुछ बूंदें नींबू का रस व एक अंडे का पीला भाग मिलकर बाहों पर लगाएं इससे अवश्य लाभ होगा।
  • स्लीवलैस परिधान पहनने से पूर्व बाहों व बगलों पर से अवांछित बाल हटा लें। इसके लिए सबसे उत्तम उपाय है वैक्स करना। इससे बांहों की त्वचा पूर्णरूप से बालों रहित हो जाती है जो देखने में अच्छी लगती है।
  • घर से बाहर निकलते समय खुले भागों पर सनस्क्रीन लोशन का प्रयोग अवश्य करें। यथासंभव छाता भी लेकर चलें।
    यदि आप स्लीवलैस ब्लाउज पहनना चाहती हैं तो यह ध्यान रखें कि यह आपकी साड़ी के शेड से मेल खाता हो। प्रिंटिड साड़ी हेा तो बेस कलर का ब्लाउज पहनें। अगर साड़ी प्लेन हो तो मैच करते कंट्रास्ट रंग के ब्लाउज पहनें।
  • इसके साथ ही बाहों की सुडौलता की तरफ भी अवश्य ध्यान दें। थुलथुली बांहों पर स्लीवलैस परिधान अच्छे नहीं लगते इसका ध्यान रखें।
    स्लीवलैस परिधान पहनने से पूर्व बगलों मे सुगंधयुक्त टेलकम पाउडर अथवा डिओडोरेंट का प्रयोग अवश्य करें।
  • यदि सूट या ब्लाउज के रंग को ध्यान में रखते हुए मैच करते कंगन अथवा सिल्वर या सुनहरे रंग का बावजूद भी पहन सकती है। इसके अलावा सुंदर कलाई घड़ी भी पहन लें तो बांहों की शोभा और भी बढ़ जाएगी।

लोक परिधान में घाघरा और चोली अपना अलग ही महत्त्व रखती है। प्राचीन काल से ही लोक साहित्य में इस परिधान का प्रचलन उत्तर भारत में रहा है। आज आधुनिक फैशन की दुनिया में इस परिधान का अपना अलग ही आकर्षण है। आज फैशन में सूती, रेशमी, बंदनी, क्रेप, आदि के कपड़ों से तैयार घाघरा चोलियों का प्रचलन है। छोटे-छोटे कांच, मोतियों, टेराकोटा, कढ़ाई आदि के काम घाघरा में किए जाते है। करीब 500 रूपयों से लेकर एक लाख तक के लहंगा चोली के फैशन बाजार में उपलब्ध है। शादी-ब्याह तीज त्यौहार, पार्टी आदि में इस परिधान का प्रचलन है। नारी सौंदर्य को यह परिधान अलग ही गरिमा प्रदान करता है। प्रस्तुत है लहंगा चोली के रख-रखाव विषयक कुछ बातें जिन्हें ध्यान रखते हुए आप इस आकर्षक परिधान की चमक सालों साल बरकरार रख सकती है।

सूती घाघरा चोलीः सूती घाघरा, पहनने से पूर्व पूरे घाघरे के नीचे फाॅल लगा लें। फाॅल लगाते समय ध्यान रखें। कि फाॅल घाघरा के दिए हुए बाॅर्डर से ऊपर न जाए। अगर आप ड्राईक्लीन में न दें कर स्वयं घर में ही धोना चाहती हैं तो कुछ बातों का ध्यान रखें। नमक मिले पानी में धोएं ताकि अतिरिक्त रंग निकल जाए और भविष्य में फिर रंग निकलने की संभावना न हो। आजकल रिवाईव कंपनी की ओर से कलर फिक्सर भी आता है जो कपड़े की रंगत को यथासंभव बनाए रखता है। सूती घाघरा चोली की ओढ़ती को कभी-कभी हल्का कलफ दे सकती है। कड़कती धूप मे न सुखाएं। छांव में रंगीन कपड़े सुखाने से कपड़ों की रंगत बनी रहती है। कलफ लगी ओढ़नी को ज्यादा दिन तक बक्से में रखे न रहने दें। इसमें झिंगुर लगने की संभावना रहती है। कजली व रक्षा बंधन जैसे पर्व पर सूती घाघरा चोली किशोरियों पर चार चांद लगा देते है।

रेशमी घाघरा चोलीः शादी ब्याह में रेशमी घाघरा चोली का प्रचलन अधिक रहा है। परिधान के पहनावे में नारी की सुंदरता जितनी दुगुनी होती है उतनी ही सावधानी से नारी को इसका रख रखाव करना होता है। रेशमी लहंगा पहनते समय कभी इत्र का प्रयोग न करें। इसमें दाग पड़ने की संभावना रहती है। पहनने से पूर्व आप सदैव इस पर हल्की इस्त्री का ही प्रयोग करें। आपको लहंगे में यदि मोतियों का काम है तो आप हल्के ब्रश से ट्रांसपेरेंट नेल एनोल का प्रयोग उन मोतियों की चमक यथासंभव बनी रहे। इस रेशम के परिधान को आप ड्राइक्लिन में दें तो अच्छा रहेगा। अगर आप स्वयं ही घर में धोने के अच्छुक हैं तो इजी नामक ऊनी व रेशमी वस्त्र धोने के द्रव्य पदार्थ को प्रयोग में लाएं। अंत में कुछ बूंदें ग्लिसरीन की पानी में डालकर एक बार धो कर उठा लें। सुखाते समय अधिक जोर से इस वस्त्र को निचोड़ें। छांव में ही सुखाएं तथा हल्की प्रेस करें। बक्से में रखते समय आप बीच बीच में तह बदल कर रखें ताकि एक ही स्थान पर पड़ने से निशान बनने का खतरा न हो।

जरी वाली घाघरा चोलीः जरी वाले घाघरा चोली को दीपावली जैसे अवसर में पहनने से जगमगाती रोशनी में इस परिधान से नारी की आभा उभर कर सामने आती है। जरी वाले घाघरा चोली पहनते समय भी इस परिधान पर इत्र न लगाएं अन्यथा जरी काली पड़ जाती है। सदैव घाघरों को उल्टा कर इस्त्री करें। धुलाई करनी हो तो ड्राइक्लीन में दे। बक्से मे रखते समय कभी पोलीथीन में डाल कर न रखें। किसी पुराने पतले सूती कपड़े में लिपटा कर रखें तो अच्छा रहेगा। कपूर की गोलियां बक्से में न रख कर नीम व लौंग की पोटली बना कर एक कोने में रखें तो बेहतर होगा। कपूर की गोली से जरी काली पड़ने की संभावना रहती है। कभी कभी बीच में हल्की धूप दिखाना अच्छा रहता है।

बंदनी व क्रेप के लहंगेः इस प्रकार के लहंगे चोली का प्रचलन काफी है। आजकल रात की पार्टियों में उच्च घराने से ले कर मध्यवर्गीय परिवारों में इस परिधान का फैशन है। थोड़ी सी सावधानी से आप वर्षों तक इसकी चमक बनाए रख सकती है। केवल मोड़ मोड़ कर रखने से ही इसकी कला है। पहनने से पूर्व हल्की प्रेस करने की आवश्यकता होती है। इसे ड्राइक्लीन में देना ही बेहतर है। इत्र लगाते समय थोड़ी सावधानी बरतें कपड़े में न लगा कर गर्दन, कलाई, आदि स्थानों पर ही लगाएं। बक्से मे रखने से पूर्व कागज में लपेट कर रखें।