पत्नी कमाए पति खाएं कहां तक उचित है

पत्नी कमाए पति खाएं कहां तक उचित है

हमारे यहां कहा जाता है कि पति पत्नी जीवन की गाड़ी के दो पहिए है और एक दूसरे के समन्वय के बिना जीवन की गाड़ी खींचना मुश्किल है। परंतु कई बार जीवन में ऐसे मोड़ भी आते है जब एक पहिया लड़खड़ाने लगते है और इस लड़खड़ाहट के कई कारण होते है और उनमें एक है जब पत्नी कमाऊ हो जाती है और पति गैर जिम्मेदार। किसी पति से यदि आप पूछे तो क्या वह हामी भरेगा कि वह गैर जिम्मेदार हो गया है? कभी नही, परंतु यदि हम अपने आस पास देखे तो हमें ऐसे कई उदाहरण मिलेंगे जहां पत्नी की कमाई से घर चलने लगता है तो पति को व्यापर करने की सुझती है या फिर आराम करने की। हमारे घरों में काम करने वाली बाईयों का हाल किसी से छुपा नहीं है। उनके पति उनकी कमाई पर ही नशा करते है यह स्थिति हमें निम्न वर्ग में हर जगह नजर आएगी। एक ओर शिक्षा और बदलते वातावरण ने महिलाओं को जागृति दी है वहीं दूसरी ओर इस शिक्षा और कुछ न कुछ काम करने की तमन्ना ने उनको दो पाटों के बीच पीसने पर मजबूर कर दिया है। आज कल बड़े शहरों में ज्यादातर महिलाएं कमाने लगी है। काम कसकर चाहे कोई भी हो, हर महिला चाहती है उसके घर में अतिरिक्त आय हो।
श्रीमति विमला अग्रवाल एक उच्च वर्गीय परिवार की सदस्य है उनके घर में ऐशोआराम की सभी चीजे है। पैसों की बहुलता और नौकरों की बहुत आयत ने विमला को प्रेरणा दी कि वे भी कुछ काम करें। वह बेकार बैठना नहीं चाहती थीं। इसलिए उन्होंने अपने घर के गैरेज में एक दो औरतों को रखकर वंदनवार और शादी विवाह के अवसर पर काम आने वाली ट्रे बनाना शुरू किया। उनका काम चल निकला और अब उसके पति सुनील भी पारिवारिक व्यापार में हाथ बटाने लगे और फिर धीरे धीरे घर पर ही रहने लगे और फिर घर में रोज शाम को ताश की चोकड़ी जमने लगी। उनके दोस्त रोजाना शाम को घर आ जाते और ताश खेली जाती। विमला परेशान रहने लगी। सुनील का कहना था कि जब विमला कमाती है तो उसे कमाने की क्या जरूरत है। कल तक मैं कमाता था आज अगर विमला कमाती है तो इसमें बुराई क्या और पुरूष का गैर जिम्मेदार होने का आरोप क्यों हो मुझ पर। लेकिन विमला को इस बात पर नाराजगी थी कि पत्नियां अगर घर में रहती है तो वो बच्चों को संभालती है और घर की बाकी जिम्मेदारियों को पूरा करती है। वे पति की तरह ताश नहीं खेल सकती। जबकि पति न बच्चों को संभाल सकते है और न ही मेहमानों की आवाभगत कर सकते है तो ये गैर जिम्मेराना ही तो हुआ। कई बार पुरूष के काम बंद करने के कारण कुछ और होते हैं। चूंकि पत्नी काम करते-करते थक जाती है, इसलिए वह पति के काम न करने से परेशान हो जाती है। परंतु कई पुरूष इस पर सवाल उठाते हैं कि यदि पुरूष काम करता है और पत्नी घर में रहती है तो कोई नहीं कहता कि पत्नी गैर जिम्मेदार हो गई है। आजकल सच्चाई है कि ज्यादातर मध्यम और उच्चवर्गीय घरों में घर के काम के लिए अतिरिक्त मदद ली जाती है। परंतु पुरूष को अपना काम स्वतः ही करना पड़ता है। जो बात हमें गैर जिम्मेदार लगती है, वह दूसरे की मजबूरी भी हो सकती है। यह तो परिस्थितियां ही बता सकती हैं कि असलियत क्या है। यह सच है कि पत्नी के काम करने से पति का व्यवहार थोड़ा लापरवाह हो जाता है क्योंकि वह अंदर से आश्वस्त होता है कि पत्नी का घर में सहयोग मिलेगा और उसे अकेले ही सारे खर्च नही चलाने पडेंगे। परंतु इसे गैर जिम्मेदाराना कहना गलत होगा। इस तरह की गैर जिम्मेदारी ज्याददातर निम्न आयवर्गीय लोगों में मिलती है। मध्यम और उच्चआय के दर्जे के लोगों की यह कोशिश रहती है कि यदि पत्नी काम करती है तो घर में कुछ बचत भी हो जाए। पति गैरजिम्मेदार तभी होता है जब उसे महसूस हो कि पत्नी से घर खर्च भली भांति चल रहा है। तब वो भूल जाता है कि उसका भी घर के प्रति कोई कर्तव्य है। पुरानी परिपाटी की पीढ़ी का मानना है कि महिलाओं का बाहर जाकर ही काम करना ही गलत है। क्यूंकि घर में क्या कम काम है जो बाहर जाने की जरूरत पड़े। स्वतंत्रता कि यह पराकाष्ठा है। और इसी का परिणाम है कि पति अपने मार्ग से भटकते है और ये भटकन लापरवाही को जन्म देती है और पति गैर जिम्मेदार होते है। पुरूष जब नारी को अपने से आगे बढ़ता देखता है तो उसके मन में हीन भावना जागृत होती है और यही भावना उसे गैर जिम्मेवार बनाती है।

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