विवाहेत्तर संबंधः ऊब का विकल्प

शिक्षा के विकास ने स्त्रियों को आत्मनिर्भर बनाया। वे बाहर नौकरी करने लगी। उनसे व्यक्त्वि का विकास हुआ। अब वे घर की चारदीवारी से बाहर सार्वजनिक क्षेत्रों में पुरूष के बराबर भागीदार बन के कार्य करने लगी लेकिन समाज आज भी पुरूषों का ही है। अपनी अस्मिता की चाह लिये जब स्त्री उसमें अपनी जगह ढूंढने चली तो उसे कई एक कठिनाइयों का सामना कई मुकामों पर एक साथ करना पड़ा। सहयोग की अपेक्षा उसके लिए मृगमरीचिका ही बनी रही। वह चाहे नौकरीपेशा हो या गृहिणी, गृहकार्य उसी की जिम्मेदारी है। अगर बच्चें है तो उनकी देखरेख भी उसे ही करनी है। घर बाहर के बोझ तले दबी नारी जब कुंठाग्रस्त होकर खीझ से भर उठती है तो उसकी भावनाओं को पति या घर के दूसरें सदस्य समझ नहीं पाते। उल्टा उसे बदमिजाज होने पर प्रताडित करते है। इसका सीधा असर उसके दांपत्य जीवन पर पड़ता है। पति के साथ उसके रिश्तों में ठंडापन, विसंगति और दरार आने लगती है। दोनों ही जब घर में सुकून नहीं पाते तो सुकून की तलाश में अन्यत्र भटकने लगते हैं। वैवाहिक जीवन की ऊब भरी असफलता व नीरस यौन जीवन न केवल पुरूषों को बल्कि स्त्रियों को भी विवाहेत्तर संबंध बनाने की ओर प्रेरित करते है। विवाहेत्तर संबंधों में फंसी सुनीता दत्ता एक शिक्षित नारी इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए कहती हैं, ‘मेरी शादी को नौ वर्ष हो गए हैं। मेरे दो बच्चें भी हैं। शादी के कुछ वर्ष बाद सब कुछ बासी लगने लगा। रोज-रोज वही रूटीन एक रस ऊबाऊ जिंदगी से मै बोर होने लगी थी। शिवम और मेरे बीच जैसे कुछ भी नया नहीं रहा। वह ऑफिस से ही क्लब चला जाता। घर में रहते हुए भी बस औपचारिकता ही बरतता। अनायास ही मेरे जीवन में मेरा सहकर्मी जावेद आ गया। सब कुछ अचानक ही हो गया था। जिंदगी मुझे फिर से जीने लायक लगने लगी। उसने मुझे औरत होने का अहसास दिलाया वर्ना मैं तो भूल ही गई थी कि मैं मिसेज दत्ता और बच्चों की मां के अलावा भी कुछ हूं।’ राहुल जिसे पहले अपनी निहायत सीधी सादी घरेलू किस्म की बीवी दुनिया की सबसे सुंदर और अच्छी स्त्री लगती थी, अब उसके लिजलिजे, यस वुमन वाले व्यक्तित्व से ऊबने लगा था। उसे अपने दोस्त की नई नवेली पत्नी जो साधारण रूप रंग होने बावजूद बहुत बोल्ड और फैशनेबल, साथ ही नंबर बन फ्लर्ट थी, आकर्षित करने लगी। दोस्त अक्सर ऑफिस के काम से टूर पर जाता रहता था। ऐसे मे उसकी फ्लर्ट पत्नी जो कॉलेज के जमाने से ही अनेक पुरूषों के साथ दैहिक संबंध बनाने की आदी थी, राहुल की कमजारी जानने के बाद फंसाने में उसे वक्त न लगा। आज नैतिकता के मापदंड बदल गए हैं। ज्यादा से ज्यादा आधुनिक विचारों वाले विवाहेत्तर संबंधों के पक्ष में मिलेंगे। अगर इससे जीवन की एकरसता टूटती है, ऊब मिटती है तो इसमें बुरा क्या है बशर्ते आप परिवार के प्रति जिम्मेदारी निभाते रहें, उसे टूटने न दें। ये संबंध अगर आप में नई स्फूर्ति भरते हैं, आपमें अपनापन लौटाते है, नये संदर्भो में पुराने को तोलने का मौका देते हैं और दांपत्य को स्थायित्व दिलाते हैं तो इन पर किसी को आपत्ति क्यों होनी चाहिए। सच्चाई यह भी है कि ऊब को मात्र बहाना मान कई व्यक्ति स्त्री हो या पुरूष, अपनी मूल प्रवृति को ऐसे संबंध बना कर संतुष्ट करते हैं।

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