धूम्रपान की लत किसी के लिए भी फायदेमंद नहीं होती। महिलाएं इसकी कीमत कुछ ज्यादा हो गई है। नार्वे के शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में इस बात का खुलासा किया कि धूम्रपान करन वाली महिलाओं की हड्डियों के खोखला होने और हृदय रोग के अलावा समय से पहले रजोनिवृति की आशंका भी बढ़ जाती है। ओस्लो विश्वविद्यालय की प्रोफेसर थ्यिा एफ मिकेल्सन के नेतृत्व में 59 और 60 साल की 2123 महिलाओं पर यह अध्ययन किया गया। रिपोर्ट के अनुसान धूम्रपान करने वाली 59 प्रतिशत महिलाएं 45 साल की उम्र के पहले ही रजोनिवृति की शिकार पाई गई। समय से पहले रजोनिवृति की शिकार दस प्रतिशत महिलाओं में 25 प्रतिशत महिलाएं अध्ययन के समय भी धूम्रपान करती थी। अध्ययन के अनुसार महिलाओं के लिए पिता या पति द्वारा धूूम्रपान करना सबसे घातक साबित होता है। चाहे-अनचाहे वे स्मोकिंग की शिकार हो जाती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू. एच. ओ.) के अनुसार भारत तंबाकू महामारी के कगार पर है। संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में तंबाकू से होने वाली बीमारियों के कारण हर साल 40 लाख लोग मरते है। मरने वालों की यह संख्या 2-3 दशकों में 70 लाख तक बढ़ने का अनुमान है। धूम्रपान धीरे-धीरे की गई आत्महत्या है। यह मानव शरीर को 25 प्रकार के रोगों का शिकार बना देता है। धूम्रपान से स्वांस नली पर सीधा प्रभाव पड़ता है। जिस प्रकार धूएं से रसोई घर, चिमनियां, स्कूटर, मोटर इत्यादि के साईलैंसर और दूसरी चीजें काली हो जाती है इसी प्रकार धूम्रपान से निकलने वाला धुआं फेफड़ों के साथ कैसी खिलवाड़ करता है, यह अनुमान किया जा सकता है। जैसे बीड़ी सिगरेट का धुआं अंदर जाता है नलियों में जकड़न होती है। वायु प्रवेश के प्रति अवरोध बढ़ जाता है। सांस की नलियों की नलियों की सतह पर छोटे छोटे बालों की तरह के अंकुर होते है इन्हें सिलिया कहते है। सामान्य हालत में ये फेफड़ों में से वहां के स्त्राव के साथ वायु के साथ पहुंचे हुए विजातीय द्रव्य धूल धूएं आदि के कण पाते। अब विजातीय द्रव्य और श्लेष्मा आसानी से बाहर नहीं निकल पाते। इस से सांस की नलियों की हालत खराब हो जाती है। एक सिगरेट का धुआं लगभग 4000 विषैले पदार्थ हवा में फैकता है। इसमें मुख्य है- निकोटिन, कार्बन मोनोक्साइड, कैंसर पैदा करने वाले पदार्थ-काॅरसिनोजन्स, टार आदि। निकाटिन से फेंफड़ों में जख्म हो जाते है। अंत में उनमें कैंसर पैदा हो जाता है। जब फेफड़ो में टार की मात्रा अधिक बढ़ने लगती है, तब कैंसर की शुरूआत होने लगती है।

1. रंगीन पाॅलिथीन में फल व सब्जियां कभी न रखें।
2. अगर आप पूरे हफ्ते की सब्जियां व फल स्टोर करते है तो उन्हें धो कर फ्रिज में न रखें गीली सब्जी रखने से सब्जी जल्दी खराब हो जाती है।
3. टमाटर का स्वाद बनाये रखने के लिए उसको रूम टेंपरेचर पर रखें।
4. प्याज को सूखे व ठंडे स्थान पर रखें, प्याज खराब नहीं होगी।
5. पालक को बिना धोए पहले अखबार में लपेटे फिर पाॅलिथीन में लपेटकर फ्रिज में रखें।
6. नाॅनस्टिक बर्तन में खाना पकाते समय आंच धीमी ही रखें, तेज आंच पर इसकी पाॅलिश खराब हो जाती है।
7. इनकी सफाई करते समय कभी भी रेत या स्टील के ब्रुश का प्रयोग न करें। इससे इनका सारा मसाला उतर जाएगा।
8. नाॅनस्टिक पैन में हमेशा लकड़ी का चम्मच ही प्रयोग में लाये।
9. यदि अंडा उबलते समय फूट जाये तो घबराइये नहीं उस बर्तन में थोड़ा नमक डाल दें।
10. जिन सब्जियों में लेस निकलता है उसमें थोड़ा सा नींबू का रस डालें।
11. दहीबड़े को मुलायम बनाने के लिए दाल फेरते समय उसमें 1-2 आलू मिला लें।
12. मक्के के आटे को यदि मांड से गुंधा जाये तो रोटी बनाते समय टूटेगी नहीं।

भूख न लगना बच्चों में एक आम समस्या है। कभी-कभी यह समस्या वास्तविक होती है, तो कभी यह अवास्तविक। माता-पिता को यह लगता कि उनका बच्चा कम खात है अथवा खाने से जी चुराता है, परंतु वास्तविकता ऐसी नहीं होती। इसके विपरीत कभी-कभी बच्चों को सचमुच भूख न लगने की बीमारी होती है। वहीं कुछ बच्चे ऐसे होते हैं जो कम मात्रा में खाते है या फिर वे बार-बार खाते हैं। यह प्रवृत्ति बच्चों की सेहत के लिए नुकसानदेह है।
शारीरिक कारणः
पेट दर्द, आंतों व यकृत में सूजन के कारण भी बच्चों को भूख नहीं लगती। कभी कभी पेट में कृमि पड़ने के कारण भी भूख नहीं लगती उल्टी व टी बी रोग की शिकायत होने पर भी बच्चों में भोजन से मोहभंग हो जाता है। कई मानसिक कारणों से भी बच्चों का भोजन से मोह भंग होने लगता है। जैसे भावनात्मक ठेस लगने और घबराहट आदि से बच्चों को खुलकर भूख नहीं लगती। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार यदि बच्चे की किसी इच्छा का दमन कर दिया जाये तो उसका भोजन से मोहभंग हो जाता है। इसके अलावा कुछ बीमारियों में खाई जाने वाली दवाओं के विपरीत प्रभाव के कारण भी बच्चों में भोजन के प्रति अरूचि पैदा हो जाती है।
उपचारः
मां का दूध बच्चों के लिए आवश्यक है। अतः प्रत्येक शिशु को 4 से 6 महीने केवल का का ही दूध देना चाहिए। बच्चों की मनपसंद चीजें खाने में देनी चाहिए। खाने की चीजें बदल-बदल कर देने से बच्चों में भोजन के प्रति रूचि बवकसित हो जाती है। बेहतर रहेगा की मां-बाप बच्चों के साथ बैठकर खाने की आदतें डाले। इससे उन्हें बच्चे की भोजन संबंधी रूचियों की जानकारियां मिलती रहेंगी।