अधिकांश बच्चें शरारती होते हैं। वे दिन भर कोई न कोई शरारत करते ही रहते हैं। कुछ बच्चे बात-बात पर मचलते और रोते हैं। आमतौर पर लोग ऐसे बच्चों को शरारत करने से रोकते या बात-बात पर रोने वाले बच्चों को डराते डपटते और मारते हैं। बच्चों को चुप कराने के लिए या शरारत करने से रोकने के लिए उपरोक्त तरीका बिल्कुल गलत है। बच्चों को डराते रहने से ऐसे बच्चे डरपोक हो जाते हैं और हर चीज से डरने लगते है। ऐसे बच्चे जीवन में कुछ करने में सफल नहीं हो पाते। बार बार असफल होने से उन्हें मानसिक आघात पहुंचता है। भयावह काल्पनिक बातों द्वारा बच्चों को चुप कराने या शरारत करने से रोकने में भले ही हम सफल हो जाते हैं लेकिन बच्चों पर इसका खतरनाक असर पड़ता है। हमारा यह व्यवहार बच्चों के कोमल मन को झंझोड़कर रख देता है। बच्चों के साथ ऐसा व्यवहार करते समय हम बिल्कुल नहीं सोचते कि बच्चों के कोमल मन पर इन बातों का क्या असर पड़ सकता हैं। बस हम तो यही चाहते हैं कि बच्चा चुप हो जाए और अपना व्यवहार बदल दें। बड़ों द्वारा कही गई डरावनी काल्पनिक बातों का बच्चे के दिमाग पर बुरा असर पड़ता है। इन भयावह बातों से उत्पन्न भय के कारण बच्चों में कई प्रकार की मानसिकता विकृतियां उत्पन्न हो जाती है। आजकल माता-पिता मनोरंजन के लिए अपने बच्चों को भूत-प्रेत के व सुपरमैन आदि के आतंकित करने वाले कारनामे सुनाते है। इनसे बच्चों का मनोरंजन तो नहीं होता लेकिन वे भयभीत और आतंकित जरूर हो जाते हैं। ऐसे बच्चें बड़े होने पर भी अंधेरे में जाने से घबराते हैं तथा हल्की आहट पर भी पसीना-पसीना हो जाते है। बच्चा ज्यों-ज्यों बड़ा होता है, इन बातों को गहराई से लेने लगता है तथा आगे चलकर यही भय भयानक रूप धारण कर लेता है। आज भी अनेकों युवक-युवतियां बिल्ली, छिपकली, इंजेक्शन या बिजली से डरते हैं। यह सब परिवार के सदस्यों द्वारा बचपन में डराने का परिणाम है। प्रत्येक माता-पिता को चाहिए कि वे रोते बच्चे को चुप कराने के लिए या उससे कोई काम करवाने के लिए उसे भयावनी बातों या कहानियों द्वारा आतंकित न करें बल्कि उन्हें महापुरूषों की साहसपूर्ण गाथाएं सुनाकर साहसी बनने की प्रेरणा देनी चाहिए। बच्चों को भक्तिपूर्ण गाथाएं, बहादुरी की गाथाएं आदि सुनाने से उनमें आत्मबल की वृद्धि होती है और बच्चे साहसी बनते है। डरावनी कहानियां तथा भयावह बातों से बच्चें शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर होते है। तभी बच्चा बड़ा होकर निडर और साहसी बन सकता है।

फैशन बड़ा ही कोमल अहसास है जिसे शब्दों में बांधना मुश्किल है। आज इसका स्वरूप इतना लुभावना, आकर्षक और मनोहर हो गया है कि बच्चे, किशोर, युवा और बूढ़े तक इससे अछूते नहीं हैं। आज के समय में कम कपड़ों के फैशन का ही बोलबाला है। शरीर पर जितने ही कम कपड़े होते हैं, वह उतना ही फैशनेबल कहलाता है। फैशन की परिधि में महिलाओं के अंतर्वस्त्र भी आ चुके हैं। कल तक जिन अंतर्वस्त्रों को आरामदेह मानकर पहला जाता था, वे ही वस्त्र आज फैशन के रूप में इस्तेमाल होने लगे है। एक समय ऐसा था जब महिलाएं दुकानों पर जाकर चोरी छिपे अंतर्वस्त्रों पैंटी, ब्रा आदि को खरीदा करती थीं किन्तु आज उन्हीं वस्तुओं को खरीदने में किसी भी प्रकार की लज्जा महसूस नहीं होती। हो भी क्यों? जब पुरूष बनियान (गंजी), अन्डरवीयर खरीदते हैं, तो क्या वे लज्जा का अनुभव करते हैं? अंतर्वस्त्रों को अंग्रेजी में ‘लिंगरीज’ के नाम से पुकारा जाता है। महिलाओं के रूझान को देखते हुए विदेशों में स्थित अनेक कंपनियों ने अंतर्वस्त्रों के निर्माण का कार्य प्रारंभ कर दिया है। वेनिटी फेयर, कैलिंडा, लवेबुल, जॉकी आदि अनेक विदेशी कंपनियों ने लिंगरीज के निर्माण में ख्याति को प्राप्त किया है। अपने देश में भी अनेक कंपनियों ने अंतर्वस्त्रों के निर्माण का कार्य प्रारंभ किया है किंतु विदेशी तकनीक एंव सुविधायुक्त वस्त्रों के निर्माण के आगे फिलहाल उपभोक्ताओं का दिल अपनी कंपनियां नहीं जीत पा रही है। लिंगरीज में महिला अंतर्वस्त्रों के अलावा रात्रिकालीन पोशाकें भी शामिल है। मुख्य रूप से लिंगरीज परिधानों में नाइटवीयर, कॉरसेट, पैंटी, ब्रा, कैमीसोल आदि शामिल है। ये अनेक स्टाइलों में नर्म, गुदगुदे तथा आरामदेह होते हैं। इसी कारण महिलाओं का झुकाव नित्यप्रति इस ओर होता जा रहा हैं। सर्वेक्षण के अनुसार इन अंतर्वस्त्रों का प्रयोग न सिर्फ कम उम्र की लड़कियां ही करती हैं बल्कि ज्यादा उम्र की महिलाएं भी इनका उपयोग धडल्ले से करने लगी हैं। अधिकांश महिलाये अपने अंतर्वस्त्रों को शोख पीले रंग, चमकीला ब्लू, रायल पर्पल, मैरून आदि रंगों में देखना पसंद करती हैं। सफेद एंव काले रंगों में अंतर्वस्त्रों को प्रायः पसंद नहीं किया जाता। ‘ब्रा’ की बाजार में कई किस्में हैं जिनमें ‘फुल बस्टेड’ प्रमुख है। यह आगे की ओर से खुल जाती है। स्तनों के ऊपर वाला स्टिच पिन से जुड़ा रहता है जिसे खोल देने पर पूरा स्तन बाहर निकल आता है। इस खोल का अंदरूनी भाग मुलायम तथा स्पंजयुक्त होता है, जिसका स्पर्श एक आनंददायक एहसास को प्रदान करता रहता है। डेमी ब्रा लो कट स्टाइल में आती है। इसे बहुत ही मोहक एंव आकर्षक डिजाइनों में तैयार किया जाता है। सीमलेस ब्रा स्मूथ एहसास दिलाता है। इसी प्रकार कन्टूर ब्रा में फाइबर या फोम का गोलाकर पैड जुड़ा होता है जो स्तनों के आकर को आकर्षक बना डालते हैं। पैड का प्रयोग नर्म एहसास दिलाने और फिगर शेप के लिए किया जाता है। इसे पैडेड ब्रा भी कहा जाता है। स्ट्रेपलेस ब्रा की पट्टियों को इच्छानुसार जोड़ा या हटाया जा सकता है। इसका इस्तेमाल ऑफ शोल्डर टॉप या अन्य इसी किस्म की पोशाकों के साथ भी किया जा सकता है। कन्वर्टिबुल ब्रा का इस्तेमाल भी स्ट्रेपलेस की तरह ही किया जा सकता है। इसके बस्टियर को जोड़ा या हटाया जा सकता है। इसे ‘वन पीस’ ब्रा की तरह आसानी से प्रयोग में लाया जा सकता है। कन्वर्टिबुल ब्रा का आकार अंग्रजी के लेटर ‘एक्स’ की तरह होता है। इसमें स्ट्रेप्स को भी लगाया या हटाया जा सकता है। पुश-अप ब्रा में पूर्णता के लिए किनारों पर पैड का इस्तेमाल किया जाता है। ये सभी ब्रा विभिन्न डिजाइनों एंव भिन्न-भिन्न लंबाईयों में उपलब्ध होती है। ब्रिटेन की मार्क्स एंड स्पेसर कंपनी के अंतर्वस्त्रों को भारतीय महिलाएं अधिक पसंद कर रही है। दूध पिलाने वाली माताओं के लिए नर्सिंग ब्रा नामक एक स्पेशल ब्रा भी भारतीय बाजार में मौजूद है। इसकी विशेषता यह है कि इसे बिना उतारे ही स्तनपान कराया जा सकता है। स्तनों में अतिरिक्त निकलने वाले दूध को भी इस ब्रा में सोख लेने की विशेष सुविधा है। बाजार में अनेक रंगों एवं डिजाइनों की पैंटी भी मौजूद है। हाईकट पैंटी में पैरों के किनारों पर एक गहरा कट और पूरा बैक कवरेज पाया जाता है। बाय लेग ब्रीफ हिप्स को आराम होने के ख्याल से तैयार किया गया है। इसका आगे वाला भाग राउण्ड चैन से युक्त होता है। इसे बिना उतारे पेशाब किया जा सकता है। टोंग नामक पैंटी में गहरा कट होता है। इसके पीछे वाले भाग में आधा या एक इंच की स्ट्रिप होती है। बिकिनी पैंटी में बेस्ट बैंड नाभि के नीचे होता है। इसमें पैरों के पास एक गहरा कट पाया जाता हैं बैक कवरेज बिकिनी के स्टाइल पर निर्भर करता है। इसे मुलायम तथा चमकीले फेब्रिक से तैयार किया जाता है। ‘नेग्लैस पैंटी’ को जापान की एक विख्यात कंपनी ने विशेष रूप से उन महिलाओं के लिए तैयार किया है जो श्वेतप्रदर (ल्यूकोरिया) अथवा कामशीतलता के बीमारियों से ग्रसित होती है। आराम दायक पैड के साथ ही औषधियों से उक्त बीमारियां छह माह के अंतराल में ही समाप्त हो जाती हैं। आज की महिलाएं अपने अंतर्वस्त्रों के प्रति जागरूक हो चुकी है। तथा अपनी सुविधा के अनुसार इन्हें खरीदने लगी है।