जहाँ अधिकांश लोग प्रेतआत्माओं के अस्तित्व को स्वीकारते दिखाई देते हैं तो वहीं ऐसे लोग भी है जो कि ऐसी बातों को दकियानूसी, मूर्खतापूर्ण विचार कहकर नकार देते हैं। उनकी दृष्टि में आत्मा, परमात्मा जैसी चीजों के बारे में सोचना ही किसी मनोरोग से पीडि़न इंसान के लक्षण हैं।
देखा जाए तो सृष्टि के आदिकाल से लेकर आज तक चाहे विश्व की कोई भी सभ्यता, संस्कृति रही हो, सब ने किसी न किसी रूप में भूत-प्रेत आत्माओं के अस्तित्व को स्वीकार किया। आज भी पश्चिम के कई देशों में मृतात्मा को बुलाकर उनके साथ बातें करने जैसे प्रयोग अक्सर होते रहते हैं। इसलिए भूत प्रेत की बातों को गुब्बारे की भांति सिर से हवा में उड़ा देना भी ठीक नहीं है। मनुष्य की अनुभुति का दायरा अभी सीमित है। संसार के अनेकानेक रहस्य होते हैं, जिनका पता लगाया जाना अभी बाकी है। इसी वजह से प्रेत आत्माओं के आस्तित्व को नकारने की अपेक्षा यदि थोड़ा गंभीरता पूर्वक अन्वेषण किया जाए तो हो सकता है कि प्रकृति के किन्ही गहरे रहस्यों को उजागर किया जा सके।
यदि अपनी बान करूँ तो मुझे ये कहने में कोई संकाच नहीं है कि मैं भूत-प्रेत इत्यादि आत्माओं के अस्तित्व पर पूर्ण विश्वास रखता है। अब जो लोग इन सब बातों को सिर्फ मन की कल्पना या किसी प्रकार का मनोरोग मान बैठे हैं, अक्सर उन लोगों का ये तर्क होता है कि यदि भूत-प्रेत इत्यादि आत्माएँ हैं भी तो वह हमें दिखाई क्यों नहीं पड़ती। चलिए इसके बारे में बाते करते है लेकिन इसे समझने के लिए सबसे पहले स्थूल एवं सूक्ष्म के बारे में जानना होगा, उनके प्रकृति को समझना होगा।
अपने आस पास हम लोग स्थूल गतिमान वस्तुओं को देखते है, उनमें सर्वाधिक गति से चलने वाले हवाई जहाज की गति भी लगभग 1500/2000 मील प्रति घंटा के करीब होगी, परंतु अंतरिक्ष यान की बात की जाए तो उसकी गति इससे भी कहीं अधिक है, जो कि एक घंटे में लगभग 17,500 मील की गति से चलता है। अब मनुष्य के अतिरिक्त प्रकृति रचित पदार्थों की बात की जाए तो सूर्य, चंद्रमा, पृथ्वी, तारे इत्यादि विभिन्न आकाशीय पिंड है, जिनकी सर्वाधिक गति है। पृथ्वी तो अपनी धुरी 24 घंटे में महज 25,000 मील की दूरी ही तय करती है परंतु सूर्य जिसका अपना व्यास ही पृथ्वी से 100 गुणा है से भी अधिक है। उसे इस दूरी को लांघने में प्रायः 25 दिन का समय लग जाता है। हां सूर्य स्थूल होते हुए भी पृथ्वी की भांति सघन नहीं।
अब अगर इनकी तुलना शब्द से की जाए जो कि इनसे सूक्ष्म है, तो उसकी गति इन सबसे अधिक है। प्रकाश की गति शब्द से भी अधिक है, जो कि एक सैकेंड में 1,88,000 मील की दूरी तय कर लेता है। प्रकाश से सूक्ष्म मन को माना जाए तो उसकी गति को तो कोई भी माप ही नहीं है। हम सिर्फ इतना ही जानते हैं कि मन की कोई गति नहीं होती, जो कि एक क्षण में भूत, भविष्य की सभी सीमाएं लांघ जाता है। यदि मन से आत्मा को और अधिक सूक्ष्म कहें तो उसकी कोई गति है या नहीं, यह भी बता पाने में हमलोग असमर्थ है।
कुल मिलाकर कहने का अर्थ यह है कि ज्यों-ज्यों हम स्थूल से सूक्ष्म तत्व की ओर बढ़ते गए, त्यों त्यों गति और शक्ति में भी वृद्धि होती चली गई। ऐसा नहीं है कि आत्मा की कोई गति नहीं है, किंतु जिस प्रकार अत्यंत गतिशील वस्तु हमारी स्थूल आंखों से चलायमान नहीं दिखाई देती, बल्कि स्थिर हो जाती है, ठीक उसी तरह आत्मा की भी गति है, किन्तु जिसे नापने का हमारे पास कोई पैमाना नही है।
अत्यंत गतिशील वस्तु में स्थिर भी इसलिए दिखाई पड़ती है, कि हमारी आंख उस गति का अनुसरण नहीं कर पाती। हां, आजकल ऐसे कैमरे अवश्य निर्मित हो गए हैं, जो कि तेज गति से चलती वस्तु की भी तस्वीर खींच सकते है, लेकिन वो भी एक सीमा तक, किसी सूक्ष्म वस्तु के मापने के लिए भी उतना ही सूक्ष्म यंत्र चाहिए होता है, जितना कि वस्तु सूक्ष्म है। वैज्ञानिक ये बता सकते हैं कि पृथ्वी का कितना वजन हैे, केवल पृथ्वी ही क्यों सूर्य, चंद्र, इत्यादि आकाशीय पिंडों के घनत्व, द्रव्यमान, गति इत्यादि के बारे में भी काफी अधिक जान चुके हैं। लेकिन ये नहीं बता सकते कि सूक्ष्माणु का आकार कितना है, उसमें भार कितना है? उनकी गति कितनी है? क्यों नहीं बता सकते, क्योंकि हमारे पास उसके माप तौल का कोई यंत्र नहीं है। तो ठहरे मन और आत्मा तो अणु से भी सूक्ष्म है। उनका मापन दृश्यावलोकन कैसे हो? कुछ भी हो विज्ञान की ये विवशता है कि आत्मा जैसे सूक्ष्म तत्व के महत्व को ही प्रमाणित करती है। जल शक्ति से हम सभी भली-भांति परिचित है। परंतु जब यही जन वाष्प रूप में परिवर्तित होकर सूक्ष्म रूप में आ जाता है तो उसकी शक्ति भी उतरोत्तर प्रचंड वेगदायक होती है। हमें विज्ञान बताता है कि सूक्ष्म की गति और शक्ति स्थूल से अनेक गुणा अधिक है, और यदि हम भूत-प्रेत आदि किसी आत्मा की बात करें तो जो कि सूक्ष्म से भी कहीं सूक्ष्म है तो तर्क से यह भी माना जा सकता है कि इन सूक्ष्म तत्त्वों की गति और शक्ति भी अनंत है और आयु भी।
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश नामक पांचो तत्वों में से किसी की भी मृत्यु नहीं होती, इनमें से कोई तत्व नष्ट नहीं होता। सिर्फ इनका रूप परिवर्तन ही होता है। तो क्या यह न माने कि मनुष्य की मृत्यु भी उसका अंत नहीं है। क्योंकि मनुष्य शरीर भी तो इन्हीं पांच तत्त्वों से बना है। जब कैसे उपरोक्त पांचो तत्वों में से किसी भी तत्व का अंत नही हो रहा तो मनुष्य शरीर का अंत मनुष्य का अंत हो जाता है?
विज्ञान कहता है कि हमारा जो ये स्थूल शरीर है, वास्तव में यह असंख्य परमाणुओं का एक पुंज है और प्रत्येक प्रमाणु के भीतर एक इलैक्ट्राॅन और एक प्रोटोन होता है, जो कि भिन्न दिशाओं में करोड़ो चक्कर प्रतिक्षण लगाते रहते हैं। अब ये चक्कर क्यों लगते रहते हैं पता नहीं।
जब कोई व्यक्ति मर जाता है तो क्या उसका सचमुच अंत हो जाता है? अब शरीर मर गया, जल गया, डूब गया, तो भी इन परमाणुओं का नाश तो नहीं हुआ। जिन अणुओं, परमाणुओं के समूह से वह बना था वो उसके मरने के बाद भी नष्ट नहीं होते, उसी तरह चक्कर काटते रहते हैं। जो बुनियादी वस्तु है तो फिर भी विद्यमान। जो परमाणु पुंज था, वही मात्र बिखर गया। हमारे पास इन सब चीजों को देखने का कोई साधन नहीं इसलिए हम ऐसा मानते हैं कि अमुक व्यक्ति मर गया। पर हमें क्या खबर कि आगे चलकर क्या हुआ? वाष्प बना तो क्या जल से हुआ। एक तो वाष्प रूप में परिवर्तित होने से उसकी गति और शक्ति दोनों ही कई गुणा बढ़ गई, दूसरे आखिर में वो दुबारा बना जल ही। ठीक इसी प्रकार से मरने के बाद शेष रह जाता है, जिसे कि हम लोग आत्मा के नाम से जानते हैं उसकी गति की एवं शक्ति भी अन्नत गुणा बढ़ जाती है। इन्हीं आत्माओं को चाहे तो हम लोग भूत कह लें या प्रेत, जिनकी गति और शक्ति भी जीवित इंसान के भीतर मौजूद आत्मा से कहीं अधिक बढ़ चुकी होती है। किंतु ये आत्माएं भी आस्तित्व के रहते हुए शरीर साधन के बिना कुध अभिव्यक्ति प्रकट नही कर पाती। हां भूत प्रेत के रूप में उनके सूक्ष्म शरीर की हरकतें यदा-कदा अवश्य प्रकाश में आ जाती है।
अणु परमाणु से भी सूक्ष्म जो ये शक्ति है। माना कि उसका हुलिया, उसकी आकृति-प्रकृति के बारे में विज्ञान अभी नहीं बता सकता। परंतु नहीं यदि सूक्ष्मतम का साक्षातकार करने में हम लोग विवश हैं तो क्या यह मान लिया जाए कि एक सीमा से आगे रास्ते बंद हो चुके हैं और सूक्ष्मतर या सूक्ष्मता जैसी कोई चीज है ही। परंतु सत्य तो यह है कि इस सूक्ष्मीकरण का कोई अंत नहीं, सूक्ष्मतम के बाद भी रास्ता आगे बढ़ता चला जाता है, जिस पर कि हमारी कल्पनाशक्ति भी दौड़ने में असमर्थ प्रकट कर देती है, हम विवश हैं इससे सूक्ष्मतम सिद्ध नहीं होता बल्कि हमारी निरीहता ही प्रकट होती है।
सचमुच कितने लाचार हैं हम उस सृष्टिकर्ता के आगे……………