पुरुषों को अट्रैक्ट करना महिलाओं के लिए कोई बड़ी बात नहीं होती। ऐसी बहुत सारी चीजें होती हैं जिनसे महिलाएं आसानी से पुरुषों को अपना दीवाना बना सकती हैं। अगर आप भी किसी के साथ रिलेशनशिप की शुरुआत करने के बहाने ढूंढ रही हैं, तो इन टिप्स को अपनाएं। पुरुष खुद-ब-खुद आपसे बातचीत की शुरुआत करेंगे।
सादगी पसंद महिलाएं
पुरुष भले ही महिलाओं के आंखों के काजल से लेकर होंठों की लिपस्टिक तक और वैक्सड हेयर से लेकर नेल पेंट लगाए हुए नेल्स को नोटिस करते हों लेकिन असलियत में उन्हें सादगी पसंद महिलाएं ही भाती हैं।
फ्लर्ट नेचर
महिलाएं फ्लर्ट करना कम ही पसंद करती हैं ये जिम्मेदारी पुरुषों की होती है लेकिन अगर आप किसी पुरुष के साथ रिलेशनशिप की शुरुआत करना चाहती हैं तो थोड़ा-सा फ्लर्टी बनना पड़ेगा। महिलाओं की फ्लर्टी नेचर उन्हें बहुत पसंद आता है इससे वो आसानी से आपकी ओर अट्रैक्ट हो जाएंगे। बालों में हाथ फेरना, खुद के लिप्स बाइट करना और आईब्रो मूवमेंट फ्लर्ट और अट्रैक्ट करने के कुछ ईजी एक्सरसाइज होती है।
स्टाइलिश होना
महिलाओं के वेल मेंटेन ड्रेस में उनकी थोड़ी-सी बाॅडी दिखती रहे पुरुषों को बहुत अच्छा लगता है। जीन्स और टाॅप के बीच की फाइन लाइन, ब्राॅंड नेक टाॅप, स्कर्ट्स वाली महिलाएं हमेशा से ही पुरुषों का ध्यान अपनी ओर खींचने में कामयाब रही हैं।
अच्छी आवाज
महिलाएं पुरुषों को अपनी आवाज से भी अपना दीवाना बना सकती हैं। बहुत तेज और कर्कश आवाज वाली महिलाओं को वो दोस्ती तक ही झेल सकते हैं। उनके साथ रिलेशनशिप में पड़ने से वो कतराते हैं।
मदद मांगना
महिलाएं पुरुषों को अपनी ओर अट्रैक्ट करने के लिए उनकी हेल्प ले सकती हैं। ये हेल्प एक पेन मांगने से लेकर लिफ्ट मांगने तक कुछ भी हो सकती है। दरअसल पुरुषों को हीमैन बनना बहुत अच्छा लगता है। खासतौर से महिलाओं के सामने। अगर आप किसी पुरुष को अट्रैक्ट करना चाहती हैं तो बिना किसी संकोच के उनसे हेल्प मांगें।
फीलिंग्स समझना
पुरुषों को अपना दीवाना बनाने के लिए एक जरूरी कदम उनकी फिलिंग्स को समझना भी है। संकोची स्वभाव होने के कारण पुरुष बहुत सी बातों को जाहिर नहीं कर पाते। उनकी बाॅडी लैंग्वेज, आंखों के इशारे आपसे बहुत कुछ कहना चाहते हैं, जिसे खामोशी से समझने की जरूरत है।

यज्ञों के आयोजन से वातावरण शुद्ध होता है। बड़े-बड़े यज्ञों के आयोजन से बारिश भी होती है। आधुनिक परिवेश में बारिश के लिए बड़े-बड़े यज्ञों का आयोजन किया जाता है। यज्ञों की परम्परा अति प्राचीन है। श्रीमद् भगवद् गीता के अनुसार प्रजापति ब्रह्मा ने मनुष्य की उत्पत्ति के साथ यज्ञ का प्रचलन भी प्रारंभ किया था। यज्ञ का प्रारंभ करते हुए ब्रह्मा ने कहा था, यज्ञों द्वारा मनुष्य की सभी मनोकामनाएं पूरी होंगी।
गीता के अनुसार सृष्टि में सभी प्राणियों की उत्पत्ति होती है। अन्न की उत्पत्ति वर्षा से होती है और वर्षा की उत्पत्ति यज्ञों से होती है। वर्षा और शुभ कार्यों के लिए यज्ञ करना आवश्यक होता है।
प्राचीन ग्रंथों के अध्ययन से पता चलता है कि प्राचीन समय में सभी राजा-महाराजाओं द्वारा यज्ञ किया जाता है। यज्ञों का धार्मिक महत्व भी कम नहीं। सूर्य व अन्य ग्रहों से आने वाली अनिष्टकारी किरणों को यज्ञों के आयोजनों से रोके जा सकता है। यज्ञों के पुण्य कर्मों से ग्रहों की अनिष्टकारी किरणों का प्रभाव नष्ट हो जाता है। शुभ कार्यों की सम्पन्नता के लिए यज्ञ किए जाते हैं।
यज्ञों द्वारा अशुभ ग्रहों का अनिष्टकारी प्रभाव नष्ट करने के साथ देवी-देवताओं को प्रसन्न किया जाता है। यज्ञ करते समय विधिवत सभी नियमों का पालन करना चाहिए। स्नान करके, स्वच्छ वस्त्र पहनकर, शारीरिक और मानसिक रूप से शुद्ध होकर यज्ञ करना चाहिए। कुलषित मन से किए गए यज्ञ का पुण्य फल नहीं मिलता है। यज्ञ में प्रयुक्त सामग्री भी पवित्र व शुद्ध होने चाहिए।
किसी भी यज्ञ के प्रारंभ में देवताओं के पूजन की परम्परा है। पूजन के लिए धूप, दीप से वातावरण सुगंधित किया जाता है। शुद्ध घी या तेल का दीपक जलाया जाता है। प्राचीन ग्रंथों के अनुसार दीपक के नीचे गेहूँ या फूल आवश्य बिछाने चाहिए। ग्रंथो में वर्णन किया गया है कि दीपक जलाने से पुण्य मिलता है। दीपक को बुझाने से पुण्य नष्ट होता है। यज्ञों के समय देवताओं की पूजा के लिए दीपक जलाने से स्वर्ग का सुख मिलता है। अगर, तगर, कूठ, मिश्री, कपूर, चंदन, खस, जायफल, सावित्री, जटामासी, देवदार, तज, शीलाजीत आदि से निर्मित धूप जलाने से वातावरण शुद्ध होता है और पुण्य की प्राप्ति होती है।
प्रत्येक मनुष्य की राशि के अनुसार यज्ञ करते समय उनके लिए विशेष मंत्र निदिष्ट होते हैं। मेष राशि के लिए श्री लक्ष्मी नारायणाय नमः मिथुन राशि के जाति के लिए  हीं विश्वरूपाय नमः, मिथुन राशि के लिए क्री केशवाय नमः, कर्क राशि के लिए हीं हरिहराय नमः, सिंह राशि के लिए हीं बाल मुकुंदाय नमः, कन्या राशि के लिए हीं परमात्मने नमः, तुला राशि के लिए श्रीं रामाय नमः, वृश्चिक श्री क्लीं जानकी रामाय नमः, मकर राशि के लिए  श्रीं वत्साय उपेंद्राय नमः, कुुंभ राशि के लिए श्री गोपाल गोविंद्राय नमः, मीन राशि के लिए हीं क्री खड़ग चक्राय नमः से मंत्र बोलकर यज्ञ किया जाता है।
यज्ञ व हवन कुंड में सामग्री डालते समय की विधि को हवन की छवि कहा जाता है। यज्ञ व हवन के उद्येश्य के अनुसार सामग्री में परिवर्तन किया जाता है। सामग्री 8 तरह की जड़ी-बूटियों व वनोमधियों से बनी होती है। यज्ञ के समय में कुंड में आहुति देते समय उस देवी-देवता का स्मरण किया जाता है। स्मरण नहीं करने से यज्ञ का पुंय नहीं मिलता है।
यज्ञ की सामग्री जौ, तिल, चिरौंजी, बादाम, नागकेशर, किशमिश, आँवला, छुआरा, लौंग, सुपारी, चंदन, आगर, गुग्गल, जायफल, नावित्री, इलायची, तामलपत्र, तागर, दालचीनी, खांड, रोली नागरमोया से बनाई जाती है। इस सामग्री से यज्ञ करने से पुण्यफल की प्राप्ति होती है। मनोकामनाएँ पूरी होती है और वातावरण स्वच्छ होता है।
सभी यज्ञ में नवग्रह की पूजा अवश्य की जाती है। नवग्रह की पूजा के लिए अलग से एक कुंड बनाया जाता है। नवग्रह यज्ञ कुंड में मध्य में सूर्य नारायण, दक्षिण पूर्व कोण में चंद्रमा, दक्षिण में मंगल, उत्तर पूर्व में बुध, उत्तर में गृहस्थिति, पूर्व में शुक्र, पश्चिम में शनि, दक्षिण-पश्चिम में राहु और पश्चिम-उत्तर दिशा में केतु की स्थापना की जाती है।
नवग्रह पूजा में देवताओं की स्थापना भी विशेष दिशाओं में करने का महत्त्व होता है। पूजा के समय पंडित ओर यजमान के बैठने की दिशा भी निर्धारित की जाती है। पंडित उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठते हैं और यजमान को पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठना होता है। पूजा प्रारंभ करने से पहले पंडित के निर्देश पर यजमान सभी पूजन सामग्री और देवताओं पर गंगाजल के छींटे मारकर पवित्र करता है।
पंडित वहाँ उपस्थित सभी व्यक्तियों को चावल देकर स्वास्ति वाचन का मंत्र उच्चारण करता है। सकंल्प, रक्षाबंधन, रक्षाविधान के बाद देव पूजन किया जाता है। देव पूजन में सभी देवताओं का आवाह्न करके गणेश की पूजा की जाती है। गणेश के बाद ब्रह्मा, फिर विष्णु, शिव, लक्ष्मी और सरस्वती की पूजा की जाती है। सभी देवताओं की पूजा करते समय विशेष मंत्र बोले जाते है।
नवग्रह पूजन में सर्वप्रथम सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि का आवाह्न किया जाता है। नवग्रह पूजन में राहु और केतु की पूजा भी की जाती है। इसके साथ ही हाथ में पुष्प और चावल लेकर अधिदेवता की पूजा की जाती है। अधिदेवता में भैरव का आवाह्न किया जाता है। उमा, स्कंद, विष्णु, ब्रह्मा, इंद्र, यम, काल, चित्रगुप्त का विधान है।

अंगूठा व्यक्ति के चिंतन विचारों का आईना होता है। अंगूठों का अध्ययन हाथ में रेखाओं जितना महत्व रखता है। अंगूठे के गुण तथा दुर्गुणों से रेखाओं के फल में अंतर आ जाता है। अतः कोई भी फलादेश कहने से पहले अंगूठे का अध्ययन जरूर करना चाहिए
अंगूठा मनुष्य के व्यवहार की खुली किताब है। इससे व्यक्ति के गुण, अवगुण कमजोरी आदि का पता लगाया जा सकता है। अतः अंगूठे के बारे में सभी को जानकारी अवश्य होनी चाहिए।
लंबा अंगूठा-
लंबा अंगूठा मनुष्य के सुलभ गुणों के बारे में बताता है जैसे व्यक्ति उदार शांत बुद्धिमान शौकीन व बड़े दिल का होता है। अगर अंगूठा लंबा होकर गुरू की अंगूली के दूसरे पौर तक आ जाए तो ऐसे लोग किसी का बुरा करना तो दूर सोचते भी नहीं है।
अगर अंगूठा लंबा मस्तिष्क रेखा निर्दोष और बुध की अंगुली उत्तम हो तो ऐसे लोग निर्णायक होतेे है। किसी भी बात को बहुत जल्दी समझ लेते है। यह लोग उलझी से उलझी बात का निर्णय भी बड़ी जल्दी कर देते है। अतः लंबा मानवता के गुणों में वृद्धि करता है। ऐसे व्यक्ति जिम्मेवार होते हैं व अनुशासित होते है।
छोटा अंगूठाः-
छोटा अंगूठा व्यक्ति के पशुत्व होने का लक्षण है। ऐसे लोग गुस्सैल बहमी जल्दबाज अकड़ू, छोटे काम करने वाले अधिक मेहनत करने वाले सीधे विश्वास करके दूसरे के कहने पर चलने वाले होते हैं ऐसे लोग अपने आपको बहुत ही बुद्धिमान और दूसरों को सामान्य समझते है। इनके घर का वातावरण भी ठीक नहीं रहता है। ऐसे लोग अपने घर में रोब बहुत जमाते हैं, अगर इनकी मस्तिष्क रेखा खराब हो तो कमजोर स्मृति होती है।
अगर अंगूठा छोटा व मोटा हो तो सभी से इनका विरोध रहता है। इनका दिया हुआ पैसा डूब जाता है। जल्दबाज बहुत होते है। इस कारण इन्हें जीवन में कई बार हानि उठानी पड़ती है। ये क्षण में कुछ, दूसरे क्षण में कुछ और सोचने लगते है। अगर हाथ में अन्य दोष हो तो ऐसे लोग कातिल व जेल जाने वाले भी होते है।
अगर इनकी अंगुलियां भी मोटी हो तो राक्षस प्रवृति होती है। इनसे ज्यादा मेंल जोल नहीं रखना चाहिए। इनकी शत्रुता भी हानिकारक होती है। अगर अंगुलियां पतली हो तो दुर्गुणों में कमी जरूर आ जाती है।
अगर मोटा अंगूठा यदि लंबा हो तो झगड़ा कम पसंद करते है। अगर इनके साथ अन्याय होता है तो चिल्ला चिल्लाकर न्याय लेने वाले होते है। ऐसे लोगों की संतान भी लापरवाह होती है। इनका गृहस्थ जीवन भी क्लेशमयी होता है। घर में खर्च बहुत अधिक होते है। ऐसे व्यक्ति किसी न किसी नशीली चीज का सेवन करते है। जैसे श्राब पीना जुआ खेलना आदि लक्षण पाए जाते है।
कठोर तथा न झुकने वाला अंगूठाः-
ऐसा अंगूठा लंबा, मोटा किसी भी प्रकार का हो सकता है पर ये पीछे की ओर नहीं मुड़ता है। ऐसा होने पर व्यक्ति मेहनती ईमानदार व दृढ़प्रतिज्ञ होता है। ऐसा व्यक्ति कोई भी निश्चय करने पर उसे मरते दम तक पूरा करने वाला होता है। ऐसे लोग खुलकर विरोध करते है। अतः इनका भी लोग बहुत विरोध करते है। ऐसे लोग संघर्ष के बाद निरंतर सफल पाए गए है। ऐसे लोगों की घर वालों से नहीं बनती है। ये सभी को दबाकर रखते है। अगर ये अंगूठा मोटा और छोटा हो तो ऐसे व्यक्ति अपने अपमान का बदला जरूर लेते है। सख्त व लंबा अंगूठा फौज के अफसरों में देखा जाता है। ऐसे लोग वफादार तथा कत्र्तव्य निभने वाले होते है।
झुकने वाला नरम अंगूठा
पीछे की ओर मुड़ने वाला व नरम अंगूठा मानव के गुणों में वृद्धि करने वाला होता है। ऐसे लोग सभी से प्यार करने वाले होते है। ये लोग किसी से बगाड़ते नही है। जिससे नाराज हो जाए उसे भुलाते नही है। माफी मांगने पर माफ कर देते है। बहुत ही भावुक होते है। जल्दी ही किसी भी बात पर रो पड़ते है। ऐसे लोग मन के साफ तथा कोई भी बात छुपाकर रखने वाले होते है। अगर इन्हें जरा भी विश्वासपात्र लगे तो गुप्त बातें भी बता देते है। ये विद्वान दयालु होते है। तथा बेकार के झगड़े में नहीं पड़ते है। ऐसे लोगों से सभी लाभ उठाते है। अगर मस्तिष्क रेखा दोषपूर्ण हो तो बर्दाश्त कम हो जाता है। तथा कटु आलोचना करने वाले होते है। ऐसे लोग दीन हीन लोगों के लिए सदैव उदार होते है।
अंगुलियांः चरित्र का परिचायक
अंगुलियां हाथ में एक विशेष स्थान रखती है। अंगुलियों के चिन्ह लंबाई मोटाई पैनापन का हाथ में एक विशेष लक्षण होता है। इसके द्वारा मानव जीवन बहुत अधिक प्रभावित होता है। अंगुलियों के बारे में जानकारी हासिल कर हम किसी व्यक्ति के सामान्य चरित्र के बारे में जानकारी हासिल कर सकते है। अगर इसका हम विस्तार से वर्णन करें तो चरित्र को बारीकियों के बारे में भी पता चल सकता है। इस लेख में मै ऐसी जानकारी देना चाहती हूं जो मेरे निजी अनुभव व गुरू की कृपा से मुझे प्राप्त हुए है। जो एक लेख में संभव नही हैं फिर भी इसे मैं संक्षेप में समझाने की कोशिश करती हूं।
अंगुलियां हाथ में सामान्य छोटी लंबी मोटी पतली सख्त कोमल इत्यादि होती है।
छोटी अंगुलियांः-
छोटी अंगुलियां जिसके हाथ में होती है, वह अपने बारे में बहुत सोचते हैं तथा स्वार्थी होते है। ऐसे लोग अपने परिवार के बाद ही समाज आदि का सोचते है। ऐसे लोग बहुत ही सोच समझकर खर्च करते है। इन्हें बेवजह दोस्तों के साथ घूमना पसंद नही होता है। ऐसे लोग दोस्ती भी उनसे करते हैं जिनसे लाभ ही होना होता है। ऐसे लोग पढ़ाई करते वक्त भी सोचते है कि आगे इससे लाभ अवश्य उठाना है। अगर हाथ में मस्तिष्क रेखा द्विभाजित है, अंगुलियां सुंदर तथा पतली हो तो ये मकान का लाभ भी व्यवसायिक रूप से उठाने की कोशिश भी और करते है। इनके मित्रों की संख्या कम होती है।
अगर यही हाथ काला पतला मोटी अंगुलियां भी हो तो ये अनैतिक काम करने वाले होते है। जैसे चोरी बेइमानी अगर भाग्य रेखा भी मोटी हो तो किसी भी तरीके से पैसा कमाने की फिराक में रहते है।
हाथ अच्छा हो तो ये जीवन मे विशेष सफलता प्राप्त करते है। इनके बच्चे भाई आदि चालाक होते है। अगर ऐसे लोग राजनीति मे हो तो लाभ उठाने वाले होते है।
मोटी उंगलियांः-
अगर अंगुलियां अधिक मोटी हो तो ऐसे लोग हाथ से ज्यादा काम करने वाले व बुद्धि से काम करने वाले वाले होते है। अगर इसके साथ हाथ सख्त भी हो तो क्रोधी जल्दबाज तानाशाह होते है। किसी चीज से संतुष्टि ना होने पर ये चिड़चिड़े बहुत जल्दी होते है।
अगर हाथ की मस्तिष्क रेखा मंगल से मंगल पर जाए तो ऐसे लोग परिणाम की चिंता नहीं करते है। अगर हाथ में अन्य दोषपूर्ण लक्षण हो तो ऐसे लोग कत्ल भी कर देते है। उनका दिल पढ़ाई में भी नहीं लगता है। इनका गृहस्थ जीवन विशेष अच्छा नहीं होता है। ऐस लोगों से ज्यादातर दूर ही रहे तो अच्छा है। ये बुद्धिमान लोगों के साथ ज्यादातर नही रह सकते है।
ये दूसरों की बुराई करने वाले होते है। अगर शुक्र अधिक उठा हो तो बहुत ही कामुक हो जाते हैं और जीवन में बदला लेने की बातें और अनुचित तरीके स बदला लेते है। अगर अंगुलियां लंबी हो तो ये अपने जीवन में धन की स्थिति को सुधार लेते।
लंबी उंगलियांः-
उंगलियां लंबी होने के साथ साथ पतली हो हाथ का रंग गुलाबी हो तो ऐसे लोग सही मायने में मानव कहलाने योग्य होते है। ऐसे लोग दूसरों की मदद जरूर करते है। इस वजह से इनकी प्रगति की रफ्तार थोड़ी धीरे हो जाती है। यह सभी से मानवता का कव्यवहार करते हैं ये लोग चलते फिरते भी दोस्ती कर लेते है। ऐसे लोग दूसरों की बातों में जल्दी आ जाते है।
इस मामले में स्त्रियों को विशेष सावधानी रखनी चाहिए क्योंकि ये प्रत्येक पर विश्वास कर लेती है। और चरित्र से संबंधित हानि पहुंचाने की कोशिश भी अधिकतर उन्हीं स्त्रियों के साथ होती है। जिनकी अंगुलियां लंबी और मोटी होती हैं अगर पतली हो तो इनकी हानि कम होती है।
शुक्र अगर उठा हो अंगुलियां लंबी हो तो कामवासना को दबाकर रखने वाले होते है। ऐसे लोग बदनामी से बहुत डरते है। कवि, सलाहकार, कलाकार इस प्रकार के बौद्धिक कार्य करने वालों की अंगुलियां पतली पाई जाती है।
सख्त तथा न झुकने वाली अंगुलियां-
ऐसे व्यक्ति स्थिर विचारों वाले होते हैं इन्हें क्रोध भी बहुत अधिक आता है। ऐसे लोग मन में सोच लें कि ये काम करना है तो बस ये कर ही डालते है। ऐसे लोग आसानी से किसी को काफ नहीं करते है। ये सभी पर अपना रोब डालने वाले अपने कार्य में हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करते है।
बचपन में भी बहुत जिद्दी पाए जाते है। इसी कारण इनके संबंध जिससे होते है। उनके साथ सैद्धांतिक मतभेद अवश्य होते है। अगर इसी दशा में अंगुलियां टेढ़ी हो मंगल पर तारा बनता हो, अंगूठा टोपाकार हो तो गुस्से में ये कत्ल भी करते है। ऐसे लोग अपने बीवी बच्चों पर भी बहुत हाथ उठाते है।
गुरू की उंगली लंबीः-
गुरू की अंगुली यानि की तर्जनी अंगुली अगर ये सूर्य की अंगुली से बड़ी हो तो ये लंबी मानी जाती है। इस अंगुली के हाथ में लंबी होने पर हाथ गुलाबी उत्तम किस्म का होने पर इन्हें जीवन में सभी प्रकार के भौतिक सुख मिलते है। इनकी प्रवृत्ति भी धार्मिक होती है। इन्हें अपने कार्यों में टीका टिप्पणी पसंद नहीं होती है।
शनि की उंगलीः-
अर्थातृ माध्यमिका उंगली अगर हाथ में उंगली लबी हो तो ऐसे लोग धार्मिक कलाकार साहित्य में रूचि रखने वाले सभी से प्यार करने वाले होते है। ज्योतिषी होने का खास लक्षण इसी उंगली के द्वारा भी पता चलता है। अगर बीच का पोर लंबा हो और शनि के नीचे त्रिकोण बनता हो तो ऐसे लोगों को इस प्रकार की विद्या का विशेष शौक होता है। बिल्कुल सीधी शनि की अंगुली धनी तथा एकांतवासी बनाती है। अगर शनि की अंगुली सूर्य पर झुकी हो जीवन रेखा एक हाथ में अधूरी हो तो ऐसे लोगों के घर जवान मौत अवश्य होती है। शनि की अंगुली सीधी होने पर जानवारों से विशेष लगाव व जानवरों का रख रखाव भी ये बड़े चाव से करते है। अगर ये अंगुली तिरछी हो तो इन्हें विशेष धन लाभ नहीं होता है। धन आने पर इनके पास टिकता हुआ नजर भी नही आता है। तिरछी होने पर ये जानवर पालते है तो इन्हें नुकसान अवश्य होता है। अगर शनि की अंगुली सीधी हाथ भारी जीवन रेखा गोल हो शनि की अंगुली पर तिल हो तो विशेष धनी होने का लक्षण है।
बुध की उंगलीः-
बुध की अंगुलों का सीधा होना, आजकल के समाज के हिसाब से अच्छा नहीं माना जाएगा क्योंकि ऐसे लोग सीधे स्वभाव के होते है। समय के अनुसार अपना काम नहीं निकाल पाते है। ना ही अपने आपको इसमें ढाल पाते है। इसलिए ये उंगली अगर थोड़ी तिरछी हो तो ही अच्छा माना जाता है। क्योंकि समय अनुसार अपना काम निकलवाना ऐसे लोग जानते है। अगर ये ज्यादा तिरछी हो तो व्यक्ति में चालाकी धोखाधड़ी षडयंत्र बनाने आदि दुर्गुणा आ जाते है। ज्यादा झूठ बोलने वालों की भी कनिष्ठा अंगुली तिरछी होती है। बुध की उंगली अनामिका से थोड़ी आगे तक जाए तो ऐसे लोग विशेष प्रगति करने वाले होते है। इस अंगुली का छोटा होना भी उन्नति में रूकावट का कारण होता है। अगर साथ में टेढ़ी भी हो तो ये गुप्तचर होते है। अगर ये अंगुली गांउदार हो तो इनके तक बहुत उत्तम होते है। अगुलियों में छेद हो या चमसाकार हाथ हो बुध की अंगुली टेढ़ी हो तो बहुत अधिक बोलने वाले होते है। इस प्रकार हमें फलादेश करते समय अंगुलियों का अध्ययन अवश्य करना चाहिए और बुध की अंगुलीका विशेष रूप से करना चाहिए। चरित्र संबंधी अन्य कई बातें हमें बुध की उंगली से ही पता चलती है। इन लक्षणों से समन्वय करके ही हस्तरेखाओं का अध्ययन भविष्यफल में चार चांद लगा देता है।

वैदिक ज्योतिष की बात की जाए तो, चंद्रमा को मन का कारक तत्त्व माना जाता है, जो कि हमारे मन की समस्त क्रियाओं का संचालन करता है। अब जिस व्यक्ति की जन्मकुंडली में चंद्रमा जिस भाव में होता है, उस व्यक्ति को अधिकांशतः उसी भाव से संबंधित पारिवारिक सदस्यों, सगे-संबंधियों वस्तुओं या पदार्थों के ही स्वप्न दिखलाई पड़ते है।
सपनों की दुनिया भी बड़ी अजीब होती है। हर इन्सान अपनी जिंदगी में अच्छे बुरे सपनों के अनुभव से गुजरता है। ये जरूरी नही कि सपने हमेशा सुंदर ही हों वे अच्छे-बुरे, सुहावने या डरावने कैसे भी हो सकते है। इनका संसार अत्यंत असिमित है और इतिहास भी शायद उतना ही पुराना है, जितना कि मानव जाति का इतिहास। सपनों का संबंध हमारे मन से है और यही मन बाह्य एवं आंतरिक रूप से हमारे समस्त जीवन को क्रियान्वित करता है।
स्वप्नों की विभिन्न परिभाषाएँः-
शरीर शास्त्र अनुसारः
नींद आने के बाद यदि मस्तिष्क में रक्त की कमी अनुभव होने लगे अथवा रक्त संचार सुचारू रूप से न हो पाए तो स्वप्न दिखाई देने लगते है।
इन्द्रिय शस्त्रानुसारः
हमारी पाचन शक्ति के कमजोर होने पर निंद्रावस्था में सपने आने लगते है।
मानव शस्त्रानुसारः
स्वप्न इंसान की पहुँच से बाहर की स्मृतियों का आभास है।
आध्यात्म शास्त्रानुसारः
हमारा सूक्ष्म शरीर नींद की अवस्था में हमारे दिन भर के क्रियाकलापों को चित्रित कर प्रस्तुत करता है, उसे ही स्वप्न कहते है।
जीवन विज्ञान अनुसारः
स्वप्न इंसान की एक चमत्कारिक समझ है। तात्पर्य है कि निद्रावस्था में मन द्वारा होने वाली क्रियाशीलता के निर्माण को ही स्वप्न कहा जाता है।
मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि स्वप्नावस्था मनुष्य के अवचेतन मस्तिष्क की उपज है, भारतीय ज्योतिष भी स्वप्न को अवचेतनावस्था का ही परिणाम मानता है किंतु मस्तिष्क नहीं अपितु मन की अवेचन अवस्था। विज्ञान जहाँ मन और मस्तिष्क को एक ही मानता है, वही हमारे यहाँ मन और मस्तिष्क दोनों की भिन्नता स्वीकार की गई है। मन एक अलग तत्त्व है और मस्तिष्क अलग। मन के दो भाग है….. चेतन मन और अवचेतन मन। भौतिक जगत के समस्त क्रियाकलाप चेतन मन की क्रियाओं द्वारा ही संपादित होते है जब कि अवचेतन मन का 95 प्रतिशत भाग सदैव सुप्तावस्था में ही रहता है। हमारे शरीर में विद्यमान सभी इन्द्रियाँ स्वतंत्र है, सबका अपना-अपना दायित्व होता है किंतु सोते समय इंद्रियां मन में ही एकत्रित होकर सिमट जाती हैं। उस स्थिति में देखना, खाना, सुनना, सूँघना, स्पर्श करना आदि क्रियाएँ विलीन हो जाती है और तब कर्मेंद्रियां कोई कर्म नहीं कर पाती तथा न ही वे कर्म करने के योग्य रहती है। यानि की सोते हुए हमारे शरीर का समस्त कार्यभार इसी अवचेतन मन के अधीन होता है जब कि जागृन अथवा में चेतन मन के अधीन।
स्वप्न में कई बार भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं को हम साफ-साफ या फिर साँकेतिक रूप में देखते है। ऐसा क्यों और कैसें? विज्ञान अभी इसकी खोज में है। लेकिन वैज्ञानिकों के अलावा इस तथ्य को कोई भी साधारण व्यक्ति नहीं नाकारेगा कि उसकी जिंदगी का कोई न कोई स्वप्न अवश्य ही भविष्य में सच हुआ।
वैदिक ज्योतिष की बात की जाए, तो चंद्रमा को मन का कारक तत्त्व माना जाता है, जो कि हमारे मन की समस्त क्रियाओं का संचालन करता है। अब जिस व्यक्ति की जन्मकुंडली में चंद्रमा जिस भाव में होता है, उस व्यक्ति को अधिकांशतः उसी भाव से संबंधित पारीवारिक सदस्यों, सगे-संबंधियों वस्तुओं या पदार्थों के ही स्वप्न दिखलाई पड़ते है। मान लिजिए किसी की जन्मकुंडली में चंद्रमा चतुर्थ भाव में स्थित है तो उस व्यक्ति को अधिकांशतः चतुर्थ भाव में संबंधित माता, भूमि, मकान, सुख के साधन, वाहन, जल, नदी इत्यादि से संबंधित स्वप्न ही दिखलाई देंगे। क्योंकि उस व्यक्ति का मन उन सब चीजों में स्थित है, इनमें रमा हुआ है। अगर उस व्यक्ति का चेतन मन उन सब वस्तुओं, पदार्थों की प्राप्ति में सहायक नहीं हो पा रहा है या कहें कि उस व्यक्ति के जीवन की परिस्थितियाँ उन पदार्थों की प्राप्ति के अनुकूल नहीं है तो फिर मन अपनी अवचेतना व स्थान में उसके लिए स्वप्न के माध्यम से मार्गदर्शक का कार्य करता है।
ऐसा भी नहीं है कि हमें दिखलाई देने वाले सभी स्वप्न सिर्फ उन्हीं वस्तुओं से संबंधित ही हो जहां कि जन्मकुंडली में चंद्रमा स्थित है। इसके अतिरिक्त गोचर में चंद्रमा जन्मकुंडली के जिस-जिस भाव में संचरण करता है, उस उस भाव से संबंधित कारक तत्त्वों के बारे में हमें नित्यप्रति सपने देखने को मिलते हैं। लेकिन ये कोई जरूरी नहीं कि वो सपने सुबह जागन पर हमें याद रह ही जाएँ। इनमें से कभी-कभार कोई सपनें हमें याद रह जाता है अन्यथा शेष स्मृति पटल से विलुप्त हो जाते है।

विवाह दो व्यक्तियों का मिलन ही नही होता अपितु दो परिवारों, उनके संस्कारों और संस्कृतियों का मिलन होता है। ईश्वर ने जब सृष्टि की रचना की तभी उसने उसे संचालित करने और निरंतर क्रियाशील रखने के लिए स्त्री और पुरूष की रचना की। इन दोनों के मिलन से ही सृष्टि चलती है।
कुण्डली अष्टकूट मिलान
विवाह दो व्यक्तियों का मिलन ही नही होता अपितु दो परिवारों, उनके संस्कारों और संस्कृतियों का मिलन होता है। ईश्वर ने जब सृष्टि की रचना की तभी उसने उसे संचालित करने और निरंतर क्रियाशील रखने के लिए स्त्री और पुरूष की रचना की। इन दोनों के मिलन से ही सृष्टि चलती है। आज के आधुनिक युग में विवाह का महत्त्व और भी अधिक हो गया है क्योंकि आज स्त्री पुरूष के समान हर क्षेत्र में समानता प्राप्त करती जा रही है। जो गृहस्थी को सफल बनाने में सहायक तो है परंतु कभी-कभी विचारों और परिस्थितियों के कारण सुखद वैवाहिक जीवन में बाधा भी बन जाती है। इसलिए यदि विवाह पूर्व ज्योतिष के अनुसार युवक और युवती की कुंडली का मिलान कर लिया जाए तो वैवाहिक जीवन शुभ, सफल, शांतिपूर्वक और सुखद व समृद्ध बन सकता है और विवाह पश्चात् आने वाली समस्याओं से बचा जा सकता है।
इसलिए वर और कन्या की कुंडलियों का अष्टकूट मिलान करके निर्णय लिया जाता है।
अष्टकूट के आठ अंग इस प्रकार हैः-
वर्णः- इसके द्वारा वर और कन्या के जातियकरण का निरीक्षण किया जाता है। कर्क वृश्चित और मीन राशि के जातक ब्राह्मण, मेष सिंह और धनु राशि के जातक क्षत्रिय, वृष कन्या और मकर राशि के जातक वैश्य वर्ण के होते है। वर का वर कन्या के कर्ण से उच्च स्तरीय अथवा समान वर्ण होने पर गुण प्राप्त होता है अन्यथा शून्य अर्थात् वर्ण दोष है।
दोष परिहारः यदि वर की राशि वर्ण से हीन हो परंतु राशि का स्वामी उत्तम हो तो और दोष समाप्त हो जाता है।
वश्य विचारः इसके द्वारा वर और कन्या के स्वभाव और प्रकृति का निरीक्षण किया जाता है। सिंह राशि के अतिरिक्त सभी राशियाँ नर मनुष्य राशि के वश में है। जल राशियाँ कर्क मकर और मीन, नर राशियाँ मिथुन, तुला, धनु, कुंभ केवल वृश्चित को छोड़कर शेष राशियाँ सिंह राशि के वश्य है। समान वश्य होने पर 2 गुण एक वश्य और दूसरा शत्रु होने पर एक गुण, एक वश्य और दूसरा शत्रु होने पर एक गुण, एक वश्य और एक भक्षय होने पर आधा गुण तथा एक शत्रु और एक भक्ष्य होने पर 0 गुण माने जाते हैं।
तारा विचारः इसके द्वारा वर और कन्या के भाग्य का निरिक्षण किया जाता है। जन्म नक्षत्र से वर और जन्म नक्षत्र तथा वर के नक्षत्र से कन्या नक्षत्र तक मिलाकर दोनों संख्याओं को अलग अलग 9 से भाग देने पर यदि शेष 3, 5, 7 बचे तो अशुभ तारा होती है। दोनों ताराओं में अशुभ तारा हो तो शुन्य गुण, एक में तारा शुभ और दूसरी में अशुभ हो तो डेढ़ गुण तथा दोनों में तारा शुभ हो तो तीन गुण होते है।
योनि विचारः इसके द्वारा वर और कन्या के यौन विचारों और यौन प्रकृति का निरिक्षण किया जाता है। अश्विनी आदि नक्षत्रों के अनुसार जातक की योनि ज्ञात की जाती है। वर और कन्या की योनियों का आपसी वैर त्जात्य है। जैसे-गो और व्याघ्र में, सिंह और गज, न्यौला और सप्र से, अश्व और महिष में, श्वान और हिरण में, वानर और मेष, मूषक और मार्जार में परस्पर महावैर है। वर और कन्या का एक ही योनि होना शुभ है। योनियों में चार गुण मित्र हो तीन, सहज प्रकृति समान समान हो तो एक गुण तथा दोनों में परस्पर शत्रुता हो तो शून्य गुण माना जाता है।
ग्रह मैत्रीः यह मैत्री के आधार पर वर और कन्या के आपसी संबंधों का निरिक्षण किया जाता है। ग्रह मैत्री कूट के संदर्भ में वर-कन्या के राशि स्वामियों का एक्य अथवा मैत्री भावादि अभिप्रम है। वर कन्या की राशियों में परस्पर अधिमित्रता या एक की राशि के होने पर पाँच गुुण, एक सम और दूसरा मित्र हो तो चार गुण, एक-दूसरे के सम हो तो तीन गुण एक मित्र दूसरा शत्रु हो तो एक गुण एक सम हो तो आधा गुण दोनों की राशियाँ परस्पर शत्रु हों तो शुन्य। दोष परिहारः वर कन्या के राशि पतियों में परस्पर वैर होने पर भी राशि नवाँश पति परस्पर मित्र हो तो, विवाह शुभ माना जाता है।
गण विचारः वर और कन्या के सामाजिक जीवन और आचार व्यवहार में समानता और विभिन्न का अध्ययन गण विचार के अन्र्तगत किया जाता है। अश्विनी, मृगशीष, पुष्य, हस्त, स्वाति, अनुराधा, श्रवण रेवती नक्षत्रों को देवतागण, तीनों पूर्वा, तीनों उत्तरा, रोहिणी, भरणी, आद्रा का मानवगण, कार्तिक, अश्विनी, मघा, चित्रा, विशाखा, ज्येष्ठा, मूल, घनिष्ठा, शतभिषा का राक्षसगण माना जाता है। वर कन्या का एक ही गण होने पर उत्तम देव मनुष्य हो तो शुभ, किसी एक का राक्षसगण हो तो अशुभ एवं त्जातय होता है। यदि वर और कन्या दोनों का गुण एक ही हो तो छः गुण वर का गण देव व कन्या का गण मनुष्य हो तो भी छः गुण, कन्या देवगण एवं वर मनुष्य हो तो पाँच गुण माने जाते है। कन्या और वर में से एक का देवगण तथा दूसरे का राक्षसगण अथवा एक का मनुष्यगण दूसरे का राक्षसगण हो तो शून्य गुणों की समानता मानी जाती है।
भृकुट विचारः इसके द्वारा वर और कन्या के लाईफ स्टाईल की समानता और विरोधाभास का निरिक्षण किया जाता है।इसे राशिकूट भी कहते है। वर कन्या की जन्मराशि परस्पर छठे एवं आठवें हो तो षडाष्टक दोष होता है। यदि वर और कन्या की राशि परस्पर पाँचवी-नौवीं हो तो नव पंचम दोष कहलाता है। षडाष्टक दोष होने की स्थिति में वर कन्या इनके माता पिता अथवा उनके किसी निकटस्थ बंधु को मृत्यु तुल्य कष्ट होने की संभावना होती है। नवपंचम दोष की स्थिति में विवाहित दंपत्ति को संतान संबंधी सुखों का अभाव और दुख होने का भय होता है तथा द्वादश, शत्रुकूट होने वर कन्या को धन, व्यापार नौकरी में हानि एवं आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।

षडाष्टक परिहरः मेष, वृश्चित, वृष, तुला, मिथुन, मकर, कर्क, चंद्र, सिंह, मीन तथा कन्या, कुम्भ आदि मित्र राशियों का षडाष्ट शुभ होता है, जबकि वैर षडाष्क ही विशेषतया दोष पूर्ण माना जाता है। यथा मेष और कन्या राशि में, कर्क और कुंभ राशि में, सिंह और मकर राशि में एवं तुला और मीन राशियों का शत्रुगत षडाष्टक होने से त्जात्य माना जाता है।
नाड़ी दोष विचारः- अष्टकूट निर्धारक तत्त्वों में नाड़ी का विशेष महत्त्व है। क्योंकि इस द्वारा विवाह पश्चात् संतान और पारिवारिक आय का अनुमान लगाया जाता है। वर-कन्या की एक ही नाड़ी होना विवाह के लिए अशुभ माना गया है।
नाड़ी दोष अपवाद एवं परिहारः- नाड़ी दोष ब्राह्मणों के लिए, वर्णदोष क्षत्रियों के लिए, गुण दोष वैश्यों के लिए तथा योनि दोष शूद्रों के लिए विशेष रूप से विचारणीय होता है। यदि वर कन्या दोनों की एक राशि अलग-अलग हो व नक्षत्र चरण भिन्न हो तो ऐसी स्थिति में नाड़ी एवं गणदोष नहीं होता अर्थात् शुभ होता है। ज्योतिष शस्त्र के अनुसार रोहिणी, मृगशिरा, आद्र्रा, ज्येष्ठा, कृतिका, पुष्य, श्रवण एवं रेवती इन नक्षत्रों में उत्पन्न वर कन्या को नाड़ी दोष नहीं लगता। निष्कर्ष रूप से हम यह कह सकते है कि विवाह करते समय कुंडली मिलान अवश्य करना चाहिए युवक युवती के जीवन में विवाह एक ऐसा मोड़ है जहाँ उसका सारा जीवन एक निर्णय पर आधारित होता है, जिस वर या कन्या से उसका विवाह होता है उससे उसके विचार मिलेंगे या नहीं इसका निर्णय हम सिर्फ ज्योतिष के आधार पर ही कर सकते है और सही मिलान आपकी गृहस्थी को धरती पर स्वर्ग का रूप दे सकता है यद्यपि गलत मिलान जीवन को नरक में परिवर्तित कर देता है।

बाबा सोलह वर्ष की आयु मे शिरडी में प्रकट हुए थे और वहां तीन वर्षों तक रूके थे। फिर वे कुछ समय के लिए अंतर्द्धन हो गये और कुछ काल के उपरांत वे औरंगाबाद के समीप निजाम स्टेट में प्रकट हुए थे। उसके बाद चांद पाटिल की बारात के साथ पुनः शिरडी पधारे और फिर जीवन पर्यंत वहीं पर रहें। उस समय वे बीस वर्ष के थे और जैसा कि सभी जानते हैं आगे आने वाले साठ वर्षों तक उन्होने लगातार शिरडी में निवास किया।
साईं कहते है जिस प्रकार जागने पर स्वप्न के राज्य वैभव अदृश्य हो जाते हैं, उसी प्रकार सांसरिक जीवन की मिथ्या विशेषता भी अदृश्य हो जाएगी। जो सांसरिक जीवन के सुखों-दुखों को मिथ्या मानता है और जिसने आत्मतल्लीन होकर इनके स्वप्न-भ्रम को दूर हटा लिया हो, वह मुक्ति प्राप्त कर लेता है। इस संसार में भक्तों की भौतिक अथवा सांसरिक पदार्थों में अधिक रूचि देखकर, उसका हृदय पिघल गया और वे करूणाभाव से चिंतित हो गये। वह दिन रात उत्सुक था कि किस तरह उसके भक्तों का इस भौतिक शरीर के प्रति मोह नष्ट हो गया। जिसकी भावना हो कि ”मैं ब्रह्म हूँ“, जो अखंड आनंद की मुर्ति हो, जो निर्विकल्प चित्त स्थिति को प्राप्त कर चुका हो, जो ऐसे व्यक्ति में सन्यास और आत्मत्याग की भावना शरण ले लेती है।
हाथ में वीणा और खड़ताल लेकर, हाथ फैलाकर और दयनीय शक्ल लेकर द्वार-द्वार भटकना ऐसा आचरण करना वे नहीं जानते थे। ऐसे कई गुरू हैं जो लागों को पकड़कर अपना शिष्य बनाकर बलपूर्वक उनके कानों में मंत्र फूंकते है और फिर धन के लालच में उन्हें धोखा देकर उनका शोषण देते हैं, लेकिन स्वयं अधर्म का आचरण करते है। वे किस प्रकार अपने भक्तों को सुरक्षित भव सागर से पार उतारेंगे और कैसे उन्हें जन्म-मरण के चक्कर से मुक्ति दिलवाएंगे?
लेकिन यहां साईं का ऐसा अद्भुत व्यक्तित्व था कि उनके मन में कोई विचार नहीं था, न ही उनकी इच्छा धार्मिक निष्ठा प्रदर्शित करने की थी, न ही वे इसके लिए लोगों की जय-जयकार और प्रशंसा हासिल करना चाहते थे। साई का ऐसा अद्भुत व्यक्तित्व था कि उनमें अहंकार के लिए जगह नहीं थी। बल्कि उनमें भक्तों के लिए असीम प्रेम था।
गुरू दो प्रकार के होते है, नियत और अनियत। अनियत गुरू की केवल यह विशेषता है कि उनके आदेशों का पालन करने से शिष्यों में उत्तम गुणों का विकास होता है तथा चित्त की शुद्धि होकर विवेक की वृद्धि होती है। वे शिष्यों को मोक्ष प्राप्ति के मार्ग पर लगा देते है। परंतु नियत गुरू की संगति मात्र से द्वैत बुद्धि का हृास शीघ्र हो जाता है और हृदय में एकत्व की भावना जागृत हो जाती है। जिसके फलस्वरूप के महावाक्य ”तत्वमसि“ की सत्यता का यथार्थ में अनुभव हो जाता है। जो उनके दर्शनार्थ जाएगा, उनके बिना पूछे ही वे उसके भूत, भविष्य और वर्तमान के गुप्त रहस्यों का संपूर्ण विवरण दे देंगे। वे समस्त प्राणियों में ब्रह्म या स्वयं ईश्वर का दर्शन किया करते थे, मित्र और शत्रु को एक नजर से देख, उनमें भेदभाव नहीं करते थे। वे किसी से किसी प्रकार की इच्छा नहीं रखते थे, बल्कि सभी के साथ एक जैसा व्यवहार करते थे, यहां तक की कृतघ्न पर भी वे अपनी कृपा की वर्षा बरसाते थे। देहधारी होते हुए भी उन्हें देह, घर जैसी सांसारिक वस्तुओं के प्रति कोई लगाव नहीं था। बाहर से तो वे देहधारी थे लेकिन अंदर से उन्हें देह की किंचतमात्र आसक्ति न थी। ऐसे व्यक्ति के जीवन में मोक्ष की प्राप्ति स्वतः ही हो जाती है।
ईश्वर निराकार है। वे शिरडी में साईं के रूप मे प्रकट हुए। उन्हें जानने के लिए सर्वप्रथम अहंकार, समस्त इच्छाएँ, क्रोध, घ्रिणा और कामुक विचारों का नष्ट होना आवश्यक है। उन्हें तो केवल प्रेम और भक्ति के द्वारा भी जाना जा सकता है। बाबा का आत्मसंयम बड़ा विचित्र है। बाबा के पास कोई अधिकृत संपत्ति नहीं थी। निर्गुण रूप में रहते हुए भी उन्होने भक्तों पर कृपा करने के निमित्त ही सगुण अवतार धारण किया। उन्होनें अपने भक्तों का प्रेम और विश्वास जीत लिया था। लेकिन उनकी वास्तविक प्रकृति को तो स्वयं ईश्वर भी पूर्ण रूप से नहीं समझ पाए। अपने भक्तों के प्रति दयाभाव के कारण बाबा के अति विनम्र हो के कहा, ”मैं दासानुदास हूँ, मैं तुम्हारा ऋणि हूँ, तुम्हारे दर्शन के लिए मै प्रकट हुआ हूँ।
यद्यपि बाह्य दृष्टि से सत्व, रजस और तमस यह तीनों गुण उनके शारीरिक अंगों में विद्यमान थे और वे सभी कार्यकलापों के कर्ता भी प्रतीक होते थे। वास्तव में उन्हें शरीर से कोई मोह नहीं था और वे त्रिगुणों से परे थे। वे पूर्ण रूप से विरक्त थे, शुद्ध चैतन्य स्वरूप थे, वे परमानंद थे। काम क्रोध की प्रबल भावनाएं उनके चरणों की शरण लेती थीं। वे इच्छा रहित और पूर्णतः संतुष्ट थे। ऐसी थी उनकी मुक्ति की पूर्ण शुद्ध अवस्था की उनके लिए चेतन पदार्थ भी ब्रह्म थे। पाप और पुंय से परे, वह सभी के लिए अंतिम विश्राम स्नान थे। वे अहंकार रहित थे और स्वप्न में भी लोगों में भेदभाव नहीं करते थे। जब नानावल्ली ने उन्हें आसन से उठने को कहा, तो वे तुरंत उठकर एक तरफ हो गए और उसे बैठने के लिए स्थान दे दिया।
उनके लिए न तो इस संसार में अर्जित करने के लिए कुछ था और न ही किसी अन्य संसार में अर्जित करने के लिए प्रकट हुए थे। ऐसे परम कृपालु संतो का इस धरती पर अवतार लेने का उद्देश्य मात्र दूसरों पर कृपा करना ही होता है उनकी दयालुता दूसरे के हेतु ही होती है। कुछ लोग कहते है कि उनका हृदय मक्खन की तरह नरम होता है। जिस प्रकार मक्खन को गरम किए जाने पर वह पिघलता है। जो स्वयं को कफनी से ढकता हो, जिस पर सौ पैबंद लगे हो जिसकी गादी और बिस्तर बोरे का बना हो और जिसका हृदय सभी प्रकार की भावनाओं से मुक्त हो, उसके लिए चाँदी के सिंहासन के लिए क्या कीमत? इस प्रकार का कोई भी सिंहासन तो उनके लिए रूकावट ही होगा।
फिर भी अगर भक्तगण पीछे चुपचाप सरका कर उसे नीचे लगा देते थे, तो बाबा उनकी प्रेम और भक्ति देखते हुए उनकी इच्छा की आदरपूर्ति के लिए मना नहीं करते थे।
बाबा ने किसी योगासन, प्राणायाम, ज्ञानेंद्रियों का सख्ती से रोकने अथवा किसी उपासना का आदेश कभी नहीं दिया। उन्होनें न ही मंत्र, तंत्र और यंत्र पूजा के लिए कहा। उन्होनें न ही कभी अपने भक्तों के कानों में मंत्र फूंका। बाह्य दृष्टि से लगता था कि वे लोगों के रीति रिवाज और तरीके अपनाते थे, लेकिन अंदर से वे बिल्कुल भिन्न थे। उनके व्यवहार और कार्यकलापों से उनकी असाधारण बुद्धिमता और कार्यकुशलता स्पष्ट प्रतीत होती थी और कोई भी उनसे मुकाबला करने में सक्षम नहीं था। साईं महाराज की परमानंद और परम शांति के आधार हैं।
बाबा न तो हिंदू है न ही मुसलमान। वे आश्रम और वर्णों से परे हैं। लेकिन वे इस सांसरिक जीवन के कष्टों और दुखों को पूर्णतः नष्ट करके उन्हें दूर कर सकते हैं। साईं की शरण में जाओ और नारायण तुम पर कृपा करेंगे। सद्गुरू के सान्निधय में रहकर स्वयं के संसार के जंजालों से मुक्त कर लो। इसी से मानव का कल्याण होता है। अगर सौभाग्यवश तुम्हें सत्संग प्राप्त हो जाए तो बिना किसी के परिश्रम के तुम्हें पूर्ण आध्यात्मिक मार्ग में अग्रसर होने के लिए केवल इंद्रियां सुखों से विरक्ति ही आवश्यक है जब तक संतों के सन्निधय की तीव्र इच्छा मन में नहीं होगी, तब तक आत्मज्ञान की प्राप्ति कदापि संभव नहीं हो पाएगी। चाहे स्वीकार करें या अस्वीकार करें जो होता है सो तो हो के ही रहेगा। केवल संतो की शरण ही हमें सुखों और दुःखों से परे ले जा सकती है।

राजा चंद्रगुप्त तीर्थाटन के लिए काशी जा रहे थे। उनके साथ उनके सेनापति, मंत्री और राजदरबार के अन्य लोग भी थे। रात होने पर एक जगह पड़ाव डाला गया। चंद्रगुप्त ने किसी भी नगर के भव्य प्रासाद या भवन में ठहरने की अपेक्षा वन में रूकना उचित समझा। वह आम के पेड़ों से भरे एक जंगल में ठहरे। भोजन विश्राम आदि की व्यवस्था की गई। बीच में कुछ नृत्य आदि के कार्यक्रम भी वैद्यों के उपचार ने उन्हें स्वस्थ तो कर दिया पर वह चिंता में डूब गए। वह विचार करने लगे कि आखिर वन और उसके आस पास रहने वाले आश्रमवासी और गाँव के लोग किस तरह रहते होंगे। उनके उपचार के लिए उन्होनें एक वैद्य को उस क्षेत्र के स्थायी रूप से नियुक्त कर दिया। वैद्य के काफी समय रहने के बाद भी जब कोई वनवासी, ग्रामवासी या गुरूकुल में रहने वाले शिष्य अथवा आचार्य अपनी चिकित्सा के लिए नहीं आये तो उकताकर एक दिन वैद्य ने एक आचार्य से कहा, लगता है मै यहां व्यर्थ ही रह रहा हूँ। यहां के लोग अस्वस्थ नहीं होते अथवा मेरे पास उपचार करवाने में संकोच करते है। आचार्य ने वैद्य के की शंका का निवरण करते हुए कहा, भविष्य में भी शायद ही कोई आपके पास चिकित्सा के लिए आए क्योंकि यहां का प्रत्येक निवासी श्रम करता है। उसे जब तक भूख परेशान नहीं करती, भोजन नहीं करता। सब यहां अल्पभोजी है। जब कुछ भुख शेष रह जाती है तभी खाना बंद कर देते है। भूख से कम भोजन और नीति नियमों से अर्जित धन से जुटाया हुआ आहार हो। स्वस्थ रहने के लिए परिश्रम करना और पसीना बहाना ही काफी नहीं है बल्कि पवित्र मन भी आवश्यक है। अपवित्र मन वाला व्यक्ति कभी स्वस्थ नहीं रह सकता। वैद्यराज के वनवासियों के स्वास्थ्य का रहस्य समझ में आ गया।

राजयोग कोई विशिष् योग नही है। यह कुंडली में बनने वाले कई योगों का प्रतिफल है। कुंडली में जब शुभ ग्रहों का योग बनता है उसके आधार पर राजयोग का आंकलन किया जाता है। इस ग्रह के आंकलन के लिए लग्न के अनुसार ग्रहों की शुभता, अशुभता, कारक, अकारक विशेष योगकारक ग्रहों को देखना होता है साथ ही ग्रहों की नैसर्गिक शुभता/ अशुभता का ध्यान रखना होता है।
ज्योतिष की दृष्टि में राजयोग का अर्थ है ऐसा योग है जो राजा के समान सुख प्रदान करें। हम सभी जीवन में सुख की कामना करते हैं परंतु सभी के भाग्य में सुख नहीं लिखा होता है। कुंडली में ग्रहों एवं योगों की स्थिति पर सुख-दुःख पर निर्भर होता है।
राज योग दो शब्दों से मिलकर बना है ”राज“ तथा ”योग“। ज्योतिष की दृष्टि में राजयोग का अर्थ है ऐसा योग है जो राजा के समान सुख प्रदान करें। हम सभी जीवन में सुख की कामना करते हैं परंतु सभी के भाग्य में सुख नहीं लिखा होता है। कुंडली में ग्रहों एवं योगों की स्थिति पर सुख-दुःख पर निर्भर होता है।
राज्य योग भी इन्हीं योगों में से है जो जीवन को सुखी बनाता है।
राज योगः
राजयोग कोई विशिष् योग नही है। यह कुंडली में बनने वाले कई योगों का प्रतिफल है। कुंडली में जब शुभ ग्रहों का योग बनता है उसके आधार पर राजयोग का आंकलन किया जाता है। इस ग्रह के आंकलन के लिए लग्न के अनुसार ग्रहों की शुभता, अशुभता, कारक, अकारक विशेष योगकारक ग्रहों को देखना होता है साथ ही ग्रहों की नैसर्गिक शुभता/ अशुभता का ध्यान रखना होता है। राजयोग के लिए केंद्र स्थान में उच्च ग्रहों की उपस्थिति, भाग्य स्थान पर उच्च ग्रहों का शुक्र, नवमेश एवं दशमेश का संबंध बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। कुंडली में अगर कोई ग्रह अपनी नीच राशि में मौजूद है तो इसका मतलब यह नही है कि वह फलदायी नही होगा क्योंकि जहाँ नीच राशि में ग्रह की स्थिति होगी वही से सप्तम उस ग्रह की दृष्टि अपने स्थान पर रहेगी। गौर करने की बात यह है कि इसका क्या फल होगा यह अन्य ग्रहों से संबंध पर निर्भर करेगा।
कुंडली में राजयोग किसी ग्रह विशेष से नहीं बनता है बल्कि इसमे सभी ग्रहों की भूमिका होती है। ज्योतिषशास्त्र के नियमानुसार कुंडली में चंद्रमा अपनी स्थिति से योगों को काफी प्रभावित करता है। चंद्रमा के निर्बल होने पर योगकारक ग्रह भी अपना फल नहीं दे पाते है। केंद्र या त्रिकोण भाव में चंद्रमा यदि पूर्ण बली शुक्र या बृहस्पति से दृष्टि होता है तो यह राजयोग का फल देता है और व्यक्ति को राजा के समान सुख प्रदान देता है।
राजयोग के प्रकारः
विपरित राजयोगः
त्रिक स्थानों के स्वामी त्रिक स्थानों में हो या युनि अथवा दृष्टि संबंध बनते हो तो विपरित राजयोग बनता है। इसे उदाहरण से इस प्रकार समझा जा सकता है कि अष्टमेष व्यय भाव या षष्ठ भाव में हो एवं षष्ठेश यदि अष्टम में व्ययेश षष्ठ या अष्टम में हो तो इन त्रिक भावों के स्वामियों की युति दृष्टि अथवा परस्पर संबंध हो और दूसरे संबंध नही हो तो यह व्यक्ति को अत्यंत धनवान और खुशहाल बनाता है इस योग में व्यक्ति महाराजाओं के समान सुख प्राप्त करता है। ज्योतिष ग्रंथो में यह भी बताया गया है कि अशुभ फल देने वाला ग्रह जब स्वयं अशुभ भाव में होता है तो अशुभ प्रभाव नष्ट हो जाते है।
केंद्र त्रिकोण राजयोगः
कुंडली में जब लग्नेश का संबंध केंद्र या त्रिकोण के स्वामियों से होता है तो यह केंद्र त्रिकोण संबंध कहलाता है। केंद्र त्रिकोण में त्रिकोण लक्ष्मी का व केंद्र विष्णु का स्वरूप होता है। यह योग जिस व्यक्ति की कुंडली में पाया जाता है वह बहुत ही भाग्यशाली होता है। यह योग मान-सम्मान धन वैभव देने वाला होता है।
नीचभंग राजयोगः
कुंडली में जब कोई ग्रह नीच राशि का होता है और जिस भाव में वह होता है उस भाव की राशि अगर उच्च राशि में हो लग्न से केंद्र में उसकी स्थिति हो तब यह नीचभंग राजयोग कहा जाता है। उदाहरण के तौर पर बृहस्पिति मकर राशि में नीच होता है लेकिन मकर का स्वामि शनि उच्च में है तो यह भंग हो जाता है जिससे नीचभंग राजयोग बनता है।
राज्यपूज्यपति योगः
यह योग कन्या के संदर्भ में देखा जाता है। यह योग जिस कन्या की कुंडली में होता है सम्पन्न एवं समाज में सम्मानित होता है। यह योग तब बनता है जब कन्या के जन्म के समय सप्तम भाव में शुभग्रह की सम राशि हो व शुभ ग्रहों से युक्त हो अथवा दृष्ट हो।

एक कहावत है कि संसार में उसी वस्तु की नकल होती है जिसकी माँग अधिक होती है। प्राचीन समय में ज्योतिष केवल आवश्यकता थी परंतु आज के दौर में आवश्यकता के साथ-साथ ज्योतिष एक फैशन भी बन गया है। जयोतिष का अर्थ है ”ज्योति दिखलाना“। मनुष्य के जीवन में लाभ-हानि, अनुकूलता-प्रतिकूलता, शुभता-अशुभता या अच्छा-बुरा कब-कब होगा इसको ज्योतिष के माध्यम से ही जाना जा सकता है।
वास्तव में ज्योतिष का अर्थ है व्यक्ति को जागरूक करना परंतु समाज में कुछ पोंगा पंडितों द्वारा गलत प्रयोग करने अर्थात् लोगों को सही जानकारी देने की बजाय उनको भयभीत कर धन कमाने के कारण कई बार इस विद्या की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है। इस लेख के माध्यम से ज्योतिष शास्त्र के उन तथ्यों के बारे में जानकारी दी जाएगी। जिनसे आमजन अक्सर भयभीत रहते है। तथा उपायों के नाम पर कुछ ज्योतिषी किस प्रकार आम लोगों को ठगते है, इस बात का भी उल्लेख किया जाएगा।
मांगलिक दोष
जन्मकुंडली के 1, 4, 7, 8, एवं 12वें भाव में मंगल के होने से जातक/जातिका मांगलिक कहलाते है। विवाह के समय कुंडली मिलान में मांगलिक दोष देखा जाता है। मंगल पानी ग्रह है या सदैव हानि करता है। ऐसी धारणा अल्पज्ञानी ज्योतिषियों की हुआ करती है। सत्य यह है कि मंगल पानी ग्रह न होकर क्रूर स्वभाव वाला ग्रह है। राजनैतिक गुणों से दूर मंगल सरल स्वभाव वाला ग्रह है। परंतु यदि कोई मंगल प्रभावित व्यक्ति से छेड़छाड़ करता है तो मंगल उसे नीति की बजाय हिंसा से सबक सिखाता है। जिसके स्वभाव में सरलता हो, निष्कपटता हो, कर्तव्यपरायणता हो व दृढ़ता हो, ऐसे सद्गुणों से भरपूर मंगल ग्रह को यदि कोई अज्ञानी पानी ग्रह कहता है तो उसकी बुद्धि प्रश्नचिन्ह लगने योग्य है।
कालसर्प योगः
आजकल चारो तरफ कालसर्प योग की बहुत ही चर्चा है। यदि आपका समय कुछ अच्छा नहीं चल रहा है और ऐसे में यदि आप किसी ज्योतिषी से संपर्क करते हैं तो अधिकतर ज्योतिषी किसी न किसी तरह से आपको कालसर्प योग से पीडि़त बताते हैं। सबसे पहले आपको यह जानकारी दी जाती है कि कालसर्प योग होता क्या है। किसी भी कुंडली में यदि सूर्य से लेकर शनि ग्रह तक सातों ग्रह राहु व केतु की एक दिशा में आ जाते हैं तो जन्मकुंडली कालसर्प योग से पीडि़त हो जाती है।
सबसे पहले हम ये जानेंगे कि कालसर्प योग की उत्पत्ति का प्रमाण किन ग्रंथों में मिलता है। ज्योतिष की उत्पत्ति वेदों से हुई है तथा वेदों का अंग भी माना जाता है, किसी भी वेद, संहिता एवं पुराणों में कालसर्प नामक योग का उल्लेख नहीं मिलता, यहाँ तक की भृगुसंहिता, पराशर एवं रावण संहिता आदि मुख्य ग्रंथों में भी इस योग की चर्चा तक नहीं है। अब जो महत्त्वपूर्ण प्रश्न सामने आते हैं वो यह है कि जब योग का विवरण किसी भी प्रमाणिक ग्रंथ में नहीं मिलता तो फिर यह कहाँ से और कब प्रकट हुआ। खोज करने पर यह मालूम पड़ा कि 80 के दशक में इस योग का आर्विभाव दक्षिण भारत की ओर से हुआ।
हम भारतीय ज्योतिष की बात करें तो राहु-केतु को छाया ग्रह माना गया है इनका अपना कोई आस्तित्व नहीं है। राहु अकेला होने पर मंगल ग्रह का प्रभाव रखते है। इस तर्क से ही कालसर्प योग अप्रमाणिक सिद्ध हो जाता है। यदि हम एक अन्य उदाहरण लें तो उसके अनुसार राहु-केतु के मध्य अन्य सभी ग्रहों के होने पर यह योग बनता है तो यदि किसी ग्रह की राहु या केतु पर दृष्टि पड़ रही हो तो भी कालसर्प योग खंडित हो जाता है क्योंकि दानों छाया ग्रह होने से इन दोनों पर जिस भी ग्रह की दृष्टि पड़ती है उसी ग्रह के अनुसार फल देने के लिए बाध्य है। अब हम दूसरी तरह से विचार करते हैं कि मान लो राहु-केतु नामक छाया ग्रह अपने प्रभाव से अन्य सात ग्रहों को बांध देते हैं तो क्या सूर्य का सभी ग्रहों का राजा कहलाया जाना बेकार है। बृहस्पति का देवगुरू होना प्रभावहीन है तथा शनि जिसे कलयुग में सबसे प्रभावशाली कारक माना जाता है क्या उनका प्रभावशाली होना मिथ्या है।

गंगा नदी नहीं बल्कि इससे बढ़कर है। गंगा के महत्त्वपूर्ण होने की वजह न सिर्फ गंगाजल है, बल्कि इस नदी के गंगोत्री से शुरू होकर अरब सागर में मिलने तक उसके रास्ते में आने वाले तमाम ऐतिहासिक व धार्मिक जगहे भी हैं। इसी बारे में विस्तृत जानकारी देता है ये लेख।
गंगोत्रीः
उत्तराखंड के उत्तराकाशी जिले में स्थित गंगोत्री ग्लेशियर गंगा की प्रमुख उपनदी भागीरथी का उदृगम स्थल है। यह आगे देवप्रयाग में अलकनंदा समेत दूसरी नदियों के साथ गंगा का निर्माण करती है। यह जगह चीन के बार्डर के नजदीक पड़ती है। गंगा के उद्गम स्थल के गाय के मुख की तरह दिखने की वजह से इसे गोमुख भी कहा जाता है। गंगोत्री हिंदुओं का एक प्रमुख धार्मिक स्थल और चार धामों में से एक है। धार्मिक स्थल होने के साथ गंगोत्री ट्रैकिंग के शौकीनों के लिए भी बड़ी अच्छी जगह है। यहां ट्रैकिंग के बेहतरीन रूट मौजूद है।
सतोपंथः
गंगा की दूसरी प्रमुख सहायक नदी अलकनंदा का जन्म उत्तराखंड स्थित सतोपंथ और भागीरथ खड़क ग्लेशियर पर होता है। उसके बाद यह नदी अपने साथ धौलीगंगा, मंदाकनी, पिंडर व नंदाकिनी नदियों को मिलाकर भागीरथी से मिलती है और गंगा का निर्माण करती है। हिंदूओं का प्रसिद्ध तीर्थ और चार धामों में से एक बद्रीनाथ भी अलकनंदा के किनारे पर ही स्थित है। अलकनंदा नदी का उद्गम स्थल सतोपंथ ग्लेशियर सैलानियों के बीच खासतौर पर फेमस है। यह जगह भारत-तिंब्बत बाॅर्डर पर स्थित है।
विष्णु प्रयागः
नैश्नल हाइवे संख्या 58 पर स्थित विष्णु प्रयाग में धौलीगंगा नदी अनकनंदा में मिलती है। इसे गंगा का पहला प्रयाग माना जाता है, क्योंकि यहां पहली बार कोई नदी अलकनंदा में मिलती है। माना जाता है कि यहां देवर्षि नारद ने भगवान विष्णु की आराधना करके अपने लिए वरदान प्राप्त किया था। तब से इस जगह को विष्णु प्रयाग कहा जाने लगा। यही हिमालय की हरियाली, सुंदर पहाडि़यों और नदी के सुरम्य किनारे का लुप्फ एक साथ उठाया जा सकता है।
बद्रीनाथ के काफी पास स्थित विष्णु प्रयाग में बहुत बड़ा हाइड्रो इलोक्ट्रोनिक प्रोजेक्ट लगाया गया है।
नंद प्रयागः
उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित नंद प्रयाग एक नगर पंचायत है, जहां अलकनंदा नदी और नंदाकिनी का संगम होता है। माना जाता है कि यहां के राजा नंद को भगवान विष्णु को बेटे के रूप में पाने का वरदान प्राप्त था। इसी तरह का वरदान कंस की बहन देवकी को भी प्राप्त था। इसलिए भगवान ने देवकी की कोख से जन्म लिया, लेकिन उसका पालन पोषण राजा नंद की पत्नी यशोदा ने किया। यह जगह ट्रैकिंग करने वालों के बीच काफी पाॅपुलर है।
कर्णप्रयागः
चमोली जिले के कार्यप्रयाग म्यूनिसिपल बोर्ड में अलकनंदा नदी पिंडारी ग्लेशियर से निकली पिंडर नदी से मिलती है। यह पंच प्रयागों में से एक है, जहां गंगा की पांचों सहायक नदियां उससे मिलती है। माना जाता है कि पांडवों के बड़े भाई कर्ण ने यहां भगवान सूर्य की अराधना की थी, जिससे इस जगह को कर्ण प्रयाग कहा जाता है। यहां एक प्राचीन मंदिर भी है। स्वामी विवेकानंद ने भी यहां करीब 18 दिनों तक मेडिटेशन किया था।
रूद्र प्रयागः
उत्तराखंड के रूद्र प्रयाग जिले में चार धामों से एक केदारनाथ के निकट चारबारी ग्लेशियर से निकली मंदाकिनी नदी अलकनंदा नदी से मिलती है। इससे पहले सोन प्रयाग में मंदाकिनी में वासूकिगंगा नदी भी मिलती है। रूद्रप्रयाग को रूद्र यानी भगवान शिव का स्थान माना जाता है। कहा जाता है कि यहां भगवान शिव ने नारद मुनि को दर्शन दिए थे। यहां स्थित भगवान शिव का गुफा मंदिर काफी प्रसिद्ध थे।
देव प्रयागः
उत्तराखंड पौड़ी गड़वाल जिले की नगर पंचायत देव प्रयाग में गंगा की दोनों प्रमुख सहायक नदियों, भागीरथी और अलकनंदा का मिलन होता है। इसी जगह दोनों नदियां अपने विशाल रूप में आती है और उसे गंगा कहा जाने लगता है। पंच प्रयागों में से एक देव प्रयाग हिंदुओं का प्रमुख धार्मिक स्थल है। माना जाता है कि यहाँ देव शर्मा ने भगवान के दर्शन किये थे। इसी वजह से इस जगह को देव प्रयाग कहा जाता हैं। यह भी माना जाता है कि भगवान राम और दशरथ ने यही मोक्ष प्राप्त किया था। यहां का रघुनाथ जी का मंदिर काफी प्रसिद्ध है। यहा बनी पत्थर की गुफाओं की उम्र हजार साल से भी ज्यादा मानी जाती है।
ऋषिकेशः
देव प्रयाग के बाद हिमालय की घाटियों का लंबा सफर तय करके गंग