अनिंद्रा के है अनेक प्रकार

आज के बढ़ते औद्योगिक तथा भौतिक दौर में अनिंद्रा एक आम बीमारी हो गयी है। तरह-तरह की नींद की गोलियां भी पूरी तरह आराम नहीं दे पाती। इनकी आदत पड़ने पर प्रायः गोलियों की मात्रा बढ़ाते रहने से ही नींद आती है और इसका परिणाम होता है अनेक रोगों से घिर कर अपने जीवन को कंटकीय बना डालना। अनिंद्रा के अनेक प्रकार होते है।
इनीटार्डियाः- जिसकी वजह से तुरंत सो सकना संभव न हो, उसे इनीटार्डिया कहा जाता है। यह एक प्रकार की वैयक्तिक अक्षमता है, जो अक्सर उन लोगों में पायी जाती है जो शो बिजनेस से संबंध रखते हैं। इस वर्ग में सिनेमा, दूरदर्शन, प्रकाशन, फैशनों के आविष्कारक व प्रचार से संबंधित लोग आते हैं। ऐसे व्यक्तियों को प्रायः अकेले रहना पड़ता है तथा अत्यधिक व्यस्तता के कारण वे समय पर खा पी और सो नहीं पाते। वे जब भी अपने काम से लौटकर सोने के लिए बिस्तर पर जाते हैं, उनके अंदर दूसरे दिन की कार्य योजना बनने लगती है और वे तुरंत नहीं सो पाते।
स्कर्जोम्नियाः- यह अनिंद्रा का दूसरा प्रकार है। इसमें नींद तो तुरंत आ जाती है किंतु दो-तीन घंटे बाद ही स्वयं टूट जाती है। इसके बाद रोगी रातभर दुबारा नहीं सो पाता। परिणामस्वरूप अगले दिन उन्हें थकावट महसूस होती है। रोगी की मांसपेशियों में दर्द होता रहता है तथा आंखे लाल-लाल रहती हैं। आंखों में जलन होती है और जम्हाइयाँ आती रहती हैं। यह अवस्था उनमें आती हैं जो मानसिक तनावों से युक्त होते हैं। अधिकतर महिलांए स्कर्जोम्निया के शिकारी होते हैं। डा. एस. के. रावत के अनुसार यौन अतृप्ति, अत्यधिक चिंता, नशीले पदार्थो का सेवन, सुबह जल्दी उठने की चिंता, किसी बात का भय आदि अनेक कारणों से लोग स्कर्जोम्निया के शिकार हो जाते हैं।
हाईपर-लिक्सियाः- यह नींद न आने का तीसरा प्रकार होता है। इसमें अक्सर अनिंद्र व्यक्ति यही सोचता रहता है कि वह रात भर ठीक से नहीं सो सका है। वास्तविकता भी यह होती है कि नींद का आना-जाना सम्पूर्ण रात लगा रहता है। हल्की नींद के दौरान हमेशा जागते रहने का आभास रोगी को होता रहता है। रोगी को इस स्थिति से जब अनेक रातें गुजारनी पड़ जाती है तो वह झुंझला जाता है। हाईपर-लिक्सिया के रोगी रात के अलावा दिन में भी सोने का प्रयास करते हैं किंतु उन्हें गहरी नींद कभी नहीं आती। यह अवस्था उन लोगों में अधिक आती है जो नशीले एंव मादक पदार्थो का सेवन अधिक करते हैं। मांसाहार एंव अधिक चटपटे पदाथो्र को खाते रहने से यह अवस्था आती है। फास्ट-फूड खाने वाले लोग भी प्रायः हाईपरलिक्सिया के शिकार हो जाया करते हैं।
प्लाइसोम्नियाः- यह अवस्था प्रायः चालीस की उम्र पार करने के बाद आती है। इसमें ऐसी नींद आती है जिसमें बार-बार जागने का व्यवधान आ पड़ता है। अधिक उम्र वालों में जागने की मियाद (समय) बढ़ने लगती है और दुबारा सो पाने की क्षमता नहीं रह जाती। प्लाइसोम्निया से ग्रसित व्यक्ति बिस्तर पर लेटे-लेटे करवटें बदलता रहता है। इस बीमारी की वजह सिर्फ बुढ़ापा ही नहीं होती। उत्तरदायित्व में कमी, अकर्मण्यता, पहले जैसी पूछ न रह जाना, मान-मर्यादा घट जाना आदि स्थितियां ज्यादा वक्त बिस्तर पर बिताने को बाध्य कर देती हैं। जवानी में भी अगर कोई गहरा विषाद, ग्लानि, उदासी या मायूसी का शिकार हो जाता है तो उसे भी यह बीमारी हो सकती है।
इन्सोम्निया टर्बुलाः- डरावने एंव बुरे दुःस्वप्न भी अनिंद्रा का एक स्वरूप है। ऐसी अनिंद्रा जो दुःस्वप्नों से भरी रहती है उसे ‘इन्सोम्निया टर्बुला’ कहा जाता है। यह अवस्था बहुत ही तकलीफदेह होती है। ये दुःस्वप्न बड़े घने-गहरे और अलग-अलग वक्त पर अचानक नींद तोड़ने वाले होते हैं। किसी व्यक्तिगत हानि या कष्टकर स्थिति में प्रायः दुःस्वप्न दिखते हैं और नींद टूट जाती है। शरीर पसीने से लथपथ हो जाता हैं। दुबारा सोने की कोशिश करने पर भी रोगी सो नहीं पता। कभी-कभी तो दुःस्वप्न की अवस्था में घिग्धी तक बंध जाती है। रोगी का शरीर पीला हो जाता है। इस तरह अनेक प्रकार की अनिंद्रा आकर परेशान करती रहती है। अनिंद्रा के शिकार लोगों को चाहिए कि वे आत्म परिक्षण कर अनिंद्रा की वजह जान कर उसे दूर करने का प्रयास करें। अच्छी नींद लाने के लिए इन उपायों को अपनायें- बिस्तर पर जाने से पहले अच्छी तरह हाथ-पांवों को धो लें तथा बिस्तर पर आने के बाद अपने इष्ट का स्मरण करते हुए सोने का प्रयास करें। सोते समय दूसरे दिन की योजनाओं पर विचार न करें तथा सभी चिंता, भय का त्याग करके सोने का उपक्रम करें। रोज एक निश्चित समय पर ही अपने बिस्तर पर पहुंच जायें। बेड रूम में तीव्र प्रकाश वाला बल्ब न जलायें तथा उस रूम में सुगन्धित अगरबत्ती या इत्र का छिड़काव कर दें। सुविधापूर्ण स्थिति में सोयें। तकिया, उचित बिछावन, चादर आदि को यथा स्थान रखें। सोने वाले बिछावन पर बैठकर पढ़ना-लिखना या खाना खाना वर्जित करें। सभी काम करने के बाद सिर्फ सोने के उद्देश्य से ही बिस्तर पर जायें। अनिंद्रा की औषधियों से अपने आपको बचाने का हर संभव प्रयास करें क्योकि यह एक बुरी आदत बनती चली जाती है।

आमतौर पर रस्सी कूदना लड़कियों का खेल समझा जाता है, लेकिन आज यह व्यायाम के रूप में काफी लोकप्रिय हो रहा है। पश्चिम देशों में रस्सी कूदना एक आम व्यायाम है। रस्सी कूदना एक ऐसा व्यायाम है जिससे शरीर के सभी अंगों की अच्छी कसरत हो जाती है। अगर आपके पास व्यायाम के लिए ज्यादा समय नहीं है तो सिर्फ पंद्रह मिनट रस्सी कूदने से ही आपके पूरे शरीर की अच्छी कसरत हो जाती है। नियम से रस्सी कूदने से मोटापा तो कम होगा ही, साथ ही फिगर भी अच्छा बना रहेगा। रस्सी कूदने से पैर, टखनों तथा कलाइयों की अच्छी कसरत हो जाती है। वे मजबूत होते हैं व शारीरिक बल बढ़ता है। छोटे बच्चों के लिए रस्सी कूदना बहुत ही लाभदायक है। इससे शरीर मजबूत होने के साथ-साथ लंबाई बढ़ती है, भूख भी खुल कर लगती है। रस्सी कूदने से रक्त संचार तीव्र होता है लेकिन अगर आपको हृदय, लीवर या किडनी संबंधी या अन्य कोई बीमारी है, तो बिना डॉक्टर की सलाह लिए रस्सी न कूदें। रस्सी कूदने के लिए सबसे अच्छी जगह हरी घास का समतल मैदान है। कठोर और ऊबड़-खाबड़ जगह पर रस्सी कूदने से पैरों और घुटनों को चोट पहुंच सकती है। घुटनों के जोड़ों को नुकसान से बचाने के लिए अच्छे किस्म के स्पोर्ट जूते पहनें। चप्पल पहन कर या नंगे पैर रस्सी कूदने से बचें। रस्सी कूदने से पहले हल्के व्यायाम या जॉगिंग से शरीर को गर्म कर लेना चाहिए। रस्सी कूदते समय अपने शरीर को सीधा रखें। आप कितनी देर रस्सी कूदें, इसका कोई निश्चित नियम नहीं है। आप जितनी देर चाहें, रस्सी कूद सकती हैं पर इतनी देर भी नहीं कि आपके पैर जख्मी हो जाएं। हर चीज की अति नुकसानदेह होती है। रस्सी कूदने की अवधि धीरे-धीरे बढ़ाएं। यह नहीं कि आप पहले ही दिन इतनी रस्सी कूद लें कि वह हानिकारक साबित हो। पहले सप्ताह आप बिना रस्सी के पचास से सौ बार कूदें। पूरे सप्ताह यही तरीका अपनाएं। दूसरे सप्ताह अपने शरीर को पहले गर्म करके फिर सौ की गिनती पूरी करते हुए एक फीट के लगभग ऊंचा कूदें। हर दिन दस अंक गिनती में बढ़ाएं। तीसरे सप्ताह भी रोज की तरह अपने शरीर को गर्म करके बिना रूके सौ की गिनती तक कूदें। दो तीन मिनट आराम करके सौ तक की गिनती करते हुए रस्सी कूदें। चौथे सप्ताह तक आपको रस्सी कूदने का पूरा अभ्यास हो जाएगा। अब आप लगातार पंद्रह से बीस मिनट तक रस्सी कूद सकती है। इस व्यायाम से आपका स्वास्थ्य ठीक रहेगा व शरीर की मांसपेशियां भी मजबूत बनेंगी। रस्सी कूदने को अपने जीवन का नियम बना लें, फिर देखिए कि आप कितनी स्वस्थ व हष्ट-पुष्ट रहेंगी।

जीवन के हर मोड़ पर मेहनत व आराम मिलकर चलते हैं। अगर मेहनत से शरीर की शक्ति खर्च होती है तो आराम इस शक्ति को पुनः भर देता है। कहने का तात्पर्य है कि अगर विश्राम न मिले तो शरीर कमजोर हो जाता है। श्रम और विश्राम, विश्राम और श्रम पर ही हमारा जीवन निर्भर है। हमारे शरीर के प्रत्येक अंग के श्रम का समय निश्चित होता है, वैसे ही आराम का समय भी निश्चित होना चाहिए। शरीर में हृदय ही ऐसा यंत्र है जो निरंतर कार्य करता है पर वह भी हर धड़कन के बीच विश्राम कर लेता है। इस प्रकार अगली धड़कन के लिए शक्ति प्राप्त कर लेता है। श्रम एक प्रकार का ध्वंसात्मक कार्य है जिससे शरीर की कोशिकाओं का क्षय होता रहता है, जिसके कारण शरीर में एक प्रकार का विष इकट्ठा हो जाता है। वह स्वास्थय के लिए बहुत ही हानिकारक होता है। विश्राम करने से यह विषैला पदार्थ नष्ट हो जाता है और अंगों की क्षतिपूर्ति भी हो जाती है। जिस प्रकार श्रम के बाद विश्राम जरूरी है, ठीक उसी प्रकार कई दिन के श्रम के बाद एक दिन विश्राम करना भी आवश्यक है। संभव हो सके तो कुछ तो कुछ दिन और विश्राम कर लेना चाहिए। इस प्रकार किया गया आराम व्यर्थ नहीं जाता। कारण ‘जो समय विश्राम में खर्च होता है वह भविष्य में शक्ति का भंडार होता है।’ केवल शारीरिक आराम ही नहीं बल्कि मानसिक रूप से विश्राम भी लेना चाहिए। गीता का कथन है- कर्मषू कौशलम्। विश्राम करने के लिए कार्य क्षमता को नियोजित ढंग से करना आवश्यक होता है अर्थात कार्य इस ढंग से किया जाए जिसमें जल्दबाजी व चिंता न हो। इससे परिश्रम की बचत होती है। शरीर जब विश्राम करता है तब भी मन विचारता ही रहता है चाहे वह किसी भी रूप में हो। हिंसा, द्वेष, प्रेम, लूटपाट, अदम्य योजनाओं में मन गोते लगाता रहता है। इस प्रकार विश्राम पूर्ण नहीं होता। श्रम में जिस प्रकार विश्राम होता है उसी प्रकार आराम की अवस्था में शरीर में कार्य होता है। इसके कारण मन उत्तेजित अवस्था में रहता है। यह विश्राम की त्रुटिपूर्ण स्थिति है। विश्राम की अवस्था में शारीरिक शिथिलता आवश्यक है जिसे प्राकृतिक चिकित्सा की भाषा में आरोग्यमूलक शिथिलता कहा जाता है। विश्राम भी एक साधना है जिसकी अपनी पद्धति है। इसके लिए शरीर व मन दोनों को एकाग्र करना आवश्यक है। उसके बाद पीठ के बल सीधा लेट जायें और बिस्तर पर इस तरह गिरायें जैसे वह टूट कर गिर गया हो। उसी प्रकार दोनों पैरों को पूरा फैला लें। फिर इन्हें समेट कर ऊपर ले आंए। घुटनों से छाती स्पर्श हो। धीरे-धीरे घुटनों को माथे से स्पर्श करें। ध्यान देने वाली बात है कि रीढ़ की हड्डी पूर्ण रूप से फैल जाए। फिर पैर व सिर को पुनः पूर्वस्थिति में नीचे ले आकर इस प्रकार रखें जैसे वे निष्प्राण हों। फिर दोनों हाथों को पेट के ऊपर शिथिल अवस्था में रखें और एक पैर की एड़ी को दूसरें पैर के ऊपर शिथिलता से चढ़ा दें। इस प्रक्रिया से आश्चर्यजनक शांति महसूस होगी। निद्रा स्वतः ही घेर लेगी। किसी योगी ने ठीक ही कहा है- जैसे नल खोल देने से पानी की धरा अबाध गति से बहने लगती है वैसे ही शरीर को शिथिल कर देने से सारे स्नायुओं में शक्ति धारा बहने लगती है। पूर्ण विश्राम सभी बीमारियों का अचूक इलाज है। बुखार की अवस्था में तो विश्राम अपरिहार्य है। किसी प्रकार का दर्द हो या हृदय रोग, ब्लडप्रेशर, आंत संबंधी रोग, खांसी, जुकाम सभी रोगों में विश्राम से आराम होता है। विश्राम खासकर स्नायुविक रोगों में ज्यादा फायदेमंद होता है। रोजाना पूरे दिन का एक घंटा भी शरीर को शिथिल कर आराम करने से तुतलापन दूर हो सकता है। वास्तव में विश्राम से ही दीर्घ जीवन प्राप्त होता है। कहते हैं कि किसी चीज की अधिकता भी ठीक नहीं। इसका भी ध्यान रखना जरूरी है। मनुष्य को सदा यह ज्ञात होना चाहिए कि विश्राम व आलस्य एक बात नहीं है। आरोग्य विश्राम का अर्थ ही है मेहनत के बाद आराम। जो विश्राम श्रम का अनुसरण नहीं करता, शरीर की निष्क्रियता को लंबा बनाता है, वह विश्राम नहीं, आलस्य है। अतः आप आलस्य और थकान में चुनाव करते हैं तो थकान को ही चुनें ‘इट इज बेटर टु वीयर आऊट देन टू रेस्ट आऊट।’

प्रायः एक बार पेट का घेरा बढ़ जाए तो उसे कम करना काफी कठिन माना जाता है। पेट बढ़ने का मूल कारण बार-बार खाना ही है। दोपहर और रात्रि के भोजन के बीच हम कई प्रकार के स्नैक्स खाते हैं। शाम होते ही कई प्रकार की उल्टी सीधी चीजें खाने की इच्छा हो जाती है। कुछ लोग समोसे खाते हैं, कुछ कचौडियां, कोई नूडल्स तो कुछ पिज्जा। कई बार तो एक स्नैक खाने के पश्चात कोई और स्नैक खाने की इच्छा हो जाती है। क्या इसका कारण पेट की थैली के आकार का बढ़ जाना है? विशेषज्ञों का कहना है कि हम जितना भोजन खाते हैं उसके हिसाब से पेट की थैली का आकार बड़ा हो जाता है और हमें अधिक भूख लगने लगती है। जो कई बार खाए बिना संतुष्ट नहीं होती। विशेषज्ञों का यह भी मानाना है कि हम प्रत्येक बार साधारण से कम भोजन खाकर पेट की थैली का आकर छोटा कर सकते हैं और अपना वजन कम कर सकते हैं। अधिक भूख और बढ़े पेट का संबंध तो सर्वविदित ही है। एक मनोवैज्ञानिक एलन ग्लिबटर ने न्यूयार्क में कुछ व्यक्तियों के पेट में एक बैलून डालकर और उसमें पानी भरकर उनके पेट की क्षमता नापी। इनमें से प्रत्येक व्यक्ति लगभग चार कप पानी से पेट काफी भरा हुआ महसूस करने लगे। उसके पश्चात इन लोगों के एक मास तक कम कैलोरी के हल्के भोजन पर रखा गया। जब पुनः उनके पेट की क्षमता नापी गई तो यह तीन कप पानी के बराबर निकली। पेट की क्षमता बढने में कितना समय लगता है? बढ़ने में लगभग दो से चार सप्ताह का समय लगता हैं। एकाध बार अधिक खा लेने से विशेष अंतर नहीं पड़ता किंतु इससे अगले दिन फिर अधिक भूख लग जाती है। एक विशेषज्ञ डा. लोरंस चैस्किन ने दिन में कम खाना और रात को भारी भोजन को इसका दोषी ठहराया है। विशेषज्ञों के अनुसार निम्न कदम आप को सीमित रखने और पेट का आकार कम रखने में सहायक कर सकते हैं।

  •  दिन में पांच बार खांए। तीन बार हल्का भोजन और दो बार हल्के स्नैक्स लें।
  •  हर वस्तु की सीमित मात्रा लें और धीरे-धीरे खांए ताकि आपके पेट को यह पता लगने लगे कि यह भर गया है।
  •  किसी जन्मदिन या विशेष अवसर पर बर्थ डे केक या पिज्जा खाना हो तो अपना मन न मारें। पहले ही तय कर लें कि आपको केक या पिज्जा का छोटा टुकडा ही खाना है। यदि संभव हो तो पार्टी में जाने से पूर्व दही या कोई फल खा लें। हलवा या मिठाई जैसी भारी चीज किसी साथी के साथ बांट कर खाएं।
  •  भोजन से पूर्व एक गिलास पानी पीने से भी भूख की तीव्रता कुछ समय कम हो जाती है।
  •  अधिक वजन बढ़ाने वाली चीजों की इच्छा होने पर इनसे कुछ मिलती-जुलती चीजें खाने का प्रयास करें जैसे फ्रेंच फ्राइस के स्थान पर उबले या भुने हुए आलू की चाट और चिकन कटलेट के स्थान पर भुना हुआ चिकन, स्टफ परांठे के स्थान पर स्टफ चपाती। शुरू में एक दो सप्ताह आपको कठिनाई हो सकती है पर धीरे-धीरे आपको आदत हो जाएगी।
    यदि आप इन तरिकों को अपना कर धीरे खाने की आदत डाल लें तो धीरें-धीरें आपका पेट अवश्य काबू में आ जाएगा।

आज की तेज रफ्तार भरी जिंदगी में हम अपने आहार की ओर ध्यान नहीं दे पाते। हमारे पास यह सोचने का समय ही नहीं होता कि क्या खाना है, कैसे खाना है। हरी सब्जियों व फलों की जगह हम फास्ट फूड की ओर बढ़ रहे हैं। इस कारण हमारे शरीर में नुकसानदेह वसा उस सीमा तक पहुंच जाती है जिसे खतरनाक कहा जा सकता है। इस स्थिति में अपने आहार के प्रति हमें अपना दृष्टिकोण पूरी तरह से बदलने की आवश्यकता है अन्यथा हमें अनेक गंभीर बीमारियों का सामना करना पड़ सकता है। आइए देखें कि हमें अपने भोजन में किस पौष्टिक तत्व की आवश्यकता होती है और वह किस भोजन में मिलता है।
विटामिन – विटामिन कार्बनिक पदार्थ हैं जो बहुत से भोज्य पदार्थो में मिलते है और शरीर को सामान्य रूप से चलाने के लिए अत्यन्त आवश्कता हैं। विटामिन कई प्रकार के होते हैं और उनकी कमी से हमारे शरीर पर अलग-अलग प्रभाव पड़ते हैं।
विटामिन ए – शरीर के ऊतकों के विकास के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण है। स्वस्थ और कांतिवान त्वचा के लिए भी इसका संतुलित मात्रा में होना आवश्यक है। इसके अच्छे स्त्रोत हैं मक्खन, दूध, मछली का तेल, गाजर, पपीता, बंदगोभी, पनीर आदि।
विटामिन बी – अगर आप ज्यादा श्रम करते हैं या व्यायाम करते है तो आपको इसकी अधिक जरूरत है। इसके मुख्य स्त्रोत हैं- गेहूं के अंकुर और सुअर का मांस।
पोटेशियम – शारीरिक श्रम तथा व्यायाम के दौरान यह ज्यादा खर्च होता है इसलिए पत्तेदार व हरी सब्जियों का सेवन अधिक करना चाहिए।
लौह तत्व – इसका मुख्य कार्य हीमोग्लोबिन का निर्माण है व इसके मुख्य स्त्रोत हैं- पालक, सेब, चुकन्दर, गन्ना, काली गाजर आदि।
प्रोटीन – दालें प्रोटीन की सबसे अच्छी स्त्रोत हैं। बच्चों को ऐसी चीजें देना आवश्यक है क्योंकि उनके शरीर बढ़ते हुए होते हैं। उनके भोजन में दूध, अंडा, फल, दही, पनीर आदि आवश्यक होने चाहिए।
विटामिन सी – इसकी कमी से स्कर्वी नामक रोग उत्पन्न हो जाता है। श्रम और व्यायाम के दौरान होने वाली ऊतकों की टूट फूट को यह सही करता है। इसके बेहतरीन स्त्रोत हैं- खट्टे फल, नींबू, संतरा, टमाटर, आंवला आदि।
विटामिन डी – विटामिन डी की कमी से रिकैट नामक बीमारी हो जाती है। इसके मुख्य स्त्रोत है- दूध, मक्खन, मछली के तेल व अंडे आदि। सूर्य की किरणों में भी ‘विटामिन डी’ पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है।
विटामिन के – इसका मुख्य स्त्रोत ताजी हरी सब्जियां हैं। कट जाने से खून का बहना इसी विटामिन द्वारा बंद होता है।
यदि हम संतुलित भोजन लें तो ये सभी विटामिन हमें आसानी से मिल जाते हैं।
कैल्शियम – मजबूत हड्डियों के निर्माण के लिए यह बेहद आवश्यक है। 1,200-1,500 मिलिग्राम तक की मात्रा में कैल्शियम लेना पर्याप्त रहता है। इसकी अधिक मात्रा से नुकसान भी हो सकता है। दूध इसका बेहतरीन स्त्रोत है।
फास्फोरस – हमारे शरीर की कोशिका में फास्फोरस मौजूद होता है। यह भी संतुलित मात्रा में लेना लाभप्रद है। अधिक फास्फोरस शरीर में कैल्शियम को नष्ट करता है। इसके अच्छे स्त्रोत है- लहसुन और मछली को तेल।

  • व्यायाम करते समय शरीर में पानी और नमक की कमी हो जाती है। अतः संभव हो तो एक गिलास इलेक्ट्रॉल का घोल पिंए अन्यथा सादा पानी पीए। यदि व्यायाम पंद्रह मिनट से अधिक समय तक जारी रहता है तो फिर पानी पिंए अर्थात व्यायाम एक घंटे का हो तो हर पंद्रह मिनट पर पानी पिंए।
  •  व्यायाम समाप्त होने पर एक गिलास दूध, शर्बत, फलों का रस या ग्लूकोज का घोल पिएं।
  •  व्यायाम यथासंभव खुले स्थान में करें ताकि फेफड़ों को स्वच्छ व शीतल हवा मिल सके।
  •  व्यायाम को उत्तम समय प्रातः सूर्योदय से पूर्व या संध्या सूर्यास्त के बाद है। खुली धूप में व्यायाम नहीं करना चाहिए।
  •  व्यायाम करते समय ढीले वस्त्र पहनने चाहिए जिनसे अंग संचालन में सुविधा हो।
  •  शारीरिक रूप से कमजोर और मरीजों को कड़े व्यायाम बहुत देर तक नहीं करने चाहिए क्योंकि व्यायाम से शरीर में ऊर्जा, पानी व नमक व्यय होता है। इससे ब्लड़ प्रेशर कम होता है। ब्लड़ प्रेशर की कमी से अत्यधिक कमजोरी या घबराहट की समस्या कुछ समय के लिए हो जाएगी। यह स्थिति कुछ लोगों के लिए घातक भी हो सकती है, इसलिए ऐसे लोग हल्के-फल्के व्यायाम अल्प समय के लिए करें।
  • तीव्रता वाले व्यायाम करने से मोटे लोगों के दिक्कत पैदा हो सकती हैं क्योंकि शरीर में मौजूद चर्बी शरीर से गर्मी निकालने में रूकावट डालती है। अतः ऐसे लोग हल्की एक्सरसाइज से शुरू करें। पहले दिन हल्का व्यायाम अल्प समय करें, फिर हर दिन उसमें एकाध मिनट का इजाफा करतें जाएं। व्यायाम करने की रफ्तार भी बढ़ा दें।
  • उमस भरें मौसम में कठोर व्यायाम न करें।
  •  शरीर का तापमान बाहर के तापमान से कम होगा तो शरीर की गर्मी बाहर निकलने में देर लगेगी। ऐसे में हल्के समय में हल्के व्यायाम करें।
  •  नियमित व्यायाम तन और मन दोनों के लिए फायदेमंद है। नियमित व्यायाम करने से शरीर में स्फूर्ति अनुभव होती है, तनाव दूर भागता है, सोते समय अच्छी नींद आती हैं नियमित व्यायाम से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, मांसपेशियां स्वस्थ रहती हैं। इससे चेहरा कांतिमय बना रहता हैं, शरीर सुडौल रहता है और काफी हद तक मन भी प्रसन्न रहता है।
  •  अत्यधिक उमस या ठंड में और कई बार किसी अन्य परिस्थिति में व्यायाम करने की इच्छा नहीं होती है, तो भी व्यायाम करना ही चाहिए क्योंकि व्यायाम भी शरीर को स्वस्थ रखने की लगभग वैसी ही जरूरत है जैसी भोजन और पानी आदि।

यूं तो प्रग्नेंसी में बहुत सी चीजों से परहेज करना होता है। लेकिन एक ऐसी चीज है जो गर्भवती महिला और होने वाले बच्चे पर काफी बुरा असर डाल सकता है। शायद आपको यकिन न हो लेकिन बहुत अधिक चाय और काँफी पीने से गर्भपात हो सकता है। ऐसे मे अगर आपको भी है चाय पीने की लत तो ये बाते जानना है आपके लिए बहुत जरूरी।
प्रेग्नेंसी के दौरान चाय और काँफी में मौजूद कैफीन भ्रूण पर असर डालता है।
प्रग्नेंट महिलाओं को एक दिन में 200 मिलीग्राम से अधिक चाय या काँफी नहीं पीनी चाहिए।
जितना हो सके पाउडर काँफी, फिल्टर काँफी और एस्प्रेसी काँफी पीने से बचें क्योकि इसमें बहुत ज्यादा कैफिन होता है।
प्रग्नेंसी में ब्लैक टी पीने से बचना चाहिए। साथ ही ग्रीन टी भी कंट्रोल करके पिएं इससे गर्भपात होने का खतरा हो सकता है।
रोजाना अधिक काँफी पीने से गर्भपात का खतरा बढ़ जाता है और इसके अलावा बच्चे का वनज भी कम होने की आंशका बढ़ जाती है।

खरबूज गर्मियोें का एक खास फल है। कई लोगों को ये कम पका पसंद है तो कुछ लोग इसे पूरा पकाकर खाना पसंद करते है। शुरूआत में ये हरे रंग का होता है लेकिन पकने के बाद पीले/नारंगी रंग का होता है। खरबूज कई प्रकार से विटामिन और खनिज लवणों से भरपूर होता है लेकिन सबसे खास बात ये है कि इसमें 95 प्रतिशत पानी होता है जो गर्मियो के लिहाज से बहुत फायदेमंद है।
आइये जानियें खरबूज खाने के फायदेः- खरबूज में एंटी- आँक्सीडेट पाए जाते है। इसके अलावा ये विटामिन सी और विटामिन ए का भी अच्छा स्त्रोत है। इसके नियमित सेवन से त्वचा पर निखार आता है।

अगर आपको सीने में जलन हो रही है तो भी विशेषज्ञ खरबूज खाने की सलाह देते हैं।
अगर आप वजन घटाने की कोशिश कर रहें है तो भी ये फल आपके लिए बहुत कारगर साबित हो सकता है। खरबूज में भरपूर मात्रा में फाइबर्स होते है। जिससे पाचन क्रिया को भी फायदा होता है।
गर्मियो में अक्सर शरीर में पानी की कमी हो जाती है। ऐसे में खरबूज खाना बहुत फायदेमंद साबित होता है। इससे डी-हाइड्रोशन नहीं होता है।
खरबूज में कई ऐसे तत्व पाए जाते है। जो कैंसर के बचाव में सहायक होते हैं। इसके आलावा ये लू से भी सुरक्षित रखने में मददगार होता है।

नमक खाने का स्वाद बढ़ा भी सकता है। और बिगाड़ भी, लेकिन अधिकतर लोग यह बात नहीं जानते कि नमक सेहत के साथ भी वही करता है। जो स्वाद के साथ। हमारे शरीर के लिए नमक की मात्रा निर्धारित है। अगर नमक की मात्रा उससे कम या ज्यादा हुई तो संतुलन बिगड़ जाता है। जो सेहत के लिए नुकसानदेह है। अधिक मात्रा में नमक या चीनी के सेवन से शरीर में कैलोरीज बढ़ती है और कैंसर का जोखिम भी बढ़ता है।

क्या सांसो की दुर्गंध आपको हर मौके पर शर्मसार करती है? दरअसल सांसो में दुर्गंध की समस्या की वजह अक्सर मुँह में मौजूद बैक्टीरिया होेते है। ऐसे में कुछ ऐसे प्राकृतिक उपाय है। जिनकी मदद से हम सांसो की बदबू से छुटकारा पा सकते है।
चबाएं पुदीने के पत्तेः- पुदीने के पत्ते बेहतरीन माउथ फ्रैशनर है जिनसें आप मिनटो में सांसो की दुर्गध से छुटकारा पा सकते हैं। पुदीने के पत्ते न सिर्फ आपकी सांसो की दुर्गंध दूर करेेगा बल्कि आपको तरोताजा भी रखेगा।
जीभ की रखें सफाईः- चिकित्साकों का मानना है। कि मुंह की सफाई तब तक पूरी नहीं मानी जाती है। जब तक जीभ की सफाई न हो। कई बार भोजन के बाद कुछ बारीक कण जीभ पर लगे रह जाते हैं जिन्हे अगर सही तरिके से साफ न करें तो भी सांसो से दुर्गंध और मुंह के संक्रमण से बचा जा सकता है।
नमकीन पानी से गार्गलः- पानी में नमक घोलकर गरारे करने से मुंह के बैक्टीरिया समाप्त हो जाते हैं और मुंह में मौजूद भोजन के बारिक कण निकल जाते है। हल्के गुनगुने पानी में एक चम्मच नमक मिलाएं और रोज ब्रश करने के बाद नमकिन पानी से गार्गल करे।
सांसो की बदबू दूर करने के लिए पानी है बहुत फायदेमंदः- मुंह में थोड़ा पानी लेकर हल्के-हल्के कुल्ला करें फिर या तो पानी को पी जाएं या थूक दें। शरीर में जल का स्तर संतुलित रखकर भी सांसो की ताजगी को बनाएं रखा जा सकता है। क्योंकि जब हमारे शरीर में जल का स्तर कम हो जाता है तो मुंह मे लार का बनना कम हो जाता है। लार बनने से मुंह में पनपने वाले जीवाणु साफ होते है, जिससे सांसो में बदबू नहीं पनपती।