जीवन संयमित एवं नियम अनुसार चले, तभी हम स्वस्थ रह सकते हैं, अन्यथा बीमार होकर और नकली दवाइयां खा कर ज्यादा बीमार पड़ सकते हैं। कुछ प्राकृतिक स्वास्थ्य निर्देशों का पालन करें तो यथा संभव बीमारी एंव डॉक्टर से बचा जा सकता है।

  •  भोजन के साथ जल ना पिंए। आधे घंटे बाद पिएं। भोजन के साथ पानी पीने से पाचक रस काम नहीं करते। मूत्र त्याग के पश्चात पानी पीने से शरीर की कोशिकाओं में जल की कमी नहीं होती।
  •  पेचिश व मरोड़ में बार-बार शर्बत, नींबू-पानी, जूस, दाल व सूप पिएं। शरीर की धातुएं संतुलित रहेंगी। नशे वाली वस्तुओं से यथा संभव बच कर रहें। थोड़ जहर भी अमृत है। ज्यादा अमृत भी जहर बन सकता है।
  •  मिर्च मसाले, लाल मिर्च, अचार, ज्यादा नमक, चीनी, घी, मैदा से बचें। ये शरीर को ज्यादा लाभ नहीं देते।
  •  कोशिश करें कि मौसमी फल व सब्जियां ज्यादा खायें। इनसे विटामिन, एंजाइम और खनिज मिलते हैं।
  •  सप्ताह में एक उपवास करें या जब भूख लगे, तब खांए। भूख न हो तो जबरदस्ती ना खाएं।
  •  जब भी खांए, पौष्टिक पदार्थ खाएं। अखाद्य पदाथ ना खाएं क्योंकि आप शरीर की कोशिकाओं का पोषण कर रहे है जो हमें जीवित रखती हैं।
  •  गुस्से एवं शोक में भोजन ना खाएं। जल्दी-जल्दी भोजन न खाएं।
  •  प्रातः चार कि. मी. सैर अवश्य करें। उषा पान की आदत डालें। प्रातः कालीन चाय छोड़ने का प्रयत्न करें।
  •  सब्जियों को छिलके सहित धोकर बनाएं। यथा संभव फल भी छिलके सहित खाएं। आटा चोकर सहित एंव अनाज अंकुरित करके, दालें साबुत एंव अंकुरित करके खाएं। इससे इनके पोषक तत्वों में वृद्धि हो जाती है।
  •  दिन में तीन बार चार घंटे के पश्चात खाएं क्योंकि 4 घंटे में पेट खाली हो जाता है।
  •  हरी सब्जियां व सलाद ज्यादा लें। अन्न कम खाएं। भोजन चबा कर खाएं। बासी भोजन न खांए। भोजन उतना ही बनांए जितने से पूर्ति हो जाए।
  •  चना, गुड़, आलू, केला व शक्कर भोजन में अवश्य खायें। प्राकृतिक रंगों वाली सब्जियां व फल खाएं। प्राकृतिक रंग रोगों से मुक्त करते हैं।
  •  घर साफ, हवादार व रोशनी युक्त हो। सूर्य किरणों से विटामिन डी लें।
  •  भोजन मिट्टी के बतनों और लोहे के बर्तनों में बनाएं जो लगभग अब किसी घर में नहीं होते। किसी समय लोग मिट्टी के बत्रन में साग, दूध गर्म करते थे। हलवाई के पास लोहे की बड़ी कडाही में से लोग दूध पिया करते थे जो अब लगभग बंद हो गया है। घर में लोहे की कड़ाई में सूखी सब्जी बनायें।
  •  लस्सी, दही एंव फल सब्जियों का रस व गाजर का रस ज्यादा प्रयोग करें और तंदुरूस्त रहें। प्रकृति ने हमें 100 वर्ष का जीवन दिया है। हम अपनी नादानियों से इसे कम करते हैं। नियमपूर्वक चलने से हम दीर्घायु प्राप्त कर सकते हैं।

ज्यों-ज्यों भौतिक सुख-सुविधाओं का बाहुल्य होता जा रहा है, त्यों-त्यों हमारी कंचन काया नाना प्रकार के रोगों से ग्रस्त होती जा रही है। नये-नये अन्वेषण हो रहे हैं और नई-नई बीमारियों को चिकित्सक हमारे सामने प्रकट करते जा रहे हैं तथा उनकी चिकित्सा के लिए औषधियां भी प्रस्तुत करते जा रहे हैं। चिकित्सा के क्षेत्र में इतनी तथा कथित प्रगति होते हुए भी हम प्रतिदिन ऐसे रोगों से ग्रस्त होते जा रहे हैं जो असाध्य हो गये हैं। शरीर को अधिक आराम देना, कोई भी शारीरिक श्रम न करना, बिना विचार किए अधिक मात्रा में खाद्य-अखाद्य वस्तुओं का सेवन करना, दिन भर खाते रहना, उचित आराम न करना, खाने के लिए जीना, शराब, अफीम, तंबाकू, गांजा आदि हारिकारक पदार्थो का सेवन करना इत्यादि का मनुष्य ने जो नियमित क्रम बना लिया है, वही रोगों के उपचारित न होने, बढ़ने, एक रोग समाप्त होने से पूर्व कई रोगों के उभर आने का मूल कारण है। इसके अतिरिक्त कुछ दवाइयों की प्रतिक्रिया भी कुछ अंशों में इसके लिए जिम्मेवार है। हम अपनी धात्री-प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं तथा हमारा अप्राकृतिक रहन-सहन हमारे शरीर को अंदर से जर्जर करता जा रहा है, अतः हमें सावधान एवं जागरूक रहने की विशेष आवश्यकता है। यदि मनुष्य स्वयं को पंच तत्वों से उपचारित करने की नैसर्गिक कला सीख ले तो शायद पंचतत्वों से निर्मित इस शरीर को किसी औषधि की आवश्यकता न पड़े। इसी के साथ ही कुछ शारीरिक-परिचालन को अपनाकर भी हम रोगों को दूर रख सकते हैं। इन्हीं क्रियाओं में एक क्रिया ‘ताली-बजाना’ भी है। प्राचीन काल से मंदिरों में आरती, भजन-कीर्तन, पूजा आदि में हम ताली बजाते आए हैं। ताली बजाने से सिर्फ भक्ति भावना ही दिखाई नहीं पड़ती है अपितु शरीर को स्वस्थ रखने का उत्कृष्ट साधन है। ताली बजाने से उत्कृष्ट प्रकार का व्यायाम हो जाता है जिससे शरीर की निष्क्रियता समाप्त होकर उसमें क्रियाशीलता की वृद्धि होती है। शरीर के किसी भाग में रक्त-संचार में रूकावट या बाधा पड़ रही हो तो वह बाधा तुरंत समाप्त हो जाती है। ताली बजाने से शरीर के अंग सम्यक् रूप से कार्य करने लगते हैं, रक्तवाहिकाएं ठीक रीति से तत्परता के साथ शुद्धिकरण हेतु रक्त को हृदय की ओर ले जाने लगती हैं और उसको शुद्ध करने के अनंतर सारे शरीर में शुद्ध रक्त पहुंचाती हैं। इससे हृदय रोग और रक्त से पूरी तरह निष्कासन होते रहने के कारण, फेफड़ों की बीमारियों की भी समाप्ति हो जाती है। रक्त में लाल रक्त कणों की वृद्धि होती है जिससे कई रोगों से मुक्ति मिल जाती हैं। नलिकाओं में रक्त का थक्का बनना समाप्त हो जाता है और भविष्य में हृदय या धमनियों की शल्य-क्रिया कराने की नौबत नहीं आने पाती। फेफड़ों में शुद्ध ऑक्सीजन की पर्याप्त मात्रा होने के कारण तथा अशुद्ध हवा का फेफड़ों से पूरी तरह निष्कासन होते रहने के कारण, फेफड़ों की बीमारियों की भी समाप्ति हो जाती है। रक्त में लाल रक्त कणों की वृद्धि होती है जिससे कई रोगों से मुक्ति मिल जाती है। ताली बजाने से श्वेत रक्तकण सक्षम तथा सशक्त बन जाते हैं, जिससे शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बहुत बढ़ जाती है। मनुष्य निरोग होने लगते हैं। शरीर में चुस्ती, फरती तथा ताजगी आ जाती है। ताली बजाने से हाथों के एक्यूप्रेशर केंद्रों पर अच्छा दबाव पड़ता है और शरीर निरोग होने लगता है। शुद्ध रक्त हृदय से पैरों तक पूरी क्षमता से दौड़ता है, जिससे हमारा शरीर निरोग होने लगता है। किस रोग में कितनी देर तक ताली बजायी जाए या कैसे बजायी जाए, इसका निर्धारण आपकी शारीरिक शक्ति एंव रोग जिसका उपचार किया जाना है, उसका आंकलन करके ही हो सकता है। अपने शरीर की शक्ति का अनुमान लगाकर उन तालियों को जो आपके लिए सहज एंव उपयुक्त हों, अपनायें। इस सहज स्वाभाविक योग से मात्र कुछ दिनों में आप रोग को दूर करके शरीर को अधिक न थकाते हुए स्वयं को चुस्त, दुरूस्त एंव तंदुरूस्त रख सकते हैं।

नारी के जीवन में आने वाली रजोनिवृति की तरह की ही स्थिति पुरूषों के जीवन में भी आती है जिसे ‘एडम’ यानी ‘एंड्रोजन डेफिशिऐंसी इन एजिंग मेल्स’ कहा जाता है। ऐसा उन वैज्ञानिकों का कहना है जो कई दशकों से उम्र बढ़ने के साथ पुरूषों के शरीर पर पड़ते प्रभाव का अध्ययन करते आ रहे थे। उम्र बढ़ने के साथ पुरूषों के स्वभाव में भी परिवर्तन आने लगता है। 40 वर्ष की उम्र के बाद पुरूषों के शरीर में सैक्स हारमोन ‘टेस्टोस्टेरोन’ की उत्पत्ति कम होने लगती है जिसका असर पुरूष के यौन जीवन और स्वभाव पर पड़ता है। टेस्टोस्टेरोन की उत्पत्ति कम होने के कारण प्रायः पुरूषों में कामेच्छा कम हो जाती है और चिड़चिड़े हो जाते हैं। हड्डियों और जोड़ों में दर्द होने लगता है। अंगों पर चर्बी बढ़ने लगती है और वे तनाव तथा डिप्रेशन का शिकार हो जाते है। ये सभी लक्षण ‘एडम’ अर्थात ‘एंड्रोजन डेफिशिऐंसी इन एजिंग मेल्स’ के हैं। कुछ वैज्ञानिक महिलाओं में होने वाली रजोनिवृति की प्रक्रिया तथा एडम की प्रक्रिया, दोनों को एक सा मानते हैं लेकिन कुछ अन्य वैज्ञानिक इस विचार से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि ‘एडम’ की तुलना रजोनिवृति से नहीं की जा सकती क्योंकि रजोनिवृति के बाद एंड कोशिकाओं में एग सेल्स का निर्माण होना बंद हो जाता है और महिलाएं गर्भधारण करने में अक्षम हो जाती है लेकिन एडम के चलते पुरूषों में ऐसी स्थिति नहीं आती है। उनके शरीर में जीवन भर निरंतर शुक्राणु बनने की प्रक्रिया जारी रहती है। पुरूष 60 या 70 साल की उम्र में भी गर्भाधान कराने में सक्षम होते हैं यद्यपि उस समय उनके जननांगों में पर्याप्त उत्तेजना नहीं आती। एडम को तुरंत नहीं पहचाना जा सकता क्योंकि यह स्थिति धीरे-धीरे आती है और अधिकांश पुरूष इसे उम्र का प्रभाव मान लेते हैं कि शरीर अब बुढ़ापे की ओर अग्रसर हो रहा है। डॉक्टरों का कहना है कि यह बुढ़ापे की अवस्था नहीं है बल्कि सैक्स हारमोन टेस्टोस्टेरोन की मात्रा में कमी के कारण यह स्थिति है जिसे इलाज द्वारा दूर किया जा सकता है, इसलिए एडम के लक्षणों के पता चलते ही पुरूषों को सतर्क हो जाना चाहिए। टेस्टोस्टेरोन पुरूषों के शरीर में पैदा होने वाला एक हारमोन है जिसे सैक्स हारमोन या एन्ड्रोजेनिक हारमोन कहा जाता है। इस हारमोन का निर्माण वृषणों मे होता है। एक पुरूष के अंदर प्रतिदिन 4.7 मिलीग्राम होता है। इसी हारमोन की दौलत एक दुबला पतला किशोर पूर्ण पुरूष में बदल जाता है। उसके जननांगों और शरीर का विकास होता है। चेहरे पर दाढ़ी-मूछें व शरीर पर घने बाल निकल आते है। शुक्राणु जनन की प्रक्रिया शुरू होती है। इस हारमोन का निर्माण किशोरावस्था में शुरू हो जाता है। एडम की अवस्था में मधुमेह व दिल की बीमारियों जैसे घातक रोग उभर सकते हैं। रोग पैदा होते ही उपचार कराना चाहिए। टेक्सास विश्वविद्यालय, ह्यूस्टन के एसोसिएट प्रोफेसर राबर्ट टान के अनुसार टेस्टोस्टोरोन हारमोन की कमी के कारण पुरूष में स्मरण शक्ति की कमी, हड्डियों के टूटने का खतरा, नपुंसकता और डिप्रेशन आदि का शिकार हो सकते हैं। हारमोन कमी को पूरा करके रोगी को इन परेशानियों से छुटकारा दिलाया जा सकता है। डॉ. टान के अनुसार टेस्टोस्टेरोन का स्मृति से सीधा संबंध है। जब उन्होंने इस हारमोन की कमी वाले पुरूषों को एंड्रोजन हारमोन दिया तो उनकी स्मरणशक्ति आश्चर्यजनक रूप से बढ़ गई। डॉ. टान द्वारा कराए गए सर्वेक्षण में पाया गया कि प्रति दिन 10 सिगरेट से ज्यादा सिगरेट पीने वाले पुरूषों में सिगरेट पीने वाले पुरूषों की तुलना में एंड्रोपोज की अवस्था जल्दी आती है। यही बात स्त्रियों के साथ भी है। ज्यादा मद्यपान व धूम्रपान करने वाली महिलाओं में रजोनिवृति जल्दी होती है। टेस्टोस्टेरोन हारमोन पुरूषत्व प्रदान करता है। इस हारमोन की कमी के कारण पुरूष, तनाव, चिड़चिड़ापन, डिप्रेशन व तनाव का शिकार हो जाते हैं। उन्हें गुस्सा ज्यादा आता है। एंड्रोपोज की अवस्था को टेस्टोस्टेरोन रिप्लेसमेंट थैरेपी (टी. आर. टी.) द्वारा दूर किया जा सकता है। इस थैरेपी से पहले व्यक्ति के शरीर में सीरम टेस्टोस्टेरोन की मात्रा की जांच करना आवश्यक होता है। यह परीक्षण सुबह किया जाता है। कुल टेस्टोस्टेरोन की मात्रा कम पाए जाने पर सीरम प्रोलेक्टिन जांच की जाती है। सीरम टेस्टोस्टेरोन की मात्रा कम पाए जाने पर ही टी. आर. टी. द्वारा उपचार किया जाता है।

उम्र को लेकर पहले एक वाक्य चलता था, ‘लाइफ बिगिंस एट फॉर्टी’ लेकिन अब जब औसत उम्र में इजाफा हुआ है, फॉर्टी से बढ़कर अब यह सिक्सटी हो गया है, यानी कि अब ‘लाइफ बिगिंग एट सिक्सटी’ वाक्य लोकप्र्रिय हो रहा है। जहां पहले सीनियर सिटीजन अपने बेटे बहू, पोते पोती के साथ रहना चाहते थे, आज जीवन के स्वर्णिम काल में अपना जीवन वे अपने ढंग से गुजारना पसंद करने लगे हैं। अपनी स्वतंत्रता और सम्मान अब उन्हें ज्यादा महत्वपूर्ण लगने लगा है। वे एक्टिव रहते हुए संसार से कूच करना चाहते हैं, निष्क्रिय रहकर एक कोने में पड़े उपेक्षित बूढ़े की तरह नहीं। जनरेशन गेप के कारण बाप बेटों व सास बहू में आए दिन झगड़े होने लगते हैं। झगड़े न भी हों तो उनमें से किसी न किसी को तो दूसरी पोजीशन पर रहना ही पड़ता है। अब वे उसे किस तरह लेते हैं, यह उनकी समझ पर निर्भर करता है। जाहिर है कि मां बाप जब अब तक घर में सर्वेसर्वा थे, सैकंड पोजीशन पर रहकर अपमानित महसूस करते हैं। ऐसी स्थिति आए, इससे पहले ही क्यों न प्रेमपूर्वक अलग रहा जाए, यही सोचकर आज कई उम्रदराज लोग बच्चों की शादी के बाद अलग रहना पसंद करते हैं। वे बराबर बच्चों से संपर्क और सुरक्षा की दृष्टि से सपोर्ट नेटवर्क भी बना कर रखते हैं। डिगनिटी फाउंडेशन के अध्यक्ष शीलू श्रीनिवासन के अनुसार एक परिवार की चाह और खर्च ने की पावर बढ़ने के कारण बहुत से सीनियर सिटीजन स्वतंत्र जीवन ही पसंद करते हुए अपनी पहचान बनाने में जुटे रहते हैं। बहुत से रिटायर्ड लोग कुछ न कुछ काम करते मिल जाएंगे। उनके पास अनुभव का खजाना होता है। कन्सलटेंसी का काम या कोई दुकान चलाना, कही पर पैंसठ वर्ष की मीरा यादव कहती हैं, ‘कुछ दिन साथ भी रहे हैं हम और रोज-रोज का नर्क भी भुगत कर देख लिया। बहू इतनी ज्यादा एंटी थी कि पूरे समय मुझे नोचने को तैयार रहती थी। मेरा हसना, बोलना कोई काम उसे पसंद नही था, सिवाय उन कार्यो के जो नौकरानी करती हैं। मेड बहुत छुट्टी करती रहती थी, तब बर्तन झाडु मुझसे करवाते उसे जरा भी लाज शरम नहीं आती। हर हिसाब किताब का काम देखना, ट्यूशन, कोचिंग देना उनमें से कुछ हैं। सीनियर सिटीजन श्री गणपत वाडेकर कहते हैं, ‘भई हम तो जियो और जीने दो के दर्शन में विश्वास करते हैं। यंग लोगों की अपनी जीवनशैली है। उनकी भागदौड़ में हम कहां फिट बैठते हैं। जब हम भी लाइफ एंजॉय कर सकते हैं तो हम उन पर बोझ बन कर क्यों रहें। हमने अपना धन इस तरह से इनवेस्ट किया है कि उससे अच्छी खासी रकम मिल जाती है। थोड़ा बहुत शेयर का काम कर लेता हूं। अक्सर हम पति पत्नी कभी सिनेमा, कभी मॉल चले जाते हैं। फ्रैंड सर्कल है। उनसे मेल मुलाकात हो जाती है। कभी उनके साथ आउटिंग पर चले जाते हैं। साल दो साल में फॉरेन टूर भी लगा लेते है। हम तो अपने जीवन का स्वर्णिम काल लगता है। कोई जिम्मेदारी बाकी नहीं। अपने कर्तव्य पूरी निष्ठा से निभाये हैं। दोनों बेटों को लायक बना दिया। खूब कमा रहे हैं, संस्कारवान हैं। एक फोन पर दौड चले आएंगे। हमें और क्या चाहिए?’ मिस्टर एंड मिसेज कपूर सोशल वर्क करके सुकून पाते हैं। मिस्टर एंड मिसेज जैन ने अपना एक म्यूजिकल ग्रुप बना रखा है जहां दस बारह संगीत प्रेमी म्यूजिकल इंसर्टूमेंट लेकर गाते बजाते खुश रहते हैं। नेहा जी नृत्यांगना हैं। साठ की हो जाने के बाद भी वे बखूबी डांस क्लास चला रही हैं। इसी का नाम है जीना कि आखिरी सांस तक शिद्दत से जिएं।

नमक प्राचीकाल से भोजन के स्वाद को बढ़ाने हेतु प्रयोग किया जाता रहा है। पुरानी पीढ़ी नमकीन, भुजिया, समोसे, पकौड़े, पूड़ियों व कचौड़ियों का आनंद लिया करती थी तो नई पीढ़ी पिज्जा, बर्गर, वेफर्स व नूडल्स की दीवानी है। भोज्य पदार्थ चाहे नये हों या पुराने नमक के बिना तो उनकी कल्पना ही नहीं की जा सकती। मीठा खाए बिना रहना उतना कठिन नहीं है जितना नमक खाए बिना रहना है किंतु नमक के अधिक उपयोग को उच्च उक्तचाप के मरीजों हेतु हानिकारक माना जाता है, इसलिए डॉक्टर उच्च रक्तचाप के मरीजों को नमक कम मात्रा में खाने की सलाह देते आए हैं। अब नवीन शोधों से पता चला है कि उच्च रक्तचाप के कुछ रोगी ऐसे भी होते हैं जिन्हें नमक कम या अधिक खाने से कोई अन्तर नहीं पड़ता। नमक कम करने से भी उनके रक्तचाप में कोई कमी नहीं आती। यह जानने के लिए कि आपका रक्तचाप किस श्रेणी में है, आप चार सप्ताह हेतु नमक कम खाकर देखें। यदि आपका रक्तचाप कम होता है तो आप उस श्रेणी में हैं जिन्हें अधिक नमक लेने से कठिनाई हो सकती है। आप किसी भी श्रेणी में हों, आपके लिए नमक सीमित मात्रा में खाना ही उचित होगा। इस हेतु आप कुछ उपाय अपना कर नमक की मात्रा पर काबू पा सकते हैं।
 भोजन के साथ कुछ मात्रा में नमक लेना तो आवश्यक है किंतु यदि आप अतिरिक्त नमक डालकर खाने के आदी हैं तो आप इस आदत को छोड़ने का प्रयास करें।
 भोजन के साथ दाल व सब्जियों को सीमित मात्रा में ही खायें। अचार, चटनी, पापड़ व सॉस का सेवन न करें। यदि छोड़ न सकें तो घर पर बनी कम नमक वाली चटनी ही खायें।
 बाजार के पापकॉर्न, वेफर्स, नमकीन, दालमोठ, गोलगप्पे आदि का सेवन न करें।
 बाजारी मक्खन, चीज, पेस्ट्री, केक व आइसक्रीम में काफी मात्रा में सोडियम होता है, अतः इन्हें भी अपनी दैनिक दिनचर्या से निकाल दें।
 यदि आप मांसाहारी भोजन के शौकिन हैं तो सासेज, बेकन, डिब्बाबंद मांस या मछली न खायें।
 ताजे फल आपके लिए लाभदायक हैं किंतु डिब्बाबंद जूस और फलों में काफी सोडियम होता है।
 सलाद का सेवन लाभदायक है किंतु सलाद पर केवल नींबू डाल कर खायें। नमक या कोई बाजारू सलाद ड्रेसिंग न डालें।
 ये छोटे-छोटे उपाय अपना कर आप अपने रक्तचाप को काबू में रख सकते हैं और इस सुप्त दानव के खतरों से बच सकते हैं।

सबसे खतरनाक है मोबाइल एडिक्शन

युद्ध और मोहब्बत के दौरान सनक ही सब कुछ कराती है। प्रेम करना गुनाह नहीं। गुनाह है प्यार में अंधा हो कर सब कुछ भूल जाना। भक्ति में शक्ति होती है। प्रेम करना ही है तो वतन से करो, प्रकृति से करो, ईश्वर से करो। प्रेम रोगी बन कर हिंसक बन जाना प्रेम का अपमान करना ही है। एडिक्ट होना घातक हो जाता है फिर चाहे आप किसी भी चीज के एडिक्ट क्यों न बनें। चर्चा में ड्रग एडिक्ट ही आते हैं। लव एडिक्शन के कारनामे भी रोंगटे खड़े कर देते हैं। प्रेम रोगियों की केमिस्ट्री कम खतरनाक नहीं होती। आधुनिक युग में टीवी एडिक्शन के शिकार हैं तो कुछ मोबाइल एडिक्शन के। दुष्परिणाम पड़ रहा है घरेलू औरतों और विद्यार्थियों पर। औरतें आक्रामक हो रही हैं तो विद्यार्थियों का रूझान पढ़ाई से हटता जा रहा है। किताबों के पन्नों में प्रेमी प्रेमिका की तस्वीरें और खत रहेंगे तो कहां से पढाई में मन लगेगा। करोड़ों हाथों में मोबाइल पकड़ा कर कई कंपनियों ने अरबों का कारोबार कर लिया किंतु उपयोगिता के दृष्टिकोण से यदि हम मोबाइल फोन की समीक्षा करें तो लाभ कम, हानि ज्यादा नजर आयेगी। मोबाइल फोन ब्लैकमेलिंग का सुलभ साधन जो बन गया है। घंटों मोबाइल फोन पर अपनी उंगलियां चलाने वालों की निराली दुनिया यही बता रही है कि मोबाइल स्टेटस सिममबल बन गया है। लोग इसका सदुपयोग कम और दुरूपयोग ज्यादा कर रहे हैं। अश्लील तस्वीरें और संदेश के प्रसारण में मोबाइल महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। गप्प मारने में महारथियों के लिए तो मोबाइल फोन वरदान साबित हो रहा है। स्कूली विद्यार्थियों को भी मोबाइल लत लग रही है। कंप्यूटर के गेम्स बच्चे मोबाइल में खेल रहे हैं। गाने सुन रहें है, फिल्में देख रहे हैं। ब्लू फिल्में तक बड़ी आसानी से बन रही हैं। मोबाइल एडिक्ट पतन के मार्ग पर बढ़ चुके हैं। अपनी जिंदगी हैण्डसेट तक सीमित कर युवा वर्ग ने मोबाइल रोग पाल कर स्वयं को बर्बादी का मार्ग प्रशस्त किया है। मोबाइल एडिक्ट न दिन में अपना ध्यान अपने कार्यक्षेत्र में केंद्रित कर पा रहे हैं और न ही रात में चैन की नींद सो पा रहे हैं। एसएमएस से पीड़ितों का इलाज संभव नहीं। इसी तरह मोबाइल टू मोबाइल घंटों बातें करने वालों का भी इलाज मुश्किल है। मोबाइल फोन का उपयोग जानना जरूरी है। दुर्भाग्य यह है कि लोग दुरूपयोग का आनंद लूट रहे हैं। मोबाइल झूठ बोलने वालों के लिए तो मानो वरदान साबित हो रहा है लेकिन चिंता किसे है? सभी मस्त हैं मोबाइल-मोबाइल खेलने और बेचने में। मध्यम वर्ग पर मोबाइल का बड़ा गहरा प्रभाव पड़ रहा है। पेट में रोटी न रहे चलेगा, जेब में मोबाइल जरूरी है। टॉपअप जरूरी है। रिचार्ज कूपन जरूरी है। स्कूल-कॉलेज पढ़ने वालों के पास लंच बॉक्स न रहे चलेगा, मोबाइल जरूरी है। पालकों ने प्रतिस्पर्धा को गलत अर्थ में लिया और खरीद दिया बच्चों का कलर मोबाइल हैन्डसेट्स। होस्टल में रह कर पढ़ने वाले विद्यार्थियों के लिए तो एक बार मोबाइल की उपयोगिता मायने रखती है किंतु घर में रह कर गांव अथवा शहर के शैक्षणिक संस्थानों में शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों और शिक्षकों दोनों के लिए मोबाइल की अनिवार्यता समझ के बाहर की बात है। क्लासरूम में ही रिंग टोन बनजे लगती है। बच्चे म्यूजिक सुनने में मस्त है। पढ़ाई की किसी को काई फिक्र नहीं है। घर पर भी पढ़ाई के समय मोबाइल हाथ में नजर आए तो इसे दुर्भाग्य ही कहना पडेगा। मोबाइल के द्वारा टीनएजर्स अपराध के नये-नये गुर सीख रहे हैं। मोबाइल एडिक्शन एक खतरनाक रोग बनता जा रहा है।

स्वस्थ रहना इतना मुश्किल नहीं है लेकिन यह हमारी ही लापरवाही का नतीजा है कि हम स्वस्थ नहीं रह पाते। हम अपना स्वास्थ्य स्वयं ही खराब करते हैं। लापरवाही का यह नतीजा होता है कि हमारा शरीर बीमारियों का घर बनता चला जाता है। ये बीमारियां फिर धीरे-धीरे विकराल रूप् धारण कर लेती हैं। यह तो सभी जानते हैं कि दिन जागने के लिए होता है और रात सोने के लिए। दिन में अपने सारे कार्यो को निपटाते हैं और रात को चैन से आराम करते हैं। जैसे खाना खाना एक काम है वैसे ही इसे पचाना भी एक काम है। जब हम अपने सारे काम दिन में ही कर लेते हैं तो हमें भोजन भी दिन में ही कर लेना चाहिए। रात को नहीं करना चाहिए। किंतु दिनभर काम में लगे रहने से हमें दिन में तो ढंग से खाने की फुरसत ही नहीं मिलती, तो रात को तसल्ली से ही भोजन किया जाता है। स्वस्थ रहने के लिए जरूरी है स्वास्थ्य के नियमों का पालन करना। भोजन करने के भी समय होते हैं। यदि हम समयानुकूल भोजन नहीं करेंगे तो चाहे कितना ही पौष्टिक भोजन क्यों न कर लें, बीमार जरूर पड़ेंगे। भोजन करने के क्या नियम हैं, पहले इन्हें जान लें। तभी स्वस्थ रह सकेंगे। हमारी सबसे बड़ी गलती यह होती है कि दिनभर जब हम काम में लगे रहते हैं, हमारे पास खाना खाने का समय नहीं होता जबकि रात में जो हमारे आराम करने का समय है, हम पेटभर खाना खाते हैं। इसी से स्वास्थ्य गिरता चला जाता है। हमारे शरीर को शक्ति मिलती है दोपहर के भोजन से न कि रात के भोजन से बल्कि रात में भोजन करने से शरीर में बीमारियों का घर बनता है। रात में भोजन करने से तो बचना चाहिए। दिन में पेट भर भोजन करना चाहिए। भोजन ताजा एंव गर्म होना चाहिए। उसमें सब्जी, फल, सलाद प्रचुर मात्रा में होना चाहिए। भोजन दिन में ही कई बार कर लें। भोजन इस प्रकार करें कि दूसरे समय तक खुल जाये। शाम होते ही भोजन कर लें। रात का इंतजार न करें। शाम को हल्का भोजन ही करें। जिनकी पाचन शक्ति कमजोर हो, वे जल्दी व हल्का भोजन कर लें। फिर रात में कुछ न खायें। दिन भर भोजन क्रम से करने से रात को भूख भी नहीं लगेगी। फिर भी यदि रात को भूख लगे तो दूध, सूप या कोई अन्य गर्म पेय लिया जा सकता है। दिनभर क्रम से भोजन करेंगे तो रात को भूख-प्यास नहीं लगेगी। यदि फिर भी रात को भूख-प्यास लगे तो अपने भोजन क्रम पर ध्यान दें। बिल्कुल पेट भरकर भोजन न करें। थोड़ी भूख रखें। भोजन में अरूचि न होने दें। रात में थककर घर आकर तुरंत भोजन न करें। थकान से भूख बढ़ती है। पहले थोड़ा आराम कर लें जिससे थोड़ी सी भूख शांत हो जाए। फिर थोड़ा गर्म शीतल पेय ले लें जो कि आपकी भूख को शांत करेगा। कुछ खास खाने का मन न करें तो ऐसी चीज दिन में ही खायें। जो व्यंजन रात में नहीं पच पाते, उन्हें दिन में ही अपने भोजन में शामिल करें। अपने भोजन पर ध्यान दें। भोजन करने के समय पर ध्यान दें। तभी तो आप स्वस्थ रह सकेंगी। याद रखें रात में भोजन करने से परहेज करें।

अनिंद्रा के है अनेक प्रकार

आज के बढ़ते औद्योगिक तथा भौतिक दौर में अनिंद्रा एक आम बीमारी हो गयी है। तरह-तरह की नींद की गोलियां भी पूरी तरह आराम नहीं दे पाती। इनकी आदत पड़ने पर प्रायः गोलियों की मात्रा बढ़ाते रहने से ही नींद आती है और इसका परिणाम होता है अनेक रोगों से घिर कर अपने जीवन को कंटकीय बना डालना। अनिंद्रा के अनेक प्रकार होते है।
इनीटार्डियाः- जिसकी वजह से तुरंत सो सकना संभव न हो, उसे इनीटार्डिया कहा जाता है। यह एक प्रकार की वैयक्तिक अक्षमता है, जो अक्सर उन लोगों में पायी जाती है जो शो बिजनेस से संबंध रखते हैं। इस वर्ग में सिनेमा, दूरदर्शन, प्रकाशन, फैशनों के आविष्कारक व प्रचार से संबंधित लोग आते हैं। ऐसे व्यक्तियों को प्रायः अकेले रहना पड़ता है तथा अत्यधिक व्यस्तता के कारण वे समय पर खा पी और सो नहीं पाते। वे जब भी अपने काम से लौटकर सोने के लिए बिस्तर पर जाते हैं, उनके अंदर दूसरे दिन की कार्य योजना बनने लगती है और वे तुरंत नहीं सो पाते।
स्कर्जोम्नियाः- यह अनिंद्रा का दूसरा प्रकार है। इसमें नींद तो तुरंत आ जाती है किंतु दो-तीन घंटे बाद ही स्वयं टूट जाती है। इसके बाद रोगी रातभर दुबारा नहीं सो पाता। परिणामस्वरूप अगले दिन उन्हें थकावट महसूस होती है। रोगी की मांसपेशियों में दर्द होता रहता है तथा आंखे लाल-लाल रहती हैं। आंखों में जलन होती है और जम्हाइयाँ आती रहती हैं। यह अवस्था उनमें आती हैं जो मानसिक तनावों से युक्त होते हैं। अधिकतर महिलांए स्कर्जोम्निया के शिकारी होते हैं। डा. एस. के. रावत के अनुसार यौन अतृप्ति, अत्यधिक चिंता, नशीले पदार्थो का सेवन, सुबह जल्दी उठने की चिंता, किसी बात का भय आदि अनेक कारणों से लोग स्कर्जोम्निया के शिकार हो जाते हैं।
हाईपर-लिक्सियाः- यह नींद न आने का तीसरा प्रकार होता है। इसमें अक्सर अनिंद्र व्यक्ति यही सोचता रहता है कि वह रात भर ठीक से नहीं सो सका है। वास्तविकता भी यह होती है कि नींद का आना-जाना सम्पूर्ण रात लगा रहता है। हल्की नींद के दौरान हमेशा जागते रहने का आभास रोगी को होता रहता है। रोगी को इस स्थिति से जब अनेक रातें गुजारनी पड़ जाती है तो वह झुंझला जाता है। हाईपर-लिक्सिया के रोगी रात के अलावा दिन में भी सोने का प्रयास करते हैं किंतु उन्हें गहरी नींद कभी नहीं आती। यह अवस्था उन लोगों में अधिक आती है जो नशीले एंव मादक पदार्थो का सेवन अधिक करते हैं। मांसाहार एंव अधिक चटपटे पदाथो्र को खाते रहने से यह अवस्था आती है। फास्ट-फूड खाने वाले लोग भी प्रायः हाईपरलिक्सिया के शिकार हो जाया करते हैं।
प्लाइसोम्नियाः- यह अवस्था प्रायः चालीस की उम्र पार करने के बाद आती है। इसमें ऐसी नींद आती है जिसमें बार-बार जागने का व्यवधान आ पड़ता है। अधिक उम्र वालों में जागने की मियाद (समय) बढ़ने लगती है और दुबारा सो पाने की क्षमता नहीं रह जाती। प्लाइसोम्निया से ग्रसित व्यक्ति बिस्तर पर लेटे-लेटे करवटें बदलता रहता है। इस बीमारी की वजह सिर्फ बुढ़ापा ही नहीं होती। उत्तरदायित्व में कमी, अकर्मण्यता, पहले जैसी पूछ न रह जाना, मान-मर्यादा घट जाना आदि स्थितियां ज्यादा वक्त बिस्तर पर बिताने को बाध्य कर देती हैं। जवानी में भी अगर कोई गहरा विषाद, ग्लानि, उदासी या मायूसी का शिकार हो जाता है तो उसे भी यह बीमारी हो सकती है।
इन्सोम्निया टर्बुलाः- डरावने एंव बुरे दुःस्वप्न भी अनिंद्रा का एक स्वरूप है। ऐसी अनिंद्रा जो दुःस्वप्नों से भरी रहती है उसे ‘इन्सोम्निया टर्बुला’ कहा जाता है। यह अवस्था बहुत ही तकलीफदेह होती है। ये दुःस्वप्न बड़े घने-गहरे और अलग-अलग वक्त पर अचानक नींद तोड़ने वाले होते हैं। किसी व्यक्तिगत हानि या कष्टकर स्थिति में प्रायः दुःस्वप्न दिखते हैं और नींद टूट जाती है। शरीर पसीने से लथपथ हो जाता हैं। दुबारा सोने की कोशिश करने पर भी रोगी सो नहीं पता। कभी-कभी तो दुःस्वप्न की अवस्था में घिग्धी तक बंध जाती है। रोगी का शरीर पीला हो जाता है। इस तरह अनेक प्रकार की अनिंद्रा आकर परेशान करती रहती है। अनिंद्रा के शिकार लोगों को चाहिए कि वे आत्म परिक्षण कर अनिंद्रा की वजह जान कर उसे दूर करने का प्रयास करें। अच्छी नींद लाने के लिए इन उपायों को अपनायें- बिस्तर पर जाने से पहले अच्छी तरह हाथ-पांवों को धो लें तथा बिस्तर पर आने के बाद अपने इष्ट का स्मरण करते हुए सोने का प्रयास करें। सोते समय दूसरे दिन की योजनाओं पर विचार न करें तथा सभी चिंता, भय का त्याग करके सोने का उपक्रम करें। रोज एक निश्चित समय पर ही अपने बिस्तर पर पहुंच जायें। बेड रूम में तीव्र प्रकाश वाला बल्ब न जलायें तथा उस रूम में सुगन्धित अगरबत्ती या इत्र का छिड़काव कर दें। सुविधापूर्ण स्थिति में सोयें। तकिया, उचित बिछावन, चादर आदि को यथा स्थान रखें। सोने वाले बिछावन पर बैठकर पढ़ना-लिखना या खाना खाना वर्जित करें। सभी काम करने के बाद सिर्फ सोने के उद्देश्य से ही बिस्तर पर जायें। अनिंद्रा की औषधियों से अपने आपको बचाने का हर संभव प्रयास करें क्योकि यह एक बुरी आदत बनती चली जाती है।

गोलगप्पा एंव कांजी का नाम सुनते ही हर किसी के मुंह में पानी भर आता है। गोलगप्पा सूजी का और आटे का बनता है। सूजी का गोलगप्पा भुरभुरा एंव करारा होता है। इसे पानीपूरी भी कहते हैं क्योकि गोलगप्पे को कांजी, चना, आलू मसाले से भरकर चाव से खाया जाता है। गोलगप्पे को हाजमेदार जायकेदार एंव चटकारेदार व्यंजन माना जाता है। गोलगप्पे का ठेला, रेहड़ी, साईकिल छाना कहीं पर भी लाद कर बेजा जा सकता है। इसके साथ-साथ चाट पापड़ी, भेल, चटनी भी बेची जाती है। हर शहर में गोलगप्पे को युवतियां महिलाएं बड़े चाव से खाती हैं। अब तो पुरूष भी इसे बड़े चाव से खाते हैं। विवाह शादियों, पार्टियों में गोलगप्पे के स्टाल के विशेष स्थान दिया जाता है। गोलगप्पा बेलकर बनाया जाता है। इनको पूरी की भांति तला जाता है। यह पूरी फूल कर गोल-गप्पा बन जाता है। आजकल एक गोलगप्पा एक रूपए से दो रूपए तक का बिकता है। इसमें आलू, चटनी, चना की फिलिंग की जाती है। कांजी से भर कर, पूरा मुंह खोल कर मुंह में रखकर चबाया जाता है और बड़े चाव से खाया जाता है। अक्सर चाट-गोल गप्पे की रेहड़ियों के गिर्द युवा लड़कियों का जमघट रहता है। कई बार उन्हें निहारने के लिए लड़के भी गोलगप्पे खाने का शौक पाल लेते है तो ठेले वाले की चांदी हो जाती है। गोलगप्पों के साथ-साथ चाट पकौड़ी का भी मेल हो जाता है। आलू, भल्ला, पकौड़ी, पापड़ी, चटनी, दही के साथ मिक्स करके महिलाएं चाट पकौड़ी बड़े चटकारे लगा कर खाती हैं। साथ में आलू की टिक्की चटनी के साथ तो जायका और बढ़ा देती है। खट्टा खाने से हाजमा ठीक हो जाता है। मन ठीक हो जाता है। खट्टा और इमली खाने से रक्त की अम्लता एंव पी. एच. वैल्यू ठीक रहती है। अजीर्ण एंव अपच ठीक हो जाता हैं। भोजन के प्रति अरूचि ठीक हो जाती है। कहा जाता है कि आपके मन को जो अच्छा लगता है वह खाइए। आपकी सेहत ठीक रहेगी। तंदुरूस्ती का खजाना मनभावन खाना खाने में होता है। उन लोगों पर ईश्वर का वरदान होता है जो मनभावन वस्तु खा सकें और खाया हुआ पचा सकें। मुंबई जैसे महानगर में पानी पूरी और भेज पूरी खाने का बहुत प्रचलन है। तीखी मिर्ची एंव खट्टे वाले गोलगप्पे को पूरी कहते है और उसमें डालने वाली कांजी को आम मुंबईया भाषा में पानी कहते हैं। इसके साथ चना, आलू की स्टफिंग करके जो स्वाद आता है। वह तो खाने वाला ही जानता हैं। चटकारे लगाकर मिर्ची वाले गोलगप्पे के बाद मिठाई खाकर ही जुबान को आराम मिलता है। कोई मोटा बच्चा हो तो प्यार से लोग उसे गोलगप्प कहते हैं। सचमुच गोलगप्पा चटनी से भरा हुआ देख कर सबके मुंह में पानी भर आता है। पानी पूरी का नाम सुनते ही लड़कियां चुस्कियां लगानी शुरू कर देती हैं।

बचपन से सुनते रहते हैं कि भगवान स्वयं व्यक्ति के अंदर रहता है, जबकि हम उसे बाहरी संसार में ढूंढते रहते हैं। भगवान को पाने के लिए उसको देखने की लालसा नहीं बल्कि उसे समझने की तड़प पैदा करनी होगी। जब हम भगवान को समझ लेंगे तो उसे अपने पास ही अनुभव करेंगे। उसे पाने के लिए किसी बाहरी सहारे की जरूरत नहीं पड़ेगी। भगवान हर व्यक्ति के अपने व्यक्तित्व में छुपा है। उसे संवारने, सजाने और शुद्ध करने की आवश्यकता हैं। व्यक्तित्व में निखार लाने और उसे गुणवान बनाने की जरूरत है। आपने व्यक्तित्व को महान बना लिया तो समझो भगवान को भी पा लिया। कुछ लोग व्यक्तित्व का अर्थ शक्ल-सूरत और बाहरी साज-सज्जा समझते हैं। ऐसा करने से आप दुनियावी रूप से तो गुणवान लग सकते हैं लेकिन अपनी नजरों में तभी सम्मान पा सकेंगे जब आप में अंदरूनी गुण होंगे। आपकी आत्मा में शुद्धता, मन में सादगी, विचारों में महानता और दिल में ठहराव होगा तो आप अपने आप में ही गद्गद रहेंगे। एक अमिट, अनन्त और गहरे सुख की अनुभूति होगी। यही भगवान की प्राप्ति है। ‘व्यक्तित्व में सुधार’ सुनने में जितना आसान और सरल लगता है, यह काम उतना ही मुश्किल और असम्भव सा है। यह एक निरंतर और बड़ी कठिनाई से करने वाला काम है। एक क्षण के लाखवें हिस्से में भी चूक हो गई तो सब किया कराया चौपट हो जाता है। अपने शरीर के हर हार्डवेयर और साफ्टवेयर को हर समय स्कैन करते रहना पड़ता है। एक भी वायरस आ गया तो आपका जीवन ही पटरी से उतर जाएगा। आपको लगता होगा कि यहां शायद अध्यात्म की बात हो रही है, वेद पुराणों के आदर्शो की दुहाई दी जा रही है। कोई संतों का उपदेश चला रहा है। आपको कोइ्र चोगा पहन कर पूजा-अर्चना या तपस्या करने के लिए कहा जा रहा है। आपको अपना परिवार, समाज व काम धंधे छोड़ कर धन-कमाई त्यागने का उपदेश दिया जा रहा है। आपको साधू बन कर किसी आश्रम में रहने के लिए कहा जाएगा। नहीं, ऐसा करने से भी भगवान को पाना आसान नहीं है। सम्भव भी नहीं है। बस बात सीधी सी है कि गोद में बच्चा है और हम उसे बाहर खोज रहे हैं। इस बच्चे को ढूंढ कर बड़े लाड़-प्यार से पालने और देखभाल करने की जरूरत है, वह बच्चा आप स्वयं हैं और वह आपका ही बच्चा है। उसे अपने पैरों पर खड़ा करना है। अपने आप को किसी का मोहताज नहीं बनाना। उसे दूसरों पर आश्रित नहीं रखना और न ही कमजोर बनने देना है। आपको सबसे अधिक खतरा स्वयं अपने से हैं। आपने स्वयं को नहीं समझा तो संसार के हर कदम पर आप मात खाएंगे। आपके व्यक्तित्व को आप की कमजोरियां ही नष्ट कर देंगी। आप की शुरूआत से पहले ही हार हो जाएगी। आप जीवन में चलते जरूर रहेंगे परंतु भारी कदमों और निराशा के साथ। हर पल आपको आत्मग्लानी, क्षोभ, कुंठा और तनाव रहेगा। इन सभी को दूर करने के लिए आप फिर से बाहरी सहारों की खोज करेंगे जो आपको कई गुना अधिक कष्टों के साथ सब कुछ लौटा देंगे। इस चक्रव्यूह से निकलने का एक ही रास्ता है कि आप अपने व्यक्तित्व को निहारते रहें। अपने प्रयासों से ही अपने आप को शिला की तरह खड़ा करें। हर पल सोचने का अर्थ कुंठा या तनाव रखना नहीं है। सहज भाव से हर काम करना चाहिए। आक्रोश, क्रोध या जल्दबाजी में काम न करें। हर काम को करने से पहले और उसे करने के लिए पूरा समय दें। अपनी गलतियों से सबक लें और उन्हें दोबारा न होनें दें। गलतियां हो भी जाएं तो उन्हें दिल से न लगाएं। अपनी और दूसरों की गलतियों को भी भुलाना सीखें। इससे काम भी सही होगा और आपके व्यक्तित्व में निखार भी आएगा। जीवन जीने के कुछ मूलभूत नियमों पर अनुसंधान करते रहें। उनकी खोज करते रहें। उन्हें अपनाने की कोशिश करते रहें। जीवन में आगे बढ़ने के लिए अवसरों की प्रतीक्षा न करें। स्वयं आगे बढ़ कर अवसरों को पैदा करें। अपनी सोच नकारात्मक न रखें और हर अवसर में से सकारात्मक पहलू ढूंढते रहें। किसी भी कार्य के लिए अपने आप को अयोग्य न समझें और न ही किसी काम को कल के लिए स्थागित करें। कार्य में असफल होने पर भाग्य को मत कोसें न ही काम न होने पर बहानों की तलाश करें। असफल होने पर निराशा को अपने पर हावी न होने दें। कड़वे भूतकाल के लिए अपना वर्तमान का जायका खराब न करें। भविष्य के लिए सदा आशावान रहें और निरंतर प्रयास करते रहें। कई बार ऐसा होता है कि आपको कुछ भी ठीक नजर नहीं आता, लेकिन अपनी सोच को बदलें और ठीक की ही शुभेच्छा करें। हर पल असफलता का मजबूती और खुशी से सामना करने के लिए तैयार रहें। अवसर खो जाने पर पीछे मुड़ कर न देखें। वह आपके लिए अंतिम अवसर नहीं था, यही समझें। निराशा को अपने पास न फटकने दें। किसी से मजाक या दिखावे के लिए भी निराशा की बात न करें। व्यक्तित्व का एक बड़ा पहलू यह भी है कि अपने बारे में यह कभी न सोचें कि आप क्या नहीं कर सकते बल्कि यह सोचें कि क्या कर सकते हैं। काम को भरोसे के साथ स्वयं करने की आदत डालें। किसी काम के लिए वक्त और परिस्थितियों का इंतजार न करें। काम करने का हर समय ठीक मौका होता है। अपनी कार्य कुशलता, क्षमता, कौशल और साधनों को कम न मानें। अपनी पूरी ताकत व बुद्धी के साथ काम पर जुट जाएं। विश्वास से बड़ी शक्ति कोई नहीं होती। विश्वास पहाड़ को भी हिला सकता है। इसलिए उसे हर कीमत पर बनाए रखें। अपने में विश्वास बनाए रखें। अपने काम में पूरी एकाग्रता और बलिदान की भावना से सर्वस्व झोंक दें। सफलता आपके कदम चूमेगी। सफलता को किसी पैमाने से मत तोलो। हर छोटी से छोटी सफलता को पा कर भी प्रसन्न जरूर हों पर असन्तुष्ट व निराश न रहें। असफलता के अंश पर ध्यान न दें। सफलता को धूमधाम से स्वीकार करें। जो भी मिलता है उससे अपनी निराशा मिटाएं और आगे की ओर देखें। यही भगवान है, यही भगवान का असली रूप है। आप सच्चे मायनों में सुखी हैं तो भगवान को पा लिया समझो। अपने व्यक्तित्व के सहारे आप भगवान को पा सकते हैं। ऐसी छोटी-छोटी लेकिन महत्वपूर्ण बातें आपको अपना आप संवारने में मददगार साबित हो सकती हैं। अपने दिमाग को पैराशूट की तरह खोल कर रखेंगे तो आप बड़ी से बड़ी छलांग आसानी से लगा सकते हैं। अपने दिमाग को बंद रख कर अंधेरे और घुटन के अलावा कुछ हासिल नहीं होगा।