dior-1078712__180

ऐसे ही चेहरे पर कुछ भी पोत लेना मेकअप नहीं है। मेकअप वही अच्छा लगता है जो सही तरीके से किया गया होता है। उसमें कोई भी आसानी से खूबसूरत लग सकता है। बेढंगा मेकअप खूबसूरत चेहरे को भी बेजान बना देता है।
फाउंडेशन और पाउडर
मेकअप की शुरूआत करने से पहले चेहरे को अच्छी तरह साफ कर लेना चाहिए। फाउंडेशन लगाने के लिए स्पंज का प्रयोग करें। इसे हाथ से न लगाकर स्वच्छ स्पंज मे लगाएं और फिर उंगलियों के ऊपरी भाग की सहायता से चेहरे पर गोलाई में लगाएं।
फाउंडेशन अपनी हेयरलाइन कानों जाॅलाइन गर्दन, पलकों आदि पर लगाना न भूलें। चेहरे पर फाउंडेशन थोड़ा और एकसार लगाएं नहीं तो चेहरा पुता हुआ लगेगा। फाउंडेशन को अच्छी तरह फैलायें। उसमे कोई पैच इत्यादि न पड़ने दे। फाउंडेशन का वहीं शेड लें जो आपकी त्वचा पर चमकता न हो अन्यथा भद्दा लगेगा।
फाउंडेशन के बाद चेहरे पर काॅस्मेटिक पाउडर लगाये। यह फाउंडेशन को सेट करने में मदद करता है। चेहरे पर यदि थोड़ा बहुत तेल होता है तो उसे सोख लेता है। चेहरे को एकसार करने में भी मदद करता है। यदि चेहरे पर ज्यादा तेल नजर आये तो पाउडर नहीं लगाना चाहिए। इससे ज्यादा पैच नजर आयेंगे। चेहरे के तेल को हटाने के लिए आयल एब्जार्बिंग पेपर इस्तेमाल करें। चेहरा का रंग अगर सांवला हो तो थोड़ा खुला फेस पाउडर भी इस्तेमाल करने से भी चेहरे के दाग-धब्बे, मुहासे, दरारें आदि छिप जाती है। सांवले रंग पर गुलाबी शेड वाला फाउंडेशन या पाउडर प्रयोग न करे।
आईब्रो और लैशेज
आईब्रो का रंग बालों के रंग से मेल खाता हआ होना चाहिए। पहले आइलाइनर लगाये, फिर हल्के रंग का आई शैडो लगाएं। फिर पलकों पर मस्कारा लगाये। फिर पलकों पर मस्कारा लगाये। आजकल बाजार में कई प्रकार के आई शैडो भी उपलब्ध है जैसे जैल पाउडर क्रीम इत्यादि।
लिपस्टिक
लिपस्टिक लगाने से पहले होठों पर चारों ओर लिपलाइनर से बार्डर बनाये। फिर इसके बीच में लिपस्टिक लगायें। लिपलाइनर का रंग लिपस्टिक के रंग से एक शेड हल्का होना चाहिए। लिपस्टिक ज्यादा समय तक टिकी रहे इसके लिए होठों को हल्का सा टिशू पेपर से दबाएं और खुले पाउडर की हल्की सी परत उस पर लगाएं। होठों को हल्का सा प्रेस कर दें। जिससे पाउडर सेट हो जाएगा। होंठ अगर पतले हो तो उन्हें मोटा दिखाने के लिए आउटलाइन थोड़ी मोटी और डार्क लिपस्टिक से करें। लिपस्टिम लगाने के बाद लिप ग्लाॅस लगाने से बेहद ही खूबसूरत लुक आता है होंठों का।
मेकअप रिमूवर
अच्छी कंपनी का ही मेकअप रिमूवर खरीदें। हमेशा मेकअप उतारकर ही सोएं। मेकअप उतारने मे आलस न दिखाएं। आंखों के आस पास हल्के हाथों से रिमूवर प्रयोग करें। मेकअप हटाकर सोने से त्वचा के रोप छिद्र बंद नहीं होते और उन्हें आॅक्सीजन मिलती रहती है।

कांटैक्ट लैंस यूज करना आज फैशन बन गया है। इन्हें इस्तेमाल करना आज धीरे धीरे इस्तेमाल करना आज धीरे धीरे आप बात होती जा रही है। कांटैक्ट लैंस का इस्तेमाल दृष्टि दोष में अपने सौंदर्य को निखारने के लिए आंखों का कलर बदलने के लिए कोर्नियल अल्सर के मरीजों में इलाज के लिए और काला मोतिया के मरीजों में दवा के उचित इस्तेमाल के लिए किया जाता है। काटैक्ट लैंस आमतौर पर तीन प्रकार के होते हैं-
हार्ड कांटैक्ट लैंसः ये लैंस वजन में हल्के व ज्यादा समय तक चलने वाले होते है। हार्ड कांटैक्ट लैंस पोलीमिथाइल मिथा एकरेलेट मेटीरियल के बने होते है। ये वजन में हल्के बेशक होते हैं लेकिन ये आॅक्सीजन को आर पार नहीं होने देते, जिसकी वजह से आॅक्सीजन काॅर्निया तक नहीं पहुंच पाती है। इन्हें हम रोज इस्तेमाल कर सकते हैं लेकिन रात के समय ध्यान से उतार लेने चाहिए। नहीं तो कार्निया को आॅक्सीजन की कमी हो जाएगी और धुंधला दिखाई देने लगेगा। हार्ड कांटैक्ट लैंस को सावधानी से लगाना चाहिए। इनके हार्ड होने की वजह से कार्निया मे खरोंच लगने का एवं कोर्निया अल्सर होने का खतरा बढ़ जाता है। आजकल कांटैक्ट लैंस का फैशन बढ़ता ही जा रहा है।
सेमी साॅफ्ट कांटैक्ट लैंस
ये लैंस सिलीकाॅन पालीमर्स के बने होते हैं। इनमें हार्ड और साॅफ्ट दोनों प्रकार के गुण पाये जाते है। आज के समय में सेमी साॅफ्ट कांटैक्ट लैंस सबसे अच्छे माने जाते है। ये लैंस आक्सीजन को कार्निया तक पहुंचाने में मदद करते है। साॅफ्ट लैंस की तुलना में ये अपना आकार बनाए रखने के साथ साथ इन लैंसों से एकदम साफ भी दिखाई देता है। जिन लोगों को सिलिंड्रीकल नंबर होता है। उन लोगों के लिए ये लैंस सबसे अच्छे होते है। इसकी देखभाल करना भी आसान होता है। और ये साॅफ्ट कांटैक्ट लैंस की तुलना में अधिक टिकाऊ भी होते है।
साॅफ्ट कांटैक्ट लैंस
ये लैंस हाइड्रोक्सी इथाईलइथा एक रीलेट नामक मेटिरियल के बने होते है। इसमें पानी भी शामिल होता है। जो आॅक्सीजन को लैंस से कार्निया तक पहुंचाने में मददगार होता है। साॅफ्ट होने के कारण नये व्यक्ति के लिए इन्हें इस्तेमाल करना आसान होता है। जहां साॅफ्ट लैंस के कुछ फायदे हैं वहां नुकसान भी है। जैसे इन लैंसों में थोड़े समय में ही प्रोटीन जमा होने लगता है, जिससे ये धुंधले पड़ सकते है। एवं इन्हें बदलना पड़ता है।
साॅफ्ट होने की वजह से ये टूटते भी जल्दी है और संक्रमित भी जल्दी हो जाते है। लेकिन ये लैंस सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरणों से आंखों का बचाव करने में सक्षम होते है। कुछ साॅफ्ट लैंस डिसपोजेबल भी होते है। जिंहें कुछ समय के बाद बदल दिया जाता है। जिंहें कुछ समय के बाद बदल दिया जाता है। जिससे संक्रमित होने का खतरा भी कम रहता है। जिनकी आंखों में एलर्जी रहती है। साॅफ्ट लैंस को साल में एक बार अवश्य बदल लेना चाहिए। ऐसा करने से आंख के संक्रमण का खतरा कम रहता है, साथ ही साॅफ्ट लैंस उन लोगों के लिए बहुत कारगर होते हैं जिन्हें देर तक काम करना होता है।
साॅफ्ट लैंस कई प्रकार के होते है। महीने में बदलने वाले कांटैक्ट लैंस इन लैंसों को एक महीने इस्तेमाल करने के बाद बदल देना आवश्यक है। जिन लोगों की आंखों में संक्रमण जल्दी जल्दी होता है उनके लिए ये लैंस बहुत उपयोगी होते हैं और रोज बदलने वाले लैंस की तुलना में ये सस्ते भी पड़ते हैं एवं ज्यादा लोकप्रिय भी है।
डेली डिस्पोजल लैंस
इन लैंसों को हर दिन इस्तेमाल करने के बाद फेक दिया जाता है। जिन लोगों को आंख में एलर्जी और आंख में संक्रमण की शिकायत होती है उन लोगों के लिए इस तरह के कांटैक्ट लैंस बहुत उपयोगी होते है।
रंगीन साॅफ्ट कांटैक्ट लैंस
रंगीन कांटैक्ट लैंस लगाकर आप अपनी सुंदरता को बढ़ा सकते है। इन लैंसों का ज्यादातर इस्तेमाल माॅडल करते है। साथ ही इन लैंसों का इस्तेमाल वो लोग भी करते हैं जिनकी आंख की पुतली में फूला पड़ गया होता है।
बायफोकल एवं ग्रेडिड कांटैक्ट लैंस
बायफोकल कांटैक्ट लैंस दूर एवं पास की दृष्टि दोष दोनों में इस्तेमाल किये जाते है। इनका प्रयोग पास की नेत्र ज्योति कमजोर होने पर किया जाता है। बायफोकल लैंस साॅफ्ट एवं सेमी साॅफ्ट दोनों तरह के होते है।
कांटैक्ट लैंस से होने वाले नुकसान
आंख में संक्रमण
कांटैक्ट लैंस लगाने से पहले हाथों को अच्छी तरह धों लें। वरना आंख में संक्रमण होने का डर रहता है। कांटैक्ट लैंस को कभी भी पानी से धोना नहीं चाहिए वरना इसमें मौजूद बैक्टीरिया आंख में संक्रमण कर सकते है। कांटैक्ट लैंस को लेंस केयर सोल्यूशन को दुबारा इस्तेमाल न करें।
आंख में एलर्जी जिसमें आंख लाल रहने लगती है। आंख में खुजली होने लगती है। ऐसा होने पर कुछ समय के लिए कांटैक्ट लैंस न लगाएं और नेत्र विशेषज्ञ की सलाह लें।
आंख की पुतली पर खरोच
ध्यान रखें कि कांटैक्ट लैंस को पहनते और उतारते समय आंख की पुतली पर खरोच न लगे क्योंकि ऐसा होने पर कोर्नियल अल्सर एवं आंख की पुतली पर सफेदी पड़ने का डर रहता है। जिसकी वजह से आंख की रोशनी भी जा सकती है।
कांटैक्ट लैंस का इस्तेमाल न करें जब-

  •  व्यक्ति मंदबुद्धि हो
  •  आंख में संक्रमण होने पर
  •  आंख की रूसी होने पर
  •  आंख की एलर्जी होने पर
  •  आंख के सूखे होने पर
  •  आंख की पुतली पर सूजन होने पर।

लोक परिधान में घाघरा और चोली अपना अलग ही महत्त्व रखती है। प्राचीन काल से ही लोक साहित्य में इस परिधान का प्रचलन उत्तर भारत में रहा है। आज आधुनिक फैशन की दुनिया में इस परिधान का अपना अलग ही आकर्षण है। आज फैशन में सूती, रेशमी, बंदनी, क्रेप, आदि के कपड़ों से तैयार घाघरा चोलियों का प्रचलन है। छोटे-छोटे कांच, मोतियों, टेराकोटा, कढ़ाई आदि के काम घाघरा में किए जाते है। करीब 500 रूपयों से लेकर एक लाख तक के लहंगा चोली के फैशन बाजार में उपलब्ध है। शादी-ब्याह तीज त्यौहार, पार्टी आदि में इस परिधान का प्रचलन है। नारी सौंदर्य को यह परिधान अलग ही गरिमा प्रदान करता है। प्रस्तुत है लहंगा चोली के रख-रखाव विषयक कुछ बातें जिन्हें ध्यान रखते हुए आप इस आकर्षक परिधान की चमक सालों साल बरकरार रख सकती है।

सूती घाघरा चोलीः सूती घाघरा, पहनने से पूर्व पूरे घाघरे के नीचे फाॅल लगा लें। फाॅल लगाते समय ध्यान रखें। कि फाॅल घाघरा के दिए हुए बाॅर्डर से ऊपर न जाए। अगर आप ड्राईक्लीन में न दें कर स्वयं घर में ही धोना चाहती हैं तो कुछ बातों का ध्यान रखें। नमक मिले पानी में धोएं ताकि अतिरिक्त रंग निकल जाए और भविष्य में फिर रंग निकलने की संभावना न हो। आजकल रिवाईव कंपनी की ओर से कलर फिक्सर भी आता है जो कपड़े की रंगत को यथासंभव बनाए रखता है। सूती घाघरा चोली की ओढ़ती को कभी-कभी हल्का कलफ दे सकती है। कड़कती धूप मे न सुखाएं। छांव में रंगीन कपड़े सुखाने से कपड़ों की रंगत बनी रहती है। कलफ लगी ओढ़नी को ज्यादा दिन तक बक्से में रखे न रहने दें। इसमें झिंगुर लगने की संभावना रहती है। कजली व रक्षा बंधन जैसे पर्व पर सूती घाघरा चोली किशोरियों पर चार चांद लगा देते है।

रेशमी घाघरा चोलीः शादी ब्याह में रेशमी घाघरा चोली का प्रचलन अधिक रहा है। परिधान के पहनावे में नारी की सुंदरता जितनी दुगुनी होती है उतनी ही सावधानी से नारी को इसका रख रखाव करना होता है। रेशमी लहंगा पहनते समय कभी इत्र का प्रयोग न करें। इसमें दाग पड़ने की संभावना रहती है। पहनने से पूर्व आप सदैव इस पर हल्की इस्त्री का ही प्रयोग करें। आपको लहंगे में यदि मोतियों का काम है तो आप हल्के ब्रश से ट्रांसपेरेंट नेल एनोल का प्रयोग उन मोतियों की चमक यथासंभव बनी रहे। इस रेशम के परिधान को आप ड्राइक्लिन में दें तो अच्छा रहेगा। अगर आप स्वयं ही घर में धोने के अच्छुक हैं तो इजी नामक ऊनी व रेशमी वस्त्र धोने के द्रव्य पदार्थ को प्रयोग में लाएं। अंत में कुछ बूंदें ग्लिसरीन की पानी में डालकर एक बार धो कर उठा लें। सुखाते समय अधिक जोर से इस वस्त्र को निचोड़ें। छांव में ही सुखाएं तथा हल्की प्रेस करें। बक्से में रखते समय आप बीच बीच में तह बदल कर रखें ताकि एक ही स्थान पर पड़ने से निशान बनने का खतरा न हो।

जरी वाली घाघरा चोलीः जरी वाले घाघरा चोली को दीपावली जैसे अवसर में पहनने से जगमगाती रोशनी में इस परिधान से नारी की आभा उभर कर सामने आती है। जरी वाले घाघरा चोली पहनते समय भी इस परिधान पर इत्र न लगाएं अन्यथा जरी काली पड़ जाती है। सदैव घाघरों को उल्टा कर इस्त्री करें। धुलाई करनी हो तो ड्राइक्लीन में दे। बक्से मे रखते समय कभी पोलीथीन में डाल कर न रखें। किसी पुराने पतले सूती कपड़े में लिपटा कर रखें तो अच्छा रहेगा। कपूर की गोलियां बक्से में न रख कर नीम व लौंग की पोटली बना कर एक कोने में रखें तो बेहतर होगा। कपूर की गोली से जरी काली पड़ने की संभावना रहती है। कभी कभी बीच में हल्की धूप दिखाना अच्छा रहता है।

बंदनी व क्रेप के लहंगेः इस प्रकार के लहंगे चोली का प्रचलन काफी है। आजकल रात की पार्टियों में उच्च घराने से ले कर मध्यवर्गीय परिवारों में इस परिधान का फैशन है। थोड़ी सी सावधानी से आप वर्षों तक इसकी चमक बनाए रख सकती है। केवल मोड़ मोड़ कर रखने से ही इसकी कला है। पहनने से पूर्व हल्की प्रेस करने की आवश्यकता होती है। इसे ड्राइक्लीन में देना ही बेहतर है। इत्र लगाते समय थोड़ी सावधानी बरतें कपड़े में न लगा कर गर्दन, कलाई, आदि स्थानों पर ही लगाएं। बक्से मे रखने से पूर्व कागज में लपेट कर रखें।

धूम्रपान की लत किसी के लिए भी फायदेमंद नहीं होती। महिलाएं इसकी कीमत कुछ ज्यादा हो गई है। नार्वे के शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में इस बात का खुलासा किया कि धूम्रपान करन वाली महिलाओं की हड्डियों के खोखला होने और हृदय रोग के अलावा समय से पहले रजोनिवृति की आशंका भी बढ़ जाती है। ओस्लो विश्वविद्यालय की प्रोफेसर थ्यिा एफ मिकेल्सन के नेतृत्व में 59 और 60 साल की 2123 महिलाओं पर यह अध्ययन किया गया। रिपोर्ट के अनुसान धूम्रपान करने वाली 59 प्रतिशत महिलाएं 45 साल की उम्र के पहले ही रजोनिवृति की शिकार पाई गई। समय से पहले रजोनिवृति की शिकार दस प्रतिशत महिलाओं में 25 प्रतिशत महिलाएं अध्ययन के समय भी धूम्रपान करती थी। अध्ययन के अनुसार महिलाओं के लिए पिता या पति द्वारा धूूम्रपान करना सबसे घातक साबित होता है। चाहे-अनचाहे वे स्मोकिंग की शिकार हो जाती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू. एच. ओ.) के अनुसार भारत तंबाकू महामारी के कगार पर है। संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में तंबाकू से होने वाली बीमारियों के कारण हर साल 40 लाख लोग मरते है। मरने वालों की यह संख्या 2-3 दशकों में 70 लाख तक बढ़ने का अनुमान है। धूम्रपान धीरे-धीरे की गई आत्महत्या है। यह मानव शरीर को 25 प्रकार के रोगों का शिकार बना देता है। धूम्रपान से स्वांस नली पर सीधा प्रभाव पड़ता है। जिस प्रकार धूएं से रसोई घर, चिमनियां, स्कूटर, मोटर इत्यादि के साईलैंसर और दूसरी चीजें काली हो जाती है इसी प्रकार धूम्रपान से निकलने वाला धुआं फेफड़ों के साथ कैसी खिलवाड़ करता है, यह अनुमान किया जा सकता है। जैसे बीड़ी सिगरेट का धुआं अंदर जाता है नलियों में जकड़न होती है। वायु प्रवेश के प्रति अवरोध बढ़ जाता है। सांस की नलियों की नलियों की सतह पर छोटे छोटे बालों की तरह के अंकुर होते है इन्हें सिलिया कहते है। सामान्य हालत में ये फेफड़ों में से वहां के स्त्राव के साथ वायु के साथ पहुंचे हुए विजातीय द्रव्य धूल धूएं आदि के कण पाते। अब विजातीय द्रव्य और श्लेष्मा आसानी से बाहर नहीं निकल पाते। इस से सांस की नलियों की हालत खराब हो जाती है। एक सिगरेट का धुआं लगभग 4000 विषैले पदार्थ हवा में फैकता है। इसमें मुख्य है- निकोटिन, कार्बन मोनोक्साइड, कैंसर पैदा करने वाले पदार्थ-काॅरसिनोजन्स, टार आदि। निकाटिन से फेंफड़ों में जख्म हो जाते है। अंत में उनमें कैंसर पैदा हो जाता है। जब फेफड़ो में टार की मात्रा अधिक बढ़ने लगती है, तब कैंसर की शुरूआत होने लगती है।

1. रंगीन पाॅलिथीन में फल व सब्जियां कभी न रखें।
2. अगर आप पूरे हफ्ते की सब्जियां व फल स्टोर करते है तो उन्हें धो कर फ्रिज में न रखें गीली सब्जी रखने से सब्जी जल्दी खराब हो जाती है।
3. टमाटर का स्वाद बनाये रखने के लिए उसको रूम टेंपरेचर पर रखें।
4. प्याज को सूखे व ठंडे स्थान पर रखें, प्याज खराब नहीं होगी।
5. पालक को बिना धोए पहले अखबार में लपेटे फिर पाॅलिथीन में लपेटकर फ्रिज में रखें।
6. नाॅनस्टिक बर्तन में खाना पकाते समय आंच धीमी ही रखें, तेज आंच पर इसकी पाॅलिश खराब हो जाती है।
7. इनकी सफाई करते समय कभी भी रेत या स्टील के ब्रुश का प्रयोग न करें। इससे इनका सारा मसाला उतर जाएगा।
8. नाॅनस्टिक पैन में हमेशा लकड़ी का चम्मच ही प्रयोग में लाये।
9. यदि अंडा उबलते समय फूट जाये तो घबराइये नहीं उस बर्तन में थोड़ा नमक डाल दें।
10. जिन सब्जियों में लेस निकलता है उसमें थोड़ा सा नींबू का रस डालें।
11. दहीबड़े को मुलायम बनाने के लिए दाल फेरते समय उसमें 1-2 आलू मिला लें।
12. मक्के के आटे को यदि मांड से गुंधा जाये तो रोटी बनाते समय टूटेगी नहीं।

भूख न लगना बच्चों में एक आम समस्या है। कभी-कभी यह समस्या वास्तविक होती है, तो कभी यह अवास्तविक। माता-पिता को यह लगता कि उनका बच्चा कम खात है अथवा खाने से जी चुराता है, परंतु वास्तविकता ऐसी नहीं होती। इसके विपरीत कभी-कभी बच्चों को सचमुच भूख न लगने की बीमारी होती है। वहीं कुछ बच्चे ऐसे होते हैं जो कम मात्रा में खाते है या फिर वे बार-बार खाते हैं। यह प्रवृत्ति बच्चों की सेहत के लिए नुकसानदेह है।
शारीरिक कारणः
पेट दर्द, आंतों व यकृत में सूजन के कारण भी बच्चों को भूख नहीं लगती। कभी कभी पेट में कृमि पड़ने के कारण भी भूख नहीं लगती उल्टी व टी बी रोग की शिकायत होने पर भी बच्चों में भोजन से मोहभंग हो जाता है। कई मानसिक कारणों से भी बच्चों का भोजन से मोह भंग होने लगता है। जैसे भावनात्मक ठेस लगने और घबराहट आदि से बच्चों को खुलकर भूख नहीं लगती। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार यदि बच्चे की किसी इच्छा का दमन कर दिया जाये तो उसका भोजन से मोहभंग हो जाता है। इसके अलावा कुछ बीमारियों में खाई जाने वाली दवाओं के विपरीत प्रभाव के कारण भी बच्चों में भोजन के प्रति अरूचि पैदा हो जाती है।
उपचारः
मां का दूध बच्चों के लिए आवश्यक है। अतः प्रत्येक शिशु को 4 से 6 महीने केवल का का ही दूध देना चाहिए। बच्चों की मनपसंद चीजें खाने में देनी चाहिए। खाने की चीजें बदल-बदल कर देने से बच्चों में भोजन के प्रति रूचि बवकसित हो जाती है। बेहतर रहेगा की मां-बाप बच्चों के साथ बैठकर खाने की आदतें डाले। इससे उन्हें बच्चे की भोजन संबंधी रूचियों की जानकारियां मिलती रहेंगी।

थोड़ी सी मलाई में एक चुटकी बेसन व हल्दी मिलाकर इस लेप को चेहरे पर लगाएं। सूखने पर उतार दें और फिर ठंडे पानी से मुंह धो लें। ऐसा करने से चेहरा दमक उठेगा।
एक चम्मच जौ के आटे में जरा सी हल्दी व 5-6 बूंद नारियल का तेल मिला लें। आवश्यकतानुसार जरा सा पानी मिलाकर लेप तैयार कर लें। इसे 10-15 मिनट तक चेहरे पर लगाएं फिर बाद में चेहरा धों ले। इस लेप से त्वचा की शुष्कता दूर हो जाएगी। एक बड़े चम्मच दही में 2 बूंद नारियल का तेल और चुटकी भर हल्दी मिला लें। इस लेप को चेहरे पर लगा लें। जब लेप सूख जाए तब उसे रगड़कर छुड़ा दें। और चेहरे को धो लें। ऐसा करने से त्वचा स्निग्ध होगी।
एक चुटकी हल्दी, थोड़ा दूध, नींबू की चार बूंद रस मिलाकर पेस्ट बना लें। इसे चेहरे पर आधे घंटे तक लगाकर चेहरा पानी से धों दें। इससे काले धब्बे धीरे-धीरे ठीक हो जाएंगे।
मैदे को दूध में मिलाकर पेस्ट तैयार कर लें। इसे चेहरे पर मलें। सूख जाने पर इसे उतार दें और चेहरा धों लें। इस से त्वचा मुलायम बनी रहेगी।
आॅयली स्किन वालों के लिए सर्दियों का मौसम सबसे बेहतर होता है, लेकिन देखभाल की जरूरत इन्हें इस मौसम में भी होती है। आॅयली स्किन वालों को हमेशा ग्लिसरिन और स्ट्राॅबरी युक्त फेस वाॅश का ही इस्तेमाल करना चाहिए मायश्चराइजर का इस्तेमाल करते समय इतना ध्यान जरूर रखें कि आपका मायश्चराइजर आॅयल फ्री हो। ड्राई स्किन वालों को सबसे देखभाल और केयर की जरूरत है। इनको अतिरिक्त माॅयश्चराइजर का प्रयोग करना चाहिए। जब भ्ज्ञी धूप में बाहर निकलें तो सूरज की किरणों से त्वचा को बचाए रखने के लिए सनस्क्रीन जरूर लगाएं। रात को सोने से पहले जैतून और बादाम का तेल लगाएं। इससे त्वचा का रूखापन दूर हो जाएगा। नाॅर्मल स्किन वाली महिलाओं को सर्दियों में त्वचा की देखरेख के लिए काफी सावधानी बरतनी चाहिए। इन्हें सर्दियों में हमेशा क्रीम लगानी चाहिए। इससे आपकी त्वचा को जरूरी पोषण मिल जाएगा। रात में सोने से पहले दूध में थोड़ा नमक मिलाकर रूई के फाहे से चेहरे पर लेप करने से रंग में निखार आता है। और त्वचा मुलयम भी बनी रहती है। रात में जो भी लेप किया है उसे सुबह उठकर धो देना चाहिए।
सर्दियों में धूप से बचाव के लिए एसपीएफ 15 युक्त मायश्चराइजर का प्रयोग करें। यदि बाहर जा रहे हो तो हाई एसपीएफ सनस्क्रीन लगाएं क्योंकि सनबर्न सर्दियों में भी हो सकता है।

पैरों पर बाल न बढ़ें इसके लिए आपको लगातार सावधान रहना चाहिए। किसी पार्लर में वैक्सिंग करा लें या नहाते समय शैविंग करके पैरों पर से बाल निकालें। लेजर किरणों से भी बालों को निकाला जा सकता है। पैरों को कुछ रंग दें। इसके लिए हल्के रंग की स्टाॅकिंग या पैंटी होस पाइप पहनें। पैरों को व्यायाम देने से वह सुंदर दिखते हैं। दौड़ना, तैराकी, साइकिल चलाना इससे पैरों से अतिरिक्त चर्बी हटकर वह सुडौल दिखते हैं। पैरों की मालिश करें। मालिश पैरों से जांघों तक हल्के हाथों से करें। मालिश करने से पैरों में रक्त का संचार बढ़ता है और अतिरिक्त चर्बी भी कम होती है। आम तौर पर पैरों को जमीन से जुड़ा रहना पड़ता है। हर दिन 15 मिनट के लिए पीठ के बल लेटकर पैरों को हवा में उठाये रखें। पैरों को धो कर मास्चराइजर लगा कर पैरों को थोड़ी नमी दें। पैरों को एक दूसरे से अलग रखना चाहिए। पैरों के जुड़े रहने से पैरों की नसों में सूजन आ सकती है।

जब आप लोगों के सामने अपनी खूबसूरत मुस्कान बिखेरती हैं और खुलकर हंसती हैं तो इससे पता चलता है कि आपने अपने दाँतों को कितना चमकाया है। नेशनल डेंटल एसोसिएशन के अनुसार दाँतों की साफ-सफाई और स्वास्थ्य के लिए रोजाना दो बार दाँत ब्रश करने चाहिए।

दाँतों को ब्रश करने का तरीका
1. किसी जाने-माने बढि़या टुथपेस्ट का इस्तेमाल करें और ऐसा आप टीवी विज्ञापन देखकर नहीं करें बल्कि अगर आपके दांतों की कोई छोटी मोटी समस्या है तो उसके अनुसार अपने डाक्टर से इस बारे में राय कर लें और
2. दांतों के अंदरूनी तथा बाहरी हिस्सों में 45 डिग्री के कोण से ब्रश करें। आप मसूड़ों से शुरू करके आधे दांत की चैड़ाई के स्ट्रोक्स लें।
3. ब्रश को हर 3 से 5 महीने में एक बार जरूर बदलें।
4. इस बात का ध्यान रखना भी जरूरी है कि ब्रश का चुनाव करते समय यह सावधानी रखें कि आपके दाँतों और मसूड़ों की नाजुक परत को वो कोई नुक्सान नहीं पहुंचाए और उसके रेशे नाजुक होने चाहिए।
5. आप मसूड़ों की मालिश कर सकते हैं पिपरमेंट के तेल से।
6. दाँतों को भी व्यायाम चाहिए होता है ऐसा करने के लिए आप ब्रश करने के बाद अपने ऊपर के दाँत और नीचे के दाँतों को आपस में प्रेशर के साथ दबाएँ और फिर खोल दें।
7. मीठा कम खाएं क्योंकि ऐसी चीजें जो चीने से भरपूर होते हैं वह आपके मुँह में जाकर सड़न पैदा करने का काम करती है और ये हमारी दाँतों के इनेमल वाली पर्त को गला देते हैं इसलिए जरूरत से अधिक मीठे के शौकीन नहीं बनें।
8. अगर आप दाँतों की सही से देखभाल नहीं करते तो आपको मुंह की किसी भी तरह की बीमारी का सामना करना पड़ सकता है।
9. आपके दाँत आपके जीवन भर साथ रहें इसके लिए आवश्यक है कि आप नशे से जुड़ी आदतों से दूर रहें और नियमित दाँतों की देखभाल करें क्योंकि तम्बाकू आदि से आपको मुँह के कैंसर की समस्या से जूझना भी पड़ सकता है।

प्राकृतिक रूप से गुलाबी होंठ एक महिला की खूबसूरती की पहचान होती है। कई लोग अपने होंठों को चमकदार और सुन्दर बनाना चाहते हैं। होठों के काले पड़ने के कई कारण हो सकते हैं जैसे सूरज की अत्याधिक रौशनी पड़ना, औषधियों का विपरीत असर पड़ना, खराब क्वालिटी के सौंदर्य प्रसाधन, धूम्रपान, काफी मात्रा में कैफीन का सेवन तथा शरीर में हार्मोनों का असंतुलन आदि।

डार्क लिप से कैसे पाएं छुटकारा
काॅफी और चाय होंठों को डार्क बनाने में कसर नहीं छोड़ते। दिन भर में एक या दो बार काॅफी या चाय पीने से कोई फर्क नहीं पड़ता पर यदि मात्रा थोड़ी ज्यादा हो जाए तो निश्चित फर्क पड़ेगा। इसके अलावा समोकिंग, एलर्जी, होंठ को बार बार चाटना भी आपके होठों को डार्क बना सकता है।

उपचार
1 सुबह ब्रश करने के बाद अपने उसी ब्रश से होंठ पर से मृत कोशिका को हटाने का प्रयास करे इससे नई त्वचा आ जाएगी।
2 रात को सोने से पहले अपने होंठों पर वैसलीन या नींबू का रस लगा कर सोएं। इसके लिए एसपीएफ 15 वेल्यू वाला लिप बाल्म लगाना चाहिए साथ ही दिन भर में 8 गिलास पानी जरूर पीना चाहिए।
3 पौष्टिक आहार न लेने से भी डार्क लिप हो जाते हैं।
4 एक्सपायर लिपिस्टक न लगाएं।
5 होठों का कालापन दूर करने के लिए बादाम का तेल बहुत उपयोगी होता है।
6 खीरे का प्रयोग आप अपनी कुहनी, घुटने और हाथों के बगल के रंग में भी निखार ला सकती हैं साथ ही खीरा होंठों पर लगाने से होंठों के कालेपन से छुटकारा मिल जाएगा।
7 होंठों के कालेपन को दूर करने के लिए एक सूती कपड़े में दूध की कुछ बूंदें लें और इसे अपने होंठों पर लगाएं। इससे होंठों का कालापन दूर होता है।
8 होंठों को स्वस्थ रखने के लिए मक्खन का इस्तेमाल करें।
9 नींबू से होंठों का रंग साफ किया जा सकता है।
10 गुलाब जल के साथ शहद मिलाकर होठों पर लगाने से होंठों का डार्कनेस कम किया जा सकता है।