ताली बजाइये और रोगों को दूर भगाइये

ज्यों-ज्यों भौतिक सुख-सुविधाओं का बाहुल्य होता जा रहा है, त्यों-त्यों हमारी कंचन काया नाना प्रकार के रोगों से ग्रस्त होती जा रही है। नये-नये अन्वेषण हो रहे हैं और नई-नई बीमारियों को चिकित्सक हमारे सामने प्रकट करते जा रहे हैं तथा उनकी चिकित्सा के लिए औषधियां भी प्रस्तुत करते जा रहे हैं। चिकित्सा के क्षेत्र में इतनी तथा कथित प्रगति होते हुए भी हम प्रतिदिन ऐसे रोगों से ग्रस्त होते जा रहे हैं जो असाध्य हो गये हैं। शरीर को अधिक आराम देना, कोई भी शारीरिक श्रम न करना, बिना विचार किए अधिक मात्रा में खाद्य-अखाद्य वस्तुओं का सेवन करना, दिन भर खाते रहना, उचित आराम न करना, खाने के लिए जीना, शराब, अफीम, तंबाकू, गांजा आदि हारिकारक पदार्थो का सेवन करना इत्यादि का मनुष्य ने जो नियमित क्रम बना लिया है, वही रोगों के उपचारित न होने, बढ़ने, एक रोग समाप्त होने से पूर्व कई रोगों के उभर आने का मूल कारण है। इसके अतिरिक्त कुछ दवाइयों की प्रतिक्रिया भी कुछ अंशों में इसके लिए जिम्मेवार है। हम अपनी धात्री-प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं तथा हमारा अप्राकृतिक रहन-सहन हमारे शरीर को अंदर से जर्जर करता जा रहा है, अतः हमें सावधान एवं जागरूक रहने की विशेष आवश्यकता है। यदि मनुष्य स्वयं को पंच तत्वों से उपचारित करने की नैसर्गिक कला सीख ले तो शायद पंचतत्वों से निर्मित इस शरीर को किसी औषधि की आवश्यकता न पड़े। इसी के साथ ही कुछ शारीरिक-परिचालन को अपनाकर भी हम रोगों को दूर रख सकते हैं। इन्हीं क्रियाओं में एक क्रिया ‘ताली-बजाना’ भी है। प्राचीन काल से मंदिरों में आरती, भजन-कीर्तन, पूजा आदि में हम ताली बजाते आए हैं। ताली बजाने से सिर्फ भक्ति भावना ही दिखाई नहीं पड़ती है अपितु शरीर को स्वस्थ रखने का उत्कृष्ट साधन है। ताली बजाने से उत्कृष्ट प्रकार का व्यायाम हो जाता है जिससे शरीर की निष्क्रियता समाप्त होकर उसमें क्रियाशीलता की वृद्धि होती है। शरीर के किसी भाग में रक्त-संचार में रूकावट या बाधा पड़ रही हो तो वह बाधा तुरंत समाप्त हो जाती है। ताली बजाने से शरीर के अंग सम्यक् रूप से कार्य करने लगते हैं, रक्तवाहिकाएं ठीक रीति से तत्परता के साथ शुद्धिकरण हेतु रक्त को हृदय की ओर ले जाने लगती हैं और उसको शुद्ध करने के अनंतर सारे शरीर में शुद्ध रक्त पहुंचाती हैं। इससे हृदय रोग और रक्त से पूरी तरह निष्कासन होते रहने के कारण, फेफड़ों की बीमारियों की भी समाप्ति हो जाती है। रक्त में लाल रक्त कणों की वृद्धि होती है जिससे कई रोगों से मुक्ति मिल जाती हैं। नलिकाओं में रक्त का थक्का बनना समाप्त हो जाता है और भविष्य में हृदय या धमनियों की शल्य-क्रिया कराने की नौबत नहीं आने पाती। फेफड़ों में शुद्ध ऑक्सीजन की पर्याप्त मात्रा होने के कारण तथा अशुद्ध हवा का फेफड़ों से पूरी तरह निष्कासन होते रहने के कारण, फेफड़ों की बीमारियों की भी समाप्ति हो जाती है। रक्त में लाल रक्त कणों की वृद्धि होती है जिससे कई रोगों से मुक्ति मिल जाती है। ताली बजाने से श्वेत रक्तकण सक्षम तथा सशक्त बन जाते हैं, जिससे शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बहुत बढ़ जाती है। मनुष्य निरोग होने लगते हैं। शरीर में चुस्ती, फरती तथा ताजगी आ जाती है। ताली बजाने से हाथों के एक्यूप्रेशर केंद्रों पर अच्छा दबाव पड़ता है और शरीर निरोग होने लगता है। शुद्ध रक्त हृदय से पैरों तक पूरी क्षमता से दौड़ता है, जिससे हमारा शरीर निरोग होने लगता है। किस रोग में कितनी देर तक ताली बजायी जाए या कैसे बजायी जाए, इसका निर्धारण आपकी शारीरिक शक्ति एंव रोग जिसका उपचार किया जाना है, उसका आंकलन करके ही हो सकता है। अपने शरीर की शक्ति का अनुमान लगाकर उन तालियों को जो आपके लिए सहज एंव उपयुक्त हों, अपनायें। इस सहज स्वाभाविक योग से मात्र कुछ दिनों में आप रोग को दूर करके शरीर को अधिक न थकाते हुए स्वयं को चुस्त, दुरूस्त एंव तंदुरूस्त रख सकते हैं।

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