सीनियर सिटीजन, जो जीना चाहते हैं

उम्र को लेकर पहले एक वाक्य चलता था, ‘लाइफ बिगिंस एट फॉर्टी’ लेकिन अब जब औसत उम्र में इजाफा हुआ है, फॉर्टी से बढ़कर अब यह सिक्सटी हो गया है, यानी कि अब ‘लाइफ बिगिंग एट सिक्सटी’ वाक्य लोकप्र्रिय हो रहा है। जहां पहले सीनियर सिटीजन अपने बेटे बहू, पोते पोती के साथ रहना चाहते थे, आज जीवन के स्वर्णिम काल में अपना जीवन वे अपने ढंग से गुजारना पसंद करने लगे हैं। अपनी स्वतंत्रता और सम्मान अब उन्हें ज्यादा महत्वपूर्ण लगने लगा है। वे एक्टिव रहते हुए संसार से कूच करना चाहते हैं, निष्क्रिय रहकर एक कोने में पड़े उपेक्षित बूढ़े की तरह नहीं। जनरेशन गेप के कारण बाप बेटों व सास बहू में आए दिन झगड़े होने लगते हैं। झगड़े न भी हों तो उनमें से किसी न किसी को तो दूसरी पोजीशन पर रहना ही पड़ता है। अब वे उसे किस तरह लेते हैं, यह उनकी समझ पर निर्भर करता है। जाहिर है कि मां बाप जब अब तक घर में सर्वेसर्वा थे, सैकंड पोजीशन पर रहकर अपमानित महसूस करते हैं। ऐसी स्थिति आए, इससे पहले ही क्यों न प्रेमपूर्वक अलग रहा जाए, यही सोचकर आज कई उम्रदराज लोग बच्चों की शादी के बाद अलग रहना पसंद करते हैं। वे बराबर बच्चों से संपर्क और सुरक्षा की दृष्टि से सपोर्ट नेटवर्क भी बना कर रखते हैं। डिगनिटी फाउंडेशन के अध्यक्ष शीलू श्रीनिवासन के अनुसार एक परिवार की चाह और खर्च ने की पावर बढ़ने के कारण बहुत से सीनियर सिटीजन स्वतंत्र जीवन ही पसंद करते हुए अपनी पहचान बनाने में जुटे रहते हैं। बहुत से रिटायर्ड लोग कुछ न कुछ काम करते मिल जाएंगे। उनके पास अनुभव का खजाना होता है। कन्सलटेंसी का काम या कोई दुकान चलाना, कही पर पैंसठ वर्ष की मीरा यादव कहती हैं, ‘कुछ दिन साथ भी रहे हैं हम और रोज-रोज का नर्क भी भुगत कर देख लिया। बहू इतनी ज्यादा एंटी थी कि पूरे समय मुझे नोचने को तैयार रहती थी। मेरा हसना, बोलना कोई काम उसे पसंद नही था, सिवाय उन कार्यो के जो नौकरानी करती हैं। मेड बहुत छुट्टी करती रहती थी, तब बर्तन झाडु मुझसे करवाते उसे जरा भी लाज शरम नहीं आती। हर हिसाब किताब का काम देखना, ट्यूशन, कोचिंग देना उनमें से कुछ हैं। सीनियर सिटीजन श्री गणपत वाडेकर कहते हैं, ‘भई हम तो जियो और जीने दो के दर्शन में विश्वास करते हैं। यंग लोगों की अपनी जीवनशैली है। उनकी भागदौड़ में हम कहां फिट बैठते हैं। जब हम भी लाइफ एंजॉय कर सकते हैं तो हम उन पर बोझ बन कर क्यों रहें। हमने अपना धन इस तरह से इनवेस्ट किया है कि उससे अच्छी खासी रकम मिल जाती है। थोड़ा बहुत शेयर का काम कर लेता हूं। अक्सर हम पति पत्नी कभी सिनेमा, कभी मॉल चले जाते हैं। फ्रैंड सर्कल है। उनसे मेल मुलाकात हो जाती है। कभी उनके साथ आउटिंग पर चले जाते हैं। साल दो साल में फॉरेन टूर भी लगा लेते है। हम तो अपने जीवन का स्वर्णिम काल लगता है। कोई जिम्मेदारी बाकी नहीं। अपने कर्तव्य पूरी निष्ठा से निभाये हैं। दोनों बेटों को लायक बना दिया। खूब कमा रहे हैं, संस्कारवान हैं। एक फोन पर दौड चले आएंगे। हमें और क्या चाहिए?’ मिस्टर एंड मिसेज कपूर सोशल वर्क करके सुकून पाते हैं। मिस्टर एंड मिसेज जैन ने अपना एक म्यूजिकल ग्रुप बना रखा है जहां दस बारह संगीत प्रेमी म्यूजिकल इंसर्टूमेंट लेकर गाते बजाते खुश रहते हैं। नेहा जी नृत्यांगना हैं। साठ की हो जाने के बाद भी वे बखूबी डांस क्लास चला रही हैं। इसी का नाम है जीना कि आखिरी सांस तक शिद्दत से जिएं।

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