भगवान को देख कर नहीं, समझ कर पाओ

बचपन से सुनते रहते हैं कि भगवान स्वयं व्यक्ति के अंदर रहता है, जबकि हम उसे बाहरी संसार में ढूंढते रहते हैं। भगवान को पाने के लिए उसको देखने की लालसा नहीं बल्कि उसे समझने की तड़प पैदा करनी होगी। जब हम भगवान को समझ लेंगे तो उसे अपने पास ही अनुभव करेंगे। उसे पाने के लिए किसी बाहरी सहारे की जरूरत नहीं पड़ेगी। भगवान हर व्यक्ति के अपने व्यक्तित्व में छुपा है। उसे संवारने, सजाने और शुद्ध करने की आवश्यकता हैं। व्यक्तित्व में निखार लाने और उसे गुणवान बनाने की जरूरत है। आपने व्यक्तित्व को महान बना लिया तो समझो भगवान को भी पा लिया। कुछ लोग व्यक्तित्व का अर्थ शक्ल-सूरत और बाहरी साज-सज्जा समझते हैं। ऐसा करने से आप दुनियावी रूप से तो गुणवान लग सकते हैं लेकिन अपनी नजरों में तभी सम्मान पा सकेंगे जब आप में अंदरूनी गुण होंगे। आपकी आत्मा में शुद्धता, मन में सादगी, विचारों में महानता और दिल में ठहराव होगा तो आप अपने आप में ही गद्गद रहेंगे। एक अमिट, अनन्त और गहरे सुख की अनुभूति होगी। यही भगवान की प्राप्ति है। ‘व्यक्तित्व में सुधार’ सुनने में जितना आसान और सरल लगता है, यह काम उतना ही मुश्किल और असम्भव सा है। यह एक निरंतर और बड़ी कठिनाई से करने वाला काम है। एक क्षण के लाखवें हिस्से में भी चूक हो गई तो सब किया कराया चौपट हो जाता है। अपने शरीर के हर हार्डवेयर और साफ्टवेयर को हर समय स्कैन करते रहना पड़ता है। एक भी वायरस आ गया तो आपका जीवन ही पटरी से उतर जाएगा। आपको लगता होगा कि यहां शायद अध्यात्म की बात हो रही है, वेद पुराणों के आदर्शो की दुहाई दी जा रही है। कोई संतों का उपदेश चला रहा है। आपको कोइ्र चोगा पहन कर पूजा-अर्चना या तपस्या करने के लिए कहा जा रहा है। आपको अपना परिवार, समाज व काम धंधे छोड़ कर धन-कमाई त्यागने का उपदेश दिया जा रहा है। आपको साधू बन कर किसी आश्रम में रहने के लिए कहा जाएगा। नहीं, ऐसा करने से भी भगवान को पाना आसान नहीं है। सम्भव भी नहीं है। बस बात सीधी सी है कि गोद में बच्चा है और हम उसे बाहर खोज रहे हैं। इस बच्चे को ढूंढ कर बड़े लाड़-प्यार से पालने और देखभाल करने की जरूरत है, वह बच्चा आप स्वयं हैं और वह आपका ही बच्चा है। उसे अपने पैरों पर खड़ा करना है। अपने आप को किसी का मोहताज नहीं बनाना। उसे दूसरों पर आश्रित नहीं रखना और न ही कमजोर बनने देना है। आपको सबसे अधिक खतरा स्वयं अपने से हैं। आपने स्वयं को नहीं समझा तो संसार के हर कदम पर आप मात खाएंगे। आपके व्यक्तित्व को आप की कमजोरियां ही नष्ट कर देंगी। आप की शुरूआत से पहले ही हार हो जाएगी। आप जीवन में चलते जरूर रहेंगे परंतु भारी कदमों और निराशा के साथ। हर पल आपको आत्मग्लानी, क्षोभ, कुंठा और तनाव रहेगा। इन सभी को दूर करने के लिए आप फिर से बाहरी सहारों की खोज करेंगे जो आपको कई गुना अधिक कष्टों के साथ सब कुछ लौटा देंगे। इस चक्रव्यूह से निकलने का एक ही रास्ता है कि आप अपने व्यक्तित्व को निहारते रहें। अपने प्रयासों से ही अपने आप को शिला की तरह खड़ा करें। हर पल सोचने का अर्थ कुंठा या तनाव रखना नहीं है। सहज भाव से हर काम करना चाहिए। आक्रोश, क्रोध या जल्दबाजी में काम न करें। हर काम को करने से पहले और उसे करने के लिए पूरा समय दें। अपनी गलतियों से सबक लें और उन्हें दोबारा न होनें दें। गलतियां हो भी जाएं तो उन्हें दिल से न लगाएं। अपनी और दूसरों की गलतियों को भी भुलाना सीखें। इससे काम भी सही होगा और आपके व्यक्तित्व में निखार भी आएगा। जीवन जीने के कुछ मूलभूत नियमों पर अनुसंधान करते रहें। उनकी खोज करते रहें। उन्हें अपनाने की कोशिश करते रहें। जीवन में आगे बढ़ने के लिए अवसरों की प्रतीक्षा न करें। स्वयं आगे बढ़ कर अवसरों को पैदा करें। अपनी सोच नकारात्मक न रखें और हर अवसर में से सकारात्मक पहलू ढूंढते रहें। किसी भी कार्य के लिए अपने आप को अयोग्य न समझें और न ही किसी काम को कल के लिए स्थागित करें। कार्य में असफल होने पर भाग्य को मत कोसें न ही काम न होने पर बहानों की तलाश करें। असफल होने पर निराशा को अपने पर हावी न होने दें। कड़वे भूतकाल के लिए अपना वर्तमान का जायका खराब न करें। भविष्य के लिए सदा आशावान रहें और निरंतर प्रयास करते रहें। कई बार ऐसा होता है कि आपको कुछ भी ठीक नजर नहीं आता, लेकिन अपनी सोच को बदलें और ठीक की ही शुभेच्छा करें। हर पल असफलता का मजबूती और खुशी से सामना करने के लिए तैयार रहें। अवसर खो जाने पर पीछे मुड़ कर न देखें। वह आपके लिए अंतिम अवसर नहीं था, यही समझें। निराशा को अपने पास न फटकने दें। किसी से मजाक या दिखावे के लिए भी निराशा की बात न करें। व्यक्तित्व का एक बड़ा पहलू यह भी है कि अपने बारे में यह कभी न सोचें कि आप क्या नहीं कर सकते बल्कि यह सोचें कि क्या कर सकते हैं। काम को भरोसे के साथ स्वयं करने की आदत डालें। किसी काम के लिए वक्त और परिस्थितियों का इंतजार न करें। काम करने का हर समय ठीक मौका होता है। अपनी कार्य कुशलता, क्षमता, कौशल और साधनों को कम न मानें। अपनी पूरी ताकत व बुद्धी के साथ काम पर जुट जाएं। विश्वास से बड़ी शक्ति कोई नहीं होती। विश्वास पहाड़ को भी हिला सकता है। इसलिए उसे हर कीमत पर बनाए रखें। अपने में विश्वास बनाए रखें। अपने काम में पूरी एकाग्रता और बलिदान की भावना से सर्वस्व झोंक दें। सफलता आपके कदम चूमेगी। सफलता को किसी पैमाने से मत तोलो। हर छोटी से छोटी सफलता को पा कर भी प्रसन्न जरूर हों पर असन्तुष्ट व निराश न रहें। असफलता के अंश पर ध्यान न दें। सफलता को धूमधाम से स्वीकार करें। जो भी मिलता है उससे अपनी निराशा मिटाएं और आगे की ओर देखें। यही भगवान है, यही भगवान का असली रूप है। आप सच्चे मायनों में सुखी हैं तो भगवान को पा लिया समझो। अपने व्यक्तित्व के सहारे आप भगवान को पा सकते हैं। ऐसी छोटी-छोटी लेकिन महत्वपूर्ण बातें आपको अपना आप संवारने में मददगार साबित हो सकती हैं। अपने दिमाग को पैराशूट की तरह खोल कर रखेंगे तो आप बड़ी से बड़ी छलांग आसानी से लगा सकते हैं। अपने दिमाग को बंद रख कर अंधेरे और घुटन के अलावा कुछ हासिल नहीं होगा।

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