स्त्री के जीवन में पुरूष का महत्त्व

रामचरित्र मानस में तुलसीदास ने लिखा है- बिन जल बादल सूना है, वैसे ही पुरूष बिन नारी का जीवन।
लेकिन आज समय बदल चुका है। संयुक्त परिवारों की परंपरा बीते समय की बाते हैं। नौकरियों ने देश विदेश की सीमाएं खत्म की दी हैं। एक जमाना था औरत घर की चैखट पार नहीं करती थी, पर आज वे नौकरियों की तालाश में वे एक अच्छे कैरियर की चाह लिए घरों से दूर, दूसरे शहरों में अकेले नौकरी करने में भी नहीं हिचकती हैं। यही नहीं, अब वे मनचाहे रिश्तों का बोझ भी नहीं उठाती है और तालाक के बाद अकेले जीवनयापन कर रहीं है।
वैवाहिक संबंधो की असफलता को देख अविवाहित रहने के निर्णय भी लिये जा रहें हैं। यही नही, पति की मृत्यु के बाद औरत अपने जीवन को बड़े व्यवस्थित तरीके से जी कर दिखा रहीं है। कुछ अरसे पहले लंदन में लगभग साढ़े चार हजार स्त्री-पुरूषों पर हुए एक सर्वेक्षण से यह सिद्ध हुआ कि अकेले रहने वाली महिलाएं उतनी ही खुश रहती हैं जितनी कि शादी के बाद परिस्थितियां व संबंध विच्छेद का दुख झेल चुकी महिलाएं वे मानसिक तौर पर कहीं ज्यादा स्वस्थ होती है। यानि स्त्री के जीवन में पुरूष न हो तो भी वे खुश रह सकती है।
सर्वेक्षण में यह तथ्य भी सामने आया कि पुरूषों को रिश्ते मानसिक रूप से ज्यादा बेहतर रख पाते है। एक के बाद दूसरे संबंध जहां पुरूषों के मानसिक स्वस्थ के लिए अच्छे साबित होते हैं, वहीं महिलाएं उनसे टूटती ज्यादा है।
लंदन विश्वविद्यालय के सोधकर्ताओं ने 35 वर्ष से कम उम्र के लोगों से किए गए सवाल-जवाब के आधार पर एपिडिमियोलाॅजी एंड कम्युटि हेल्थ के जर्नल में प्रकाशित अपने अध्ययन मे यह पाया कि पहले संबंधो के टूटने पर नए संबंध बनाने पर पुरूषों की मानसिक स्थिति ज्यादा बेहतर होती है और स्त्रियों की मानसिक स्थिति पर बुरा असर पड़ता है। नेशनल फैमिली एंड पैरैंटिंग इंस्टीयूट के सर्वे से भी इसी बात को समर्थन मिलता है कि शादीशुदा मर्दों की मानसिक स्वास्थ महिलाओं के मुकाबले ज्यादा बेहतर होता है। जबकि महिलाएं इन संबंधो से बाहर निकल कर बेहतर जिंदगी जी सकती हैं, क्योंकि उनमें भावनात्मक संबल ज्यादा होता है। लंदन विश्वविद्यालय का यह अध्ययन अकेले लंदन में रहने वाले स्त्री-पुरूषों की मानसिकता को ही उजागर नहीं करता, बल्कि हर समाज में रहने वाले स्त्री पुरूषों पर लागू होता है।

जर्मन ग्रियर ने ‘द फीमेल यूनेक‘ में करीब सौ साल पहले एक पति-पत्नीके आपसी संवाद का जिक्र किया है, जिसमें पत्नी पति से पूछती है कि तुम क्या मानते हो, मेरा सबसे पवित्र कर्तव्य क्या है..? तो पति ने जवाब दिया, ‘अपने पति और बच्चों के प्रति तुम्हारा कत्र्तव्य‘।
इस पर पत्नी असहमत हुई और बोली, ”मेरा एक और कत्र्तव्य है, उतना ही पवित्र अपने प्रति मेरा कत्र्तव्य“। मैं मानती हूँ कि सबसे पहले मैं मनुष्य हूँ। उतनी ही, जितने कि तुम या हर सूरत में मैं वह बनने की कोशिश तो करूंगी ही। पुरूषों द्वारा धर्म गं्रथों, उनके विचारों से मै संतुष्ट नहीं रह पाउंगी। मुझे चीजों पर खुद सोच विचार करना होगा और उन्हें समझने की कोशिश करनी होगी”

संभवतः सौ साल पहले की स्त्री अपने सुख की तालाश पुरी नहीं कर पाई और अपने गृहस्थ कत्र्तव्य के प्रति अत्यधिक जागरूक थी, लेकिन आज की महिला अपने ‘स्व‘ के स्थान के लिए प्रयास कर रही है।

ऐशली मांटेग ने ‘द‘ नेचुरल सुपीरियाॅरिटि आॅफ विमेन में लिखा है कि स्त्रियां अपनी भावनाओं को वे काम करने देती हैं जिनके लिए वे बनी हैं, इसलिए मानसिक रूप से वे पुरूषों की अपेक्षा अधिक स्वस्थ रहती है।

आज की स्त्री ने अपनी अभिव्यक्तियों को सुखद करने के प्रयास किए हैं। घर की चार दिवारी की कैद या लंबे घूंघटों को उसने छोड़ने के प्रयास तो किए हैं। कहते हैं कि भय, अपर्यापत्ता और दुश्चिंता जैसे भाव व्यक्ति के वे सबसे कमजोर हिस्से हैं। जिनके कारण सुरक्षा की तालाश की जाती है हमारे समाज की अवधारणा अब तक की यही रही है कि स्त्री का जीवन विवाह करके ही सुरक्षित हो सकता है। इस कारण माता- पिता बेटियों को ब्याह कर गंगा नहा लेते हैं।
आर्थिक रूप से सुरक्षित स्त्री जैसे-तैसे बोझ बन चुके संबंधो को ढोने के लिए विवश रहती है। ऐसे में स्त्री जब अपने पैरों पर खड़ी होना सीख चुकी है, तो विवशता वाली बात अब उसके साथ नहीं है। रोज-रोज पति की मार सहने, उसके तानो को चुपचाप सहने के स्थान पर वह अपने बच्चों को अपने साथ लेकर अलग गृहस्थी बसाने के अपने फैसले ले पाती हैं और पहले से बेहतर जिंदगी जी लेती हैं।
यही नहीं, पुरूष के लिए जिस साथ के लिए स्त्री विवाह करती है, जिन सुखों की चाह वह रखती है, विवाह के बाद भी वह सब अधूरे रहते हैं, वह अकेलेपन को दूर करने के लिए वह करती है, किंतु जब उसे यह लगने लगता है कि घर और पति के बावजूद वह अकेली है, तो उसका उन सभी के साथ छूटने लगता है।
शायद कुछ इन्हीं कारणों से विवाह संबंधों में जिस सुरक्षा के कारणों का उल्लेख होता है, भावनात्मक स्तर पर वे मूल्यवान साबित होते हैं जिसके अभाव में दांपत्य संबंधो में खुशियों का पक्ष नदारद होता चला जाता है। इसी कारण मनोचिकित्सक डाॅ. विनोद प्रसाद सिन्हा कहते हैं कि अगर स्त्रियां अपनी स्थिति को प्रभावी रूप से ठीक करना चाहती हैं तो यह साफ जाहिर होता है कि उन्हें विवाह करने से इन्कार नहीं होगा। सभी स्त्रियां प्रेम पाने के लिए विवाह करती हैं। सेक्स से भी महत्त्वपूर्ण प्रेम है, लेकिन जब आज समाज में प्रेम पाने के लिए विवाह करना जरूरी नहीं समझा जाता है तो स्त्री ने भी अपनी सुविधानुसार सोचना शुरू कर दिया है। यहीं नहीं पुरूषों की ज्यादतियों को भी उसने चुपचाप सहना बंद कर दिया है।
डाॅ. सिन्हा का मनोविश्लेषण सही है, क्योंकि आज शादी के किए बगैर महिलाएं बच्चे गोद ले रहीं है। स्वाभिमानी बन सिंगल पैरेंट बनकर वे अपने बच्चों की परवरिश कर रहीं है। भारत की ही सुप्रसिद्ध अभिनेत्री सुसमिता सेन एक लड़की को गोद लेकर उसका लालन-पालन कर रही है। स्त्रियों के लिए विशेष पब, बियर बार, डिस्को की बढ़ती संख्या यह सूचित करती है कि वह अब पति के इंतजार में बैठना पसंद नहीं करती बल्कि अपने हिसाब से अपनी खुशी ढूंढ लेती है।

Related Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *