सोलह वर्ष की आयु में शिरडी में प्रगट थे ”साईं बाबा“

बाबा सोलह वर्ष की आयु मे शिरडी में प्रकट हुए थे और वहां तीन वर्षों तक रूके थे। फिर वे कुछ समय के लिए अंतर्द्धन हो गये और कुछ काल के उपरांत वे औरंगाबाद के समीप निजाम स्टेट में प्रकट हुए थे। उसके बाद चांद पाटिल की बारात के साथ पुनः शिरडी पधारे और फिर जीवन पर्यंत वहीं पर रहें। उस समय वे बीस वर्ष के थे और जैसा कि सभी जानते हैं आगे आने वाले साठ वर्षों तक उन्होने लगातार शिरडी में निवास किया।
साईं कहते है जिस प्रकार जागने पर स्वप्न के राज्य वैभव अदृश्य हो जाते हैं, उसी प्रकार सांसरिक जीवन की मिथ्या विशेषता भी अदृश्य हो जाएगी। जो सांसरिक जीवन के सुखों-दुखों को मिथ्या मानता है और जिसने आत्मतल्लीन होकर इनके स्वप्न-भ्रम को दूर हटा लिया हो, वह मुक्ति प्राप्त कर लेता है। इस संसार में भक्तों की भौतिक अथवा सांसरिक पदार्थों में अधिक रूचि देखकर, उसका हृदय पिघल गया और वे करूणाभाव से चिंतित हो गये। वह दिन रात उत्सुक था कि किस तरह उसके भक्तों का इस भौतिक शरीर के प्रति मोह नष्ट हो गया। जिसकी भावना हो कि ”मैं ब्रह्म हूँ“, जो अखंड आनंद की मुर्ति हो, जो निर्विकल्प चित्त स्थिति को प्राप्त कर चुका हो, जो ऐसे व्यक्ति में सन्यास और आत्मत्याग की भावना शरण ले लेती है।
हाथ में वीणा और खड़ताल लेकर, हाथ फैलाकर और दयनीय शक्ल लेकर द्वार-द्वार भटकना ऐसा आचरण करना वे नहीं जानते थे। ऐसे कई गुरू हैं जो लागों को पकड़कर अपना शिष्य बनाकर बलपूर्वक उनके कानों में मंत्र फूंकते है और फिर धन के लालच में उन्हें धोखा देकर उनका शोषण देते हैं, लेकिन स्वयं अधर्म का आचरण करते है। वे किस प्रकार अपने भक्तों को सुरक्षित भव सागर से पार उतारेंगे और कैसे उन्हें जन्म-मरण के चक्कर से मुक्ति दिलवाएंगे?
लेकिन यहां साईं का ऐसा अद्भुत व्यक्तित्व था कि उनके मन में कोई विचार नहीं था, न ही उनकी इच्छा धार्मिक निष्ठा प्रदर्शित करने की थी, न ही वे इसके लिए लोगों की जय-जयकार और प्रशंसा हासिल करना चाहते थे। साई का ऐसा अद्भुत व्यक्तित्व था कि उनमें अहंकार के लिए जगह नहीं थी। बल्कि उनमें भक्तों के लिए असीम प्रेम था।
गुरू दो प्रकार के होते है, नियत और अनियत। अनियत गुरू की केवल यह विशेषता है कि उनके आदेशों का पालन करने से शिष्यों में उत्तम गुणों का विकास होता है तथा चित्त की शुद्धि होकर विवेक की वृद्धि होती है। वे शिष्यों को मोक्ष प्राप्ति के मार्ग पर लगा देते है। परंतु नियत गुरू की संगति मात्र से द्वैत बुद्धि का हृास शीघ्र हो जाता है और हृदय में एकत्व की भावना जागृत हो जाती है। जिसके फलस्वरूप के महावाक्य ”तत्वमसि“ की सत्यता का यथार्थ में अनुभव हो जाता है। जो उनके दर्शनार्थ जाएगा, उनके बिना पूछे ही वे उसके भूत, भविष्य और वर्तमान के गुप्त रहस्यों का संपूर्ण विवरण दे देंगे। वे समस्त प्राणियों में ब्रह्म या स्वयं ईश्वर का दर्शन किया करते थे, मित्र और शत्रु को एक नजर से देख, उनमें भेदभाव नहीं करते थे। वे किसी से किसी प्रकार की इच्छा नहीं रखते थे, बल्कि सभी के साथ एक जैसा व्यवहार करते थे, यहां तक की कृतघ्न पर भी वे अपनी कृपा की वर्षा बरसाते थे। देहधारी होते हुए भी उन्हें देह, घर जैसी सांसारिक वस्तुओं के प्रति कोई लगाव नहीं था। बाहर से तो वे देहधारी थे लेकिन अंदर से उन्हें देह की किंचतमात्र आसक्ति न थी। ऐसे व्यक्ति के जीवन में मोक्ष की प्राप्ति स्वतः ही हो जाती है।
ईश्वर निराकार है। वे शिरडी में साईं के रूप मे प्रकट हुए। उन्हें जानने के लिए सर्वप्रथम अहंकार, समस्त इच्छाएँ, क्रोध, घ्रिणा और कामुक विचारों का नष्ट होना आवश्यक है। उन्हें तो केवल प्रेम और भक्ति के द्वारा भी जाना जा सकता है। बाबा का आत्मसंयम बड़ा विचित्र है। बाबा के पास कोई अधिकृत संपत्ति नहीं थी। निर्गुण रूप में रहते हुए भी उन्होने भक्तों पर कृपा करने के निमित्त ही सगुण अवतार धारण किया। उन्होनें अपने भक्तों का प्रेम और विश्वास जीत लिया था। लेकिन उनकी वास्तविक प्रकृति को तो स्वयं ईश्वर भी पूर्ण रूप से नहीं समझ पाए। अपने भक्तों के प्रति दयाभाव के कारण बाबा के अति विनम्र हो के कहा, ”मैं दासानुदास हूँ, मैं तुम्हारा ऋणि हूँ, तुम्हारे दर्शन के लिए मै प्रकट हुआ हूँ।
यद्यपि बाह्य दृष्टि से सत्व, रजस और तमस यह तीनों गुण उनके शारीरिक अंगों में विद्यमान थे और वे सभी कार्यकलापों के कर्ता भी प्रतीक होते थे। वास्तव में उन्हें शरीर से कोई मोह नहीं था और वे त्रिगुणों से परे थे। वे पूर्ण रूप से विरक्त थे, शुद्ध चैतन्य स्वरूप थे, वे परमानंद थे। काम क्रोध की प्रबल भावनाएं उनके चरणों की शरण लेती थीं। वे इच्छा रहित और पूर्णतः संतुष्ट थे। ऐसी थी उनकी मुक्ति की पूर्ण शुद्ध अवस्था की उनके लिए चेतन पदार्थ भी ब्रह्म थे। पाप और पुंय से परे, वह सभी के लिए अंतिम विश्राम स्नान थे। वे अहंकार रहित थे और स्वप्न में भी लोगों में भेदभाव नहीं करते थे। जब नानावल्ली ने उन्हें आसन से उठने को कहा, तो वे तुरंत उठकर एक तरफ हो गए और उसे बैठने के लिए स्थान दे दिया।
उनके लिए न तो इस संसार में अर्जित करने के लिए कुछ था और न ही किसी अन्य संसार में अर्जित करने के लिए प्रकट हुए थे। ऐसे परम कृपालु संतो का इस धरती पर अवतार लेने का उद्देश्य मात्र दूसरों पर कृपा करना ही होता है उनकी दयालुता दूसरे के हेतु ही होती है। कुछ लोग कहते है कि उनका हृदय मक्खन की तरह नरम होता है। जिस प्रकार मक्खन को गरम किए जाने पर वह पिघलता है। जो स्वयं को कफनी से ढकता हो, जिस पर सौ पैबंद लगे हो जिसकी गादी और बिस्तर बोरे का बना हो और जिसका हृदय सभी प्रकार की भावनाओं से मुक्त हो, उसके लिए चाँदी के सिंहासन के लिए क्या कीमत? इस प्रकार का कोई भी सिंहासन तो उनके लिए रूकावट ही होगा।
फिर भी अगर भक्तगण पीछे चुपचाप सरका कर उसे नीचे लगा देते थे, तो बाबा उनकी प्रेम और भक्ति देखते हुए उनकी इच्छा की आदरपूर्ति के लिए मना नहीं करते थे।
बाबा ने किसी योगासन, प्राणायाम, ज्ञानेंद्रियों का सख्ती से रोकने अथवा किसी उपासना का आदेश कभी नहीं दिया। उन्होनें न ही मंत्र, तंत्र और यंत्र पूजा के लिए कहा। उन्होनें न ही कभी अपने भक्तों के कानों में मंत्र फूंका। बाह्य दृष्टि से लगता था कि वे लोगों के रीति रिवाज और तरीके अपनाते थे, लेकिन अंदर से वे बिल्कुल भिन्न थे। उनके व्यवहार और कार्यकलापों से उनकी असाधारण बुद्धिमता और कार्यकुशलता स्पष्ट प्रतीत होती थी और कोई भी उनसे मुकाबला करने में सक्षम नहीं था। साईं महाराज की परमानंद और परम शांति के आधार हैं।
बाबा न तो हिंदू है न ही मुसलमान। वे आश्रम और वर्णों से परे हैं। लेकिन वे इस सांसरिक जीवन के कष्टों और दुखों को पूर्णतः नष्ट करके उन्हें दूर कर सकते हैं। साईं की शरण में जाओ और नारायण तुम पर कृपा करेंगे। सद्गुरू के सान्निधय में रहकर स्वयं के संसार के जंजालों से मुक्त कर लो। इसी से मानव का कल्याण होता है। अगर सौभाग्यवश तुम्हें सत्संग प्राप्त हो जाए तो बिना किसी के परिश्रम के तुम्हें पूर्ण आध्यात्मिक मार्ग में अग्रसर होने के लिए केवल इंद्रियां सुखों से विरक्ति ही आवश्यक है जब तक संतों के सन्निधय की तीव्र इच्छा मन में नहीं होगी, तब तक आत्मज्ञान की प्राप्ति कदापि संभव नहीं हो पाएगी। चाहे स्वीकार करें या अस्वीकार करें जो होता है सो तो हो के ही रहेगा। केवल संतो की शरण ही हमें सुखों और दुःखों से परे ले जा सकती है।

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