ज्योतिष एक फैशन

एक कहावत है कि संसार में उसी वस्तु की नकल होती है जिसकी माँग अधिक होती है। प्राचीन समय में ज्योतिष केवल आवश्यकता थी परंतु आज के दौर में आवश्यकता के साथ-साथ ज्योतिष एक फैशन भी बन गया है। जयोतिष का अर्थ है ”ज्योति दिखलाना“। मनुष्य के जीवन में लाभ-हानि, अनुकूलता-प्रतिकूलता, शुभता-अशुभता या अच्छा-बुरा कब-कब होगा इसको ज्योतिष के माध्यम से ही जाना जा सकता है।
वास्तव में ज्योतिष का अर्थ है व्यक्ति को जागरूक करना परंतु समाज में कुछ पोंगा पंडितों द्वारा गलत प्रयोग करने अर्थात् लोगों को सही जानकारी देने की बजाय उनको भयभीत कर धन कमाने के कारण कई बार इस विद्या की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है। इस लेख के माध्यम से ज्योतिष शास्त्र के उन तथ्यों के बारे में जानकारी दी जाएगी। जिनसे आमजन अक्सर भयभीत रहते है। तथा उपायों के नाम पर कुछ ज्योतिषी किस प्रकार आम लोगों को ठगते है, इस बात का भी उल्लेख किया जाएगा।
मांगलिक दोष
जन्मकुंडली के 1, 4, 7, 8, एवं 12वें भाव में मंगल के होने से जातक/जातिका मांगलिक कहलाते है। विवाह के समय कुंडली मिलान में मांगलिक दोष देखा जाता है। मंगल पानी ग्रह है या सदैव हानि करता है। ऐसी धारणा अल्पज्ञानी ज्योतिषियों की हुआ करती है। सत्य यह है कि मंगल पानी ग्रह न होकर क्रूर स्वभाव वाला ग्रह है। राजनैतिक गुणों से दूर मंगल सरल स्वभाव वाला ग्रह है। परंतु यदि कोई मंगल प्रभावित व्यक्ति से छेड़छाड़ करता है तो मंगल उसे नीति की बजाय हिंसा से सबक सिखाता है। जिसके स्वभाव में सरलता हो, निष्कपटता हो, कर्तव्यपरायणता हो व दृढ़ता हो, ऐसे सद्गुणों से भरपूर मंगल ग्रह को यदि कोई अज्ञानी पानी ग्रह कहता है तो उसकी बुद्धि प्रश्नचिन्ह लगने योग्य है।
कालसर्प योगः
आजकल चारो तरफ कालसर्प योग की बहुत ही चर्चा है। यदि आपका समय कुछ अच्छा नहीं चल रहा है और ऐसे में यदि आप किसी ज्योतिषी से संपर्क करते हैं तो अधिकतर ज्योतिषी किसी न किसी तरह से आपको कालसर्प योग से पीडि़त बताते हैं। सबसे पहले आपको यह जानकारी दी जाती है कि कालसर्प योग होता क्या है। किसी भी कुंडली में यदि सूर्य से लेकर शनि ग्रह तक सातों ग्रह राहु व केतु की एक दिशा में आ जाते हैं तो जन्मकुंडली कालसर्प योग से पीडि़त हो जाती है।
सबसे पहले हम ये जानेंगे कि कालसर्प योग की उत्पत्ति का प्रमाण किन ग्रंथों में मिलता है। ज्योतिष की उत्पत्ति वेदों से हुई है तथा वेदों का अंग भी माना जाता है, किसी भी वेद, संहिता एवं पुराणों में कालसर्प नामक योग का उल्लेख नहीं मिलता, यहाँ तक की भृगुसंहिता, पराशर एवं रावण संहिता आदि मुख्य ग्रंथों में भी इस योग की चर्चा तक नहीं है। अब जो महत्त्वपूर्ण प्रश्न सामने आते हैं वो यह है कि जब योग का विवरण किसी भी प्रमाणिक ग्रंथ में नहीं मिलता तो फिर यह कहाँ से और कब प्रकट हुआ। खोज करने पर यह मालूम पड़ा कि 80 के दशक में इस योग का आर्विभाव दक्षिण भारत की ओर से हुआ।
हम भारतीय ज्योतिष की बात करें तो राहु-केतु को छाया ग्रह माना गया है इनका अपना कोई आस्तित्व नहीं है। राहु अकेला होने पर मंगल ग्रह का प्रभाव रखते है। इस तर्क से ही कालसर्प योग अप्रमाणिक सिद्ध हो जाता है। यदि हम एक अन्य उदाहरण लें तो उसके अनुसार राहु-केतु के मध्य अन्य सभी ग्रहों के होने पर यह योग बनता है तो यदि किसी ग्रह की राहु या केतु पर दृष्टि पड़ रही हो तो भी कालसर्प योग खंडित हो जाता है क्योंकि दानों छाया ग्रह होने से इन दोनों पर जिस भी ग्रह की दृष्टि पड़ती है उसी ग्रह के अनुसार फल देने के लिए बाध्य है। अब हम दूसरी तरह से विचार करते हैं कि मान लो राहु-केतु नामक छाया ग्रह अपने प्रभाव से अन्य सात ग्रहों को बांध देते हैं तो क्या सूर्य का सभी ग्रहों का राजा कहलाया जाना बेकार है। बृहस्पति का देवगुरू होना प्रभावहीन है तथा शनि जिसे कलयुग में सबसे प्रभावशाली कारक माना जाता है क्या उनका प्रभावशाली होना मिथ्या है।

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