गंगोत्री से हरिद्वार

गंगा नदी नहीं बल्कि इससे बढ़कर है। गंगा के महत्त्वपूर्ण होने की वजह न सिर्फ गंगाजल है, बल्कि इस नदी के गंगोत्री से शुरू होकर अरब सागर में मिलने तक उसके रास्ते में आने वाले तमाम ऐतिहासिक व धार्मिक जगहे भी हैं। इसी बारे में विस्तृत जानकारी देता है ये लेख।
गंगोत्रीः
उत्तराखंड के उत्तराकाशी जिले में स्थित गंगोत्री ग्लेशियर गंगा की प्रमुख उपनदी भागीरथी का उदृगम स्थल है। यह आगे देवप्रयाग में अलकनंदा समेत दूसरी नदियों के साथ गंगा का निर्माण करती है। यह जगह चीन के बार्डर के नजदीक पड़ती है। गंगा के उद्गम स्थल के गाय के मुख की तरह दिखने की वजह से इसे गोमुख भी कहा जाता है। गंगोत्री हिंदुओं का एक प्रमुख धार्मिक स्थल और चार धामों में से एक है। धार्मिक स्थल होने के साथ गंगोत्री ट्रैकिंग के शौकीनों के लिए भी बड़ी अच्छी जगह है। यहां ट्रैकिंग के बेहतरीन रूट मौजूद है।
सतोपंथः
गंगा की दूसरी प्रमुख सहायक नदी अलकनंदा का जन्म उत्तराखंड स्थित सतोपंथ और भागीरथ खड़क ग्लेशियर पर होता है। उसके बाद यह नदी अपने साथ धौलीगंगा, मंदाकनी, पिंडर व नंदाकिनी नदियों को मिलाकर भागीरथी से मिलती है और गंगा का निर्माण करती है। हिंदूओं का प्रसिद्ध तीर्थ और चार धामों में से एक बद्रीनाथ भी अलकनंदा के किनारे पर ही स्थित है। अलकनंदा नदी का उद्गम स्थल सतोपंथ ग्लेशियर सैलानियों के बीच खासतौर पर फेमस है। यह जगह भारत-तिंब्बत बाॅर्डर पर स्थित है।
विष्णु प्रयागः
नैश्नल हाइवे संख्या 58 पर स्थित विष्णु प्रयाग में धौलीगंगा नदी अनकनंदा में मिलती है। इसे गंगा का पहला प्रयाग माना जाता है, क्योंकि यहां पहली बार कोई नदी अलकनंदा में मिलती है। माना जाता है कि यहां देवर्षि नारद ने भगवान विष्णु की आराधना करके अपने लिए वरदान प्राप्त किया था। तब से इस जगह को विष्णु प्रयाग कहा जाने लगा। यही हिमालय की हरियाली, सुंदर पहाडि़यों और नदी के सुरम्य किनारे का लुप्फ एक साथ उठाया जा सकता है।
बद्रीनाथ के काफी पास स्थित विष्णु प्रयाग में बहुत बड़ा हाइड्रो इलोक्ट्रोनिक प्रोजेक्ट लगाया गया है।
नंद प्रयागः
उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित नंद प्रयाग एक नगर पंचायत है, जहां अलकनंदा नदी और नंदाकिनी का संगम होता है। माना जाता है कि यहां के राजा नंद को भगवान विष्णु को बेटे के रूप में पाने का वरदान प्राप्त था। इसी तरह का वरदान कंस की बहन देवकी को भी प्राप्त था। इसलिए भगवान ने देवकी की कोख से जन्म लिया, लेकिन उसका पालन पोषण राजा नंद की पत्नी यशोदा ने किया। यह जगह ट्रैकिंग करने वालों के बीच काफी पाॅपुलर है।
कर्णप्रयागः
चमोली जिले के कार्यप्रयाग म्यूनिसिपल बोर्ड में अलकनंदा नदी पिंडारी ग्लेशियर से निकली पिंडर नदी से मिलती है। यह पंच प्रयागों में से एक है, जहां गंगा की पांचों सहायक नदियां उससे मिलती है। माना जाता है कि पांडवों के बड़े भाई कर्ण ने यहां भगवान सूर्य की अराधना की थी, जिससे इस जगह को कर्ण प्रयाग कहा जाता है। यहां एक प्राचीन मंदिर भी है। स्वामी विवेकानंद ने भी यहां करीब 18 दिनों तक मेडिटेशन किया था।
रूद्र प्रयागः
उत्तराखंड के रूद्र प्रयाग जिले में चार धामों से एक केदारनाथ के निकट चारबारी ग्लेशियर से निकली मंदाकिनी नदी अलकनंदा नदी से मिलती है। इससे पहले सोन प्रयाग में मंदाकिनी में वासूकिगंगा नदी भी मिलती है। रूद्रप्रयाग को रूद्र यानी भगवान शिव का स्थान माना जाता है। कहा जाता है कि यहां भगवान शिव ने नारद मुनि को दर्शन दिए थे। यहां स्थित भगवान शिव का गुफा मंदिर काफी प्रसिद्ध थे।
देव प्रयागः
उत्तराखंड पौड़ी गड़वाल जिले की नगर पंचायत देव प्रयाग में गंगा की दोनों प्रमुख सहायक नदियों, भागीरथी और अलकनंदा का मिलन होता है। इसी जगह दोनों नदियां अपने विशाल रूप में आती है और उसे गंगा कहा जाने लगता है। पंच प्रयागों में से एक देव प्रयाग हिंदुओं का प्रमुख धार्मिक स्थल है। माना जाता है कि यहाँ देव शर्मा ने भगवान के दर्शन किये थे। इसी वजह से इस जगह को देव प्रयाग कहा जाता हैं। यह भी माना जाता है कि भगवान राम और दशरथ ने यही मोक्ष प्राप्त किया था। यहां का रघुनाथ जी का मंदिर काफी प्रसिद्ध है। यहा बनी पत्थर की गुफाओं की उम्र हजार साल से भी ज्यादा मानी जाती है।
ऋषिकेशः
देव प्रयाग के बाद हिमालय की घाटियों का लंबा सफर तय करके गंग

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