बढ़ रही हैं छेड़छाड़ की घटनाएं

अभी कुछ समय पहले ही एक बाहरवीं कक्षा की छात्रा पर कुछ मनचलों ने उस समय ज्वलनशील पदार्थ फेंक दिया जब उसने छेड़छाड़ करने का उन्हें हंस-मुस्कुरा कर कोई सकारात्मक जवाब नहीं दिया था। यह घटना उस सम घटी थी जब छात्रा अपने घर से चलकर स्कूल के निकट पहुंची ही थी।
रेडीमेड कपड़ों की दुकान पर कार्यरत एक सेल्सगर्ल शाम के समय अपना काम समाप्त करके घर वापस लौट रही थी तो अचानक कुछ मनचलों ने उसे गली में घेर लिया और पकड़ कर उसका शीलभंग करने का प्रयास करने लगे। युवती के प्रबल विरोध करने और सहायतार्थ चिल्लाने पर गुंडों ने उसका ब्लाउज फाड़ दिया और उसे शारीरिक कष्ट पहुंचाया। भीड़ इकट्ठी हो जाने पर अपराधी तत्व बड़े आराम से सबके सामने सुरक्षित निकल कर भाग गये। छेड़छाड़ की घटनाएं किसी विशेष् नगर की बात नहीं है। आजकल तो हर नगर में ही छेड़छाड़, अश्लील और भद्दी हरकतें करने का प्रचलन इतना बढ़ रहा है कि दिनोंदिन महिलाएं घर से बाहर अपने आप को असूरक्षित महसूस कर रही है। आश्चर्य की बात तो यह है कि छेड़छाड़ की हरकतों में युवक ही नहीं अच्छी खासी उम्र वाले और बूढ़े तक शामिल है। इनकी हालत यह है कि ये आंख मिचैली खेलने और हाथ घुमाने तक की हरकतों में शामिल है परंतु बुजुर्ग होने के कारण कोई कुछ कह नहीं पाता और मामला शांत हो जाता है। शहर के चैराहों और व्यस्त बाजारों और कन्या पाठशालाओं की ओर जाने वाले रास्तों पर युवतियों छात्राओं की काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है। मेलों ठेलों की भीड़भाड़ में तो ये मनचले निंबों पर चुटकी काटने और उरोजों को दबाने से भी बाज नहीं आते आते। कुछ महिलाएं तो शर्म के मारे सब कुछ सहन कर लेती है। अभी थोड़ी ही समय में स्कूल काॅलेज आती जाती छात्राओं के साथ तो छेड़छाड़ की घटनाओं में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। मनचले निडर होकर खुलेआम छात्राओं पर न केवल फब्तियां कसते हैं बल्कि उनके अंगों को छूने और प्रेम पत्र देने की सीमा तक बढ़ रहे है।

  • 4-6 के समूह में आती हुई छात्राएं तो इनकी हरकतों से बच निकलती हैं लेकिन अकेली छात्रा को तो इनका दुव्र्यवहार झेलना ही पड़ता है। हमें यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि आखिर वे कौन से ऐसे कारण है कि आज का युवा वर्ग चरित्रिक पतन की ओर इतना फिसल रहा है।
    गहराई से सोचने पर लगता है कि निम्नलिखित बातें ऐसी हैं जो युवाओं को चरित्रिक पतन की ओर धकेलने में सहायक सिद्ध हो रही है।
    हमारी वर्तमान शिक्षा पद्धति ऐसी है जिसमें अब स्कूलों के नाम पर कुछ रह ही नहीं गया। महंगे पब्लिक स्कूलों की भरमार है जहां सभी कुछ पाश्चात्य ढंग से सिखाया पढ़ाया जाता है। अपनी सभ्यता और संस्कृति पर पाश्चात्य रंग चढ़ता जा रहा है। समय की मांग को देखकर मां-बाप ऐसे स्कूलों ही में अपने बच्चों को दाखिला दिलाकर गौरव महसूस करते है। प्रगतिशीलता के नाम पर नशा और फ्री सेक्स का बोलबाला है।
  • पुलिस व्यवस्था चैाकस न होने के कारण ऐसे युवकों पुरूषों के हौंसले बुलंद है।
    पिछले कुछ वर्षों से विज्ञापनों, फिल्मों तथा टेलीविजन के कार्यक्रम और पत्र पत्रिकाओं इत्यादि में नारी के नंगेपन और अश्लील चित्रों की भरतार है। इस कुप्रवृति के कारण समाज में चरित्रहीनता और वहशीपन बढ़ता जा रहा है। किशोर और युवक शिक्षा की ओर से विमुख होकर कुकृत्यों मंे अधिक से अधिक रूचि ले रहे है। सेक्स और मादक द्रव्यों का उपयोग किशोरों के लिए एक फैशन सा बन रहा है। कमी कंप्यूटर ने पूरी कर दी है। मीडिया भी गलत हरकतों को इतना उछालता है कि बार बार उन दृश्यों को देखकर युवक गलत ही सीखते है।
  • फैशन इतना बढ़ रहा है कि शरीर का अधिक से अधिक भाग प्रदर्शित करने की होड़ सी लगी हुई है। फिल्मी अभिनेत्रियों का अंग प्रदर्शन के विषय में यह कथन कि जब भगवान ने उन्हें सुंदर सुडौल शरीर रूपी सौगात दी है तो उसका प्रदर्शन करने में क्या बुराई है। किशोरियों के लिए प्रेरणास्रोत है।
  • लड़कियों के जींस या निकर में कसे हुए नितंब और शर्ट के सामने से खेले हुए बटन क्या युवाओं की यौन भावनाओं को भड़काने का काम नहीं करते? फैशन टीवी पर माॅडलों के नंगे शरीर देखकर क्या युवाओं में वासना जागृत नहीं होती। कहने का अर्थ है कि बढ़ता हुआ नंगापन किशोरों और युवाओं के मन मस्तिष्क को दूषित कर रहा है। जिसके कारण वे काम आवेग में आकर छेड़छाड़ और बलात्कार जैसे घटनाओं को जन्म देते है।
  • युवक युवतियों में चरित्र निर्माण के साहित्य में रूचि बिल्कुल भी नहीं है। पाश्चात्य मीडिया उसके मानस पटल पर पूरी तरह छाता जा रहा है। लड़के हों या लड़कियां आजकल अधिकतर की शर्टोें पर अजीबो-गरीब सेक्सी शब्द या वाक्य रहते है। ”मैं बुरा हूं“ माइकल जेक्सन के ये शब्द जाने किस आदर्श का प्रचार प्रसार कर रहे है?
  • खाली दिमाग भी शैतान का घर होता है। युवाओं के लिए आज जीवन को सही ढंग से जीना बड़ा मुश्किल हो रहा है। कड़ी स्पर्धा और बढ़ती हुई बेरोजगारी व निठल्लापन और उद्देश्यहीन जीवन भी बहुत हद तक युवाओं के मन मस्तिष्क को विकृत कर रहा है।
  • शिकागो के सर्वधर्म सम्मेलन में अपना भाषण आरंभ करने से पहले स्वामी विवेकानंद ने वहां के जनसमूह को बहनो और भाइयों कहकर संबोधित किया था। उनके इन शब्दों में अपनत्व, प्यार और विश्वबंधुत्व की भावना थी। लेडीज एंड जेंटलमेन के स्थान पर भाई और बहन का संबोधन सुनकर वहां के स्त्री पुरूष गदगद हो गए और देर तक तालियां बजाकर उनका स्वागत किया था
    काश हम आज भी अपनी सभ्यता और संस्कृति दूसरों में बांट पाते लेकिन अफसोस हम खुद ही भटक गए है।

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