भारतीय परम्परा में यज्ञ का महत्त्व

यज्ञों के आयोजन से वातावरण शुद्ध होता है। बड़े-बड़े यज्ञों के आयोजन से बारिश भी होती है। आधुनिक परिवेश में बारिश के लिए बड़े-बड़े यज्ञों का आयोजन किया जाता है। यज्ञों की परम्परा अति प्राचीन है। श्रीमद् भगवद् गीता के अनुसार प्रजापति ब्रह्मा ने मनुष्य की उत्पत्ति के साथ यज्ञ का प्रचलन भी प्रारंभ किया था। यज्ञ का प्रारंभ करते हुए ब्रह्मा ने कहा था, यज्ञों द्वारा मनुष्य की सभी मनोकामनाएं पूरी होंगी।
गीता के अनुसार सृष्टि में सभी प्राणियों की उत्पत्ति होती है। अन्न की उत्पत्ति वर्षा से होती है और वर्षा की उत्पत्ति यज्ञों से होती है। वर्षा और शुभ कार्यों के लिए यज्ञ करना आवश्यक होता है।
प्राचीन ग्रंथों के अध्ययन से पता चलता है कि प्राचीन समय में सभी राजा-महाराजाओं द्वारा यज्ञ किया जाता है। यज्ञों का धार्मिक महत्व भी कम नहीं। सूर्य व अन्य ग्रहों से आने वाली अनिष्टकारी किरणों को यज्ञों के आयोजनों से रोके जा सकता है। यज्ञों के पुण्य कर्मों से ग्रहों की अनिष्टकारी किरणों का प्रभाव नष्ट हो जाता है। शुभ कार्यों की सम्पन्नता के लिए यज्ञ किए जाते हैं।
यज्ञों द्वारा अशुभ ग्रहों का अनिष्टकारी प्रभाव नष्ट करने के साथ देवी-देवताओं को प्रसन्न किया जाता है। यज्ञ करते समय विधिवत सभी नियमों का पालन करना चाहिए। स्नान करके, स्वच्छ वस्त्र पहनकर, शारीरिक और मानसिक रूप से शुद्ध होकर यज्ञ करना चाहिए। कुलषित मन से किए गए यज्ञ का पुण्य फल नहीं मिलता है। यज्ञ में प्रयुक्त सामग्री भी पवित्र व शुद्ध होने चाहिए।
किसी भी यज्ञ के प्रारंभ में देवताओं के पूजन की परम्परा है। पूजन के लिए धूप, दीप से वातावरण सुगंधित किया जाता है। शुद्ध घी या तेल का दीपक जलाया जाता है। प्राचीन ग्रंथों के अनुसार दीपक के नीचे गेहूँ या फूल आवश्य बिछाने चाहिए। ग्रंथो में वर्णन किया गया है कि दीपक जलाने से पुण्य मिलता है। दीपक को बुझाने से पुण्य नष्ट होता है। यज्ञों के समय देवताओं की पूजा के लिए दीपक जलाने से स्वर्ग का सुख मिलता है। अगर, तगर, कूठ, मिश्री, कपूर, चंदन, खस, जायफल, सावित्री, जटामासी, देवदार, तज, शीलाजीत आदि से निर्मित धूप जलाने से वातावरण शुद्ध होता है और पुण्य की प्राप्ति होती है।
प्रत्येक मनुष्य की राशि के अनुसार यज्ञ करते समय उनके लिए विशेष मंत्र निदिष्ट होते हैं। मेष राशि के लिए श्री लक्ष्मी नारायणाय नमः मिथुन राशि के जाति के लिए  हीं विश्वरूपाय नमः, मिथुन राशि के लिए क्री केशवाय नमः, कर्क राशि के लिए हीं हरिहराय नमः, सिंह राशि के लिए हीं बाल मुकुंदाय नमः, कन्या राशि के लिए हीं परमात्मने नमः, तुला राशि के लिए श्रीं रामाय नमः, वृश्चिक श्री क्लीं जानकी रामाय नमः, मकर राशि के लिए  श्रीं वत्साय उपेंद्राय नमः, कुुंभ राशि के लिए श्री गोपाल गोविंद्राय नमः, मीन राशि के लिए हीं क्री खड़ग चक्राय नमः से मंत्र बोलकर यज्ञ किया जाता है।
यज्ञ व हवन कुंड में सामग्री डालते समय की विधि को हवन की छवि कहा जाता है। यज्ञ व हवन के उद्येश्य के अनुसार सामग्री में परिवर्तन किया जाता है। सामग्री 8 तरह की जड़ी-बूटियों व वनोमधियों से बनी होती है। यज्ञ के समय में कुंड में आहुति देते समय उस देवी-देवता का स्मरण किया जाता है। स्मरण नहीं करने से यज्ञ का पुंय नहीं मिलता है।
यज्ञ की सामग्री जौ, तिल, चिरौंजी, बादाम, नागकेशर, किशमिश, आँवला, छुआरा, लौंग, सुपारी, चंदन, आगर, गुग्गल, जायफल, नावित्री, इलायची, तामलपत्र, तागर, दालचीनी, खांड, रोली नागरमोया से बनाई जाती है। इस सामग्री से यज्ञ करने से पुण्यफल की प्राप्ति होती है। मनोकामनाएँ पूरी होती है और वातावरण स्वच्छ होता है।
सभी यज्ञ में नवग्रह की पूजा अवश्य की जाती है। नवग्रह की पूजा के लिए अलग से एक कुंड बनाया जाता है। नवग्रह यज्ञ कुंड में मध्य में सूर्य नारायण, दक्षिण पूर्व कोण में चंद्रमा, दक्षिण में मंगल, उत्तर पूर्व में बुध, उत्तर में गृहस्थिति, पूर्व में शुक्र, पश्चिम में शनि, दक्षिण-पश्चिम में राहु और पश्चिम-उत्तर दिशा में केतु की स्थापना की जाती है।
नवग्रह पूजा में देवताओं की स्थापना भी विशेष दिशाओं में करने का महत्त्व होता है। पूजा के समय पंडित ओर यजमान के बैठने की दिशा भी निर्धारित की जाती है। पंडित उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठते हैं और यजमान को पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठना होता है। पूजा प्रारंभ करने से पहले पंडित के निर्देश पर यजमान सभी पूजन सामग्री और देवताओं पर गंगाजल के छींटे मारकर पवित्र करता है।
पंडित वहाँ उपस्थित सभी व्यक्तियों को चावल देकर स्वास्ति वाचन का मंत्र उच्चारण करता है। सकंल्प, रक्षाबंधन, रक्षाविधान के बाद देव पूजन किया जाता है। देव पूजन में सभी देवताओं का आवाह्न करके गणेश की पूजा की जाती है। गणेश के बाद ब्रह्मा, फिर विष्णु, शिव, लक्ष्मी और सरस्वती की पूजा की जाती है। सभी देवताओं की पूजा करते समय विशेष मंत्र बोले जाते है।
नवग्रह पूजन में सर्वप्रथम सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि का आवाह्न किया जाता है। नवग्रह पूजन में राहु और केतु की पूजा भी की जाती है। इसके साथ ही हाथ में पुष्प और चावल लेकर अधिदेवता की पूजा की जाती है। अधिदेवता में भैरव का आवाह्न किया जाता है। उमा, स्कंद, विष्णु, ब्रह्मा, इंद्र, यम, काल, चित्रगुप्त का विधान है।

चंद्रमा के अधीन है हमारे स्वप्नों का संसार

वैदिक ज्योतिष की बात की जाए तो, चंद्रमा को मन का कारक तत्त्व माना जाता है, जो कि हमारे मन की समस्त क्रियाओं का संचालन करता है। अब जिस व्यक्ति की जन्मकुंडली में चंद्रमा जिस भाव में होता है, उस व्यक्ति को अधिकांशतः उसी भाव से संबंधित पारिवारिक सदस्यों, सगे-संबंधियों वस्तुओं या पदार्थों के ही स्वप्न दिखलाई पड़ते है।
सपनों की दुनिया भी बड़ी अजीब होती है। हर इन्सान अपनी जिंदगी में अच्छे बुरे सपनों के अनुभव से गुजरता है। ये जरूरी नही कि सपने हमेशा सुंदर ही हों वे अच्छे-बुरे, सुहावने या डरावने कैसे भी हो सकते है। इनका संसार अत्यंत असिमित है और इतिहास भी शायद उतना ही पुराना है, जितना कि मानव जाति का इतिहास। सपनों का संबंध हमारे मन से है और यही मन बाह्य एवं आंतरिक रूप से हमारे समस्त जीवन को क्रियान्वित करता है।
स्वप्नों की विभिन्न परिभाषाएँः-
शरीर शास्त्र अनुसारः
नींद आने के बाद यदि मस्तिष्क में रक्त की कमी अनुभव होने लगे अथवा रक्त संचार सुचारू रूप से न हो पाए तो स्वप्न दिखाई देने लगते है।
इन्द्रिय शस्त्रानुसारः
हमारी पाचन शक्ति के कमजोर होने पर निंद्रावस्था में सपने आने लगते है।
मानव शस्त्रानुसारः
स्वप्न इंसान की पहुँच से बाहर की स्मृतियों का आभास है।
आध्यात्म शास्त्रानुसारः
हमारा सूक्ष्म शरीर नींद की अवस्था में हमारे दिन भर के क्रियाकलापों को चित्रित कर प्रस्तुत करता है, उसे ही स्वप्न कहते है।
जीवन विज्ञान अनुसारः
स्वप्न इंसान की एक चमत्कारिक समझ है। तात्पर्य है कि निद्रावस्था में मन द्वारा होने वाली क्रियाशीलता के निर्माण को ही स्वप्न कहा जाता है।
मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि स्वप्नावस्था मनुष्य के अवचेतन मस्तिष्क की उपज है, भारतीय ज्योतिष भी स्वप्न को अवचेतनावस्था का ही परिणाम मानता है किंतु मस्तिष्क नहीं अपितु मन की अवेचन अवस्था। विज्ञान जहाँ मन और मस्तिष्क को एक ही मानता है, वही हमारे यहाँ मन और मस्तिष्क दोनों की भिन्नता स्वीकार की गई है। मन एक अलग तत्त्व है और मस्तिष्क अलग। मन के दो भाग है….. चेतन मन और अवचेतन मन। भौतिक जगत के समस्त क्रियाकलाप चेतन मन की क्रियाओं द्वारा ही संपादित होते है जब कि अवचेतन मन का 95 प्रतिशत भाग सदैव सुप्तावस्था में ही रहता है। हमारे शरीर में विद्यमान सभी इन्द्रियाँ स्वतंत्र है, सबका अपना-अपना दायित्व होता है किंतु सोते समय इंद्रियां मन में ही एकत्रित होकर सिमट जाती हैं। उस स्थिति में देखना, खाना, सुनना, सूँघना, स्पर्श करना आदि क्रियाएँ विलीन हो जाती है और तब कर्मेंद्रियां कोई कर्म नहीं कर पाती तथा न ही वे कर्म करने के योग्य रहती है। यानि की सोते हुए हमारे शरीर का समस्त कार्यभार इसी अवचेतन मन के अधीन होता है जब कि जागृन अथवा में चेतन मन के अधीन।
स्वप्न में कई बार भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं को हम साफ-साफ या फिर साँकेतिक रूप में देखते है। ऐसा क्यों और कैसें? विज्ञान अभी इसकी खोज में है। लेकिन वैज्ञानिकों के अलावा इस तथ्य को कोई भी साधारण व्यक्ति नहीं नाकारेगा कि उसकी जिंदगी का कोई न कोई स्वप्न अवश्य ही भविष्य में सच हुआ।
वैदिक ज्योतिष की बात की जाए, तो चंद्रमा को मन का कारक तत्त्व माना जाता है, जो कि हमारे मन की समस्त क्रियाओं का संचालन करता है। अब जिस व्यक्ति की जन्मकुंडली में चंद्रमा जिस भाव में होता है, उस व्यक्ति को अधिकांशतः उसी भाव से संबंधित पारीवारिक सदस्यों, सगे-संबंधियों वस्तुओं या पदार्थों के ही स्वप्न दिखलाई पड़ते है। मान लिजिए किसी की जन्मकुंडली में चंद्रमा चतुर्थ भाव में स्थित है तो उस व्यक्ति को अधिकांशतः चतुर्थ भाव में संबंधित माता, भूमि, मकान, सुख के साधन, वाहन, जल, नदी इत्यादि से संबंधित स्वप्न ही दिखलाई देंगे। क्योंकि उस व्यक्ति का मन उन सब चीजों में स्थित है, इनमें रमा हुआ है। अगर उस व्यक्ति का चेतन मन उन सब वस्तुओं, पदार्थों की प्राप्ति में सहायक नहीं हो पा रहा है या कहें कि उस व्यक्ति के जीवन की परिस्थितियाँ उन पदार्थों की प्राप्ति के अनुकूल नहीं है तो फिर मन अपनी अवचेतना व स्थान में उसके लिए स्वप्न के माध्यम से मार्गदर्शक का कार्य करता है।
ऐसा भी नहीं है कि हमें दिखलाई देने वाले सभी स्वप्न सिर्फ उन्हीं वस्तुओं से संबंधित ही हो जहां कि जन्मकुंडली में चंद्रमा स्थित है। इसके अतिरिक्त गोचर में चंद्रमा जन्मकुंडली के जिस-जिस भाव में संचरण करता है, उस उस भाव से संबंधित कारक तत्त्वों के बारे में हमें नित्यप्रति सपने देखने को मिलते हैं। लेकिन ये कोई जरूरी नहीं कि वो सपने सुबह जागन पर हमें याद रह ही जाएँ। इनमें से कभी-कभार कोई सपनें हमें याद रह जाता है अन्यथा शेष स्मृति पटल से विलुप्त हो जाते है।

शुभ विवाह का आधार

विवाह दो व्यक्तियों का मिलन ही नही होता अपितु दो परिवारों, उनके संस्कारों और संस्कृतियों का मिलन होता है। ईश्वर ने जब सृष्टि की रचना की तभी उसने उसे संचालित करने और निरंतर क्रियाशील रखने के लिए स्त्री और पुरूष की रचना की। इन दोनों के मिलन से ही सृष्टि चलती है।
कुण्डली अष्टकूट मिलान
विवाह दो व्यक्तियों का मिलन ही नही होता अपितु दो परिवारों, उनके संस्कारों और संस्कृतियों का मिलन होता है। ईश्वर ने जब सृष्टि की रचना की तभी उसने उसे संचालित करने और निरंतर क्रियाशील रखने के लिए स्त्री और पुरूष की रचना की। इन दोनों के मिलन से ही सृष्टि चलती है। आज के आधुनिक युग में विवाह का महत्त्व और भी अधिक हो गया है क्योंकि आज स्त्री पुरूष के समान हर क्षेत्र में समानता प्राप्त करती जा रही है। जो गृहस्थी को सफल बनाने में सहायक तो है परंतु कभी-कभी विचारों और परिस्थितियों के कारण सुखद वैवाहिक जीवन में बाधा भी बन जाती है। इसलिए यदि विवाह पूर्व ज्योतिष के अनुसार युवक और युवती की कुंडली का मिलान कर लिया जाए तो वैवाहिक जीवन शुभ, सफल, शांतिपूर्वक और सुखद व समृद्ध बन सकता है और विवाह पश्चात् आने वाली समस्याओं से बचा जा सकता है।
इसलिए वर और कन्या की कुंडलियों का अष्टकूट मिलान करके निर्णय लिया जाता है।
अष्टकूट के आठ अंग इस प्रकार हैः-
वर्णः- इसके द्वारा वर और कन्या के जातियकरण का निरीक्षण किया जाता है। कर्क वृश्चित और मीन राशि के जातक ब्राह्मण, मेष सिंह और धनु राशि के जातक क्षत्रिय, वृष कन्या और मकर राशि के जातक वैश्य वर्ण के होते है। वर का वर कन्या के कर्ण से उच्च स्तरीय अथवा समान वर्ण होने पर गुण प्राप्त होता है अन्यथा शून्य अर्थात् वर्ण दोष है।
दोष परिहारः यदि वर की राशि वर्ण से हीन हो परंतु राशि का स्वामी उत्तम हो तो और दोष समाप्त हो जाता है।
वश्य विचारः इसके द्वारा वर और कन्या के स्वभाव और प्रकृति का निरीक्षण किया जाता है। सिंह राशि के अतिरिक्त सभी राशियाँ नर मनुष्य राशि के वश में है। जल राशियाँ कर्क मकर और मीन, नर राशियाँ मिथुन, तुला, धनु, कुंभ केवल वृश्चित को छोड़कर शेष राशियाँ सिंह राशि के वश्य है। समान वश्य होने पर 2 गुण एक वश्य और दूसरा शत्रु होने पर एक गुण, एक वश्य और दूसरा शत्रु होने पर एक गुण, एक वश्य और एक भक्षय होने पर आधा गुण तथा एक शत्रु और एक भक्ष्य होने पर 0 गुण माने जाते हैं।
तारा विचारः इसके द्वारा वर और कन्या के भाग्य का निरिक्षण किया जाता है। जन्म नक्षत्र से वर और जन्म नक्षत्र तथा वर के नक्षत्र से कन्या नक्षत्र तक मिलाकर दोनों संख्याओं को अलग अलग 9 से भाग देने पर यदि शेष 3, 5, 7 बचे तो अशुभ तारा होती है। दोनों ताराओं में अशुभ तारा हो तो शुन्य गुण, एक में तारा शुभ और दूसरी में अशुभ हो तो डेढ़ गुण तथा दोनों में तारा शुभ हो तो तीन गुण होते है।
योनि विचारः इसके द्वारा वर और कन्या के यौन विचारों और यौन प्रकृति का निरिक्षण किया जाता है। अश्विनी आदि नक्षत्रों के अनुसार जातक की योनि ज्ञात की जाती है। वर और कन्या की योनियों का आपसी वैर त्जात्य है। जैसे-गो और व्याघ्र में, सिंह और गज, न्यौला और सप्र से, अश्व और महिष में, श्वान और हिरण में, वानर और मेष, मूषक और मार्जार में परस्पर महावैर है। वर और कन्या का एक ही योनि होना शुभ है। योनियों में चार गुण मित्र हो तीन, सहज प्रकृति समान समान हो तो एक गुण तथा दोनों में परस्पर शत्रुता हो तो शून्य गुण माना जाता है।
ग्रह मैत्रीः यह मैत्री के आधार पर वर और कन्या के आपसी संबंधों का निरिक्षण किया जाता है। ग्रह मैत्री कूट के संदर्भ में वर-कन्या के राशि स्वामियों का एक्य अथवा मैत्री भावादि अभिप्रम है। वर कन्या की राशियों में परस्पर अधिमित्रता या एक की राशि के होने पर पाँच गुुण, एक सम और दूसरा मित्र हो तो चार गुण, एक-दूसरे के सम हो तो तीन गुण एक मित्र दूसरा शत्रु हो तो एक गुण एक सम हो तो आधा गुण दोनों की राशियाँ परस्पर शत्रु हों तो शुन्य। दोष परिहारः वर कन्या के राशि पतियों में परस्पर वैर होने पर भी राशि नवाँश पति परस्पर मित्र हो तो, विवाह शुभ माना जाता है।
गण विचारः वर और कन्या के सामाजिक जीवन और आचार व्यवहार में समानता और विभिन्न का अध्ययन गण विचार के अन्र्तगत किया जाता है। अश्विनी, मृगशीष, पुष्य, हस्त, स्वाति, अनुराधा, श्रवण रेवती नक्षत्रों को देवतागण, तीनों पूर्वा, तीनों उत्तरा, रोहिणी, भरणी, आद्रा का मानवगण, कार्तिक, अश्विनी, मघा, चित्रा, विशाखा, ज्येष्ठा, मूल, घनिष्ठा, शतभिषा का राक्षसगण माना जाता है। वर कन्या का एक ही गण होने पर उत्तम देव मनुष्य हो तो शुभ, किसी एक का राक्षसगण हो तो अशुभ एवं त्जातय होता है। यदि वर और कन्या दोनों का गुण एक ही हो तो छः गुण वर का गण देव व कन्या का गण मनुष्य हो तो भी छः गुण, कन्या देवगण एवं वर मनुष्य हो तो पाँच गुण माने जाते है। कन्या और वर में से एक का देवगण तथा दूसरे का राक्षसगण अथवा एक का मनुष्यगण दूसरे का राक्षसगण हो तो शून्य गुणों की समानता मानी जाती है।
भृकुट विचारः इसके द्वारा वर और कन्या के लाईफ स्टाईल की समानता और विरोधाभास का निरिक्षण किया जाता है।इसे राशिकूट भी कहते है। वर कन्या की जन्मराशि परस्पर छठे एवं आठवें हो तो षडाष्टक दोष होता है। यदि वर और कन्या की राशि परस्पर पाँचवी-नौवीं हो तो नव पंचम दोष कहलाता है। षडाष्टक दोष होने की स्थिति में वर कन्या इनके माता पिता अथवा उनके किसी निकटस्थ बंधु को मृत्यु तुल्य कष्ट होने की संभावना होती है। नवपंचम दोष की स्थिति में विवाहित दंपत्ति को संतान संबंधी सुखों का अभाव और दुख होने का भय होता है तथा द्वादश, शत्रुकूट होने वर कन्या को धन, व्यापार नौकरी में हानि एवं आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।

षडाष्टक परिहरः मेष, वृश्चित, वृष, तुला, मिथुन, मकर, कर्क, चंद्र, सिंह, मीन तथा कन्या, कुम्भ आदि मित्र राशियों का षडाष्ट शुभ होता है, जबकि वैर षडाष्क ही विशेषतया दोष पूर्ण माना जाता है। यथा मेष और कन्या राशि में, कर्क और कुंभ राशि में, सिंह और मकर राशि में एवं तुला और मीन राशियों का शत्रुगत षडाष्टक होने से त्जात्य माना जाता है।
नाड़ी दोष विचारः- अष्टकूट निर्धारक तत्त्वों में नाड़ी का विशेष महत्त्व है। क्योंकि इस द्वारा विवाह पश्चात् संतान और पारिवारिक आय का अनुमान लगाया जाता है। वर-कन्या की एक ही नाड़ी होना विवाह के लिए अशुभ माना गया है।
नाड़ी दोष अपवाद एवं परिहारः- नाड़ी दोष ब्राह्मणों के लिए, वर्णदोष क्षत्रियों के लिए, गुण दोष वैश्यों के लिए तथा योनि दोष शूद्रों के लिए विशेष रूप से विचारणीय होता है। यदि वर कन्या दोनों की एक राशि अलग-अलग हो व नक्षत्र चरण भिन्न हो तो ऐसी स्थिति में नाड़ी एवं गणदोष नहीं होता अर्थात् शुभ होता है। ज्योतिष शस्त्र के अनुसार रोहिणी, मृगशिरा, आद्र्रा, ज्येष्ठा, कृतिका, पुष्य, श्रवण एवं रेवती इन नक्षत्रों में उत्पन्न वर कन्या को नाड़ी दोष नहीं लगता। निष्कर्ष रूप से हम यह कह सकते है कि विवाह करते समय कुंडली मिलान अवश्य करना चाहिए युवक युवती के जीवन में विवाह एक ऐसा मोड़ है जहाँ उसका सारा जीवन एक निर्णय पर आधारित होता है, जिस वर या कन्या से उसका विवाह होता है उससे उसके विचार मिलेंगे या नहीं इसका निर्णय हम सिर्फ ज्योतिष के आधार पर ही कर सकते है और सही मिलान आपकी गृहस्थी को धरती पर स्वर्ग का रूप दे सकता है यद्यपि गलत मिलान जीवन को नरक में परिवर्तित कर देता है।

सोलह वर्ष की आयु में शिरडी में प्रगट थे ”साईं बाबा“

बाबा सोलह वर्ष की आयु मे शिरडी में प्रकट हुए थे और वहां तीन वर्षों तक रूके थे। फिर वे कुछ समय के लिए अंतर्द्धन हो गये और कुछ काल के उपरांत वे औरंगाबाद के समीप निजाम स्टेट में प्रकट हुए थे। उसके बाद चांद पाटिल की बारात के साथ पुनः शिरडी पधारे और फिर जीवन पर्यंत वहीं पर रहें। उस समय वे बीस वर्ष के थे और जैसा कि सभी जानते हैं आगे आने वाले साठ वर्षों तक उन्होने लगातार शिरडी में निवास किया।
साईं कहते है जिस प्रकार जागने पर स्वप्न के राज्य वैभव अदृश्य हो जाते हैं, उसी प्रकार सांसरिक जीवन की मिथ्या विशेषता भी अदृश्य हो जाएगी। जो सांसरिक जीवन के सुखों-दुखों को मिथ्या मानता है और जिसने आत्मतल्लीन होकर इनके स्वप्न-भ्रम को दूर हटा लिया हो, वह मुक्ति प्राप्त कर लेता है। इस संसार में भक्तों की भौतिक अथवा सांसरिक पदार्थों में अधिक रूचि देखकर, उसका हृदय पिघल गया और वे करूणाभाव से चिंतित हो गये। वह दिन रात उत्सुक था कि किस तरह उसके भक्तों का इस भौतिक शरीर के प्रति मोह नष्ट हो गया। जिसकी भावना हो कि ”मैं ब्रह्म हूँ“, जो अखंड आनंद की मुर्ति हो, जो निर्विकल्प चित्त स्थिति को प्राप्त कर चुका हो, जो ऐसे व्यक्ति में सन्यास और आत्मत्याग की भावना शरण ले लेती है।
हाथ में वीणा और खड़ताल लेकर, हाथ फैलाकर और दयनीय शक्ल लेकर द्वार-द्वार भटकना ऐसा आचरण करना वे नहीं जानते थे। ऐसे कई गुरू हैं जो लागों को पकड़कर अपना शिष्य बनाकर बलपूर्वक उनके कानों में मंत्र फूंकते है और फिर धन के लालच में उन्हें धोखा देकर उनका शोषण देते हैं, लेकिन स्वयं अधर्म का आचरण करते है। वे किस प्रकार अपने भक्तों को सुरक्षित भव सागर से पार उतारेंगे और कैसे उन्हें जन्म-मरण के चक्कर से मुक्ति दिलवाएंगे?
लेकिन यहां साईं का ऐसा अद्भुत व्यक्तित्व था कि उनके मन में कोई विचार नहीं था, न ही उनकी इच्छा धार्मिक निष्ठा प्रदर्शित करने की थी, न ही वे इसके लिए लोगों की जय-जयकार और प्रशंसा हासिल करना चाहते थे। साई का ऐसा अद्भुत व्यक्तित्व था कि उनमें अहंकार के लिए जगह नहीं थी। बल्कि उनमें भक्तों के लिए असीम प्रेम था।
गुरू दो प्रकार के होते है, नियत और अनियत। अनियत गुरू की केवल यह विशेषता है कि उनके आदेशों का पालन करने से शिष्यों में उत्तम गुणों का विकास होता है तथा चित्त की शुद्धि होकर विवेक की वृद्धि होती है। वे शिष्यों को मोक्ष प्राप्ति के मार्ग पर लगा देते है। परंतु नियत गुरू की संगति मात्र से द्वैत बुद्धि का हृास शीघ्र हो जाता है और हृदय में एकत्व की भावना जागृत हो जाती है। जिसके फलस्वरूप के महावाक्य ”तत्वमसि“ की सत्यता का यथार्थ में अनुभव हो जाता है। जो उनके दर्शनार्थ जाएगा, उनके बिना पूछे ही वे उसके भूत, भविष्य और वर्तमान के गुप्त रहस्यों का संपूर्ण विवरण दे देंगे। वे समस्त प्राणियों में ब्रह्म या स्वयं ईश्वर का दर्शन किया करते थे, मित्र और शत्रु को एक नजर से देख, उनमें भेदभाव नहीं करते थे। वे किसी से किसी प्रकार की इच्छा नहीं रखते थे, बल्कि सभी के साथ एक जैसा व्यवहार करते थे, यहां तक की कृतघ्न पर भी वे अपनी कृपा की वर्षा बरसाते थे। देहधारी होते हुए भी उन्हें देह, घर जैसी सांसारिक वस्तुओं के प्रति कोई लगाव नहीं था। बाहर से तो वे देहधारी थे लेकिन अंदर से उन्हें देह की किंचतमात्र आसक्ति न थी। ऐसे व्यक्ति के जीवन में मोक्ष की प्राप्ति स्वतः ही हो जाती है।
ईश्वर निराकार है। वे शिरडी में साईं के रूप मे प्रकट हुए। उन्हें जानने के लिए सर्वप्रथम अहंकार, समस्त इच्छाएँ, क्रोध, घ्रिणा और कामुक विचारों का नष्ट होना आवश्यक है। उन्हें तो केवल प्रेम और भक्ति के द्वारा भी जाना जा सकता है। बाबा का आत्मसंयम बड़ा विचित्र है। बाबा के पास कोई अधिकृत संपत्ति नहीं थी। निर्गुण रूप में रहते हुए भी उन्होने भक्तों पर कृपा करने के निमित्त ही सगुण अवतार धारण किया। उन्होनें अपने भक्तों का प्रेम और विश्वास जीत लिया था। लेकिन उनकी वास्तविक प्रकृति को तो स्वयं ईश्वर भी पूर्ण रूप से नहीं समझ पाए। अपने भक्तों के प्रति दयाभाव के कारण बाबा के अति विनम्र हो के कहा, ”मैं दासानुदास हूँ, मैं तुम्हारा ऋणि हूँ, तुम्हारे दर्शन के लिए मै प्रकट हुआ हूँ।
यद्यपि बाह्य दृष्टि से सत्व, रजस और तमस यह तीनों गुण उनके शारीरिक अंगों में विद्यमान थे और वे सभी कार्यकलापों के कर्ता भी प्रतीक होते थे। वास्तव में उन्हें शरीर से कोई मोह नहीं था और वे त्रिगुणों से परे थे। वे पूर्ण रूप से विरक्त थे, शुद्ध चैतन्य स्वरूप थे, वे परमानंद थे। काम क्रोध की प्रबल भावनाएं उनके चरणों की शरण लेती थीं। वे इच्छा रहित और पूर्णतः संतुष्ट थे। ऐसी थी उनकी मुक्ति की पूर्ण शुद्ध अवस्था की उनके लिए चेतन पदार्थ भी ब्रह्म थे। पाप और पुंय से परे, वह सभी के लिए अंतिम विश्राम स्नान थे। वे अहंकार रहित थे और स्वप्न में भी लोगों में भेदभाव नहीं करते थे। जब नानावल्ली ने उन्हें आसन से उठने को कहा, तो वे तुरंत उठकर एक तरफ हो गए और उसे बैठने के लिए स्थान दे दिया।
उनके लिए न तो इस संसार में अर्जित करने के लिए कुछ था और न ही किसी अन्य संसार में अर्जित करने के लिए प्रकट हुए थे। ऐसे परम कृपालु संतो का इस धरती पर अवतार लेने का उद्देश्य मात्र दूसरों पर कृपा करना ही होता है उनकी दयालुता दूसरे के हेतु ही होती है। कुछ लोग कहते है कि उनका हृदय मक्खन की तरह नरम होता है। जिस प्रकार मक्खन को गरम किए जाने पर वह पिघलता है। जो स्वयं को कफनी से ढकता हो, जिस पर सौ पैबंद लगे हो जिसकी गादी और बिस्तर बोरे का बना हो और जिसका हृदय सभी प्रकार की भावनाओं से मुक्त हो, उसके लिए चाँदी के सिंहासन के लिए क्या कीमत? इस प्रकार का कोई भी सिंहासन तो उनके लिए रूकावट ही होगा।
फिर भी अगर भक्तगण पीछे चुपचाप सरका कर उसे नीचे लगा देते थे, तो बाबा उनकी प्रेम और भक्ति देखते हुए उनकी इच्छा की आदरपूर्ति के लिए मना नहीं करते थे।
बाबा ने किसी योगासन, प्राणायाम, ज्ञानेंद्रियों का सख्ती से रोकने अथवा किसी उपासना का आदेश कभी नहीं दिया। उन्होनें न ही मंत्र, तंत्र और यंत्र पूजा के लिए कहा। उन्होनें न ही कभी अपने भक्तों के कानों में मंत्र फूंका। बाह्य दृष्टि से लगता था कि वे लोगों के रीति रिवाज और तरीके अपनाते थे, लेकिन अंदर से वे बिल्कुल भिन्न थे। उनके व्यवहार और कार्यकलापों से उनकी असाधारण बुद्धिमता और कार्यकुशलता स्पष्ट प्रतीत होती थी और कोई भी उनसे मुकाबला करने में सक्षम नहीं था। साईं महाराज की परमानंद और परम शांति के आधार हैं।
बाबा न तो हिंदू है न ही मुसलमान। वे आश्रम और वर्णों से परे हैं। लेकिन वे इस सांसरिक जीवन के कष्टों और दुखों को पूर्णतः नष्ट करके उन्हें दूर कर सकते हैं। साईं की शरण में जाओ और नारायण तुम पर कृपा करेंगे। सद्गुरू के सान्निधय में रहकर स्वयं के संसार के जंजालों से मुक्त कर लो। इसी से मानव का कल्याण होता है। अगर सौभाग्यवश तुम्हें सत्संग प्राप्त हो जाए तो बिना किसी के परिश्रम के तुम्हें पूर्ण आध्यात्मिक मार्ग में अग्रसर होने के लिए केवल इंद्रियां सुखों से विरक्ति ही आवश्यक है जब तक संतों के सन्निधय की तीव्र इच्छा मन में नहीं होगी, तब तक आत्मज्ञान की प्राप्ति कदापि संभव नहीं हो पाएगी। चाहे स्वीकार करें या अस्वीकार करें जो होता है सो तो हो के ही रहेगा। केवल संतो की शरण ही हमें सुखों और दुःखों से परे ले जा सकती है।

कुण्डली में राजयोग

राजयोग कोई विशिष् योग नही है। यह कुंडली में बनने वाले कई योगों का प्रतिफल है। कुंडली में जब शुभ ग्रहों का योग बनता है उसके आधार पर राजयोग का आंकलन किया जाता है। इस ग्रह के आंकलन के लिए लग्न के अनुसार ग्रहों की शुभता, अशुभता, कारक, अकारक विशेष योगकारक ग्रहों को देखना होता है साथ ही ग्रहों की नैसर्गिक शुभता/ अशुभता का ध्यान रखना होता है।
ज्योतिष की दृष्टि में राजयोग का अर्थ है ऐसा योग है जो राजा के समान सुख प्रदान करें। हम सभी जीवन में सुख की कामना करते हैं परंतु सभी के भाग्य में सुख नहीं लिखा होता है। कुंडली में ग्रहों एवं योगों की स्थिति पर सुख-दुःख पर निर्भर होता है।
राज योग दो शब्दों से मिलकर बना है ”राज“ तथा ”योग“। ज्योतिष की दृष्टि में राजयोग का अर्थ है ऐसा योग है जो राजा के समान सुख प्रदान करें। हम सभी जीवन में सुख की कामना करते हैं परंतु सभी के भाग्य में सुख नहीं लिखा होता है। कुंडली में ग्रहों एवं योगों की स्थिति पर सुख-दुःख पर निर्भर होता है।
राज्य योग भी इन्हीं योगों में से है जो जीवन को सुखी बनाता है।
राज योगः
राजयोग कोई विशिष् योग नही है। यह कुंडली में बनने वाले कई योगों का प्रतिफल है। कुंडली में जब शुभ ग्रहों का योग बनता है उसके आधार पर राजयोग का आंकलन किया जाता है। इस ग्रह के आंकलन के लिए लग्न के अनुसार ग्रहों की शुभता, अशुभता, कारक, अकारक विशेष योगकारक ग्रहों को देखना होता है साथ ही ग्रहों की नैसर्गिक शुभता/ अशुभता का ध्यान रखना होता है। राजयोग के लिए केंद्र स्थान में उच्च ग्रहों की उपस्थिति, भाग्य स्थान पर उच्च ग्रहों का शुक्र, नवमेश एवं दशमेश का संबंध बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। कुंडली में अगर कोई ग्रह अपनी नीच राशि में मौजूद है तो इसका मतलब यह नही है कि वह फलदायी नही होगा क्योंकि जहाँ नीच राशि में ग्रह की स्थिति होगी वही से सप्तम उस ग्रह की दृष्टि अपने स्थान पर रहेगी। गौर करने की बात यह है कि इसका क्या फल होगा यह अन्य ग्रहों से संबंध पर निर्भर करेगा।
कुंडली में राजयोग किसी ग्रह विशेष से नहीं बनता है बल्कि इसमे सभी ग्रहों की भूमिका होती है। ज्योतिषशास्त्र के नियमानुसार कुंडली में चंद्रमा अपनी स्थिति से योगों को काफी प्रभावित करता है। चंद्रमा के निर्बल होने पर योगकारक ग्रह भी अपना फल नहीं दे पाते है। केंद्र या त्रिकोण भाव में चंद्रमा यदि पूर्ण बली शुक्र या बृहस्पति से दृष्टि होता है तो यह राजयोग का फल देता है और व्यक्ति को राजा के समान सुख प्रदान देता है।
राजयोग के प्रकारः
विपरित राजयोगः
त्रिक स्थानों के स्वामी त्रिक स्थानों में हो या युनि अथवा दृष्टि संबंध बनते हो तो विपरित राजयोग बनता है। इसे उदाहरण से इस प्रकार समझा जा सकता है कि अष्टमेष व्यय भाव या षष्ठ भाव में हो एवं षष्ठेश यदि अष्टम में व्ययेश षष्ठ या अष्टम में हो तो इन त्रिक भावों के स्वामियों की युति दृष्टि अथवा परस्पर संबंध हो और दूसरे संबंध नही हो तो यह व्यक्ति को अत्यंत धनवान और खुशहाल बनाता है इस योग में व्यक्ति महाराजाओं के समान सुख प्राप्त करता है। ज्योतिष ग्रंथो में यह भी बताया गया है कि अशुभ फल देने वाला ग्रह जब स्वयं अशुभ भाव में होता है तो अशुभ प्रभाव नष्ट हो जाते है।
केंद्र त्रिकोण राजयोगः
कुंडली में जब लग्नेश का संबंध केंद्र या त्रिकोण के स्वामियों से होता है तो यह केंद्र त्रिकोण संबंध कहलाता है। केंद्र त्रिकोण में त्रिकोण लक्ष्मी का व केंद्र विष्णु का स्वरूप होता है। यह योग जिस व्यक्ति की कुंडली में पाया जाता है वह बहुत ही भाग्यशाली होता है। यह योग मान-सम्मान धन वैभव देने वाला होता है।
नीचभंग राजयोगः
कुंडली में जब कोई ग्रह नीच राशि का होता है और जिस भाव में वह होता है उस भाव की राशि अगर उच्च राशि में हो लग्न से केंद्र में उसकी स्थिति हो तब यह नीचभंग राजयोग कहा जाता है। उदाहरण के तौर पर बृहस्पिति मकर राशि में नीच होता है लेकिन मकर का स्वामि शनि उच्च में है तो यह भंग हो जाता है जिससे नीचभंग राजयोग बनता है।
राज्यपूज्यपति योगः
यह योग कन्या के संदर्भ में देखा जाता है। यह योग जिस कन्या की कुंडली में होता है सम्पन्न एवं समाज में सम्मानित होता है। यह योग तब बनता है जब कन्या के जन्म के समय सप्तम भाव में शुभग्रह की सम राशि हो व शुभ ग्रहों से युक्त हो अथवा दृष्ट हो।

गंगोत्री से हरिद्वार

गंगा नदी नहीं बल्कि इससे बढ़कर है। गंगा के महत्त्वपूर्ण होने की वजह न सिर्फ गंगाजल है, बल्कि इस नदी के गंगोत्री से शुरू होकर अरब सागर में मिलने तक उसके रास्ते में आने वाले तमाम ऐतिहासिक व धार्मिक जगहे भी हैं। इसी बारे में विस्तृत जानकारी देता है ये लेख।
गंगोत्रीः
उत्तराखंड के उत्तराकाशी जिले में स्थित गंगोत्री ग्लेशियर गंगा की प्रमुख उपनदी भागीरथी का उदृगम स्थल है। यह आगे देवप्रयाग में अलकनंदा समेत दूसरी नदियों के साथ गंगा का निर्माण करती है। यह जगह चीन के बार्डर के नजदीक पड़ती है। गंगा के उद्गम स्थल के गाय के मुख की तरह दिखने की वजह से इसे गोमुख भी कहा जाता है। गंगोत्री हिंदुओं का एक प्रमुख धार्मिक स्थल और चार धामों में से एक है। धार्मिक स्थल होने के साथ गंगोत्री ट्रैकिंग के शौकीनों के लिए भी बड़ी अच्छी जगह है। यहां ट्रैकिंग के बेहतरीन रूट मौजूद है।
सतोपंथः
गंगा की दूसरी प्रमुख सहायक नदी अलकनंदा का जन्म उत्तराखंड स्थित सतोपंथ और भागीरथ खड़क ग्लेशियर पर होता है। उसके बाद यह नदी अपने साथ धौलीगंगा, मंदाकनी, पिंडर व नंदाकिनी नदियों को मिलाकर भागीरथी से मिलती है और गंगा का निर्माण करती है। हिंदूओं का प्रसिद्ध तीर्थ और चार धामों में से एक बद्रीनाथ भी अलकनंदा के किनारे पर ही स्थित है। अलकनंदा नदी का उद्गम स्थल सतोपंथ ग्लेशियर सैलानियों के बीच खासतौर पर फेमस है। यह जगह भारत-तिंब्बत बाॅर्डर पर स्थित है।
विष्णु प्रयागः
नैश्नल हाइवे संख्या 58 पर स्थित विष्णु प्रयाग में धौलीगंगा नदी अनकनंदा में मिलती है। इसे गंगा का पहला प्रयाग माना जाता है, क्योंकि यहां पहली बार कोई नदी अलकनंदा में मिलती है। माना जाता है कि यहां देवर्षि नारद ने भगवान विष्णु की आराधना करके अपने लिए वरदान प्राप्त किया था। तब से इस जगह को विष्णु प्रयाग कहा जाने लगा। यही हिमालय की हरियाली, सुंदर पहाडि़यों और नदी के सुरम्य किनारे का लुप्फ एक साथ उठाया जा सकता है।
बद्रीनाथ के काफी पास स्थित विष्णु प्रयाग में बहुत बड़ा हाइड्रो इलोक्ट्रोनिक प्रोजेक्ट लगाया गया है।
नंद प्रयागः
उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित नंद प्रयाग एक नगर पंचायत है, जहां अलकनंदा नदी और नंदाकिनी का संगम होता है। माना जाता है कि यहां के राजा नंद को भगवान विष्णु को बेटे के रूप में पाने का वरदान प्राप्त था। इसी तरह का वरदान कंस की बहन देवकी को भी प्राप्त था। इसलिए भगवान ने देवकी की कोख से जन्म लिया, लेकिन उसका पालन पोषण राजा नंद की पत्नी यशोदा ने किया। यह जगह ट्रैकिंग करने वालों के बीच काफी पाॅपुलर है।
कर्णप्रयागः
चमोली जिले के कार्यप्रयाग म्यूनिसिपल बोर्ड में अलकनंदा नदी पिंडारी ग्लेशियर से निकली पिंडर नदी से मिलती है। यह पंच प्रयागों में से एक है, जहां गंगा की पांचों सहायक नदियां उससे मिलती है। माना जाता है कि पांडवों के बड़े भाई कर्ण ने यहां भगवान सूर्य की अराधना की थी, जिससे इस जगह को कर्ण प्रयाग कहा जाता है। यहां एक प्राचीन मंदिर भी है। स्वामी विवेकानंद ने भी यहां करीब 18 दिनों तक मेडिटेशन किया था।
रूद्र प्रयागः
उत्तराखंड के रूद्र प्रयाग जिले में चार धामों से एक केदारनाथ के निकट चारबारी ग्लेशियर से निकली मंदाकिनी नदी अलकनंदा नदी से मिलती है। इससे पहले सोन प्रयाग में मंदाकिनी में वासूकिगंगा नदी भी मिलती है। रूद्रप्रयाग को रूद्र यानी भगवान शिव का स्थान माना जाता है। कहा जाता है कि यहां भगवान शिव ने नारद मुनि को दर्शन दिए थे। यहां स्थित भगवान शिव का गुफा मंदिर काफी प्रसिद्ध थे।
देव प्रयागः
उत्तराखंड पौड़ी गड़वाल जिले की नगर पंचायत देव प्रयाग में गंगा की दोनों प्रमुख सहायक नदियों, भागीरथी और अलकनंदा का मिलन होता है। इसी जगह दोनों नदियां अपने विशाल रूप में आती है और उसे गंगा कहा जाने लगता है। पंच प्रयागों में से एक देव प्रयाग हिंदुओं का प्रमुख धार्मिक स्थल है। माना जाता है कि यहाँ देव शर्मा ने भगवान के दर्शन किये थे। इसी वजह से इस जगह को देव प्रयाग कहा जाता हैं। यह भी माना जाता है कि भगवान राम और दशरथ ने यही मोक्ष प्राप्त किया था। यहां का रघुनाथ जी का मंदिर काफी प्रसिद्ध है। यहा बनी पत्थर की गुफाओं की उम्र हजार साल से भी ज्यादा मानी जाती है।
ऋषिकेशः
देव प्रयाग के बाद हिमालय की घाटियों का लंबा सफर तय करके गंग

भोजन और दोनों की हमारे लिए आवश्यक है। जैसे भोजन के बिना हम जी नहीं सकते, वैसे ही भजन के बिना हमारा जीना नहीं जीने के बराबर है। जैसे भोजन हमारे बाह्य शरीर का पोषक है। वैसे ही भजन हमारे आंतरिक शरीर का पोषक है। अपने शरीर के सर्वागीण विकास के लिए दोनों की आवश्यकता को हृदयंगम करना चाहिए। जैसे भोजन के बिना हमारा भजन ठीक से नहीं हो सकता इसका अनुभव सभी को है, वैसे ही यदि सभी यह व्रत ले ले कि बिना भजन किये हम भोजन नहीं करेंगे तो हम सभी का संबंध भगवान से होने पर देर नही लगेगी।
भगवान श्री कृष्ण कहते हैः युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसुर। युक्तस्वप्नावबोधस्य योगों भवति दुःखहा।।
दुःखों का नाश करनेवाला योग तो यथायोग्य आहार-विहार करनेवाले का कर्मों में यथायोग्य सोने तथा जागने वाले का ही सिद्ध होता है। भोजन के असंयम से ही शरीर में रोग का प्रवेश होता है। जो भजन में बाधा उपस्थित करता है।
भूखे भजन न होई गोपाल।
ये लो अपनी कंठी माला।।
भोजन को ही प्रधानता देने और भजन को भूल जाने के कारण ही आज देश के विभिन्न भागों में अकाल जैसी स्थिति हो गया है। भजन का बल महान होता है।
भजन और भोजन का पारस्परिक संबंध जीवन में स्थापित करना चहिए। जिन भक्तों ने अपने जीवन में भजन को प्रधानता दी, उन्हें कभी भोजन संकट नहीं हुआ। यह भजन की ही प्रधानता का प्रभाव है।
स्वामीरामसुखदासजी महाराज ने कहा है कि भगवन्नाम के जप से कीर्तन से प्रारब्ध बदल जाता है। नया प्रारब्ध बन जाता है, जो वस्तु न मिलनेवाली हो वह मिल जाती है जो असंभव है वह संभव हो जाता है ऐसा संतों का महापुरूषों का अनुभव है। जिसने कर्मों के फल का विधान किया है उसको कोई पुकारे बार बार उसका नाम ले तो नाम लेने वाले का प्रारब्ध बदलने में आश्चर्य ही क्या है ये जो भीख मांगते फिरते हैं जिनको पेट भर खाने को भी नहीं मिलता वे अगर सच्चे हृदय से नाम जप में लग जाये तो उनको किसी चीज की कमी नहीं रहेगी। परंतु नाम जप को प्रारब्ध बदलने में पापों को काटने में नहीं लगाना चाहिए। जैसे अमूल्य रत्न के बदले में कोयला कोयला खरीदना बुद्धिमानी नहीं है। ऐसे ही अमूल्य भगवन्नाम को तुच्छ कामनापूर्ति में लगाना बुद्धिमानी नहीं है।

चमत्कारी देव, महामहिम, चुरू नरेश श्री बाबोसा भगवान के चरणों में कोटिशः नमन्।

चूरू धाम। दिल्ली-बीकानेर रेल लाइन पर दिल्ली से लगभग 275 कि.मी. नी अवस्थित यह छोटा शहर आज असंख्य श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है। इसका मुख्य कारण है यहाँ पर स्थापित बालारूप श्री बाबोसा भगवान का मंदिर जहाँ आकर व्यक्ति अपने मन की मुरादें पूरी होने का विश्वास हासिल करता है।
बाबोसा नाम है एक ऐसे देव का जिनके उनकेे श्रद्धालु अनेक रूपों में देखते है। किसी ने उन्हे कृष्ण के रूप में देखा है किसी ने उन्हें विष्णु के रूप में देखा है तो किसी ने उन्हें बजरंगबली का रूप मानते है। ”जाकि रही भावना जैसी, प्रभु मूरत तिनि देखी वैसी“ की उक्ति को चरितार्थ करते हुए बाबोसा भगवान भी अपने भक्तों को उनकी भावना के अनुरूप दर्शन देते हैै। भक्त सर्वाधिक बाला रूप में ही उनका पूजन एवं स्मरण करते है।
बाबोसा भगवान के चमत्कारों के किस्से आज हर किसी की जुबान पर है। इनके समक्ष सच्चे मन, अखंड आस्था एवं अविचल विश्वास के साथ उपस्थित होने वाले हर भक्त का कष्ट निवारण हुआ है।
लोकमत एवं प्रचलित मान्यता के अनुसार चुरू में श्री बाबोसा भगवान के मंदिर में नारियल बाँधने से व्यक्ति की मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होती है। इसलिए यहाँ प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु आकर भक्ति भावना से अरदास लगातें है। बाबोसा भगवान की चमत्कारी देव शक्ति से असाध्य रोगों का इलाज हो जाता है। भूत पिशाच एवं ऊपरी विघ्न बाधाओं का निवारण हो जाता है।
बाबोसा भगवान के दरबार की सबसे बड़ी विशेषता एवं आकर्षण का केंद्र है-परम अराधिका मंजू बाईसा में समाहित होती है तो श्रद्धालु नतमस्तक होकर बाबोसा भगवान की जय-जयकार करते हुए धन्य हो जाते है। उस समय उनका दिव्य रूप देखकर यही अहसास होता है मानों साक्षात बजरंगबली हमारे बीच पधार गये हों। इस दृश्य को देखने के लिए भक्त घंटो इंतजार करते रहते है।
भक्तो के कष्टों के निवारण हेतु ताँती जल एवं भभूति का वितरण किया जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि बाबोसा भगवान ने इन अवदानों से उनके जीवन में अनेक चमत्कारी घटनाएं घटित हुई है।
बाबोसा भगवान के तीन मुख्य समारोह मनाये जाते है। इनका वर्षिकोत्सव मिंगसर शुक्ला पंचमी को चूरू में धूमधाम से मनाया जाता है। यह दिन बाबोसा भगवान के राजतिलकोत्सव यानि देव शक्ति धारण रूप में मनाया जाता है। इसमें शामिल होने के लिए देश के कोने कोने से हजारों श्रद्धालु चूरू पहुंचते है। मिंगसर शुक्ला चतुर्थी के दिन दोपहर को चूरू में विशाल शोभायात्रा एवं रात्रि में अखंड जागरण का कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। हजारों भक्त भक्ति भावना से ओत प्रोत होकर इस कार्यक्रम में सारी रात शामिल होकर अपने आराध्य का स्मरण करते है। इस आयोजन को लोग मिंगसर मेला के नाम से भी जानते है। इसमें हजारों व्यक्ति छप्पन भोग एवं सवामणि प्रसाद बाबोसा भगवान के चरणों में अर्पित करते है।
बाबोसा भगवान का जन्मोत्सव माघ शुक्ला के दिन कोलकाता में धूम धाम से मनाया जाता है। बाबोसा भगवान का निर्वाण महोत्सव भाद्रव शुक्ला पंचमी को मनाया जाता है।
बाबोसा भगवान के तीनों मुख्य दिन शुक्ल पक्ष की पंचमी के ही आते है। इसलिए बाबोसा भगवान के भक्त इस दिन जगह-जगह पर अत्यंत श्रद्धा एवं भक्ति से भजन कीर्तन एवं भंडारे का आयोजन करते है। बाबोसा भगवान के दरबार में हर व्यक्ति की मनोकामनाएं पूर्ण होती है। मंदिर में परम आराधिका मंजु बाईसा एवं श्रद्धेय श्री प्रकाश भाई जी तन मन धन से श्री बाबोसा भगवान के भ्क्तिमय कार्यक्रमों में मग्न है। श्री बाबोसा भगवान की लीला को घर-घर पहुँचाने में इन्होनें अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया है।
श्री बाबोसा भगवान की चमत्कारी ताँतीः
कैसे बनती है? कैसे मिलती है? क्या उपयोग है?
ताँती का निमार्ण प्रारंभ होता है रेशम की डोर से। कोरे रंग की रेशम की डोरी को लाल, केसरिया या पीत रंगों में रंगाया जाता है फिर इसे छोटे-छोटे टुकडों में काटा जाता है। इन टुकडों में पाँच गाँठे थोड़ी-थोड़ी दूरी पर बाँधी जाती है। प्रत्येक गांठ पर ”¬ बाबोसा“ महामंत्र की पूरी 108 मनको की पूरी माला फेरी जाती है। श्री बाबोसा भगवान के कीर्तन की पावन ज्योति में यह ताँती पूर्ण रूप से सवे शुद्धि तेज प्राप्त करती है।
परम आराधिका मंजु बाईसा कीर्तन में एवं धाम में यही ताँती भक्तों को अपने पावन हाथो से प्रदान करती है। इस तांती के बारे में भक्तो को विश्वास है कि ”आपद संकट दूर रहे और विपदा पास न आती, हर पल हर क्षण रक्षा करती बाबोसा की तांती“ इस तांती को अपने शरीर पर श्रद्धापूर्वक धारण करने से यह सुरक्षा कवच का कार्य करती है। इसलिए बाबोसा भगवान के हर भक्त इसे पूरे विश्वास के साथ अपने शरीर पर धारण करते है।
श्री बालाजी बाबोसा मंदिर चूरू में नारियल बाँधने की महिमाः
श्री बाबोसा भगवान के दरबार में कई विधियों जैसे तांती, जल के छीटें, भभूत इत्यादि से कष्टों का निवारण होता है। इसी प्रकार मनोकामनाएँ पूर्ण करने के लिए भक्तगण श्री बाबोसा भगवान के मंदिर में नारियल बाँधते हैै। भक्तों को विश्वास है कि श्री बाबोसा भगवान के चूरू धाम के मंदिर में नारियल बाँधने से मनोकामनायें अवश्य पूर्ण होती है। इसलिए प्रतिवर्ष हजारों भक्त श्री बाबोसा भगवान के मंदिर में नारियल बाँधते है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर बाँधे गये हजारों नारियल इस बात की गवाही देते है भक्तों का यह विश्वास अकारण नही है।
नारियल बाँधने की विधिः
मंदिर के कार्यालय में भक्तों को नारियल उपलब्ध करवाये जाते है। इसके साथ एक पर्ची एवं मोली का धागा भी दिया जाता है। अपना नाम एवं पता उस पर्ची पर लिखकर उस मोली से नारियल के साथ बाँधना होता है। फिर इस नारियल को श्री बाबोसा की प्रतिमा के समक्ष अपने हाथों में रखकर मन ही मन अपनी मनोकामना बोलनी चाहिए। इसके बाद नारियल को यथा स्थान बाँध देना चाहिए एवं संकल्प लेना चाहिए कि मनोकामना पूर्ण होने पर चूरू धाम में श्री बाबोसा भगवान के दर्शन करने आवश्य आएंगे।
” बाबोसा“ महामंत्र की महिमा
हमारे शस्त्रो में ध्वनि का अत्यंत महत्व है। हमारे द्वारा उच्चारित प्रत्येक का अलग महत्व है। ध्वनि का अपना अलग विज्ञान है। हर अक्षर एवं हर शब्द अपना विशेष अर्थ रखता है। अक्षर का सुव्यवस्थित संयोजन उन्हें मंत्र का रूप प्रदान करते है। कुछ शब्द स्वयं ही अपने विशेष अर्थ के कारण मंत्र का रूप धारण कर लेते है। ऐसे ही ¬ बाबोसा महामंत्र आज सभी भक्तों के लिए श्रद्धा एवं आस्था का केंद्र बन गया है। ”¬“ यानि ओंकार। इस मंत्र के उच्चारण से सारे वायुमंडल में एक विशेष प्रकार का कंपन होता है।  को सृष्टि का आदि मंत्र माना गया है। ”बाबोसा“ नाम के तीनों अक्षर विशेष अर्थ रखते है। प्रथम ”ब“ यानि ब्रह्मा, द्वितीय ”ब“ यानि विष्णु एवं तृतीय “स” यानि शंकर। बीच के “ब” में ओ की मात्रा जुड़ने से उसमें ओउम की ध्वनि भी शमिल हो गई। इस प्रकार ”¬“ ब्रह्मा, विष्णु, महेश का सार लेकर “बाबोसा” का नाम एक महामंत्र का रूप धारण चुका है। इसलिए इस महामंत्र का जाप भक्तो के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। भक्तो का विश्वास है कि शुद्ध मन से श्रद्धा के साथ किया गया यह जाप अपना असर अवश्य दिखाता है।
श्री बाबोसा दिव्य स्थलः
मिंगसर वार्षिक 2007 के अवसर पर श्री बाबोसा दिव्य स्थल पर श्री बाबोसा भगवान की विशाल मूर्ति का अनावरण हुआ था। इस मूर्ति की ऊँचाई 65 फुट है। यह मूर्ति राजस्थान की सबसे ऊँची और देश की चंद ऊंची प्रतिमाओं में से एक है।
इसका निमार्ण 8 महीने की रिकार्ड अवधि में पूरा हुआ। मूर्तिकार श्री मातुराम वर्मा के शब्दों में इतने कम समय में इतनी बड़ी मूर्ति का निर्माण स्वयं में एक आश्चर्यकारी घटना है। इसके अनुसार इस मूर्ति के निर्माण में समय उन्हें हर पल यह महसूस हो रहा था कि कोई दिव्य शक्ति उनसे यह कार्य करवा रही है। मूर्ति के भूतल में एक अत्यंत सुंदर चित्र विथिका (फोटो गैलरी) भी बनाई गई जिसके माध्यम से श्री बाबोेसा भगवान से संबंधित कई महत्वपूर्ण घटनाओं की झलक पेश की गई है। राजस्थान के पर्यटक स्थलों में एक नया नाम जुड़ गया है श्री बाबोसा दिव्य स्थल प्रतिदिन बड़ी संख्या में दर्शक व पर्यटक श्रद्धापूर्वक इस स्थल पर आकर श्री बाबोसा भगवान के चरणों में अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते है।
भक्तों का विश्वास है कि इस विशाल प्रतिमा के चरणों के दोनो अंगूठों को एक साथ स्पर्श कर माँगी गई मन्नत अवश्य पूर्ण होती है

वैज्ञानिकों ने भी आत्माओं के आस्तित्व को स्वीकार किया

जहाँ अधिकांश लोग प्रेतआत्माओं के अस्तित्व को स्वीकारते दिखाई देते हैं तो वहीं ऐसे लोग भी है जो कि ऐसी बातों को दकियानूसी, मूर्खतापूर्ण विचार कहकर नकार देते हैं। उनकी दृष्टि में आत्मा, परमात्मा जैसी चीजों के बारे में सोचना ही किसी मनोरोग से पीडि़न इंसान के लक्षण हैं।
देखा जाए तो सृष्टि के आदिकाल से लेकर आज तक चाहे विश्व की कोई भी सभ्यता, संस्कृति रही हो, सब ने किसी न किसी रूप में भूत-प्रेत आत्माओं के अस्तित्व को स्वीकार किया। आज भी पश्चिम के कई देशों में मृतात्मा को बुलाकर उनके साथ बातें करने जैसे प्रयोग अक्सर होते रहते हैं। इसलिए भूत प्रेत की बातों को गुब्बारे की भांति सिर से हवा में उड़ा देना भी ठीक नहीं है। मनुष्य की अनुभुति का दायरा अभी सीमित है। संसार के अनेकानेक रहस्य होते हैं, जिनका पता लगाया जाना अभी बाकी है। इसी वजह से प्रेत आत्माओं के आस्तित्व को नकारने की अपेक्षा यदि थोड़ा गंभीरता पूर्वक अन्वेषण किया जाए तो हो सकता है कि प्रकृति के किन्ही गहरे रहस्यों को उजागर किया जा सके।
यदि अपनी बान करूँ तो मुझे ये कहने में कोई संकाच नहीं है कि मैं भूत-प्रेत इत्यादि आत्माओं के अस्तित्व पर पूर्ण विश्वास रखता है। अब जो लोग इन सब बातों को सिर्फ मन की कल्पना या किसी प्रकार का मनोरोग मान बैठे हैं, अक्सर उन लोगों का ये तर्क होता है कि यदि भूत-प्रेत इत्यादि आत्माएँ हैं भी तो वह हमें दिखाई क्यों नहीं पड़ती। चलिए इसके बारे में बाते करते है लेकिन इसे समझने के लिए सबसे पहले स्थूल एवं सूक्ष्म के बारे में जानना होगा, उनके प्रकृति को समझना होगा।
अपने आस पास हम लोग स्थूल गतिमान वस्तुओं को देखते है, उनमें सर्वाधिक गति से चलने वाले हवाई जहाज की गति भी लगभग 1500/2000 मील प्रति घंटा के करीब होगी, परंतु अंतरिक्ष यान की बात की जाए तो उसकी गति इससे भी कहीं अधिक है, जो कि एक घंटे में लगभग 17,500 मील की गति से चलता है। अब मनुष्य के अतिरिक्त प्रकृति रचित पदार्थों की बात की जाए तो सूर्य, चंद्रमा, पृथ्वी, तारे इत्यादि विभिन्न आकाशीय पिंड है, जिनकी सर्वाधिक गति है। पृथ्वी तो अपनी धुरी 24 घंटे में महज 25,000 मील की दूरी ही तय करती है परंतु सूर्य जिसका अपना व्यास ही पृथ्वी से 100 गुणा है से भी अधिक है। उसे इस दूरी को लांघने में प्रायः 25 दिन का समय लग जाता है। हां सूर्य स्थूल होते हुए भी पृथ्वी की भांति सघन नहीं।
अब अगर इनकी तुलना शब्द से की जाए जो कि इनसे सूक्ष्म है, तो उसकी गति इन सबसे अधिक है। प्रकाश की गति शब्द से भी अधिक है, जो कि एक सैकेंड में 1,88,000 मील की दूरी तय कर लेता है। प्रकाश से सूक्ष्म मन को माना जाए तो उसकी गति को तो कोई भी माप ही नहीं है। हम सिर्फ इतना ही जानते हैं कि मन की कोई गति नहीं होती, जो कि एक क्षण में भूत, भविष्य की सभी सीमाएं लांघ जाता है। यदि मन से आत्मा को और अधिक सूक्ष्म कहें तो उसकी कोई गति है या नहीं, यह भी बता पाने में हमलोग असमर्थ है।
कुल मिलाकर कहने का अर्थ यह है कि ज्यों-ज्यों हम स्थूल से सूक्ष्म तत्व की ओर बढ़ते गए, त्यों त्यों गति और शक्ति में भी वृद्धि होती चली गई। ऐसा नहीं है कि आत्मा की कोई गति नहीं है, किंतु जिस प्रकार अत्यंत गतिशील वस्तु हमारी स्थूल आंखों से चलायमान नहीं दिखाई देती, बल्कि स्थिर हो जाती है, ठीक उसी तरह आत्मा की भी गति है, किन्तु जिसे नापने का हमारे पास कोई पैमाना नही है।
अत्यंत गतिशील वस्तु में स्थिर भी इसलिए दिखाई पड़ती है, कि हमारी आंख उस गति का अनुसरण नहीं कर पाती। हां, आजकल ऐसे कैमरे अवश्य निर्मित हो गए हैं, जो कि तेज गति से चलती वस्तु की भी तस्वीर खींच सकते है, लेकिन वो भी एक सीमा तक, किसी सूक्ष्म वस्तु के मापने के लिए भी उतना ही सूक्ष्म यंत्र चाहिए होता है, जितना कि वस्तु सूक्ष्म है। वैज्ञानिक ये बता सकते हैं कि पृथ्वी का कितना वजन हैे, केवल पृथ्वी ही क्यों सूर्य, चंद्र, इत्यादि आकाशीय पिंडों के घनत्व, द्रव्यमान, गति इत्यादि के बारे में भी काफी अधिक जान चुके हैं। लेकिन ये नहीं बता सकते कि सूक्ष्माणु का आकार कितना है, उसमें भार कितना है? उनकी गति कितनी है? क्यों नहीं बता सकते, क्योंकि हमारे पास उसके माप तौल का कोई यंत्र नहीं है। तो ठहरे मन और आत्मा तो अणु से भी सूक्ष्म है। उनका मापन दृश्यावलोकन कैसे हो? कुछ भी हो विज्ञान की ये विवशता है कि आत्मा जैसे सूक्ष्म तत्व के महत्व को ही प्रमाणित करती है। जल शक्ति से हम सभी भली-भांति परिचित है। परंतु जब यही जन वाष्प रूप में परिवर्तित होकर सूक्ष्म रूप में आ जाता है तो उसकी शक्ति भी उतरोत्तर प्रचंड वेगदायक होती है। हमें विज्ञान बताता है कि सूक्ष्म की गति और शक्ति स्थूल से अनेक गुणा अधिक है, और यदि हम भूत-प्रेत आदि किसी आत्मा की बात करें तो जो कि सूक्ष्म से भी कहीं सूक्ष्म है तो तर्क से यह भी माना जा सकता है कि इन सूक्ष्म तत्त्वों की गति और शक्ति भी अनंत है और आयु भी।
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश नामक पांचो तत्वों में से किसी की भी मृत्यु नहीं होती, इनमें से कोई तत्व नष्ट नहीं होता। सिर्फ इनका रूप परिवर्तन ही होता है। तो क्या यह न माने कि मनुष्य की मृत्यु भी उसका अंत नहीं है। क्योंकि मनुष्य शरीर भी तो इन्हीं पांच तत्त्वों से बना है। जब कैसे उपरोक्त पांचो तत्वों में से किसी भी तत्व का अंत नही हो रहा तो मनुष्य शरीर का अंत मनुष्य का अंत हो जाता है?
विज्ञान कहता है कि हमारा जो ये स्थूल शरीर है, वास्तव में यह असंख्य परमाणुओं का एक पुंज है और प्रत्येक प्रमाणु के भीतर एक इलैक्ट्राॅन और एक प्रोटोन होता है, जो कि भिन्न दिशाओं में करोड़ो चक्कर प्रतिक्षण लगाते रहते हैं। अब ये चक्कर क्यों लगते रहते हैं पता नहीं।
जब कोई व्यक्ति मर जाता है तो क्या उसका सचमुच अंत हो जाता है? अब शरीर मर गया, जल गया, डूब गया, तो भी इन परमाणुओं का नाश तो नहीं हुआ। जिन अणुओं, परमाणुओं के समूह से वह बना था वो उसके मरने के बाद भी नष्ट नहीं होते, उसी तरह चक्कर काटते रहते हैं। जो बुनियादी वस्तु है तो फिर भी विद्यमान। जो परमाणु पुंज था, वही मात्र बिखर गया। हमारे पास इन सब चीजों को देखने का कोई साधन नहीं इसलिए हम ऐसा मानते हैं कि अमुक व्यक्ति मर गया। पर हमें क्या खबर कि आगे चलकर क्या हुआ? वाष्प बना तो क्या जल से हुआ। एक तो वाष्प रूप में परिवर्तित होने से उसकी गति और शक्ति दोनों ही कई गुणा बढ़ गई, दूसरे आखिर में वो दुबारा बना जल ही। ठीक इसी प्रकार से मरने के बाद शेष रह जाता है, जिसे कि हम लोग आत्मा के नाम से जानते हैं उसकी गति की एवं शक्ति भी अन्नत गुणा बढ़ जाती है। इन्हीं आत्माओं को चाहे तो हम लोग भूत कह लें या प्रेत, जिनकी गति और शक्ति भी जीवित इंसान के भीतर मौजूद आत्मा से कहीं अधिक बढ़ चुकी होती है। किंतु ये आत्माएं भी आस्तित्व के रहते हुए शरीर साधन के बिना कुध अभिव्यक्ति प्रकट नही कर पाती। हां भूत प्रेत के रूप में उनके सूक्ष्म शरीर की हरकतें यदा-कदा अवश्य प्रकाश में आ जाती है।
अणु परमाणु से भी सूक्ष्म जो ये शक्ति है। माना कि उसका हुलिया, उसकी आकृति-प्रकृति के बारे में विज्ञान अभी नहीं बता सकता। परंतु नहीं यदि सूक्ष्मतम का साक्षातकार करने में हम लोग विवश हैं तो क्या यह मान लिया जाए कि एक सीमा से आगे रास्ते बंद हो चुके हैं और सूक्ष्मतर या सूक्ष्मता जैसी कोई चीज है ही। परंतु सत्य तो यह है कि इस सूक्ष्मीकरण का कोई अंत नहीं, सूक्ष्मतम के बाद भी रास्ता आगे बढ़ता चला जाता है, जिस पर कि हमारी कल्पनाशक्ति भी दौड़ने में असमर्थ प्रकट कर देती है, हम विवश हैं इससे सूक्ष्मतम सिद्ध नहीं होता बल्कि हमारी निरीहता ही प्रकट होती है।
सचमुच कितने लाचार हैं हम उस सृष्टिकर्ता के आगे……………