मन में नेगेटिव विचार आते हैं तो जिंदगी में जरूर लाएं ये 5 बदलाव

कई बार मन में नकारात्मक विचार कुछ इस तरह घर कर जाते हैं कि हमारी सोच ही नकारात्मक होती जाती है और जीवन में सिर्फ निराशा ही दिखती है। नकारात्मक विचार मन में जितने अधिक होंगे अवसाद उतनी ही तेजी से हमें घेरेगा। ऐसे में इन्हें खुद से दूर रखने का हर संभव प्रयास हमारे लिए जरूरी है। अगर आप भी अक्सर ऐसे ही नकारात्मक भावों से घिर जाते हैं तो अपने भीतर छोटे-छोटे बदलाव करें और सकारात्मक दिशा में बढ़ें।

मनोविज्ञान को समझें – मनोविज्ञान में नकारात्मक भावों से दूर रखने के लिए कॉग्नीटिव बिहेवियरल थेरेपी, साइकोथेरेपी आदि विधाओं में कई उपाय हैं। आप इनसे संबंधित किताबें पढ़ सकते हैं जिससे बहुत हद तक आपकी सोच में बदलाव आएगा और आत्मविश्वास बढ़ेगा।

दौर बीत जाता है – हर समस्या का अपना एक दौर होता है जो जीवन में कभी न कभी आता है और बीत भी जाता है। ऐसे में किसी समस्या को अपने जीवन से इतना बड़ा न बनाएं कि वह दौर आपको अपने आप से बड़ा लगने लगे। बड़ी से बड़ी समस्या को आप सिर्फ एक दौर मानकर चलें तो मन में निराशा कभी बैठ ही नहीं सकती।

अपनी काबिलियत को न भूलें – हो सकता है समय सही न हो, हो सकता है आपकी किसी गलती का खामियाजा आपको दिन-रात परेशान करता हो, लेकिन इन सबके बीच आपके व्यक्तित्व के गुणों कभी दरकिनार न करें। बुरे से बुरे समय में भी अपने गुणों को याद रखें। कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं होता लेकिन हर किसी में अच्छाई-बुराई तो होती ही है। इसलिए अपनी कमियों को पहचानें पर अपने गुणों की अनदेखी न करें।

खुद निर्णय लेना सीखें – अवसाद की स्थिति में मजबूत से मजबूत व्यक्ति भी निर्णय नहीं ले पाता। ऐसे में छोटे-छोटे निर्णयों को लें और उन पर अमल करें। ये न सोचें कि आपके निर्णय का परिणाम क्या होगा, सिर्फ यह ध्यान में रखें कि एक बार अगर अपने किसी निर्णय पर अमल किया तो वह अनुभव ही होगा।

ब्लड प्रेशर ज्यादा रहता है तो आजमाएं ये जबरदस्त नुस्खा

अगर आपको हाई ब्लड प्रेशर की वजह से अक्सर चक्कर आते हैं या सिर में असहनीय दर्द रहता है। जिससे राहत पाने के लिए आप या तो डॉक्टर की दुकान के चक्कर लगाते हैं या किसी पेन किलर का सहारा लेते हैं। तो अब घबराने की जरूरत नहीं है। एक आसान सा नुस्खा अपनाकर आप इस परेशानी से हमेशा के लिए बिना कोई दवाई खाए छुटकारा पा सकते हैं। बड़ी इलायची में कई औषधीय गुण होने की वजह से ये सांस से जुड़ी कई बीमारियां जैसे अस्थमा, फेफड़े में संकुचन आदि के साथ ब्लड प्रेशर की दिक्कत को भी दूर करती है। देखिए कैसे इसकी मदद से ब्लड प्रेशर को ठीक किया जा सकता है। 200 ग्राम बड़ी इलायची लेकर तवे पर भून लें। इलायची को इतना भूने कि जल कर उसकी राख हो जाए। इलायची की इस राख को पीस कर एक डिब्बे में भरकर अपने पास रख लें। इसके बाद रोज सुबह और शाम खाली पेट खाना खाने से 1 घंटा पहले 5 ग्राम इलायची की राख को 2 चम्मच शहद के साथ मिलाकर खाएं। लगातार 15 से 20 दिन तक इस नुस्खें को आजमाने से आपको किसी भी बीपी की किसी दवा की जरूरत नही पड़ेगी। इस उपाय के अलावा अगर आपके मुंह से दुर्गंध आती हो तो बड़ी इलायची चबाकर आप इस परेशानी से भी निजात पा सकते हैं। इतना ही नहीं मुंह के घावों को ठीक करने के लिए भी बड़ी इलायची का इस्तेमाल किया जाता है।

आज बीमारियों की रोकथाम के लिए जितनी तेजी से तरह-तरह की दवाइयों का निर्माण हो रहा है, उतनी ही तेजी से मनुष्य नई-नई बीमारियों के शिकंजे में जकड़ता जा रहा है। इनमें कुछ बीमारियां तो ऐसी भी हैं जिनका अभी तक कोई कारगर इलाज नहीं खोजा जा सका है। कैंसर भी एक ऐसा ही रोग है। रसायनिक दवाइयों से कीमोथैरेपी, विकिरण से रेडियोथैरेपी, हार्मोन थैरेपी तथा इम्यूनोथेरेपी जैसी आधुनिक चिकित्सा प्रणालियों के बाद भी कैंसर से मरने वालों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार पूरे विश्व में प्रतिवर्ष लगभग 80 लाख मौतें सिर्फ विकासशील देशों में होती हैं जहां कैंसर से लड़ने के संसाधन अत्यंत कम हैं। विकसित देशों में व्याप्त जानलेवा रोगों में कैंसर का स्थान चौथा है और 6 प्रतिशत मौतों का कारण है। भारत में मौत के दस प्रमुख कारणों में से कैंसर एक प्रमुख कारण है। यहां एक लाख लोगों में से सत्तर लोगों में कैंसर का प्रकोप देखा गया है और हर आठ में एक को कैंसर होने की संभावना है। हर वर्ष यहां कैंसर के पांच लाख नए मरीज बन जाते हैं। कैंसर एक गैर संक्रामक रोग है। यह कोई वंशानुगत बीमारी भी नहीं है। फिर भी कभी-कभी कुछ परिवारों में यह रोग एक से अधिक सदस्यों को अपनी चपेट में ले लेता है। कैंसर किसी भी आयु में, किसी भी व्यक्ति को हो सकता है। स्त्री-पुरूष, बच्चे, युवा, वृद्ध सभी इसके शिकार हो सकते हैं। कैंसर का सबसे बड़ा कारण है- पर्यावरण प्रदूषण। दो-तिहाई कैंसर गलत खान-पान व रहन सहन की आदतों के कारण होता है जैसे-तंबाकू, बीड़ी, सिगरेट, सुपारी, पान-मसाला, शराब आदि का अत्यधिक सेवन। कुछ दवाइयां, हार्मोंस, एक्स रे एंव अल्ट्रा वायलेट किरणें भी कैंसर का कारण बन सकती हैं। यह मानव शरीर के किसी भी अंग में हो सकता है। वर्तमान में गुटखा या पान मसाला खाने का व्यसन जिस तेजी से बढ़ा है उसी अनुपात में मुंह का कैंसर के रोगियों में भी वृद्धि हुई है। मुंह के कैंसर के इलाज की अब तक कई आधुनिक विधियों का आविष्कार हो चुका है। रेडियोथेरेपी द्वारा मुंह के कैंसर का काफी सीमा तक उपचार संभव है परंतु इन नई विधियों के बाद भी अगर यह बीमारी हो जाए तो आज भी उसका शत-प्रतिशत नहीं है। साधारणतया मुंह का कैंसर उन व्यक्तियों में अधिक होता है जो तंबाकू का प्रयोग चूने के साथ करते हैं एंव बीड़ी, सिगरेट या सिगार पीते हैं। कुछ चिकित्सकीय व्याधियां जैसे टाइलोसिस पामेरिस, पैटर्सनब्राउन, कैलीसिड्रोम, भोजन में आयरन की कमी से होने वाला एनीमिया, ग्रास नली का एक्लेजिया इस कैंसर के अन्य स्वरूप हैं। ग्रास नली के कैंसर का उपचार कीमोथेरेपी, बाह्य विकिरण चिकित्सा और अंत विकिरण चिकित्सा के समन्वित सहयोग से किया जाता है जिसके अच्छे परिणाम सामने आये हैं। फिर भी इसमें 20 से 30 प्रतिशत रोगियों में भी पूर्णरूपेण रोग मुक्त होने की संभावनाएं बन पाती हैं। रक्त कैंसर से हर साल हजारों व्यक्ति मौत के मुंह में जा रहे हैं। रक्त कैंसर के दो वर्ग हैं। एक वर्ग ‘क्रॉनिट रक्त कैंसर’ का तथा दूसरा वर्ग ‘एक्यूट रक्त कैंसर’ का होता है। कुछ कैंसर ऐसे होते हैं जो सिर्फ महिलाओं को होते हैं। इनमें से एक है स्तन कैंसर। पैंतीस से चौवन वर्ष की आयु की महिलाओं को होने वाला सबसे घातक रोग स्तन कैंसर है। वैज्ञानिको के अनुसार स्तन कैंसर हार्मोन में परिवर्तन, बी. आर. ए. सी. जीन, वंशानुगत प्रभावों, अधिक उम्र में गर्भ धारण, मासिक चक्र की अनियमितता, रजोनिवृत्ति एंव पर्यावरण में विद्यमान कैंसरजन्य पदार्थो के कारण हो सकता है। स्तन कैंसर का प्रारंभिक अवस्था में दवाइयों, इंजेक्शनों आदि की मदद से अथवा कैमोथेरेपी चिकित्सा पद्वति द्वारा इलाज किया जा सकता है। सर्जरी, रेडिएशसन एंव हार्मोन थेरेपी स्तन कैंसर के उपचार की अन्य विधियां हैं। कैंसर के अनेक प्रकारों के अनुसार उसके कारण भी बहुआयामी हैं परंतु विभिन्न शोधों से यह तथ्य निर्विवाद रूप से सत्य है कि उसकी रोकथाम में शरीर की आंतरिक क्षमता की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण हो सकती है। कैंसर जैसे रोग के हो जाने के बाद उपचार भले ही कठिन है लेकिन थोड़ी वैज्ञानिक जीवन शैली और थोड़े संतुलित आहार के सहारे काफी सीमा तक अपने आप को कैंसर से सुरक्षित रखा जा सकता है। समुचित खान-पान कैंसर से लड़ने का प्रमुख हथियार बन सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसर कैंसर को नियंत्रित करने में सक्षम विटामिन ‘ए’ और ‘बी’ केरोटीन तत्व प्राकृतिक रूप् से साग-सब्जियों में पाए जाते हैं। ये मेथी, पालक, गोभी, आलूबुखारे एंव गाजर आदि में उपलब्ध होते हैं। जिन देशों-प्रदेशों के लोग भोजन में हरी साग-सब्जी एंव ताजी फलों का सेवन करते हैं, वहां इस के रोगी बहुत कम पाए जाते हैं। विटामिन ‘सी’ से युक्त खाद्य पदार्थो का सेवन करके भी कैंसर से बचा जा सकता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि सीधी-सरल प्राकृतिक जीवनशैली अपनाकर एंव साग-सब्जी तथा ताजे फलों के नियमित सेवन से कैंसर जैसी घातक बीमारी से दूर रहा जा सकता है। इसके लिए लोगों में जागरूकता पैदा करके कैंसर के भयावह शिंकजे से मुक्त रहने का सामूहिक प्रयास किया जाना चाहिए। ‘सादा जीवन, सादा भोजन’ का सूत्र ही मानव जाति को इस भयावह बीमारी से बचा जा सकता है।

एड्स एक जानलेवा रोग न होकर खतरनाक रोग है। आम धारणा भले ही यह हो कि असुरक्षित सेक्स से एड्स होता है किंतु यही सच नहीं। सच तो यह भी है कि ब्यूटी पार्लर से भी आप एड्स का शिकार हो सकते हैं। दवाखानों से तो एड्स का खतरा रहता ही है। जेन्ट्स पार्लर सबसे ज्यादा असुरक्षित क्षेत्र हैं। सस्ते पार्लर क्या और महंगे पार्लर क्या, दोनों ही पार्लर सुरक्षित नहीं है। क्या आपको याद है कि पार्लर से सेवारत लोग कपड़े झटक कर ग्राहक के ऊपर डाल देते हैं। प्रतिदिन कपड़े ठीक ढंग से धुलने चाहिए। रेजन, ब्रुश, कंघी प्रतिदिन सैकड़ों लोग इस्तेमाल करते हैं। अन्य सामग्री के दौरान भी सावधानी नहीं बरती जाती है। ग्राहकों को कहां खबर है कि पार्लर में उपयोग की जाने वाली अधिकांश कॉस्मेटिक सामग्री घटिया क्वालिटी की होती है। नकली क्रीम चर्म रोग को आमंत्रित करती है। जरूरी नहीं कि ब्यूटीशियन प्रशिक्षित हों। अप्रशिक्षित ब्यूटीशियन नुकसान पहुंचा सकते हैं। गली मोहल्लों में पार्लर खुल चुके है। गांव और कस्बों में सैलून तो ढेरों होते है किंतु कहीं भी स्वास्थ्य की दृष्टि से कोई ठोस कदम नहीं उठाए जाते। इसी कारण संक्रमण फैलता जाता है। एड्स का प्रचार गलत ढंग से हुआ और इलाज भी गलत ढंग से किया जाता है। समाज एड्स पीडित को इस बुरी नजर से देखता है मानो उसने जघन्य अपराध किया हो। असुरक्षित सेक्स से यदि बचने का प्रयास किया जाए तो एड्स से घबराने की जरूरत नहीं। जरूरी नहीं कि आप बाहर से गुप्त रोग लायेंगे। घर बैठे भी आप गुप्त रोगों के शिकार हो सकते हैं। रक्त चढ़ाने के दौरान भी लापरवाही से एड्स फैल सकता है। ब्लड़ डोनेशन के दौरान भी सावधानियां बरतनी चाहिए। पार्लर जाते समय आप साथ में ऐप्रन तो ले जायेंगे नहीं। न ही अपना नैपकी, क्रीम यूज करेंगे। सावधानी कैसे बरतेंगे? सावधानी का सबसे आसान तरीका यह है कि बेवजह सैलून में जा कर दाढ़ी न बनवाएं। कटिंग करवाते समय भी सावधान रहें। रेजर नया यूज करने को कहिए। बालों को डाय कराना चाहते हैं तो घर पर करें। पार्लर में ब्रश एक ही रहता है और उसी ब्रश से वह सभी के बालों का काला करता हैं। मेहंदी लगाता है। समझ गए न सावधानी।

जीवन संयमित एवं नियम अनुसार चले, तभी हम स्वस्थ रह सकते हैं, अन्यथा बीमार होकर और नकली दवाइयां खा कर ज्यादा बीमार पड़ सकते हैं। कुछ प्राकृतिक स्वास्थ्य निर्देशों का पालन करें तो यथा संभव बीमारी एंव डॉक्टर से बचा जा सकता है।

  •  भोजन के साथ जल ना पिंए। आधे घंटे बाद पिएं। भोजन के साथ पानी पीने से पाचक रस काम नहीं करते। मूत्र त्याग के पश्चात पानी पीने से शरीर की कोशिकाओं में जल की कमी नहीं होती।
  •  पेचिश व मरोड़ में बार-बार शर्बत, नींबू-पानी, जूस, दाल व सूप पिएं। शरीर की धातुएं संतुलित रहेंगी। नशे वाली वस्तुओं से यथा संभव बच कर रहें। थोड़ जहर भी अमृत है। ज्यादा अमृत भी जहर बन सकता है।
  •  मिर्च मसाले, लाल मिर्च, अचार, ज्यादा नमक, चीनी, घी, मैदा से बचें। ये शरीर को ज्यादा लाभ नहीं देते।
  •  कोशिश करें कि मौसमी फल व सब्जियां ज्यादा खायें। इनसे विटामिन, एंजाइम और खनिज मिलते हैं।
  •  सप्ताह में एक उपवास करें या जब भूख लगे, तब खांए। भूख न हो तो जबरदस्ती ना खाएं।
  •  जब भी खांए, पौष्टिक पदार्थ खाएं। अखाद्य पदाथ ना खाएं क्योंकि आप शरीर की कोशिकाओं का पोषण कर रहे है जो हमें जीवित रखती हैं।
  •  गुस्से एवं शोक में भोजन ना खाएं। जल्दी-जल्दी भोजन न खाएं।
  •  प्रातः चार कि. मी. सैर अवश्य करें। उषा पान की आदत डालें। प्रातः कालीन चाय छोड़ने का प्रयत्न करें।
  •  सब्जियों को छिलके सहित धोकर बनाएं। यथा संभव फल भी छिलके सहित खाएं। आटा चोकर सहित एंव अनाज अंकुरित करके, दालें साबुत एंव अंकुरित करके खाएं। इससे इनके पोषक तत्वों में वृद्धि हो जाती है।
  •  दिन में तीन बार चार घंटे के पश्चात खाएं क्योंकि 4 घंटे में पेट खाली हो जाता है।
  •  हरी सब्जियां व सलाद ज्यादा लें। अन्न कम खाएं। भोजन चबा कर खाएं। बासी भोजन न खांए। भोजन उतना ही बनांए जितने से पूर्ति हो जाए।
  •  चना, गुड़, आलू, केला व शक्कर भोजन में अवश्य खायें। प्राकृतिक रंगों वाली सब्जियां व फल खाएं। प्राकृतिक रंग रोगों से मुक्त करते हैं।
  •  घर साफ, हवादार व रोशनी युक्त हो। सूर्य किरणों से विटामिन डी लें।
  •  भोजन मिट्टी के बतनों और लोहे के बर्तनों में बनाएं जो लगभग अब किसी घर में नहीं होते। किसी समय लोग मिट्टी के बत्रन में साग, दूध गर्म करते थे। हलवाई के पास लोहे की बड़ी कडाही में से लोग दूध पिया करते थे जो अब लगभग बंद हो गया है। घर में लोहे की कड़ाई में सूखी सब्जी बनायें।
  •  लस्सी, दही एंव फल सब्जियों का रस व गाजर का रस ज्यादा प्रयोग करें और तंदुरूस्त रहें। प्रकृति ने हमें 100 वर्ष का जीवन दिया है। हम अपनी नादानियों से इसे कम करते हैं। नियमपूर्वक चलने से हम दीर्घायु प्राप्त कर सकते हैं।

ज्यों-ज्यों भौतिक सुख-सुविधाओं का बाहुल्य होता जा रहा है, त्यों-त्यों हमारी कंचन काया नाना प्रकार के रोगों से ग्रस्त होती जा रही है। नये-नये अन्वेषण हो रहे हैं और नई-नई बीमारियों को चिकित्सक हमारे सामने प्रकट करते जा रहे हैं तथा उनकी चिकित्सा के लिए औषधियां भी प्रस्तुत करते जा रहे हैं। चिकित्सा के क्षेत्र में इतनी तथा कथित प्रगति होते हुए भी हम प्रतिदिन ऐसे रोगों से ग्रस्त होते जा रहे हैं जो असाध्य हो गये हैं। शरीर को अधिक आराम देना, कोई भी शारीरिक श्रम न करना, बिना विचार किए अधिक मात्रा में खाद्य-अखाद्य वस्तुओं का सेवन करना, दिन भर खाते रहना, उचित आराम न करना, खाने के लिए जीना, शराब, अफीम, तंबाकू, गांजा आदि हारिकारक पदार्थो का सेवन करना इत्यादि का मनुष्य ने जो नियमित क्रम बना लिया है, वही रोगों के उपचारित न होने, बढ़ने, एक रोग समाप्त होने से पूर्व कई रोगों के उभर आने का मूल कारण है। इसके अतिरिक्त कुछ दवाइयों की प्रतिक्रिया भी कुछ अंशों में इसके लिए जिम्मेवार है। हम अपनी धात्री-प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं तथा हमारा अप्राकृतिक रहन-सहन हमारे शरीर को अंदर से जर्जर करता जा रहा है, अतः हमें सावधान एवं जागरूक रहने की विशेष आवश्यकता है। यदि मनुष्य स्वयं को पंच तत्वों से उपचारित करने की नैसर्गिक कला सीख ले तो शायद पंचतत्वों से निर्मित इस शरीर को किसी औषधि की आवश्यकता न पड़े। इसी के साथ ही कुछ शारीरिक-परिचालन को अपनाकर भी हम रोगों को दूर रख सकते हैं। इन्हीं क्रियाओं में एक क्रिया ‘ताली-बजाना’ भी है। प्राचीन काल से मंदिरों में आरती, भजन-कीर्तन, पूजा आदि में हम ताली बजाते आए हैं। ताली बजाने से सिर्फ भक्ति भावना ही दिखाई नहीं पड़ती है अपितु शरीर को स्वस्थ रखने का उत्कृष्ट साधन है। ताली बजाने से उत्कृष्ट प्रकार का व्यायाम हो जाता है जिससे शरीर की निष्क्रियता समाप्त होकर उसमें क्रियाशीलता की वृद्धि होती है। शरीर के किसी भाग में रक्त-संचार में रूकावट या बाधा पड़ रही हो तो वह बाधा तुरंत समाप्त हो जाती है। ताली बजाने से शरीर के अंग सम्यक् रूप से कार्य करने लगते हैं, रक्तवाहिकाएं ठीक रीति से तत्परता के साथ शुद्धिकरण हेतु रक्त को हृदय की ओर ले जाने लगती हैं और उसको शुद्ध करने के अनंतर सारे शरीर में शुद्ध रक्त पहुंचाती हैं। इससे हृदय रोग और रक्त से पूरी तरह निष्कासन होते रहने के कारण, फेफड़ों की बीमारियों की भी समाप्ति हो जाती है। रक्त में लाल रक्त कणों की वृद्धि होती है जिससे कई रोगों से मुक्ति मिल जाती हैं। नलिकाओं में रक्त का थक्का बनना समाप्त हो जाता है और भविष्य में हृदय या धमनियों की शल्य-क्रिया कराने की नौबत नहीं आने पाती। फेफड़ों में शुद्ध ऑक्सीजन की पर्याप्त मात्रा होने के कारण तथा अशुद्ध हवा का फेफड़ों से पूरी तरह निष्कासन होते रहने के कारण, फेफड़ों की बीमारियों की भी समाप्ति हो जाती है। रक्त में लाल रक्त कणों की वृद्धि होती है जिससे कई रोगों से मुक्ति मिल जाती है। ताली बजाने से श्वेत रक्तकण सक्षम तथा सशक्त बन जाते हैं, जिससे शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बहुत बढ़ जाती है। मनुष्य निरोग होने लगते हैं। शरीर में चुस्ती, फरती तथा ताजगी आ जाती है। ताली बजाने से हाथों के एक्यूप्रेशर केंद्रों पर अच्छा दबाव पड़ता है और शरीर निरोग होने लगता है। शुद्ध रक्त हृदय से पैरों तक पूरी क्षमता से दौड़ता है, जिससे हमारा शरीर निरोग होने लगता है। किस रोग में कितनी देर तक ताली बजायी जाए या कैसे बजायी जाए, इसका निर्धारण आपकी शारीरिक शक्ति एंव रोग जिसका उपचार किया जाना है, उसका आंकलन करके ही हो सकता है। अपने शरीर की शक्ति का अनुमान लगाकर उन तालियों को जो आपके लिए सहज एंव उपयुक्त हों, अपनायें। इस सहज स्वाभाविक योग से मात्र कुछ दिनों में आप रोग को दूर करके शरीर को अधिक न थकाते हुए स्वयं को चुस्त, दुरूस्त एंव तंदुरूस्त रख सकते हैं।

नमक प्राचीकाल से भोजन के स्वाद को बढ़ाने हेतु प्रयोग किया जाता रहा है। पुरानी पीढ़ी नमकीन, भुजिया, समोसे, पकौड़े, पूड़ियों व कचौड़ियों का आनंद लिया करती थी तो नई पीढ़ी पिज्जा, बर्गर, वेफर्स व नूडल्स की दीवानी है। भोज्य पदार्थ चाहे नये हों या पुराने नमक के बिना तो उनकी कल्पना ही नहीं की जा सकती। मीठा खाए बिना रहना उतना कठिन नहीं है जितना नमक खाए बिना रहना है किंतु नमक के अधिक उपयोग को उच्च उक्तचाप के मरीजों हेतु हानिकारक माना जाता है, इसलिए डॉक्टर उच्च रक्तचाप के मरीजों को नमक कम मात्रा में खाने की सलाह देते आए हैं। अब नवीन शोधों से पता चला है कि उच्च रक्तचाप के कुछ रोगी ऐसे भी होते हैं जिन्हें नमक कम या अधिक खाने से कोई अन्तर नहीं पड़ता। नमक कम करने से भी उनके रक्तचाप में कोई कमी नहीं आती। यह जानने के लिए कि आपका रक्तचाप किस श्रेणी में है, आप चार सप्ताह हेतु नमक कम खाकर देखें। यदि आपका रक्तचाप कम होता है तो आप उस श्रेणी में हैं जिन्हें अधिक नमक लेने से कठिनाई हो सकती है। आप किसी भी श्रेणी में हों, आपके लिए नमक सीमित मात्रा में खाना ही उचित होगा। इस हेतु आप कुछ उपाय अपना कर नमक की मात्रा पर काबू पा सकते हैं।
 भोजन के साथ कुछ मात्रा में नमक लेना तो आवश्यक है किंतु यदि आप अतिरिक्त नमक डालकर खाने के आदी हैं तो आप इस आदत को छोड़ने का प्रयास करें।
 भोजन के साथ दाल व सब्जियों को सीमित मात्रा में ही खायें। अचार, चटनी, पापड़ व सॉस का सेवन न करें। यदि छोड़ न सकें तो घर पर बनी कम नमक वाली चटनी ही खायें।
 बाजार के पापकॉर्न, वेफर्स, नमकीन, दालमोठ, गोलगप्पे आदि का सेवन न करें।
 बाजारी मक्खन, चीज, पेस्ट्री, केक व आइसक्रीम में काफी मात्रा में सोडियम होता है, अतः इन्हें भी अपनी दैनिक दिनचर्या से निकाल दें।
 यदि आप मांसाहारी भोजन के शौकिन हैं तो सासेज, बेकन, डिब्बाबंद मांस या मछली न खायें।
 ताजे फल आपके लिए लाभदायक हैं किंतु डिब्बाबंद जूस और फलों में काफी सोडियम होता है।
 सलाद का सेवन लाभदायक है किंतु सलाद पर केवल नींबू डाल कर खायें। नमक या कोई बाजारू सलाद ड्रेसिंग न डालें।
 ये छोटे-छोटे उपाय अपना कर आप अपने रक्तचाप को काबू में रख सकते हैं और इस सुप्त दानव के खतरों से बच सकते हैं।

स्वस्थ रहना इतना मुश्किल नहीं है लेकिन यह हमारी ही लापरवाही का नतीजा है कि हम स्वस्थ नहीं रह पाते। हम अपना स्वास्थ्य स्वयं ही खराब करते हैं। लापरवाही का यह नतीजा होता है कि हमारा शरीर बीमारियों का घर बनता चला जाता है। ये बीमारियां फिर धीरे-धीरे विकराल रूप् धारण कर लेती हैं। यह तो सभी जानते हैं कि दिन जागने के लिए होता है और रात सोने के लिए। दिन में अपने सारे कार्यो को निपटाते हैं और रात को चैन से आराम करते हैं। जैसे खाना खाना एक काम है वैसे ही इसे पचाना भी एक काम है। जब हम अपने सारे काम दिन में ही कर लेते हैं तो हमें भोजन भी दिन में ही कर लेना चाहिए। रात को नहीं करना चाहिए। किंतु दिनभर काम में लगे रहने से हमें दिन में तो ढंग से खाने की फुरसत ही नहीं मिलती, तो रात को तसल्ली से ही भोजन किया जाता है। स्वस्थ रहने के लिए जरूरी है स्वास्थ्य के नियमों का पालन करना। भोजन करने के भी समय होते हैं। यदि हम समयानुकूल भोजन नहीं करेंगे तो चाहे कितना ही पौष्टिक भोजन क्यों न कर लें, बीमार जरूर पड़ेंगे। भोजन करने के क्या नियम हैं, पहले इन्हें जान लें। तभी स्वस्थ रह सकेंगे। हमारी सबसे बड़ी गलती यह होती है कि दिनभर जब हम काम में लगे रहते हैं, हमारे पास खाना खाने का समय नहीं होता जबकि रात में जो हमारे आराम करने का समय है, हम पेटभर खाना खाते हैं। इसी से स्वास्थ्य गिरता चला जाता है। हमारे शरीर को शक्ति मिलती है दोपहर के भोजन से न कि रात के भोजन से बल्कि रात में भोजन करने से शरीर में बीमारियों का घर बनता है। रात में भोजन करने से तो बचना चाहिए। दिन में पेट भर भोजन करना चाहिए। भोजन ताजा एंव गर्म होना चाहिए। उसमें सब्जी, फल, सलाद प्रचुर मात्रा में होना चाहिए। भोजन दिन में ही कई बार कर लें। भोजन इस प्रकार करें कि दूसरे समय तक खुल जाये। शाम होते ही भोजन कर लें। रात का इंतजार न करें। शाम को हल्का भोजन ही करें। जिनकी पाचन शक्ति कमजोर हो, वे जल्दी व हल्का भोजन कर लें। फिर रात में कुछ न खायें। दिन भर भोजन क्रम से करने से रात को भूख भी नहीं लगेगी। फिर भी यदि रात को भूख लगे तो दूध, सूप या कोई अन्य गर्म पेय लिया जा सकता है। दिनभर क्रम से भोजन करेंगे तो रात को भूख-प्यास नहीं लगेगी। यदि फिर भी रात को भूख-प्यास लगे तो अपने भोजन क्रम पर ध्यान दें। बिल्कुल पेट भरकर भोजन न करें। थोड़ी भूख रखें। भोजन में अरूचि न होने दें। रात में थककर घर आकर तुरंत भोजन न करें। थकान से भूख बढ़ती है। पहले थोड़ा आराम कर लें जिससे थोड़ी सी भूख शांत हो जाए। फिर थोड़ा गर्म शीतल पेय ले लें जो कि आपकी भूख को शांत करेगा। कुछ खास खाने का मन न करें तो ऐसी चीज दिन में ही खायें। जो व्यंजन रात में नहीं पच पाते, उन्हें दिन में ही अपने भोजन में शामिल करें। अपने भोजन पर ध्यान दें। भोजन करने के समय पर ध्यान दें। तभी तो आप स्वस्थ रह सकेंगी। याद रखें रात में भोजन करने से परहेज करें।

अनिंद्रा के है अनेक प्रकार

आज के बढ़ते औद्योगिक तथा भौतिक दौर में अनिंद्रा एक आम बीमारी हो गयी है। तरह-तरह की नींद की गोलियां भी पूरी तरह आराम नहीं दे पाती। इनकी आदत पड़ने पर प्रायः गोलियों की मात्रा बढ़ाते रहने से ही नींद आती है और इसका परिणाम होता है अनेक रोगों से घिर कर अपने जीवन को कंटकीय बना डालना। अनिंद्रा के अनेक प्रकार होते है।
इनीटार्डियाः- जिसकी वजह से तुरंत सो सकना संभव न हो, उसे इनीटार्डिया कहा जाता है। यह एक प्रकार की वैयक्तिक अक्षमता है, जो अक्सर उन लोगों में पायी जाती है जो शो बिजनेस से संबंध रखते हैं। इस वर्ग में सिनेमा, दूरदर्शन, प्रकाशन, फैशनों के आविष्कारक व प्रचार से संबंधित लोग आते हैं। ऐसे व्यक्तियों को प्रायः अकेले रहना पड़ता है तथा अत्यधिक व्यस्तता के कारण वे समय पर खा पी और सो नहीं पाते। वे जब भी अपने काम से लौटकर सोने के लिए बिस्तर पर जाते हैं, उनके अंदर दूसरे दिन की कार्य योजना बनने लगती है और वे तुरंत नहीं सो पाते।
स्कर्जोम्नियाः- यह अनिंद्रा का दूसरा प्रकार है। इसमें नींद तो तुरंत आ जाती है किंतु दो-तीन घंटे बाद ही स्वयं टूट जाती है। इसके बाद रोगी रातभर दुबारा नहीं सो पाता। परिणामस्वरूप अगले दिन उन्हें थकावट महसूस होती है। रोगी की मांसपेशियों में दर्द होता रहता है तथा आंखे लाल-लाल रहती हैं। आंखों में जलन होती है और जम्हाइयाँ आती रहती हैं। यह अवस्था उनमें आती हैं जो मानसिक तनावों से युक्त होते हैं। अधिकतर महिलांए स्कर्जोम्निया के शिकारी होते हैं। डा. एस. के. रावत के अनुसार यौन अतृप्ति, अत्यधिक चिंता, नशीले पदार्थो का सेवन, सुबह जल्दी उठने की चिंता, किसी बात का भय आदि अनेक कारणों से लोग स्कर्जोम्निया के शिकार हो जाते हैं।
हाईपर-लिक्सियाः- यह नींद न आने का तीसरा प्रकार होता है। इसमें अक्सर अनिंद्र व्यक्ति यही सोचता रहता है कि वह रात भर ठीक से नहीं सो सका है। वास्तविकता भी यह होती है कि नींद का आना-जाना सम्पूर्ण रात लगा रहता है। हल्की नींद के दौरान हमेशा जागते रहने का आभास रोगी को होता रहता है। रोगी को इस स्थिति से जब अनेक रातें गुजारनी पड़ जाती है तो वह झुंझला जाता है। हाईपर-लिक्सिया के रोगी रात के अलावा दिन में भी सोने का प्रयास करते हैं किंतु उन्हें गहरी नींद कभी नहीं आती। यह अवस्था उन लोगों में अधिक आती है जो नशीले एंव मादक पदार्थो का सेवन अधिक करते हैं। मांसाहार एंव अधिक चटपटे पदाथो्र को खाते रहने से यह अवस्था आती है। फास्ट-फूड खाने वाले लोग भी प्रायः हाईपरलिक्सिया के शिकार हो जाया करते हैं।
प्लाइसोम्नियाः- यह अवस्था प्रायः चालीस की उम्र पार करने के बाद आती है। इसमें ऐसी नींद आती है जिसमें बार-बार जागने का व्यवधान आ पड़ता है। अधिक उम्र वालों में जागने की मियाद (समय) बढ़ने लगती है और दुबारा सो पाने की क्षमता नहीं रह जाती। प्लाइसोम्निया से ग्रसित व्यक्ति बिस्तर पर लेटे-लेटे करवटें बदलता रहता है। इस बीमारी की वजह सिर्फ बुढ़ापा ही नहीं होती। उत्तरदायित्व में कमी, अकर्मण्यता, पहले जैसी पूछ न रह जाना, मान-मर्यादा घट जाना आदि स्थितियां ज्यादा वक्त बिस्तर पर बिताने को बाध्य कर देती हैं। जवानी में भी अगर कोई गहरा विषाद, ग्लानि, उदासी या मायूसी का शिकार हो जाता है तो उसे भी यह बीमारी हो सकती है।
इन्सोम्निया टर्बुलाः- डरावने एंव बुरे दुःस्वप्न भी अनिंद्रा का एक स्वरूप है। ऐसी अनिंद्रा जो दुःस्वप्नों से भरी रहती है उसे ‘इन्सोम्निया टर्बुला’ कहा जाता है। यह अवस्था बहुत ही तकलीफदेह होती है। ये दुःस्वप्न बड़े घने-गहरे और अलग-अलग वक्त पर अचानक नींद तोड़ने वाले होते हैं। किसी व्यक्तिगत हानि या कष्टकर स्थिति में प्रायः दुःस्वप्न दिखते हैं और नींद टूट जाती है। शरीर पसीने से लथपथ हो जाता हैं। दुबारा सोने की कोशिश करने पर भी रोगी सो नहीं पता। कभी-कभी तो दुःस्वप्न की अवस्था में घिग्धी तक बंध जाती है। रोगी का शरीर पीला हो जाता है। इस तरह अनेक प्रकार की अनिंद्रा आकर परेशान करती रहती है। अनिंद्रा के शिकार लोगों को चाहिए कि वे आत्म परिक्षण कर अनिंद्रा की वजह जान कर उसे दूर करने का प्रयास करें। अच्छी नींद लाने के लिए इन उपायों को अपनायें- बिस्तर पर जाने से पहले अच्छी तरह हाथ-पांवों को धो लें तथा बिस्तर पर आने के बाद अपने इष्ट का स्मरण करते हुए सोने का प्रयास करें। सोते समय दूसरे दिन की योजनाओं पर विचार न करें तथा सभी चिंता, भय का त्याग करके सोने का उपक्रम करें। रोज एक निश्चित समय पर ही अपने बिस्तर पर पहुंच जायें। बेड रूम में तीव्र प्रकाश वाला बल्ब न जलायें तथा उस रूम में सुगन्धित अगरबत्ती या इत्र का छिड़काव कर दें। सुविधापूर्ण स्थिति में सोयें। तकिया, उचित बिछावन, चादर आदि को यथा स्थान रखें। सोने वाले बिछावन पर बैठकर पढ़ना-लिखना या खाना खाना वर्जित करें। सभी काम करने के बाद सिर्फ सोने के उद्देश्य से ही बिस्तर पर जायें। अनिंद्रा की औषधियों से अपने आपको बचाने का हर संभव प्रयास करें क्योकि यह एक बुरी आदत बनती चली जाती है।

आमतौर पर रस्सी कूदना लड़कियों का खेल समझा जाता है, लेकिन आज यह व्यायाम के रूप में काफी लोकप्रिय हो रहा है। पश्चिम देशों में रस्सी कूदना एक आम व्यायाम है। रस्सी कूदना एक ऐसा व्यायाम है जिससे शरीर के सभी अंगों की अच्छी कसरत हो जाती है। अगर आपके पास व्यायाम के लिए ज्यादा समय नहीं है तो सिर्फ पंद्रह मिनट रस्सी कूदने से ही आपके पूरे शरीर की अच्छी कसरत हो जाती है। नियम से रस्सी कूदने से मोटापा तो कम होगा ही, साथ ही फिगर भी अच्छा बना रहेगा। रस्सी कूदने से पैर, टखनों तथा कलाइयों की अच्छी कसरत हो जाती है। वे मजबूत होते हैं व शारीरिक बल बढ़ता है। छोटे बच्चों के लिए रस्सी कूदना बहुत ही लाभदायक है। इससे शरीर मजबूत होने के साथ-साथ लंबाई बढ़ती है, भूख भी खुल कर लगती है। रस्सी कूदने से रक्त संचार तीव्र होता है लेकिन अगर आपको हृदय, लीवर या किडनी संबंधी या अन्य कोई बीमारी है, तो बिना डॉक्टर की सलाह लिए रस्सी न कूदें। रस्सी कूदने के लिए सबसे अच्छी जगह हरी घास का समतल मैदान है। कठोर और ऊबड़-खाबड़ जगह पर रस्सी कूदने से पैरों और घुटनों को चोट पहुंच सकती है। घुटनों के जोड़ों को नुकसान से बचाने के लिए अच्छे किस्म के स्पोर्ट जूते पहनें। चप्पल पहन कर या नंगे पैर रस्सी कूदने से बचें। रस्सी कूदने से पहले हल्के व्यायाम या जॉगिंग से शरीर को गर्म कर लेना चाहिए। रस्सी कूदते समय अपने शरीर को सीधा रखें। आप कितनी देर रस्सी कूदें, इसका कोई निश्चित नियम नहीं है। आप जितनी देर चाहें, रस्सी कूद सकती हैं पर इतनी देर भी नहीं कि आपके पैर जख्मी हो जाएं। हर चीज की अति नुकसानदेह होती है। रस्सी कूदने की अवधि धीरे-धीरे बढ़ाएं। यह नहीं कि आप पहले ही दिन इतनी रस्सी कूद लें कि वह हानिकारक साबित हो। पहले सप्ताह आप बिना रस्सी के पचास से सौ बार कूदें। पूरे सप्ताह यही तरीका अपनाएं। दूसरे सप्ताह अपने शरीर को पहले गर्म करके फिर सौ की गिनती पूरी करते हुए एक फीट के लगभग ऊंचा कूदें। हर दिन दस अंक गिनती में बढ़ाएं। तीसरे सप्ताह भी रोज की तरह अपने शरीर को गर्म करके बिना रूके सौ की गिनती तक कूदें। दो तीन मिनट आराम करके सौ तक की गिनती करते हुए रस्सी कूदें। चौथे सप्ताह तक आपको रस्सी कूदने का पूरा अभ्यास हो जाएगा। अब आप लगातार पंद्रह से बीस मिनट तक रस्सी कूद सकती है। इस व्यायाम से आपका स्वास्थ्य ठीक रहेगा व शरीर की मांसपेशियां भी मजबूत बनेंगी। रस्सी कूदने को अपने जीवन का नियम बना लें, फिर देखिए कि आप कितनी स्वस्थ व हष्ट-पुष्ट रहेंगी।